Wednesday, July 27, 2011

न चीर होंगे न हरण होगा !!!

पिछले दिनों कनाडा के टोरंटो शहर में एक पुलिस कांस्टेबल ने महिला विद्यार्थियों से कह दिया कि अवॉइड ड्रेसिंग लाइक स्लट्स......
पुलिसवाला नहीं जानता था कि उसकी इस एक टिप्पणी से तूफान आ जाएगा और स्लट वॉक नाम का आंदोलन शुरू हो जाएगा। महिलाएं कम कपड़े पहनकर सड़कों पर निकल आएंगी और  कहेंगी देखो कपडे कम हो या पूरे छेड़छाड़ न हो इसके लिए कपड़े नहीं वह  मानसिकता जिम्मेदार है जो ऐसा करना  अपना हक़ समझती है .
 आंदोलन की सोच ने समूचे कनाडा और अमेरिका को झकझोर डाला। महिलाओं ने यह बताने की कोशिश की कि अगर कम कपड़े पहनने पर आप हमें स्लट् यानी फूहड़, कुलटा और ढीठ की संज्ञा देंगे तो यही सही। ऐसा कहकर आप अपराधी को तो बरी कर देते हैं और स्त्री को अपराधी ठहरा देते हैं। यह और बात है कि सकारात्मक भाव के साथ दिल्ली पुलिस कमिश्नर बी.के. गुप्ता भी यही कह चुके हैं कि देर रात किसी महिला को बाहर निकलना हो तो वह अपने रिश्तेदार या फ्रेंड के साथ हो। जाहिर है पुलिस प्रशासन यह स्वीकार चुका है कि महिलाएं अपने भरोसेमंद पुरुष के साथ ही ज्यादा सुरक्षित हैं। जब स्त्री अपने-आप में ही असुरक्षित है तो उसके कपड़े और कम कपड़े  सुरक्षा की गारंटी को न तो बढ़ाते हैं और न घटाते ।
पूरे कपड़े ही यदि किसी स्त्री को महफूज रख सकते, तो नन्हीं बच्चियों के साथ बदसलूकी नहीं होती। घरों में लड़कियों पर यौनाचार नहीं होता। छोटे लड़कों के साथ अप्राकृतिक कृत्य नहीं होते। यहां प्रोवोक यानी उकसाने जैसी अवधारणा कहीं भी नहीं है, फिर भी अपराध होते हैं।
स्लट वॉक की तर्ज पर दिल्ली की उन्नीस वर्षीय कॉलेज छात्रा उमंग सबरवाल ने भी ऐसे ही आंदोलन की घोषणा की है। अभी वे फेसबुक पर भाव-भूमिका बना रही हैं। नाम रखा गया है स्लटवॉक, 2011 अर्थात बेशर्म मोर्चा। इसे बीस हजार लोगों की भगीदारी मिल चुकी है।
ढाई साल पहले शिवसेना ने वेलेंटाइन्स डे के अवसर पर मिलने वाले जोड़ों की शादी करा देने की बात कही थी, तब महिलाओं ने उन्हें पिंक चड्डी भेंट करने का अभियान चलाया था। यह विरोध भी स्लट वॉक की तर्ज पर ही था कि आप जैसा सोचते हैं हम उसी पर खरे उतरेंगे।  मंगलौर में श्रीराम सेना ने लड़कियों के पब में जाने का विरोध किया था तब तत्कालीन महिला एवं विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने पब भरो आंदोलन का समर्थन किया था। सच कहा जाए तो कम कपड़ों में सड़कों पर मोर्चा निकालना हो या पिंक चड्डी भेंट करनी हो या पब भरना, ये तरीके किसी वैचारिक चेतना को जाग्रत नहीं करते। तभी ये किसी बड़े अभियान का सूत्रपात भी नहीं कर पाते।
हमें स्वीकारना चाहिए कि समाज में कुंठाएं व्याप्त हैं। अखबार की साइट पर जाकर देखिए सबसे ज्यादा क्लिक किस खबर को मिलते हैं। देह व्यापार, देह पर रिसर्च जैसी शीर्षक वाली खबरें सबसे ज्यादा पढ़ी जाती हैं। आप खुशफहमी पाल सकते हैं कि शायद पाठक खबर से जुड़े रिसर्च में भी उतनी ही दिलचस्पी रखता हो। फिल्म पब्लिसिटी के तमाम हथकंडे इसी मानसिकता को ध्यान में रखकर अपनाए जाते हैं। खबरें कहती हैं कैटरीना कैफ ने इस फिल्म में रितिक रोशन को किस जरूर किया है, लेकिन अब उन्होंने तौबा कर ली है कि वे  किसी फिल्म में किस सीन नहीं करेंगी यहां तक की सलमान  के साथ भी नहीं। दर्शक सोचता है यही मौका है देख लो भाई।
स्लट वॉक या बेशर्म मोर्चा निकालने से मानसिकता में बदलाव आना दूर की कौड़ी लगती है। बुनियादी बात है सम्मान। अगर आप किसी का सम्मान नहीं करते तो सकारात्मक भाव नहीं ला सकते। स्त्री को मान देना हमने नहीं सीखा है। वह गर्भ से ही  बोझ है। बोझ इसलिए कि उसके पालन-पोषण में हजार दिक्कते हैं। इन हजार दिक्कतों के मूल में वही डर है कि वह कहीं भी कभी भी छेड़ी जा सकती है।  बलात्कार, दहेज जैसी तकलीफों से उसे मुक्ति मिल जाए तो शायद माता-पिता बेटी के जन्म पर भी थाली ही पीटेंगे।
 कम कपड़े पहनकर आप यदि यह समझाना चाह रही हैं कि हम सीमाओं में न बांधें  तो यह मुश्किल ही लगता है क्योंकि सती का विरोध सती होकर नहीं किया जा सकता और न ही
डायन बनकर यह व्यथा समझाई जा सकती है . बहरहाल, चीन का चाऊमीन, इटली का पीत्जा और अमेरिका से बर्गर के साथ अहंकार का आयात तो हमने कर लिया है अब आंदोलनों का भी आयात हो रहा है। यूरोपीय संदर्भ हमसे अलग है। उन्हें हमारे दौर से निकले हुए आधी सदी से ज्यादा बीत चुकी है।...फिर भी यदि दिल्ली में निकाले जा रहे बेशर्म मोर्चे से किसी एक की भी सोच बदलती है तो यह सार्थक होगा, न  चीर  होंगे  न  हरण होगा.

Thursday, July 21, 2011

दो बच्चों के साथ लापता मां का सुराग नहीं


खाली छोड़े गए फ्रेम में आप एक स्त्री
और दो बच्चों की तस्वीर की कल्पना
कर लीजिए। दो बच्चों के साथ लापता
मां का सुराग नहीं
शीर्षक के साथ यह खबर मय तस्वीर के मंगलवार को जयपुर के एक एक बड़े अखबार में प्रकाशित हुई है । खबर के अनुसार थाने में 13
जुलाई को रिपोर्ट दर्ज कराई गई कि
12 जुलाई को सुबह ग्यारह बजे उसकी [पति का नाम ]
पत्नी (27), बेटी (11) और बेटा (2)
के साथ कहीं चली गई। उसके पास
चालीस हजार रुपए भी हैं। यह रकम
पति ने मकान का पट्टा प्राप्त करने के
लिए दी थी। पति और उसके परिजनों ने
महिला को किसी व्यक्ति द्वारा बहलाकर
ले जाने की आशंका व्यक्त की है।
सवाल यह उठता है कि किसी भी
महिला की तस्वीर छापकर या उसे
'भगौरिया घोषित कर हम क्या बताना
चाहते हैं। वह  वयस्क और दो
बच्चों की मां है। बच्चे भले ही नाबालिग
हों, मां बालिग है और अपने फैसले ले सकती है। ऐसी खबरें किसी भी
स्त्री के आत्न्सम्मान को ठेस ही
पहुंचाएगी। यह कहकर भी
अपमान किया गया है कि कोई उसे
बहला-फुसलाकर ले गया और वह
चालीस हजार रुपए लेकर गई है यानी
चोर कहने से भी कोई बाज नहीं आया
है। यह सूचना मय स्त्री और बच्चों की
तस्वीर के है। एक किशोर होती बच्ची
और मासूम बेटे को गैर-इरादतन दंडित
करने की यह मिसाल समाज में स्त्री को
अपनी भूमिका पर गौर करने के लिए
प्रेरित करती है।
शायद यहां पत्रकार का इरादा उस
महिला का सुराग भर लगाने का रहा
हो, लेकिन  एक अखबार किस हद तक जाकर सुराग लगाने की कोशिश कर 

सकता है इस पर भी विचार ज़रूरी है .यह मीडिया डॉन [मुग़ल नहीं] रूपर्ट मर्डोक से कम बड़ा अपराध नहीं कि लोगों की निजता में इतना दखल हो और स्त्री का घर से जाना भी सुर्ख़ियों में हो .
ऐसी ही अवमानना से स्त्री को बचाने के
लिए सर्वोच्च न्यायालय ने बलात्कार जैसे
मामलों में स्त्री का नाम न छापने के दिशा निर्देश दिए हैं, यहां तक कि

वेश्यावृत्ति कानून के तहत आप उनकी
तस्वीर भी  आम नहीं कर सकते। न्याय
प्रक्रिया के दौरान भी बलात्कार पीड़िता की पहचान
उजागर करना जरूरी नहीं है। रास्ते
निकाल लिए गए है मुंह पर कपड़ा
डालकर तस्वीरें छाप दी जाती हैं।
बहुत कम पीडि़त स्त्रियां इस हिम्मत  के साथ सामने आई होंगी कि हां
हमें इंसाफ चाहिए, हमारे साथ हुआ है
अन्याय। दरअसल, समूची परिस्थितियां
ही काफी शर्मिंदगी उठाने वाली होती हैं,
जो उन्हें बलात्कार जैसी दरिंदगी जितनी
ही खौफनाक लगती हैं।
बहरहाल भारतीय दंड विधान की
धारा 366 के तहत किसी महिला को
उसकी मर्जी के खिलाफ ले जाने
और उसके साथ ज्यादती करने पर
अधिकतम दस साल की सजा और
जुर्माने का प्रावधान है। आपराधिक
खबरों को पढ़ते हुए पाठक महसूस
करता है कि वह एक बने बनाए फ्रेम में
होती हैं, जैसे मामला दर्ज करने से
पहले उसे कानूनी धाराओं में फिट
करना हो।  इन ख़बरों में अक्सर लड़कियां या महिलाएं
बहला-फुसलाकर ही ले जाई जाती हैं,
वे घर से धन लेकर भी भागी होती हैं।
इस मामले में भी यही है। स्त्री की
तस्वीर देकर  उसे घोषित अपराधी बना दिया गया है
कई वर्षों से अखबार में क्राइम
रिपोर्टिंग  संभाल रहे
वरिष्ठ पत्रकार का कहना है- ऐसे
मामले वाकई संवेदनशील हैं किसी ने
इस बारे में आवाज नहीं उठाई, इसलिए
ऐसा चल रहा है। यहां अखबार और
पुलिस का इरादा महिला को नुकसान
पहुंचाने का नहीं होगा, लेकिन ऐसा हो
जाता है। ऐसी खबरों से दूरी बरता जाना
ही बेहतर होता है।
दरअसल, हमारी निगाह में महिला
के निर्णय का कोई मान नहीं है। यही
माना जाता है कि वह इस्तेमाल
हो सकती है। कोई स्त्री कभी अपने पति
के लिए ऐसा मुकदमा दर्ज नहीं करा
सकती कि उसका पति पैसे लेकर दो
बच्चों के साथ चला गया है। यह तो
उसका हक है, वह जहां चाहे जाए। न
मुकदमा दर्ज होगा, ना अखबार में
तस्वीर छपेगी।
स्त्री को अब भी अबोध [ बेवक़ूफ़  भी ] और मिल्कियत
माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ बरसों
से शहरी इलाकों में शिक्षा पर दिए जा
रहे जोर से उसमें फैसला लेने की ताकत
आई है। उसके फैसलों को नासमझी
और नादानी बताने की होड़ चारों तरफ
है। ऐसे में कई बार वह जलील भी की
जाती है। अपने फैसलों को मान दिला
पाने की लड़ाई लंबी है। कई बार उसके
दिमाग पर देह को हावी कर दिया जाता
है। स्त्री देह पाने का मतलब यह नहीं है
कि वह दिमाग भी नाजुक-सा लेकर
पैदा हुई है। उसे गरिमा से जीने का हक
तो हमें देना ही होगा। यूं बेवजह अपराधी
बनने के लिए उसे भी प्रस्तुत नहीं होना
चाहिए। खुद को बुलंद करने के बाद ही
खुदा की रजामंदी मिलती है।

Wednesday, July 13, 2011

मेरे करीब मेरे पास

यादों में मसरूफ़ एक सुबह















तुम्हारे आते ही भीग जाती हैं ये आंखें
इतनी शिद्दत से कोई नहीं आता मेरे पास


ये जो धरती का सिंगार देख रहे हो इन दिनों
  इतना हरापन तुम्हीं से आया है मेरे पास
 
हर मुश्किल हालात में मेरा तेरी ओर ताकना
अब कहीं से कोई जवाब नहीं आता मेरे पास

टूटते तारे का नज़र आना भी अच्छा होता है
कभी गम में शरीक होने ही आ जाओ मेरे पास


ये जो मधुर कलरव हमारे पंछियों का है
तुम हो यहीं
मेरे बेहद करीब मेरे पास

Sunday, July 10, 2011

जान का सदका





मैं फिर जिंदा हो जाना चाहती हूँ
तेरी जान का सदका लेना चाहती हूँ
 
नज़र ए बद से दुआ का सफ़र
एक  पल में करना चाहती हूँ
 


ये जो ख्वाहिश  दिल ने की है अल सुबह
तेरे ज़ख्मों में खुद को पैबस्त करना चाहती हूँ

 माजी कहकर भूलने को न कहना दोस्त
स्वर्णिम दौर को लौटा लाना चाहती हूँ
 

पाषाण युग से यही आरज़ू  रही है मेरी
तेरे लिए कायनात किनारे कर देना चाहती हूँ
 
यह लोह-ओ-क़लम  भी ले जा रहा है तेरे  करीब
मैं तो बस इसमें सवार हो जाना चाहती हूँ
 
होगी जब कभी क़यामत एक रोज़
 मैं  पूरी तरह सज जाना चाहती हूँ

Friday, July 1, 2011

जीना नहीं आएगा

 इसमें न कविता की लय है न ग़ज़ल का सलीका ...एक असर है जो बस मुखर हो जाना चाहता है . . .



तेरे बिना जीना नहीं आएगा
बिन
बरसे सावन  कैसे जाएगा
 

बेमायने है सहज होने की कल्पना
समंदर
अपना अक्स छोड़  ही जाएगा
 
 
 
ये जो सीली-सीली सी आँखें हैं मेरी
एक दिन आएगा पानी सूख जाएगा

जानते हो वह दिन क़यामत का होगा
तेरा-मेरा सिलसिला फिर जुड़ जाएगा

 

  इसे विलाप का आलाप न समझना दोस्त
आस का यह दिया अब नहीं बुझाया जाएगा