Friday, June 24, 2011

वह चुप है

राजस्थान विश्वविद्यालय के परिसर में लों की परीक्षा देकर लौट रही एक छात्रा को छात्र छेड़ने के बाद पीटते रहे लेकिन कोई आगे नहीं आया और तो और घटना  के बाद प्रतिकार  स्वरुप किसी नेता, छात्र नेता का बयान भी नहीं आया  है ...यदि एक भी नेता/कुलपति  यह कह दे कि यदि दोबारा ऐसी घटना परिसर हुई तो ऐसे छात्रों का विश्वविद्यालय में पढ़ना मुश्किल हो जाएगा तब शायद अनुशासन का सायरन बजे. शायद तब भी नहीं .यहाँ तो न किसी को पढ़ना है न पढ़ाना . होठ तो अब छात्रा ने भी सी लिए हैं ...यह चुप्पी चौंकाती है और संकेत देती है कि सब कुछ ऐसे  ही चलता रहेगा
शुभदा अपनी उम्र के तीन दशक पार
कर चुकी हैं, लेकिन आज वे चौदह
की उम्र में घटे जिस वाकये को
सहजता से सुना रही थीं तब दिल में
केवल दहशत थी। बचपन से ही
खेलने-कूदने में शुभदा की
दिलचस्पी थी। नए बन रहे मकानों
की
छतों से रेत के ढेरों पर कूदना
शुभदा के ग्रुप के बच्चों का शौक था।
उस दिन शुभदा ने घेरदार स्कर्ट
पहन रखी थी। नीचे कूदते ही वह
स्कर्ट छतरी की तरह खुल गई।
शुभदा बहुत घबरा गई और उसे खुद
पर शर्म आने लगी। बाजू से
शरारती लड़कों का समूह गुजर रहा
था। उनकी
सीटियों  और तालियों ने शुभदा को रुआंसा कर दिया 
और वे आज भी जैसे उसके कानों में गूंजती हैं
बात वहीं खत्म नहीं हुई थी। शुभदा
जब भी घर से निकलती ये लड़के
चिल्ला कर छेड़ते... उड़ गई रे!
घटना भी जैसे उड़कर पूरे मोहल्ले
के लड़कों की जुबां में समा गई थी।
शुभदा जहां से गुजरती, यही फिकरे
सुनने को मिलते। घर से निकलने में
डर लगता। स्कूल जाना  भारी
पड़ता। मां कोई काम कहती तो वह
टाल देती। सपने में उसे उड़ गई
रे... का अट्टाहस सुनाई देता। वह
खुद को अपराधी महसूस करने
लगी। उसे उस स्कर्ट से ही नफरत
हो गई ।
आज शुभदा कहती हैं, मैंने
इसके बारे में किसी को नहीं बताया।
क्या बताती मम्मी पापा को। मेरी
शिकायत में 
क्या दम था। मैं तो खुद
को ही दोषी मान रही थी। लेकिन
उन लड़कों के फिकरों ने मुझे तीन
साल तक सहज नहीं रहने दिया।
थोड़ी समझ आई तो खुद ही इसका
नोटिस लेना बंद कर दिया। बाद में
इंजीनियरिंग में चयन हो गया तो
उनकी जुबां को भी ताले लग गए।
... लेकिन आज कोई मुझसे पूछे
तो मैं कहूंगी मेरे जीवन के सर्वाधिक
मुश्किल साल वही थे। भय और
अपराधबोध ने मुझसे मेरा वह समय
छीन लिया था। अब लगता है कि
क्यों नहीं मैं गूंज गई किसी सायरन
की तरह। मेरी गलती ही
क्या थी जो
मैंने यह सब सहा? शुभदा जैसे उस
दौर से निकल ही नहीं पा रही थी।
आज यही सब जयपुर में
एलएलबी की वह छात्रा सह रही है।
सोमवार को जब वह एलएलबी का
पर्चा देकर लौट रही थी तो तीन-चार
लड़कों (कथित छात्र) ने उसे छेड़ा।
जब लड़की ने छेडख़ानी का विरोध
किया तो उन्होंने उसे पीटना शुरू कर
दिया। उसके स्कूटर में तोडफ़ोड़
करनी शुरू कर दी। वहां मौजूद
किसी ने भी इस लड़की की मदद
नहीं की। लड़की
हिम्मत कर
उनसे छूटी और मोबाइल से 100
नंबर डायल कर पुलिस सहायता की
गुहार लगाई। छात्रावास में रह रही
इस लड़की के साथ राजस्थान
विश्वविद्यालय परिसर में घटी यह
घटना इसलिए भी शर्मनाक है,योंकि बचाने के लिए कोई आगे
नहीं आया। लड़की ने लड़कों का
मुकाबला करने की कोशिश की थी।
उनहें यह कब बर्दाश्त होता। 
'हैप्पी एंडिंग  ' होती अगर लड़की की
शिकायत पर लड़के हवालात में होते।
मंगलवार की सुबह डेली न्यूज
रिपोर्टर करुणा शर्मा जब छात्रावास
पहुंची, तो वहां मरघट-सा सन्नाटा
पाया। भीतर जाने की इजाजत
किसी को नहीं थी। पुलिस के दो
जवान लड़की के बयान दर्ज करने
आए थे। महिला पुलिस नहीं थी।
वार्डन ने साफ कहा कि लड़की कोई
बयान नहीं देना चाहती। यहां सब
कल से परेशान हैं और लड़की सुबह
से सिर्फ रोए जा रही है।
क्यों  रो रही है वह? क्या
गलती है उसकी? वह लॉ की
परीक्षा दे रही है और लॉ में ही
उसका यकीन नहीं? यूं तो सारी
घटना सबके सामने है, लेकिन
औपचारिक तौर पर वह कोई बयान
दर्ज नहीं कराना चाहती। नहीं आना
चाहती किसी के सामने। उसे भय है
कि वे लड़के हैं और वह लड़की।
उसका बाहर निकलना मुश्किल हो
सकता है। अभी तो हमला किया है
आगे किसी भी हद तक जा सकते
हैं। यही आशंकाएं उसे चुप रहने पर
मजबूर कर रही हैं। लड़कियों की
इन्हीं आशंकाओं (बेशक ये निर्मूल
नहीं हैं) ने बदमाशों की
कारस्तानियों को हवा दी है। वे
चाहते हैं कि वे हमारी छेडख़ानियों
को सर झुकाकर लें। ट्रैफिक
सिग्नल पर गलती करने वाले लड़के
को बोलकर देखिए कुछ, उसके अहं
को ऐसी चोट लगती है कि वह
आपको कट-मारकर गिरा देना
चाहता है। उसे बर्दाश्त नहीं कि आप
कुछ भी कहें। आपकी
चुप्पी में
उसका सुख है।
एलएलबी करने वाली बहादुर
लड़की... हिमत मत हारो।
आंसुओं में मत डूबो।
तुम्हारी कोई
गलती नहीं। गलती तो अब होगी गर
चुप रह
गयी

Wednesday, June 15, 2011

जय डे

jyotirmay dey ie  j dey
 चार साल पहले एक लड़की आई थी। दीदी मेरा बहुत मन है पत्रकारिता की पढ़ाई करने का।  चयन हो गया और मैं इस फील्ड में अपना करियर बनाना चाहती हूं। फिर दिक्कत क्या है? ... 'पापा मना कर रहे हैं, एक बार आप चलकर उनसे बात कर लो शायद वे मान जाएं।' उसने कहा। आखिर, वे मना क्यों कर रहे हैं। 'पापा को लगता है कि इस फील्ड में खतरा ज्यादा है और पैसा भी नहीं। वे चाहते हैं कि मैं एमबीए कर लूं या फिर कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स देकर  सेफ करियर चुनूं। 'लिखने -पढऩे वाली लड़की थी। पापा का सम्मान करती थी। पत्रकारिता में नहीं आई, आज उसके  पास बढिय़ा सरकारी नौकरी है।
इससे कुछ और पहले एक लड़का भी पत्रकारिता में आया था। बड़े पैशन के साथ लेकिन मनमाफिक काम नहीं मिलने और कम तनख्वाह ने उसके पैशन की हवा निकाल दी। कुछ समर्पण और प्रतिबद्धता की भी कमी रही होगी, जो ये दोनों अखबारनवीसी को अपना नहीं पाए। सवालों के इन चक्रव्यूहों से निकलकर जो युवा इस विधा को अपना पेशा बनाता है, वह बेशक प्रतिबद्ध होता है, सुनिश्चित होता है। पैसा भले कम सही, लेकिन समाज के लिए कुछ नेक काम वह  कर जाना चाहता है। उसका पेशा उन्हें उन लोगों से अलग करता है जो प्रोडक्ट बेचने की कवायद में किसी भी हद तक जा सकते हैं। मार्केटिंग से जुड़े लोगों के लिए अखबार भी किसी प्रोडक्ट से कम नहीं, लेकिन एक पत्रकार को अब भी ऐसे शब्दों पर ऐतराज होता है। यहां उन लोगों की बात नहीं हो रही है जो पत्रकारिता में भी सिफारिशी  सीढिय़ां लांघ कर आए हैं।
सच्ची खबर लिखने वाले पत्रकार थे जे डे। पूरा नाम ज्योतिर्मय डे जिन्हे मुंबई [पवई ] में 11  जून की दोपहर चार बंदूकधारियों ने आठ गोलियां मारकर मौत के घाट उतार दिया। मुंबई से प्रकाशित मिड डे के इस खोजी क्राइम रिपोर्टर की अंतिम स्टोरीज पर गौर कीजिए-
1 अठारह मई 2011 को प्रकाशित जे की स्टोरी में 109 साल पुरानी सीताराम बिल्डिंग को जमींदोज कर दस माले की बिल्डिंग बनाने का विरोध किया था ताकि ऊंचाई से मुंबई पुलिस कमिश्नर ऑफिस को निशाना ना बनाया जा सके।   
2 सोलह मई को पेट्रोल के दाम बढ़ते ही उन्होंने स्टोरी ब्रेक की जो मुंबई के दस हजार करोड़ रुपए के तेल गिरोह  का भंडा फोड़ कर रही थी।
दस मई की एक स्टोरी में जे ने बताया था कि ओसामा की मौत दाऊद को लंबा जीने में मदद करेगी क्योंकि भारत के मोस्ट वांटेड के लिए पाकिस्तानी आईएसआई ने सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है।
तेरह जून को मुंबई के तमाम पत्रकारों ने रैली निकालकर मुख्यमंत्री से मांग की कि जे डे की हत्या की जांच सीबीआई से कराई जाए, लेकिन सरकारों में अब सुनने का चलन कहां है। दो सालों में मुंबई के 180 पत्रकार हमले के शिकार हुए हैं। पत्रकार जे डे ईमानदार थे। उनकी पुस्तक जीरो डायल के  विमोचन में अभिनेता अजय देवगन मौजूद थे। अजय ने उन्हें  करीबी मित्र बताते हुए कहा है कि वे बहुत ही विनम्र थे और नपा-तुला बोलते थे, लेकिन उनका काम हजार शब्दों में बात करता था। जीरो डायल पुलिस इन्फॉरमर्स के बारे में लिखी किताब है और खल्लास में उन शब्दावलियों का खुलासा है जो अंडरवर्ल्ड में बतौर कोडवर्ड चलती हैं। मौत से पहले तक जे डे अंडरवर्ल्ड और ऑइल माफिया से जुड़ी किताब पर काम कर रहे थे। मिड डे से पहले इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स में काम कर चुके जे डे की सारी समझ जैसे माफिया के खिलाफ थी और माफिया कब अपने खिलाफ कुछ बरदाश्त करता है। जे डे नई पीढ़ी को बेहतर प्रशिक्षण देने में यकीन रखते थे। उम्मीद है कि जे डे की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। पत्रकारिता में प्रतिबद्ध लोगों का ही प्रवेश होगा। करियर से बड़ा मिशन होगा जो चोरी और सीनाजोरी का  पर्दाफाश करेगा। जय डे।

Friday, June 10, 2011

या हुसैन !!

naman: in mumbayee at mahboob studio..image shahid mirza
मकबूल फिदा हुसैन से दिल्ली, मुंबई और इंदौर में हुईं आठ मुलाकातें उन पर लिखने का हक नहीं दे देतीं, न ईरानी होटल में उनके साथ ली गई चाय की चुस्की और न ही कफ परेड स्थित उनके फ्लैट पर खाई बिरियानी , न महबूब स्टूडियो में गजगामिनी के लिए लगाया गया सेट, न वरली नाका में उनका एक साथ पांच बड़े पैनल पर रंगों से खेलना और न ही इंदौर के कॉफी हॉउस में घंटों उनकी सोहबत। दरअसल, हुसैन बाबा से हुईं ये सारी मुलाकातें एक भीतरी परिवर्तन के दौर से गुजरने की कवायद है। आप एक कायांतरण सा महसूस करते हैं, आप विकसित होते चले जाते हैं, आपके भ्रम टूटते चले जाते हैं, माधुरी पर लट्टू एक बूढ़े की छवि तहस-नहस होती है। हमारे देवी-देवताओं को नग्न चित्रित करने वाला दृष्टिकोण चकनाचूर हो जाता है, जब आप उनकी फिल्म गजगामिनी के चरित्रों में भारतीय दर्शन को महसूस करते हैं। उनकी कला में छुपे दर्शन को उनके विरोधियों ने नहीं पहचाना। इसी के चलते उन्हें देश छोड़ना पड़ा। वे कभी लंदन तो कभी दुबई के बीच झूलते रहे। कुछ लोगों ने इसे ओढ़ा हुआ निर्वासन कहा। इस बीच किसी सरकार या समूह ने हुसैन को यह भरोसा नहीं दिया कि हे भारत! के चितेरे, तुम निर्भय होकर आओ, हम तुम्हारे साथ हैं। चार साल तक ठोकरें खाने के बाद उन्होंने कतर को चुना। शायद उस देश को, जिसने उन्हें बेखौफ जीने का आश्वासन दिया होगा।
m. f. hussain n shahid mirza at indian coffee house indore
वे कहीं भी गए, लेकिन उनके पोर-पोर से इस देश की माटी की खुशबू आती है। कहीं से न फिरके का बोध होता न अहंकार का, जिंदा रहने को आतुर एक ऎसा शख्स, जो अगले पल क्या करेगा, खुद उसे भी ख्याल नहीं, गजगामिनी की शूटिंग के दौरान रात दो-ढाई बजे माधुरी दीक्षित से लेकर स्पॉट बॉय तक उबासी लेने लगते, लेकिन तब अस्सी साल के बाबा के चेहरे पर थकान का नामों निशां नहीं होता। वे बहुत थोड़ा-थोड़ा खाते। पसंदीदा ग्वार फली की सब्जी भी उन्हें ज्यादा खाने के लिए उकसा नहीं पाती थी। चाय के  घूँट उन्हें हर आधे घंटे हलक में उतरने के लिए मजबूर करते। एक बार बाबा की प्लेट में बिरियानी परोसी गई। गोश्त के टुकड़े शायद कुछ कम होंगे, बाबा बोल पड़े... बिरियानी की आबरू आज कुछ कम सी लग रही है। ऎसे न जाने कितने लम्हें आज आ-जा रहे हैं। वे शाहिद मिर्ज़ा साहब को गजगामिनी के गीत सुनाना चाहते थे . समय कम था एक ही उपाय था कफ़ परेड से मुम्बई सेंट्रल की दूरी तय करते हुए इसे सुना जाए...बाबा ने गाडी का स्टेरिंग थमा और पूरे रास्ते न केवल गीत बजाए बल्कि उनकी व्याख्या भी करते गए...यह अलग कहानी कि उस दिन हमने ट्रेन पकड़ी भी या नहीं.
एक बार बिना तैयारी से आए किसी पत्रकार ने उनसे पूछ लिया... आप घोड़े ही क्यों बनाते हैं? वे तपाक से बोल पड़े...आपने ये लाल कमीज ही क्यों पहन रखी है, यह काला चश्मा क्यों लगा रखा है...मैं भी घोड़े बनाता हूं...इसका क्या जवाब हो सकता है। कम लोग जानते होंगे की बाबा शेर-ओ-शायरी पर कमाल की पकड़ रखते थे। उन्होंने फिल्म गजगामिनी के गीत और "मीनाक्षी अ टेल ऑव थ्री सिटीज" के लिए कव्वाली भी लिखी थी उनका एक शेर...
न आब्लों से पाँव के घबरा गया था मैं, 
जी खुश हुआ है राह को पुरखार देख कर।...
पांव के छाले देख मैं घबरा गया था, लेकिन अब राह में कांटे ही कांटे ही देख कर मन प्रसन्न हो रहा है। जीवन की चुनौतियों को हंसते-हंसते स्वीकारने वाले बाबा की सिर्फ देह ने हमसे विदा ली है, उनकी कला और उससे भी बड़ा उनका भारत प्रेम कइयों को अनंत काल तक स्पंदित करता रहेगा और कई लोगों को वह दर्द भी, जो उन्हें एक भारतीय होने के नाते मिला। दुनिया अपने कवि और कलाकारों की पूजा करती है और हम उन्हें देश से बाहर जीने-मरने के लिए मजबूर करते हैं। उन्हें उस आबोहवा से दूर करते हैं, जो उनके लिए प्रेरणा का काम करती रही है।

हुसैन औए पिकासो
पूरी दुनिया में ख्यात स्पेनिश पेंटर पाब्लो पिकासो के नाम पर हुसैन को भी भारत का पिकासो कहकर याद किया जा रहा  है । यूं पचहत्तर पूरे करते हुए हुसैन ने कहा भी था कि पिकासो की जीवन में दो ही इच्छाएं थीं लम्बा जीवन और जीवन के अंत में खूब सारा काम छोड़ जाना उनकी इच्छाएं पूरी भी हुईं। वे ९२ साल तक जीए और अंतिम २० वर्ष  उन्होंने खूब सारा काम किया। हुसैन बाबा ने भी खूब काम किया है इतना कि पीढियां अचरज करेंगी, उनकी उम्र और ऊर्जा, उनसे लगतार काम करवाती रही। यह धरोहर बेशकीमती है। उम्मीद है कि अब किसी हुसैन गुफा या हुसैन के स्टूडियो को आतातायियों का शिकार नहीं होना पड़ेगा। न किसी अदालत में मकबूल फिदा हुसैन हाजिर हो की गुहार लगेगी। मौत के हिस्से भी कुछ सुकून तो आते ही हैं। भारत के इस खूबसूरत चितेरे को नमन...

Wednesday, June 8, 2011

क्या होता है दुर्भाग्यपूर्ण ?

दुर्भाग्यपूर्ण । भारतीय राजनीति में इस एक  शब्द का जितना
दुरुपयोग हुआ है वह वाकई दुर्भाग्यपूर्णहै। क्या होता है यह दुर्भाग्यपूर्ण? सत्ता आपके पास है, फैसले आप लेते हो, डंडे
आप चलाते हो और ऊपर से कहते हो दुर्भाग्यपूर्ण। दुर्भाग्यपूर्ण
आप खुद  ही तो नहीं। इस देश के लिए। प्रजातंत्र के लिए।
ईमानदारी के लिए। महंगाई के लिए। फेहरिस्त लंबी है। गिनते
चले जाइए। आधी रात के बाद यदि यह भीड़  को तितर-बितर करने का
षड्यंत्र था, तो बेशक यह लोकतंत्र के खिलाफ था। भीड़
यदि खतरा है, तो प्रजातंत्र  भी  खतरा है। स्वयं आपकी सरकार खतरा है, क्योंकि यह सब भीड़ का ही नतीजा है। शायर अल्लामा इकबाल ने कहा भी है  जम्हूरियत यानी प्रजातंत्र वह तर्ज
-ए-हुकूमत है, जहां बंदों को तौला नहीं, गिना जाता है।
बाबा रामदेव कितने सच्चे
हैं, उन्हें योग सि खा ना चाहिए,
राजनीति नहीं करनी चाहिए, इन
सब बातों का रामलीला मैदान
पर हुए अनशन से कोई ताल्लुक
नहीं होना चाहिए। बच्चन साहब एक्टर  हैं एक्टिंग  ही करनी
चाहिए, अरुण शौरी को सिर्फपत्रकारिता और किरण बेदी को सामाजिक कार्यकर्ता की सरहद नहीं लांघनी चाहिए। कौन तय करेगा यह?. . . और किसी नेस्वयं तय कर लिया है, तो वह सरकार नियोजित डंडे खाने के लिए तैयार रहे। चार जून की देर रात को हुई उस धोखाधड़ी
की कार्रवाही के दौरान 75 फीसदी लोगों को चोट आई।
इक्यावन वर्षीय राजबाला को रीढ़ की हड्डी पर गहरी चोट है
और 24 साल के सुनील का सिर फूट चुका है। दोनों ही जीवन और मृत्यु से संघर्ष कर रहे हैं। 
बेशक ,यह अलग मुद्दे हैं
कि बाबा रामदेव से श्रेष्ठ अन्ना हजारे हैं कि बाबा रामदेव ने
विदेश में लंबी चौड़ी जमीनें खरीदी हैं कि उन्होंने अनशन को
अतिरिक्त  भव्यता दी कि पढ़ा -लिखा  युवा अन्ना हजारे से
स्वत:स्फूर्त जुड़ गया था कि बाबा रामदेव राजनीतिक पार्टी
का निर्माण कर चुके हैं। इनमें से सारी बातें अगर सच भी हैं
तब भी चार जून की रात के घटनाक्रम को न्यायोचित नहीं
ठहराया जा सकता। यूं ही लोगों को जनरल डायर की करतूत
याद नहीं आई। अंग्रेजी हुकूमत के इस जनरल ने 13 अप्रैल
1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में
अंधाधुंध गोलियां चलवाई थीं। स्त्री-पुरुष, बच्चे सब निहत्थे थे।
डेढ़ हजार से ज्यादा लाशें बिछी थीं तब। यहां रामलीला मैदान में
सब उनिंदे थे। जिस संस्कृति में सोते हुए पेड़-पौधों को जगाना भी अपराध है वहां लाठियां बरसाई गईं। आंसू गैस छोड़ी
गई।
गौरतलब है कि जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हवा बन गई थी।
लकवे का शिकार डायर अंतिम
समय में यही बुदबुदाते हुए मर
गया - 'कुछ लोग कहते हैं मैंने
ठीक किया और कुछ कहते हैं
गलत किया। अब मैं मर जाना
चाहता हूं और गॉड से पूछना
चाहता हूं कि मैं सही था या
गलत।
हमारी हुकूमत करने की शैली अंग्रेजों जैसी है। कुछ देते
हैं, तो एहसान की मुद्रा में और छीनते हैं, तो डाकू और हत्यारों
की तरह। इन दिनों एक छपा हुआ विज्ञापन हर जगह नजर
आता है। तस्वीर में  भूखे बच्चे स्कूल आकर खाना खाते हैं।
सरकार उन्हें पौष्टिक भोजन देती है। आजादी के 64 सालों बाद
तक सरकार को अपनी जनता को  भीख  देनी पड़ रही है। खाना
देंगे, स्कूल आओ पढऩे के लिए। ये तरीके एक नागरिक के भीतर स्वाभिमान नहीं जगाते होंगे। उल्टे रौंदते हैं। भूखे बच्चों
की इन कतारों के ऊपर दो तस्वीरें चस्पा होती हैं। सत्ताधारी
उम्रदराज पुरुष और स्त्री की। यह जताते हुए कि देखो , हम कितना कर रहे हैं इन लोगों के लिए। दरअसल, एक बड़ी खाई बन चुकी है हुकूमत और जनता के बीच। भरोसा उठ चुका है। यह महत्वपूर्ण समय काल
है। संक्रमण का दौर है। समय सबको दर्ज करेगा। जो चुप हैं
उनका भी हिसाब लिखा जाएगा।

Thursday, June 2, 2011

भाषा की समझ

पिछले दिनों एक कविता पढ़ी...अच्छी लगी...आप भी देखें.


भाषा की समझ

 अजितकुमार

फर्क था बहुत
मेरी और उनकी बोली में।
जब वे मांगते थे पानी
उठा लाता था मैं  कपड़े।
जब मैं चाहता था एकांत
सुलगा देते थे वे अंगीठी।
एक पुस्तक थी हमारे पास
जाने किस भाष में लिखी,
मैं कहता था ज फ ग ट ह
वे  न म ल व र
उच्चारण ही क्यों,
अर्थग्रहण में भी
अंतर था।
बावजूद इसके,
 जब तक प्रेम था हमारे बीच
वह समझ में आता रहा।
फिर विरक्ति को भी हम
धीर-धीरे
समझने लगे।