Wednesday, May 25, 2011

पाक कलश

nature smiles: kalash woman


 wonder vally : kalash
दुनिया का सबसे चर्चित मुल्क पाकिस्तान। आतंकियों को पनाह देने वाला, लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने वाला] सैनिक-गैर सैनिक हुक्मरानो की अदूरदर्शी नीतियों का शिकार पाकिस्तान। अमेरिका की गोद में बैठकर उसी से नफरत करने वाला पाकिस्तान। औरतों के हक की अनदेखी करता पाकिस्तान और पड़ोसी भारत को बेवजह हौव्वा मानने वाला पाकिस्तान।
... लेकिन इसी पाकिस्तान में एक बेहद खूबसूरत जगह है कलश। नाम जितनी ही पवित्र और सुंदर। पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम और हिंदु कुश हिमालय पर्वत शृखलाओं के बीच बसी जन्नत के नजारे वाली इस घाटी के बाशिंदे आजाद खयाल हैं। स्त्री परदे में नहीं है।  एक ऐसा त्योहार भी इस घाटी में मनता है जब एक लड़की के लिए सब कुछ मुमकिन है। वह अपने प्रेम का इजहार कर सकती है और अपनी शादी को तोड़ सकती है। बेशक, यह पाकिस्तान की आम औरतों की जिंदगी से बिलकुल अलग है। बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप से अलग है।
बीबीसी वेब पर प्रकाशित एक आलेख के मुताबिक कलश घाटी के लोग इस्लाम धर्म की बजाय तमाम देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। पहाड़ी घर आपस में सटे हुए हैं। छत और बरामदे जुड़े हैं। छोटा और बंद समाज है। रास्ता मुश्किल है इसलिए बाहरी असर ना के बराबर है। घाटियों में मंदिर बने हैं, जहां मुसलमानों और औरतों के जाने पर पाबंदी है। अजीब यह भी है कि गर्भावस्था और खास दिनों के दौरान स्त्रियां गांव से बाहर अलग घर में रहती हैं। यह परंपरा पुरानी है, लेकिन ज्यादती की शिकायतें नहीं मिलती हैं।
कलश घाटी की अपनी भाषा और संगीत है। संस्कृति पर इंडो-ग्रीक असर हावी है। रंगत और नैन-नक्श काफी कुछ यूरोप का अक्स पैदा करते हैं। भाषा खोवार है। भाषा पर गौर कीजिये हड्डी को अथी [संस्कृत में अस्थि ]; गाँव को ग्रोम [ग्राम]; बेटे को पुट [पुत्र ];नाश को वे भी नाश ही कहते हैं । इस भाषा का लिखित प्रयोग ना के बराबर है। बहुत कोशिश की गई कि खोवार भाषा को रोमन लिपि में ही लिखा जाए, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। लिखा-पढ़ी उर्दू में ही होती है।यहां के लोगों को खो कहा जाता है
माना जाता है कि तीन से चार हजार साल पहले इनके पुरखे यहां आकर बसे थे। सिकंदर महान भी यहां आए थे। सिकंदर के इतिहास में  दर्ज है कि जब वे इस इलाके से गुजरे तो वहां उन्होंने जिन लकडिय़ों का इस्तेमाल आग जलाने के लिए किया वे कोफीन थे, जिसमें मृत देह को रखा जाता था। वहां के लोगों को बेहद गोरे और नाजुक देहवाला बताया गया यानी ठीक वैसा ही जैसे वे  खुद थे। घाटी के लोग एक खास  धर्म को मानने वाले थे, जो युनानी देवी-देवताओं से काफी मिलता-जुलता था। ऐसा नहीं है कि यूनानी मूल के लोग यहां आकर बसे, बल्कि दोनों का ही मूल एक रहा होगा। एक मत यह भी कहता है कि सिकंदर के कुछ सैनिक यहीं बस गए थे और ये उन्हीं के वंशज है।
बहरहाल,  पवित्र और बाहरी हस्तक्षेप से अछूते इलाके में अब पाकिस्तान सरकार को पर्यटन की बेशुमार संभावनाएं नजर आने लगी हैं । कलश के लोग नहीं चाहते कि यहां की पाक जमीं पर बाहरी दखल हो। होटल बने। इलाका खाली बोतलों और कांच के गिलासों से पट जाए। छोटी-सी घाटी में इस कचरे को दफनाने का कोई उपाय नहीं है। कलश के लोग दुखी हैं। वे आग्रह करते हैं कि घाटी को इस दबाव से मुक्त किया जाए।
मौसम बच्चों की छुट्टियों का है। वे माता-पिता के साथ पहाड़ों पर जाना चाहते हैं। पर्यटन ज्ञान और समझ बढ़ाने का बेहतरीन जरिया है, लेकिन क्या जरूरी है कि प्रचलित पहाड़ ही चुने जाएं। वहां भीड़ और होटल्स के अलावा बहुत कम जानने के लिए होता है। क्यों नहीं वे इलाके चुनें जाएं जो थोड़े भीतरी हो। वहां की सभ्यता से जोड़ते हो। क्यों सैर का मकसद डायरी में एक शहर की उपस्थिति भर हो? कलश के बाशिंदों का भी यही एतराज है कि सरकार इस इलाके को एक मुश्त दुह लेना चाहती है वरना, मेल-जोल से किसे दिक्कत है। इस्माइल मेरठी ने तो कहा भी है
सैर कर दुनिया की गाफिल
जिंदगानी फिर कहां
जिंदगानी गर रही तो
 नौजवानी फिर कहां

Thursday, May 19, 2011

चीअर्स or फीअर्स





bold n beautiful: gabriella pasqualott
as mumbayee indians cheer leader






दक्षिणअफ्रीकी चीअर गर्ल गैबरीला का ब्लॉग उस मानसिकता की पोल
खोल
ता है जो पूरी दुनिया में
मौजूद है।
क्या गोरे, क्या काले
कोई इससे अछूता नहीं। गैबरीला
का यह कहना कि ऑस्ट्रेलियाई  खिलाड़ी  तो हमें मांस  के टुकड़े समझते हैं महज सनसनी पैदा नहीं
कर
ता बल्कि चकित करता है,
दुखी कर
ता है। वह लिखती हैं ,
आईपीएल मैचों के दौरान जब
हम भारतीय शहरों की सड़कों से
गुजरते तो सबकी नजरे केवल
हम ही पर होतीं। जैसे हम
अश्लीलता का चलता-फिरता
बाजार हो। उफ! बरदाश्त नहीं
होता था यह सब।
गैबरीला भारतीय खिलाडिय़ों
के सद्व्यवहार की तारीफ करती
हैं वहीं महिलाओं के बारे में
कहती हैं कि वे दोहरा व्यवहार
करती हैं। पहले तो हमें देखती हैं
और फिर ऐसे जताती हैं जैसे
हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं.
मुंबई इंडियंस की बाईस
वर्षीय इस खूबसूरत चीअर लीडर
ने स्पष्ट किया है कि उसे जब
  ब्लॉग लिखने का प्रस्ताव दिया
गया था तो महज इतनी अपेक्षा
थी कि अपनी आईपीएल और
भारत यात्रा के
  ब्यौरे साझा करूं।
वे साफ कहती हैं कि मैंने जो भी
लिखा सहज था। ना ही मैं किसी
भारतीय फिल्म में आ रही हूं
और ना रियलिटी शो में।
हमारा सवाल हो सकता है
कि इतना ही सीधा-सच्चा रवैया
है तो चीअर लीडर बनने की
जरूरत
क्या है कोई और काम
ढूंढ लिया होता। इससे भी पहले
सवाल यह उठता है कि चीअर
गर्ल्स  को आईपीएल मैचेज में
रखा ही
क्यों गया है? वह भी
गोरी-चिट्टी, सुडौल सुंदर
युवतियों को। जाहिर है आम
भारतीय जन मानस इसके
आकर्षण में
लिप्त हैं। मैच के
दौरान छ
क्का लगते ही इन
छरहरी बालाओं को
थिरकते देख वह
मुग्ध हो जाता है। तेज रोशनी,
संगीत, इनका नृत्य और क्रिकेट
की गेंद ऐसा जादू पैदा करती है
कि युवा भारतीय, क्रिकेट मैदानों
की ओर दौड़ा चला आता है। वह
पैसा देना चाहता है। टिकट
खरीदना चाहता है, वरना सब
जानते हैं कि इन मैचों में खिलाड़ी
और उसकी टीम के नाम में दूर-दूर
का भी रिश्ता नहीं। इन
चीअर लीडर्स का दायित्व दर्शकों
के सामने थिरकना भर नहीं
बल्कि मैच के बाद कई धनपतियों
की पार्टीज में शिरकत करना भी
होता है। वे वहां नचवाई जाती हैं।
फैशन परेड आयोजित की जाती
है। जयपुर में आयोजित वोद्का
की एक कंपनी ने तो अखबार को
भेजे  प्रेस-नोट   में लिखा है कि
चीअर
गर्ल्स की शरारती और
मस्त अदाओं ने पार्टी का रंग
जमा दिया। इस पैड पार्टीज में
कोई भी पैसेवाला शामिल हो
सकता है। शराब पीकर नृत्य
करने तक के आनंद को स्वीकृति
देने के बाद हम
उम्मीद करते हैं
कि सब कुछ दायरे में हो और
जब क्रिकेटर इस हद को पार
कर देते हैं, तो हम चीअर लीडर
को निकाल फेंकते हैं। धन के
इर्द-गिर्द लगने वाले मजमें से
और अपेक्षा भी
क्या की जा
सकती है।
गैबरीला बताती हैं कि मेरे
ब्लॉग लिखने के बाद कई
खिलाडिय़ों ने मुझसे संपर्क किया
कि कहीं भूल से भी हमारा नाम
मत ले देना। कुछ तो बच्चों की
तरह सफाई देने के लिए
आईपीएल अधिकारियों से भी
मिले, जबकि मैंने किसी खिलाड़ी
को लेकर किसी अधिकारी को
कुछ नहीं कहा।
बहरहाल, अतिथि देवो भव:
की परंपरा वाले हमारे देश को
एक बड़े तमाशे ने कहां तक क्षति
पहुंचाई है यह विचारणीय जरूर
होना चाहिए। इंक्रेडिबल इंडिया
को दुनिया तक पहुंचाने वालों के
लिए भी यह चिंता का विषय होना
चाहिए। गैबरीला महज एक

चीअर लीडर या ब्लॉगर नहीं,
बल्कि उस मानसिकता का भी
अनावरण है, जो स्त्री को उपभोग
के आगे नहीं देख सकती। . . .और शो-बिज़  में तो कतई नहीं 

क्यों चीअर्स के साथ इतने फीअर्स जुड़े हैं ??

Thursday, May 5, 2011

प्रेमपत्र


कुछ दिनों से एक किताब साथ है। असद जैदी और विष्णु नागर संपादित यह ऐसा समय है के पहले संस्करण [१९९४] में यूं तो कई बेहतरीन कविताएं हैं और कुछ रेंखाकनों और टिप्पणियों से कई नई कविताएं भी उग आई हैं। फिलहाल बद्रीनारायण की एक कविता




प्रेत आएगा
किताब से निकाल ले जाएगा प्रेमपत्र
गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच खाएगा

चोर आएगा तो प्रेमपत्र चुराएगा

जुआरी प्रेमपत्र पर दाव लगाएगा
ऋषि आएंगे तो दान में मांगेंगे प्रेमपत्र

बारिश आएगी तो
प्रेमपत्र ही गलाएगी
आग आएगी तो जलाएगी प्रेमपत्र
बंदिशें प्रेमपत्र पर ही लगाई जाएंगी

सांप आएगा तो डसेगा प्रेमपत्र
झींगुर आएंगे तो चाटेंगे प्रेमपत्र
कीड़े प्रेमपत्र ही काटेंगे
प्रलय के दिनों में
सप्तर्षि, मछली और मनु
सब वेद बचाएंगे

कोई नहीं बचाएगा प्रेमपत्र

कोई रोम बचाएगा
कोई मदीना
कोई चांदी बचाएगा, कोई सोना

मैं निपट अकेला
कैसे बचाऊंगा

तुम्हारा प्रेमपत्र