शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

मैंने बीहड़ में रास्ते बनाए हैं

meera by tamanna
मैं नहीं हो पाई सवित्री
न ही जनक नंदिनी सी समाई
धरती में
न याग्यसेनी कि तरह लगी दाव पर
मेरा पति भी शकुन्तला का दुष्यंत नहीं था
कभी कुंती सी भटकी नहीं मैं
न ही उर्मिला सी वेदना ली कभी
मैं वह राधा हूँ जिसे कृष्ण ने
पूरी दुनिया के सामने वरा
अब जब में सावित्री नहीं हो पायी हूँ
मैं हो जाना चाहती हूँ मीरा
उस एक नाम के साथ

पार कर जाना चाहती हूँ यह युग
कालातीत हो जाना चाहती हूँ मैं
राधा को भी मीरा बनना पड़ता है
यही  इस जीवन की
गाथा है.

6 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मनने से तनिक अधिक, भजने से तनिक कम।

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

यह राह तो सबसे मुश्किल होती है ...... कमाल का शाब्दिक चयन है रचना में....

varsha ने कहा…

aapka bahut shukriya praveenji aur dr. monika

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

बहुत सुंदर रचना है...

manglam ने कहा…

मनोभावनाओं को कागज पर उकेरना तो कोई आपसे सीखे

varsha ने कहा…

shukriya firdaus aur mangalamji