Friday, November 11, 2011

जिरहबख्तर


आज फिर हमने  गुस्ताखी की है
तेरे ग़म को लफ़्ज़ों की शक्ल दी है
 
क्यों चाहा अल्फाज़ का ये जिरहबख्तर
क्या होंसलों में अब कोई कमी सी है ||

मेरे हालात पे यूं जार-जार रोने लगा वो
समझ आया खुदा ने ही नाइंसाफी की  है ||
 
ये नुमाया लफ्ज़ अब बूंदों में घुल रहे हैं
तेरी सोहबत ने ये क्या सूरत दी है ||

तेरी सोहबत को दोष क्यूं कर हो
खामोश पानी को इसी ने रवानी दी है ||
 
मेरा किया गुनाह ए कबीरा न सही
गुनाह ए सगीरा से भी अब तौबा की है||

आज फिर हमने  गुस्ताखी की है
तेरे ग़म को लफ़्ज़ों की शक्ल दी है ||

गुनाह ए कबीरा -बड़ा गुनाह
गुनाह ए सगीरा -छोटा गुनाह
जिरहबख्तर -कवच

6 comments:

रंजना said...

वाह...बहुत खूब ...बहुत ही सुन्दर...

निवेदिता said...

आज फिर हमने गुस्ताखी की है
तेरे ग़म को लफ़्ज़ों की शक्ल दी है ||
.......बहुत खूब !

वाणी गीत said...

आज फिर हमने गुस्ताखी की है
तेरे ग़म को लफ़्ज़ों की शक्ल दी है

अपने एहसासों को खूबसूरत शब्द देती रहें
शुभकामनायें !

Kishore Choudhary said...

तेरी सोहबत ने ये क्या सूरत दी है... बहुत सुन्दर सूरत दी है.

शिवम् मिश्रा said...

वाह...बहुत खूब

varsha said...

ranjanaji, niveditaji, vaaniji, kishoreji aur shivamji aap sabka bahut bahut shukriya.