शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

आदम और हव्वा


माटी होने जा रही  देह को

उस दिन क्या याद आएगा
मोबाइल का ब्रांड
कम्प्युटर की स्पीड
या फिर वह कार
जिसकी खरोंच
भी 
 दिल पर लगती थी

उसे याद आएंगी
महबूब की आँखें
जिसमें देखी थी
उसने
सिर्फ मोहब्बत

माटी होते हुए भी
वह मुकम्मल
और 
मुतमइन होगी
कि उसने देखी थी
मोहब्बत में समर्पित स्त्री
एक पुरुष में .

4 टिप्‍पणियां:

sanjay vyas ने कहा…

बहुत सुंदर.आखिरी पैरा कविता का चरम है.पाठक से जुड़ता हुआ सा.अंतःक्रिया करता.

शुक्रिया.इसे पढवाने का.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बेहतरीन, बस आत्मीयता रह जाती है।

के सी ने कहा…

उसने देखी थी
मोहब्बत में समर्पित स्त्री
एक पुरुष में.

बहुत सुन्दर.

varsha ने कहा…

sanjayji, praveenji aur kishoreji aapka aabhar.