Saturday, September 24, 2011

जाना

 जाना
कितना मुश्किल है
किसी रूह का
रूह के भीतर जाना
हमारे बीच कैसे
हँसते-खेलते
हो गया सब
पाक जज़्बे-सा 
यह गठजोड़ .... 


मेरा शीश अब
वहीँ झुका जाता है
मेरा शिवाला वही
मेरा काबा वहीँ
फिर भी  मैं 
हूँ काफ़िर  तो
वही सही .

9 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

समर्पण में छिपा है अध्यात्म।

Kishore Choudhary said...

फिर भी मैं
हूँ काफ़िर तो
वही सही .

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

हृदयस्पर्शी! हम वही रहते हैं जो हैं, लोग चाहे कैसी भी छवि बनायें!
दुनिया खोने का डर नहीं मुझे
मेरी फ़िक्र खुद के खोने की है।

वाणी गीत said...

इस ज़ज्बे को नमन!

mukti said...

फिर भी मैं
हूँ काफ़िर तो
वही सही .

kavita said...

Heart touching expression.

रंजना said...

वाह...पवित्र पावन भावोद्गार...

varsha said...

praveenji, kishoreji, anuragji,vaaniji,
aradhna, kavita
and ranganaji bahut-bahut shukriya.

varsha said...

ranjanaji thanks.