Saturday, August 20, 2011

फरेब


बड़े बवंडर थाम लेती हैं ये पलकें
याद का तिनका तूफ़ान ला देता है
 

पथरीले रास्तों में संभल जाती है वो
 नन्हा-सा एक  फूल घायल कर देता है 
 
सेहरा की धूप नहीं जला पाती उसे
बादल का एक टुकड़ा सुखा देता है
 

कभी तो आओ मेरे सुकून ए जां
क्यों  सब गैर ज़रूरी  दिखाई देता है 
 
आज हर तरफ परचम और रोशनी है
लोगों को इसमें भी फरेब दिखाई देता है

9 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रकाश स्वयंसिद्ध है।

kavita said...

Bahut khubsoorat :)

वाणी गीत said...

मन में अँधेरा हो तो बाहर कितना भी उजाला हो !

राकेश कौशिक said...

"क्या क्या लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना"

सार्थक एवं मार्मिक प्रस्तुति

Arvind Mishra said...

लोग छले हुए हैं न -विचारपूर्ण रचना !

sanjay vyas said...

दमण तट पर दौड़ लगाते समर और कबीर के चित्र से याद आया दमण का खारा,उथला समुद्र और बौम जीसस गिरजा.

आपके इस ब्लॉग के ज़रिये दमण को सलाम भेजता हूँ.

फ़िरदौस ख़ान said...

बड़े बवंडर थाम लेती हैं ये पलकें
याद का तिनका तूफ़ान ला देता है

Bahut Khoob...

varsha said...

praveenji kavita vaanij rakeshji arvindji sanjayji aur firdous aapka shukriya aur aabhar

Vijay Kumar Sappatti said...

क्या बात है , आपकी कविताओ ने तो मन मोह लिया है .. शब्द जैसे एक कथा कह दे रहे हो ... आपको बधाई !!
आभार
विजय
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कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html