रविवार, 10 जुलाई 2011

जान का सदका





मैं फिर जिंदा हो जाना चाहती हूँ
तेरी जान का सदका लेना चाहती हूँ
 
नज़र ए बद से दुआ का सफ़र
एक  पल में करना चाहती हूँ
 


ये जो ख्वाहिश  दिल ने की है अल सुबह
तेरे ज़ख्मों में खुद को पैबस्त करना चाहती हूँ

 माजी कहकर भूलने को न कहना दोस्त
स्वर्णिम दौर को लौटा लाना चाहती हूँ
 

पाषाण युग से यही आरज़ू  रही है मेरी
तेरे लिए कायनात किनारे कर देना चाहती हूँ
 
यह लोह-ओ-क़लम  भी ले जा रहा है तेरे  करीब
मैं तो बस इसमें सवार हो जाना चाहती हूँ
 
होगी जब कभी क़यामत एक रोज़
 मैं  पूरी तरह सज जाना चाहती हूँ

4 टिप्‍पणियां:

के सी ने कहा…

बहुत भावपूर्ण !

Smart Indian ने कहा…

हृदयस्पर्शी! प्रेम में कुछ भी कर पाने की शक्ति है।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गहन और हृदयस्पर्शी।

varsha ने कहा…

kishoreji anuraagji aur praveenji shukriya ki aap utsaah banye rakhne mein koi kami nahin karte.