शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

जीना नहीं आएगा

 इसमें न कविता की लय है न ग़ज़ल का सलीका ...एक असर है जो बस मुखर हो जाना चाहता है . . .



तेरे बिना जीना नहीं आएगा
बिन
बरसे सावन  कैसे जाएगा
 

बेमायने है सहज होने की कल्पना
समंदर
अपना अक्स छोड़  ही जाएगा
 
 
 
ये जो सीली-सीली सी आँखें हैं मेरी
एक दिन आएगा पानी सूख जाएगा

जानते हो वह दिन क़यामत का होगा
तेरा-मेरा सिलसिला फिर जुड़ जाएगा

 

  इसे विलाप का आलाप न समझना दोस्त
आस का यह दिया अब नहीं बुझाया जाएगा

11 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

भावनाओं की अपनी अलहदा लय तुक होती है ...वाही मुखर है तो फिर क्या कविता ,क्या ग़ज़ल !

Kavita Saharia ने कहा…

Beautiful expression .

manglam ने कहा…

so nice

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहते भाव।

Pratibha Katiyar ने कहा…

Wakai!

Smart Indian ने कहा…

हृदयस्पर्शी रचना! बंधन जन्म जन्मांतर का ...

प्रदीप कांत ने कहा…

ये जो सीली-सीली सी आँखें हैं मेरी
एक दिन आएगा पानी सूख जाएगा

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भाव और विचार तो है..., सलीके से कहा गया है इसलिये अच्छा लगता है

S.N SHUKLA ने कहा…

खूबसूरत पोस्ट.

Dileepraaj Nagpal ने कहा…

Shabdon Ke Roop Me Bhawnaaon Ki Es Versha Me Man Bheeg Gaya. Aap Kuch Kahen To Use Gazhal,Kavita, Nazm Aur Sher Aadi Kisi Vidha Me Bandhne Ki Zaroorat Kaya Hai...
Jai Ho Mam...

Unknown ने कहा…

chand lafjon me chhupi aah!
kya kahun, wah! ustad wah!!

gazab ka likhdala hai deedi

varsha ने कहा…

vaniji kavita mangalamji praveenji prtibhaji anuragji pradeepji shuklaji aap sab ka shukriya
aur dileeprajji jai uski jiske liye yah panktiyaan hain aur pradeep aah par vaah ke liye thanks.