Wednesday, June 15, 2011

जय डे

jyotirmay dey ie  j dey
 चार साल पहले एक लड़की आई थी। दीदी मेरा बहुत मन है पत्रकारिता की पढ़ाई करने का।  चयन हो गया और मैं इस फील्ड में अपना करियर बनाना चाहती हूं। फिर दिक्कत क्या है? ... 'पापा मना कर रहे हैं, एक बार आप चलकर उनसे बात कर लो शायद वे मान जाएं।' उसने कहा। आखिर, वे मना क्यों कर रहे हैं। 'पापा को लगता है कि इस फील्ड में खतरा ज्यादा है और पैसा भी नहीं। वे चाहते हैं कि मैं एमबीए कर लूं या फिर कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स देकर  सेफ करियर चुनूं। 'लिखने -पढऩे वाली लड़की थी। पापा का सम्मान करती थी। पत्रकारिता में नहीं आई, आज उसके  पास बढिय़ा सरकारी नौकरी है।
इससे कुछ और पहले एक लड़का भी पत्रकारिता में आया था। बड़े पैशन के साथ लेकिन मनमाफिक काम नहीं मिलने और कम तनख्वाह ने उसके पैशन की हवा निकाल दी। कुछ समर्पण और प्रतिबद्धता की भी कमी रही होगी, जो ये दोनों अखबारनवीसी को अपना नहीं पाए। सवालों के इन चक्रव्यूहों से निकलकर जो युवा इस विधा को अपना पेशा बनाता है, वह बेशक प्रतिबद्ध होता है, सुनिश्चित होता है। पैसा भले कम सही, लेकिन समाज के लिए कुछ नेक काम वह  कर जाना चाहता है। उसका पेशा उन्हें उन लोगों से अलग करता है जो प्रोडक्ट बेचने की कवायद में किसी भी हद तक जा सकते हैं। मार्केटिंग से जुड़े लोगों के लिए अखबार भी किसी प्रोडक्ट से कम नहीं, लेकिन एक पत्रकार को अब भी ऐसे शब्दों पर ऐतराज होता है। यहां उन लोगों की बात नहीं हो रही है जो पत्रकारिता में भी सिफारिशी  सीढिय़ां लांघ कर आए हैं।
सच्ची खबर लिखने वाले पत्रकार थे जे डे। पूरा नाम ज्योतिर्मय डे जिन्हे मुंबई [पवई ] में 11  जून की दोपहर चार बंदूकधारियों ने आठ गोलियां मारकर मौत के घाट उतार दिया। मुंबई से प्रकाशित मिड डे के इस खोजी क्राइम रिपोर्टर की अंतिम स्टोरीज पर गौर कीजिए-
1 अठारह मई 2011 को प्रकाशित जे की स्टोरी में 109 साल पुरानी सीताराम बिल्डिंग को जमींदोज कर दस माले की बिल्डिंग बनाने का विरोध किया था ताकि ऊंचाई से मुंबई पुलिस कमिश्नर ऑफिस को निशाना ना बनाया जा सके।   
2 सोलह मई को पेट्रोल के दाम बढ़ते ही उन्होंने स्टोरी ब्रेक की जो मुंबई के दस हजार करोड़ रुपए के तेल गिरोह  का भंडा फोड़ कर रही थी।
दस मई की एक स्टोरी में जे ने बताया था कि ओसामा की मौत दाऊद को लंबा जीने में मदद करेगी क्योंकि भारत के मोस्ट वांटेड के लिए पाकिस्तानी आईएसआई ने सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है।
तेरह जून को मुंबई के तमाम पत्रकारों ने रैली निकालकर मुख्यमंत्री से मांग की कि जे डे की हत्या की जांच सीबीआई से कराई जाए, लेकिन सरकारों में अब सुनने का चलन कहां है। दो सालों में मुंबई के 180 पत्रकार हमले के शिकार हुए हैं। पत्रकार जे डे ईमानदार थे। उनकी पुस्तक जीरो डायल के  विमोचन में अभिनेता अजय देवगन मौजूद थे। अजय ने उन्हें  करीबी मित्र बताते हुए कहा है कि वे बहुत ही विनम्र थे और नपा-तुला बोलते थे, लेकिन उनका काम हजार शब्दों में बात करता था। जीरो डायल पुलिस इन्फॉरमर्स के बारे में लिखी किताब है और खल्लास में उन शब्दावलियों का खुलासा है जो अंडरवर्ल्ड में बतौर कोडवर्ड चलती हैं। मौत से पहले तक जे डे अंडरवर्ल्ड और ऑइल माफिया से जुड़ी किताब पर काम कर रहे थे। मिड डे से पहले इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स में काम कर चुके जे डे की सारी समझ जैसे माफिया के खिलाफ थी और माफिया कब अपने खिलाफ कुछ बरदाश्त करता है। जे डे नई पीढ़ी को बेहतर प्रशिक्षण देने में यकीन रखते थे। उम्मीद है कि जे डे की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। पत्रकारिता में प्रतिबद्ध लोगों का ही प्रवेश होगा। करियर से बड़ा मिशन होगा जो चोरी और सीनाजोरी का  पर्दाफाश करेगा। जय डे।

9 comments:

रंजना said...

विनम्र श्रद्धांजलि इस कर्तब्यनिष्ठ महान व्यक्तित्व को...

दुःख और हताशा में डूबा हुआ है अभी मन ...आगे और क्या कहूँ...

ईश्वर से प्रार्थना है कि वे ऐसे व्यक्तित्वों का संरक्षण सीधे सीधे स्वयं ही करें,क्योंकि उनकी बनायीं इस दुनियां में तो ऐसे लोग सुरक्षित नहीं...

rashmi ravija said...

इस साहसिक पत्रकार को विनम्र श्रद्धांजलि
जे डे एक निर्भीक,सक्षम पत्रकार के साथ....एक सहृदय इंसान भी थे...
उनका जाना पत्रकार जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है...उनकी कमी हमेशा बनी रहेगी.

प्रवीण पाण्डेय said...

बलिदान व्यर्थ न जाये, श्रद्धांजलि।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

पत्रकारिता में ऐसे कर्मठ लोगों के साथ जो हो रहा है वो बेहद शर्मनाक है ...... सच में अब सरकारों में सुनने का चलन नहीं है.....

प्रदीप कांत said...

विनम्र श्रद्धांजलि।


सरकारें सुनती नहीं और हमसे कुछ होता नहीं। तो फिर यही होता रहेगा....

Pratibha Katiyar said...

उम्मीद...हाँ वर्षा जी इसी उम्मीद ने हमें बाँध रखा है. मैं जब भी अपने होनहार छात्रों को देखती हूँ सिहर जाती हूँ उनके भविष्य के बारे में सोचकर. जी चाहता हूँ कह दूं जाओ भाग जाओ. कुछ नहीं है यहाँ. जिस संस्थान के लिए आप जान की बाजी लगाइए वो भी अक्सर आपके साथ खड़ा नहीं होता. जिस खबर के लिए जान जोखिम में डालिए कोई बड़ी बात नहीं की वो खबर ही कचरे के डब्बे में पड़ी हो...इसी दौर में कुछ लोग हैं जो पूरी सच्चाई के साथ डटे हुए हैं और बचा रहे हैं अस्मिता 'उम्मीद' शब्द की. जे डे उन्हीं लोगों में से एक थे..उनकी शहादत को जाया तो नहीं जाने देना है..

Pratibha Katiyar said...

उम्मीद...हाँ वर्षा जी इसी उम्मीद ने हमें बाँध रखा है. मैं जब भी अपने होनहार छात्रों को देखती हूँ सिहर जाती हूँ उनके भविष्य के बारे में सोचकर. जी चाहता हूँ कह दूं जाओ भाग जाओ. कुछ नहीं है यहाँ. जिस संस्थान के लिए आप जान की बाजी लगाइए वो भी अक्सर आपके साथ खड़ा नहीं होता. जिस खबर के लिए जान जोखिम में डालिए कोई बड़ी बात नहीं की वो खबर ही कचरे के डब्बे में पड़ी हो...इसी दौर में कुछ लोग हैं जो पूरी सच्चाई के साथ डटे हुए हैं और बचा रहे हैं अस्मिता 'उम्मीद' शब्द की. जे डे उन्हीं लोगों में से एक थे..उनकी शहादत को जाया तो नहीं जाने देना है..

varsha said...

ranjana ji aapke saath meri bhi prarthna.....rashmiji sach unki kami hamesha rahegi ....praveenji aameen...dr monika jaane kyon karmath ke saath hi yah sab hota hai....pratibhaji aapki takleef samajh mein aati hai naye bachchon se kya kaha jaye unhen kya jaabazee aur sahas ki kathaen sunayee jaye paid journalism ka dour to ve khud dekh rahe hain...fir bachta hi kya hai???

Ankur jain said...

sundar aadaranjali...prastut karta lekh...