Thursday, June 2, 2011

भाषा की समझ

पिछले दिनों एक कविता पढ़ी...अच्छी लगी...आप भी देखें.


भाषा की समझ

 अजितकुमार

फर्क था बहुत
मेरी और उनकी बोली में।
जब वे मांगते थे पानी
उठा लाता था मैं  कपड़े।
जब मैं चाहता था एकांत
सुलगा देते थे वे अंगीठी।
एक पुस्तक थी हमारे पास
जाने किस भाष में लिखी,
मैं कहता था ज फ ग ट ह
वे  न म ल व र
उच्चारण ही क्यों,
अर्थग्रहण में भी
अंतर था।
बावजूद इसके,
 जब तक प्रेम था हमारे बीच
वह समझ में आता रहा।
फिर विरक्ति को भी हम
धीर-धीरे
समझने लगे।

12 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

किसी की विरक्ति में आसक्ति हो जाती है हमें।

वाणी गीत said...

जब तक प्रेम था हमारे बीचवह समझ में आता रहा।फिर विरक्ति को भी हम
धीर-धीरे
समझने लगे...

बहुत करीब होने पर कुछ भी अनजाना नहीं रहता , ना प्रेम ,ना विरक्ति !

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

वाह !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

समायोजन कि इच्छा हो तो भाषा की दीवार कब तक टिकेगी।

ali said...

ठक से अंदर उतर गयी ये कविता !

पारुल "पुखराज" said...

अच्छा है !

मनोज कुमार said...

कमाल की कविता है!!
बहुत सुंदर भाव प्रेषित हो रहे हैं।

prithvi said...

अच्छी कविता.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बेहतरीन ......विरक्ति में आसक्ति

Manoj K said...

so simple yet so powerful..

amazing

रंजना said...

वाह...क्या कह डाला ....

अर्थ गाम्भीर्य और काव्य सौन्दर्य ने अभिभूत कर लिया...

varsha said...

aap sabka shukriya.