Friday, April 8, 2011

ये मेरी आवारगी .....


रेवा का घर जाने का बिलकुल मन नहीं था। ऑफिस से तेज बाइक चलाकर ईपी में फिल्म देखना चाहती थी। कैफे कूबा में कैपेचिनो का स्वाद लेते हुए स्टेचू सर्कल की रोशनी में नहाते हुए जनपथ से गुजरते हुए बेवजह जेएलएन मार्ग का चक्कर काटना चाहती थी, फिर उसने अपना हुलिया चैक किया। स्लीवलैस और कैप्री! नहीं...आज नहीं। उसने सिर को झटका दिया और वक्त से घर पहुंच गई।
कई बार रेवा का मन करता है कि वह इस शहर को जिए। कभी नुक्कड़वाली पान की दुकान पर ही खड़ी हो जाए, तो कभी जेकेलोन के उन मुड्ढों पर चाय की चुस्कियां ले और कभी रैन बसेरे के बाहर खड़ी हो वहां की रात पर भरपूर निगाह डाले। एक बार पहुंच भी गई। एक पुलिस वाला जो उसे कुछ देर से देख रहा था, बोला- मैडम घर जाओ...यहां अच्छे लोग नहीं आते। कुछ हो गया तो हम परेशानी में पड़ जाएंगे। रेवा चुपचाप वहां से चल पड़ी। सर्दी की रात, साढ़े दस बजे उसने सुलभ शौचालय का इस्तेमाल करना चाहा, तो वह भी बंद मिला, अलबत्ता पुरुष सुविधाएं
यथावत थीं।
तो क्या एक लड़की या स्त्री की 'आवारगी पर अघोषित प्रतिबंध है? उसका शहर एक समय सीमा के बाद उसे स्वीकारने से मना कर देता है? क्यों सांझ ढलने के बाद सेंट्रल पार्क की दूब उसके कदमों को स्वीकार नहीं  पाती? क्यों  तेज बाइक चलाने के लिए उसका आधा लड़कों जैसे दिखना जरूरी है? इस शहर की जिम्मेदार नागरिक होने के बावजूद वहां की पब्लिक प्रॉपर्टी पर उसका आधा-अधूरा  हक ही क्यों  है?
इन तमाम सवालों के जवाब देने की कोशिश की है शिल्पा फड़के, शिल्पा रानाड़े और समीरा खान ने। सवालों को उन्होंने किसी कस्बे या शहर की रोशनी में नहीं देखा है और न ही दिल्ली में, जो एक 'जेन्डर बायस्ड राजधानी है, बल्कि ये सवाल वीमन फ्रेंडली मुंबई के तरकश पर कसे गए हैं... आपको हैरानी होगी कि मुंबई भी महिला की इस कथित आवारगी का बोझ  नहीं सह सकी। समंदर का साहस रखने वाले मुंबइकर भी स्त्री को जॉब, शॉपिंग, बच्चों को स्कूल छोडऩे के अलावा कहीं और देखने के आदी नहीं हैं। इसी मुद्दे पर इन तीनों ने एक किताब लिखी है 'वाय लॉइटर? वीमन एंड रिस्क ऑन  मुबई स्ट्रीट्स।  पेंग्विन ने इसे प्रकाशित किया है और यह इनकी तीन साल की रिसर्च का नतीजा है। नतीजे कहते हैं कि मुंबई की स्त्री जो काम से आते-जाते घड़ी की सुइयों की मोहताज नहीं, उसे भी हर वक्त यह डर लगा रहता है कि कोई उसे टोक न दे। वह इस कथित हमले के लिए तैयार और चौकन्नी रहती है।
यूं तो एक कामकाजी स्त्री से उसके सहयोगी यह अपेक्षा नहीं रखते कि वह बच्चे, बीमारी, सुरक्षा या शारीरिक उत्पीडऩ को लेकर कोई सुविधा मांगे। वह घर और बाहर के बीच परफेक्ट बैलेंस रखते हुए गरिमा से जीती हुई महिला होनी चाहिए। अंग्रेजी-हिंदी की तमाम महिला पत्रिकाएं भी उसे सुपर वीमन बनाने का कोई मौका नहीं चूकतीं। स्त्री को हवा में उड़ाते हुए तमाम आलेख उसे मैजिक वुमन बना देना चाहते हैं, लेकिन यही मैजिक वुमन चांदनी रात में समंदर किनारे या फिर रेत के धोरों के बीच टहले, तो सबकी आंख का रोड़ा बन जाती है। किताब सवाल करती है कि क्यों एक स्त्री का उसके शहर,वहां की सार्वजनिक संपत्ति पर पूरा हक नहीं है, उसने क्या पहना है, किसके साथ हैं, इसका भय क्यों सताता है? क्या वे आधी नागरिक हैं?
सवाल आपका भी हो सकता है क्यों करनी है आवारगी या लॉइटर? अपना काम करो। आवरगी तो पुरुषों की भी खराब मानी जाती है...लेकिन उन पर शायद उतना बोझ नहीं होता, ना ही खतरा।
 वह क्यों नहीं जी सकती अपने इलाके को?

11 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

मैं आवारगी में आनन्द उठाता हूँ, औरों के बारे में ज्ञात नहीं।

प्रदीप कांत said...

स्त्री के ये सवाल वाजिब हैं। किंतु इस देश के जो हालात हैं उनका क्या किया जाए?

Manoj K said...

हालात बदल रहें हैं... २००३ में यूनिवर्सिटी के सामने एक सर्द शाम में २ घंटे वह मेरे साथ थी, तब लोग आश्चर्य से देखते थे, अब नहीं देखते, देखते भी हों तो आश्चर्य नहीं करते. उम्मीद है हमारा शहर इनको इनका वाजिब स्पेस दे..

वाणी गीत said...

सवाल वाजिब है ...
चांदनी रात में दूर तक की सैर अभी भी स्त्रियों के लिए इतनी सुरक्षित नहीं है ...

Kishore Choudhary said...

दिल्ली एक जेंडर बायस्ड राजधानी है. बड़ा अच्छा वाक्य है. कमोबेश जहाँ भी पंचायत लगती है, वे जगहें अपने नैसर्गिक गुणों को खोने लगती हैं और त्वरित रूप से हुक्मरान हो जाया करती है, तानाशाही जिसका अनिवार्य तत्व है.

विषय इसलिए रोचक है कि नारीवाद नारीवाद चिल्लाने की जगह एक सामान्य इच्छा के मध्यम से गहरी पड़ताल कर सकने में समर्थ है. रोचक पोस्ट है. पढ़ कर अच्छा लगा.

कुश said...

बुक रिव्यू का अंदाज़ पसंद आया.. जयपुर की जगहों का इस्तेमाल करके एक नाटक लिखा था.. आपकी पोस्ट की शुरुआत लगभग वैसी ही लगी..

मीनाक्षी said...

आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ...एक नया अन्दाज़ देखा....ऐसी आवारगी का मज़ा है तो लेकिन अपने देश में क्या मुमकिन है....?

डॉ .अनुराग said...

जाहिर है आदमी नाम का जानवर जो अब भी शहर के तौर तरीके जो सीख नहीं पाया है

रंजना said...

बात दिल पर लगी...

सही है...अक्सर ही मन कचोट जाता है कि क्यों हम स्त्रियाँ चाहकर भी इस तरह सन्नाटों का, अकेलेपन का आनंद नहीं ले पातीं..देह की असुरक्षा के भय से मुक्त हो नहीं फिर पातीं...

उत्सुकता जगा दी है आपकी समीक्षा ने...पढनी ही पड़ेगी..

चेतना के स्वर said...

यह आर्टिकल मैंने खुशबू में काफी पहले पढ़ लिया था। इस बारे में विचार शायद आपको ज़ुदा लगे, लेकिन आज के वातावरण की मजबूरी है। जिसके मन में अच्छे विचार है, उसे आज की इस जम्हूरियत में जीवित रहने का हक है? शायद नहीं। जो लोग शिखर पर हैं या उसके नजदीक है उनके हालात फिर भी ठीक है, लेकिन जो किसलय, जो नई पौध फलीभूत होने का सोच भी रही है, उससे दूसरों को अपने अस्तित्व पर खतरा नजर आ रहा है। देश स्री को बहुत सम्मान से देखता था।
वैसे लोग ‘स्त्री’ शब्द लिखते हैं, जिसका अर्थ नारी से लेते हैं, लेकिन मेरे खयाल में सही शब्द ‘स्री’ है जिसका एक अर्थ ‘लक्ष्मी’ है।
मेरे परिवार में माताजी घूंघट रखती है क्योंकि दादीसा भी रखती थीं। अब बहू आ गईं तो वे भी रखती हैं। मैंने एक दिन पूछ ही लिया कि आप घूंघट क्यों रखती हैं तो बताया कि पीहर में उनकी मम्मी रखती थीं और यहां मेरी मम्मी रखती हैं, हमारे समाज में सभी रखते हैं, इसलिए! यह स्थिति शायद सभी जगह हैं। पिताजी से भी चर्चा चली कि ऐसा क्यों? लेकिन जवाब नहीं मिला, फिर एक वरिष्ठ साथी, साथी क्या मार्गदर्शक हैं नोएडा में सहारा समय में सेन्ट्रल डेस्क इंचार्ज हैंं। दूरभाष पर लम्बी चर्चा के दौरान यह विषय भी निकल आया। उनका जवाब आया, सवाल अच्छा है पर उसका यह जवाब सही है या गलत वे खुद नहीं जानते। उन्होंने बताया कि देश में पहले घूंघट और पर्दा नहीं हुआ करता था। केवल आंख की शरम हुआ करती थी, पुरुष में भी और स्री में भी। आज सभी में है क्या? जब देश में बाहरी लोगों (यवनों) ने आक्रमण किया तो सर्वाधिक शिकार स्रियां बनी। वैसे वे तो हर युग में बनती आई हैं। यवन आक्रमणों के बाद से देश में उन्हें पर्दे में रखने की परम्परा चल पड़ी। अब पर्दा दूर हुआ, लेकिन घूंघट नहीं हट पाया। लोग कहते हैं कि आज यवन नहीं है, इसलिए घूंघट हटना चाहिए। मेरा यह मानना है दीदी कि यवन कोई जाति, सम्प्रदाय या धर्म विशेष के लोग नहीं होते। वे ऐसे लोग होते हैं जो अपनी मां और बहिन को छोडक़र प्रत्येक स्री को लिप्सा की नजर से देखते हैं। यदि ऐसा माना जाए तो देश के लगभग ९५ प्रतिशत पुरुष यवन हैं। ऐसे में हम अपनी सम्पत्ति, हमारी श्री, हमारी लक्ष्मी को कैसे उन भूखे भेडिय़ों के सामने छोड़ दिया जाए। जिनका कोई दीन-ओ-ईमान नहीं है। बचे पांच प्रतिशत लोग विरोध भी नहीं कर पाते। जम्हूरियत में स्थिति की बात मैं पहले कर ही चुका हूं।

और हां नारी सम्मान के बारे में शायद पहले भी आपकी किसी पोस्ट पर एक टिप्पणी कर चुका हूं। महान योद्धा मृत्युंजय कर्ण को आपने पढ़ा होगा। द्रोपदी के चीरहरण के वक्त उसकी खामोशी और उसका एक शब्द पांचाली को वारांगना कहना उसे उम्रभर कचोटता रहा। परिणामस्वरूप सूर्यपुत्र को मौत गले लगानी पड़ी। स्री अपमान के वक्त खुद की खामोशी ही भीष्म, द्रोण को भी ले डूबी।
स्री अपमान की कीमत हर युग में चुकानी होती है। महाभारत में द्रोपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास मात्र ही हुआ था, लाखों करोड़ों यौद्धाओं का खून बहा। महाभारत हुआ। आज कितनी बालाएं रोज लूटी जाती है, हमारा खून नहीं खौल रहा है।

दीदी! स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अभी फर्क करना होगा, नहीं तो आने वाली पीढिय़ों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। देश का लचर कानून अधिकारों के लिए बढ़ रही होड़, घट रही कर्तव्यनिष्ठा और बढ़ रही महत्वाकांक्षा के बीच युवा शक्ति की भावनाओं को नियंत्रित कर पाएगा या नहीं। सोचकर ही डर लगता है।

हो सकता है आपके और मेरे विचार इस विषय पर जुदा हों, लेकिन नारी सम्मान के लिए आने वाली पीढ़ी को जागरूक करना ही होगा। शॉर्ट स्कर्ट में कॉलेज जाने वाली लड़कियां और कार्टून चैनल देखकर बड़े हुए बेवकूफ लडक़ों के बीच यह स्थिति कैसे आ पाएगी समझ नहीं आता। मेरी सोच इतनी बड़ी तो नहीं पर पुरुषों को अपनी सीमाएं तय करनी होगी। उसे अपने स्वच्छंद स्वरूप पर अंकुश लगाना होगा और नारी को भी अपनी आंख की शरम को बचानी होगी।

इस बार शायद कुछ ज्यादा लिख गया हूं इसलिए सॉरी पर ... लम्बे समय से लिखना चाहता था

आंधियों के गांव में खड़ा आपका छोटा भाई प्रदीप

varsha said...

shukriya praveenji pradeepji manojji
vaniji kishoreji kush meenakshiji anuragji ranjanaji aur padeep aapne to lambi chitthi likhi hai...aap shayad kahna yah chah rahe hain ki hamle ki aashanka hai isliye suraksh hogi aur mein kewal itna ki jitne avaran honge anavratt karne ki aashnka bhi utni hi badhegi....jaisa ki manojji ne kaha ki 2003 aur ab ke halat mein fark hai yah fark badhti moujudgi se aaya hai...fir chahe vah park ho imarten..sri ka ghoomna utna hi aam ho jitna purushon ka..bhed khatm ho jayega