Friday, March 4, 2011

रोका क्यों नहीं

उसने पूछा

जाने क्यों दिया
रोका क्यों नहीं
मेरी ही भूल का नतीजा
उसका जाना

मेरी आधी साँसे
उखड़ा मन
आँखे नम
ये खुद को
लेकर चलने की कवायद
कोई नहीं पूछता कि
कहाँ जा रही हो
 . . .और एक दिन
सब शून्य  
कोई किसी से नहीं पूछेगा 
किसने मुझे जाने दिया

रोका क्यों नहीं....

10 comments:

कुश said...

एक शिकायत या फिर हकीकत..

Manoj K said...

खूब.. किसी ने रोका क्यों नहीं.. शायद हर मन में यह वाक्य कभी कभी ना कभी ध्वनित हॉट होगा.

मनोज
http://manojkhatrijaipur.blogspot.com/

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

जीवन की यही तो त्रासदी है, "... एक धुन्ध से आना है, इक धुन्ध में जाना है ..." जो सामने है बस वही दिख रहा है, नश्वर, अशाश्वत।

रंजना said...

कितने मोहक अंदाज में आपने बात कही है...ओह...

मन मुग्ध हो गया....

बाकी क्या कहूँ...अनुराग जी(स्मार्ट इंडियन) ने मेरे मन की कह ही दी...उनके स्वर में अपना स्वर मिलाती हूँ...

varsha said...

प्रवीण पाण्डेय March 5, 2011 1:59 PM

कभी लगता है कि हिचक मिटा कर पुकार लेते।

प्रदीप कांत said...

. . .और एक दिन
सब शून्य
कोई किसी से नहीं पूछेगा
किसने मुझे जाने दिया...........

अपूर्व said...

..यूँ लगता है कि जाना एक क्रिया ही नही एक प्रक्रिया है..फिर रुक-जाना मे भी वही जाना छिपा है..मगर चीजें हमेशा बदलती नही..हमारे चाहे भर से..

अपूर्व said...

अक्ल को ये शिकायत है हमसे/ हमने अक्सर जुनूँ से काम लिया

इस अशआर पे एक बेहद पुरकशिश शेर याद आता है..फ़राज साब का..मेरा पसंदीदा भी..जिंदगी की फिलासफी समेटे..पढ़ा होगा आपने..
अक्ल हर बार दिखाती थी जले हाथ अपने
दिल ने हर बार कहा, आग परायी ले ले।

सतीश सक्सेना said...

कुछ अलग सा लगा यहाँ ....शुभकामनायें आपको !!

Kishore Choudhary said...

और इस तरह कुछ भी विस्थापित नहीं होता... रूपायित हो जाने से पहले एक ख़याल फिर से ठहर जाता है कि यही दुनिया है तो ऐसी दुनिया क्यों है ?