Tuesday, December 13, 2011

काली शलवार


सच तो यह है कि उर्दू कथाकार सआदत हसन मंटो को याद करना अच्छा लगता है . वे होते तो सौ बरस के होते.




 घरों में जाकर खाना बनाने वाली लाली से
लेकर मिसाइल वुमन टेसी थामस
तक
स्त्री ने खुद को और पूर देश
को तरक्की की राह पर अग्रसर
किया है। स्त्री की बदलती भूमिका
को स्वीकार किए जाने के बावजूद
शेष आधी दुनिया में उसकी छवि
ज्यादा बोलने वाली, ईष्र्यालु, अति
भावुक की ही है, यहां तक कि इसे
भी सत्य की तरह स्थापित कर
दिया गया है कि औरत ही औरत
की सबसे बड़ी दुश्मन है। कहने
वाले कैकई और मंथरा को ही राम के
वनवास का जिम्मेदार  बताते
हुए इस धारणा को और भी मजबूत
करते हैं। महाभारत के युद्ध का
दोषी भी द्रोपदी को ही ठहराया
जाता है। दशरथ और भीष्म
पितामह के सर दोष कम है।
उर्दू कहानीकार सआदत
हसन मंटो ने लगभग सत्तर  साल
पहले एक कहानी लिखी थी, काली
शलवार। कहानी की नायिका
सुल्ताना एक वैश्या है। अंबाले में
उसके पास खूब काम था। गोरे
अंग्रेज खूब पैसा देते थे, लेकिन
जब से वह अपने साथी के साथ
दिल्ली आई है, उसका काम ठप
हो गया है। वह बेचैन है कि
मोहर्रम पर उसके पास काली
शलवार नहीं। उसका साथी पीर-
 पुज्जों में उलझा हुआ है और
काली शलवार का प्रबंध नहीं कर
पाता। उसकी आंख में पड़ोसन
की वही काली शलवार नाच रही है
जो उसने दर्जी से सिलवाई है।
इस बीच उसकी मुलाकात एक
व्यक्ति से होती है। अकेली,उदास
स्त्री बातचीत में उससे भी काली
सलवार का जिक्र छेड़ती है। वह
व्यक्ति कहता है कि मैं आपको
शलवार ला दूंगा, लेकिन बदले में
आपको ये बुंदे मुझे देने होंगे।
सुल्ताना को यह सौदा बुरा नहीं
लगता। मोहर्रम की सुबह, काली
शलवार उसे मिल जाती है। काली
कमीज और दुपट्टा जो उसने
रंगवाए थे, काली शलवार के साथ
पहनकर वह खुश हो ही रही होती
है कि दरवाजे पर दस्तक होती है।
 सामने पड़ोसन को देख वह हैरान
रह जाती है क्योंकि  उसके कान में
वही बुंदे चमक रहे हैं। हैरानी और
खामोशी के बीच दोनों को यह
समझते देर नहीं लगती कि भले
मानस ने उनकी हसरतों का कैसा
मेल करवाया है।
दरअसल, महिला की इस
छवि से इनकार नहीं किया जा
सकता, लेकिन जहां भी शिक्षा ने
अपनी रोशनी डाली है, वहां काली
शलवारों का वजूद खत्म हो गया
है। जब आप अपने पेशे और
हमखयाल लोगों के संपर्क में आते
हें तो मालूम होता है कि उनमें ईर्ष्या,
 द्वेष और एक-दूजे को कमतर
आंकने जैसा भाव नहीं। वे खुल के
सराहना करती है और आलोचना
भी। वे बेखौफ होकर अपनी बात
कहती हैं । ऐसे पुरुष भी बढ़े हैं जो
महिला के खुले मन को स्वीकारते
हैं। कभी कभार जरूर कुछ
शिक्षित पुरुष ऐसा कह जाते हैं,
जिसे स्त्री के स्वाभिमान को ठेस
लगती है। पुष्पा मैत्रेयी की
आत्मकथा पर जब अपशब्दों  में
पिरोई राय आती है तो इस नए
स्वीकार्य भाव को झटका लगता
है, लेकिन समय तेजी से बदल रहा
है। मन का कहने की आदत बनती
जा रही है। यह जरूरी है क्योंकि
न कहने में घुटन है और
अभिव्यक्ति  में आजादी।



कल बदनाम लेखक मंटो का जन्मदिन था

Friday, December 9, 2011

मैंने बीहड़ में रास्ते बनाए हैं

meera by tamanna
मैं नहीं हो पाई सवित्री
न ही जनक नंदिनी सी समाई
धरती में
न याग्यसेनी कि तरह लगी दाव पर
मेरा पति भी शकुन्तला का दुष्यंत नहीं था
कभी कुंती सी भटकी नहीं मैं
न ही उर्मिला सी वेदना ली कभी
मैं वह राधा हूँ जिसे कृष्ण ने
पूरी दुनिया के सामने वरा
अब जब में सावित्री नहीं हो पायी हूँ
मैं हो जाना चाहती हूँ मीरा
उस एक नाम के साथ

पार कर जाना चाहती हूँ यह युग
कालातीत हो जाना चाहती हूँ मैं
राधा को भी मीरा बनना पड़ता है
यही  इस जीवन की
गाथा है.

Wednesday, November 16, 2011

ऐसे ही मौकों पर पत्नी अपना पर्दा पति पर डालती है

bhanvari devi : no body reveals where is she
leela maderna :chair person apex bank
mahipal maderna : former minister rajasthan
  
पत्नी में वह कौनसा माद्दा होता है जिसके चलते  वह अपने पति के ऐसे गुनाह भी  माफ कर देती है जिसके लिए वह कभी कोई  समझौता नहीं करना चाहती। हैरानी होती है कि जिस मुद्दे पर घर टूट जाते हैं, रिश्ते तबाह हो जाते हैं, बच्चे अलग-थलग पड़ जाते हैं उसी मुद्दे पर
पत्नियां सार्वजनिक मंच पर डटकर मोर्चा लेती हुई नजर आती हैं। कई नाम
हैं बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन  से लेकर अमरमणि त्रिपाठी की
पत्नी मधुमणि तक सब अपराधी पति की  भक्ति करने में ही यकीन करती दिखाई देती हैं । उत्तर  प्रदेश के विधायक अमरमणि ने तो कवयित्रि मधुमिता की हत्या उस वक्त करा दी थी जब वे गर्भवती थीं। अमरमणि आज जेल में हैं।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन  पर 1992 के चुनाव प्रचार अभियान के दौरान अभिनेत्री से  रिपोर्टर बन गईं जेनिफर फ़्लार, ने आरोप लगाया था कि उनके बारह वर्ष के बच्चे के पिता बिल हैं तब
हिलेरी ने एक इंटरव्यू में कहा- 'मैं यहां इसलिए नहीं बैठी कि एक छोटी सी
स्त्री मेरे पति के साथ खड़ी है। मैं यहां हूं क्योंकि  मैं उनसे प्यार करती हूं और
उनका सम्मान करती हूं।"  मोनिका लुइंस्की मामले पर भी उनका यही रवैया था। एक्टर शाइनी आहूजा पर उनकी नौकरानी ने बलात्कार का आरोप लगाया था। पत्नी अनुपमा आहूजा का विश्वास नहीं डिगा। इसी कथित विश्वास और भरोसे में पूर्व जल संसाधन विकास मंत्री महिपाल मदेरणा की पत्नी लीला मदेरणा का बयान बहुत चौंकाने वाला है। वे कहती हैं- 'मैं कहूंगी टीवी देखना, अखबार पढऩा बंद करो, इनके कैमरे तोड़ दो। सीडी-वीडी और रिलेशन होना कोई अपराध नहीं। यह तो राजा-महाराजा के ज़माने से चला आ रहा  है
दरअसल,उन्होंने उसी मानसिकता को भुनाने  की कोशिश की है जो स्त्री को एक बंधे बंधाए आदर्श की फ्रेम में देखना चाहता है। वे सीडी की विश्वसनीयता को लगभग स्वीकारते हुए कहती हैं कि दोष उस स्त्री का है जो इस तरह की समझौतावादी भूमिका में है। पति परमेश्वर का कृत्य उन्हें उनका हक लगता है। नैतिक शुचिता की ओर उनका कोई ध्यान नहीं है। मंत्री पद की गरिमा से भी  उनका कोई लेना-देना नहीं। उल्टे जाट बिरादरी से अपेक्षा करते हुए लीला यहां तक कह डालती हैं कि पार्टी को यह सब बहुत भारी पड़ेगा। बिरादरी के विचार और सोच को इस
कदर मोटिवेटेड कैसे मान लिया जाता है कि कोई भी  घटना विशेष उनके विचारों को नहीं झकझोरेगी। जातिगत सोच उन्हें भेड़चाल में चलने के लिए ही मजबूर करेगी, क्या इस सोच पर विराम नहीं लगना चाहिए। बहरहाल, पूर्व से पश्चिम तक दुनिया एक है। स्त्री की सोच एक है। त्रिकोण के तीसरे
कोण का विरोध करते हुए पत्नियां अपने पति का बेहतरीन डिफेंस खड़ा
करती हैं, फिर चाहे आपसी विश्वास की धज्जियां उड़ चुकी हों। इसी विश्वास में उन्हें समाज में अपना सम्मान  सुरक्षित नजर आता है। पति के गुनाह को वे गुनाह नहीं मानतीं और तो और इतने भी  सब्र का परिचय नहीं दिया जाता कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है। कम से कम पीडि़त पक्ष को एक निष्पक्ष माहौल ही दिया जाए। बयानबाजी उसका पक्ष कमजोर करती है। पत्नी के साथ होते ही अपराधी का दुस्साहस लौट आता है। पत्नी के बयान पर सबकी निगाह रहती है। ऐसे में पत्नियां जब-तब पति का डिफेंस खड़ा कर उन्हें पर्दा  देती आई हैं। यही अवसर होता है जब स्त्री का पर्दा उठकर पुरुष को आवरण दे  देता है । वे चीख-चीख कर पूरे जोश ओ खरोश के साथ बयानबाजी करती हैं , ऐसा नहीं किया तो शायद उनके दर्जे में कमी आ जाएगी. सच भी है समाज ऐसी पत्नियों का सम्मान करता है और गलती से कोई पति अपनी पत्नी का यूं साथ दे बैठे तो वह घोर नाकारा और नपुंसक करार दे दिया जाता है.
पूरी आशंका रहती है कि वे केवल रिश्ते की महत्ता और भावनाओं के वश में आकर अपनी बात कह  रही हैं। ऐसे में उनके समर्थन या फिर विरोध दोनों ही बयानों को खारिज किया जाना चाहिए। भंवरी देवी कांड में महिपाल मदेरणा की बीवी की बातों को भी इसी प्रकाश में देखा जाना चाहिए। जोधपुर की नर्स और लोकगायिका भंवरी देवी गायब हैं। होने और न होने का कोई सबूत अब तक नहीं है। जो भी बातचीत बाहर आई है वह सत्ता  के घिनौने स्वरूप को उजागर करती है। पैसे और पावर के इस खेल के सामने आने के बाद किसी को हक नहीं पहुंचता कि वे अपने कहे से मामले की नजाकत को भंग करे। इस पूरे कांड का सच सामने आना चाहिए, बस।

Friday, November 11, 2011

जिरहबख्तर


आज फिर हमने  गुस्ताखी की है
तेरे ग़म को लफ़्ज़ों की शक्ल दी है
 
क्यों चाहा अल्फाज़ का ये जिरहबख्तर
क्या होंसलों में अब कोई कमी सी है ||

मेरे हालात पे यूं जार-जार रोने लगा वो
समझ आया खुदा ने ही नाइंसाफी की  है ||
 
ये नुमाया लफ्ज़ अब बूंदों में घुल रहे हैं
तेरी सोहबत ने ये क्या सूरत दी है ||

तेरी सोहबत को दोष क्यूं कर हो
खामोश पानी को इसी ने रवानी दी है ||
 
मेरा किया गुनाह ए कबीरा न सही
गुनाह ए सगीरा से भी अब तौबा की है||

आज फिर हमने  गुस्ताखी की है
तेरे ग़म को लफ़्ज़ों की शक्ल दी है ||

गुनाह ए कबीरा -बड़ा गुनाह
गुनाह ए सगीरा -छोटा गुनाह
जिरहबख्तर -कवच

Saturday, October 15, 2011

लाल सलाम

श्वेता भट्ट,इलिना सेन, जाग्रति पंड्या और चित्रा सिंह को


उन पत्नियों को सलाम करने को जी चाहता है जो न्याय की राह में अपने पतियों के लिए डटी हुई हैं। निलंबित आईपीएस संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता भट्ट ने गुजरात सरकार से लोहा लिया है तो
विनायक सेन की पत्नी इलिना सेन छत्तीसगढ़ में लड़ रही हैं। गुजरात ही के पूर्व गृहमंत्री हरेन पंड्या की पत्नी जागृति पंड्या भी अपने पति की हत्या के पीछे रची
साजिश का पर्दाफाश करना चाहती हैं । ये वो पत्नियां हैं, जिन्होंने अपने पतिके संघर्ष को आगे बढ़ाया है। पढ़ी-लिखी पत्नियां, जिन्होंने अपने पति के पेशे की चुनौतियों को समझा। ऐसी हमसफर जो अपनी भूमिका को केवल चार दीवारी और चूल्हे-चौके तक सीमित नही करती। बेशक वे लाल साड़ी और लाल बिंदी में आपको नजर नहीं आएंगी, लेकिन उनका संघर्ष आपको लालिमा से ओत-प्रोत दिखेगा। भारत में ऐसी वैचारिक शादियों की परंपरा नहीं, लेकिन
ऐसी कई महिलाएं अपने मोर्चों पर डटी हुई हैं। अगर ये न होतीं तो
इनके पति की आवाज जेल की सलाखों में दबा दी गई होती या
फिर उनकी हत्या के राज कभी खुल नहीं पाते। करवा चौथ का
व्रत भी शायद ऐसे ही साथ की हिमायत करता है। यह महज
सोलह सिंगार कर पति को रिझाने
का उपक्रम नहीं, बल्कि अंतिम सांस तक रिश्ते के निर्वाह का व्रत
है। यह सचमुच देह से देह में मिलने की ऐसी कहानी है कि
इसमें कितना कौन है, इसकी पहचान ही नहीं हो पाती।
रिश्तों की इस पवित्र परंपरा को सजदा करते हुए  जरूरी नहीं कि
आपका साथी आस-पास ही मौजूद हो। इस गैर मौजूदगी में
जगजीत सिंह की पत्नी चित्रा सिंह आज अकेली हैं। दोनों संगीत की
डोर से ही बंधे थे। यूं भी मिर्जा गालिब के कलाम को जगजीत
सिंह ने बेहद खूबसूरती से गाया है। हम सब सुबह-शाम के इस तमाशे के साक्षी हैं। गालिब का ही शेर उनकी आवाज में मन ही मन गुनगुना लीजिए-
बाज़ीचा ए अतफाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब ओ रोज तमाशा मेरे आगे

बाज़ीचा ए अतफाल- बच्चों का खेल
शब ओ रोज- सुबह-शाम

Thursday, October 13, 2011

भंवरी से भंवरी तक

kllled!!!borunda jodhpur ki bhnvari devi jo shayad maar di gayee

raped ...bhabteri jaipur ki bhvari devi do dashak pahle hui thi balatkaar ki shikaar
भंवरी से  भंवरी तक कुछ नहीं बदला .हुक्मरान बदलते गए और भंवरियों को पैरों तले कुचलने  की  चेष्टाएँ  और मजबूत होती गयीं...
बात जब महिलाओं की आती है तो हमारी हालत बांग्लादेश से भी बद्तरहै। न्यूजवीक पत्रिका के एक सर्वेक्षण
में भारत को 141 वां स्थान मिला है। सर्वेक्षण में कल 165 देश शामिल थे।
देश जो महिलाओं को सर्वाधिक अधिकार और श्रेष्ठ जीवन देते हैं उनमें
आइसलैंड, स्वीडन, कनाडा और डेनमार्क का नाम है। टॉप-20 में
एशिया का एक मात्र देश फिलिपीन्स है जिसे सत्रहवां स्थान मिला है।
सच तो यह है कि हमें इन आंकड़ों की कोई जरूरत ही नहीं है। बस एक दिन
का अखबार पढऩे की जरूरत है। पिछले एक सितम्बर से राजस्थान  के मुखिया के गृह जिले जोधपुर से एक सैंतीस वर्षीय दलित महिला गायब है। उसका पति गुहार लगाते हुए बच्चों
सहित
आत्महत्या की बात कह चुका है लेकिन  भंवरी देवी का कोई अता-पता नहीं है।
 भंवरी के पति ने इस्तगासे में कहा है कि उसकी पत्नी जालीवाड़ा पीपाड़ में
बतौर नर्स कार्यरत थी। उसने मनचाहे स्थान पर तबादला करवाने के लिए
मंत्री से संपर्क किया। मंत्री ने उसका तबादला तो करवा दिया, लेकिन इसके
बाद फोन कर 
भंवरी देवी को बुलाने लगे। उसकी आपत्ति जनक सीडी तैयार
करवाई और ब्लैकमेल कर उसके साथ दुष्कर्म किया। इस डर से कि
कहीं पोल न खुल जाए बाद में
भंवरी देवी का अपहरण कर लिया गया और
सम्भवत: उसकी हत्या कर दी गई। इस पूरे प्रकरण पर निगाह डाली
जाए तो जांच का जो तरीका इख्तियार हुआ है वह सिवाय टाल-मटोल के
कुछ नहीं। अव्वल तो यही एक खतरनाक स्थिति है कि तबादला
करवाना है, मंत्रीजी के पास पहुंच जाओ। ये मंत्री तबादला चाहने वालों से
मिलते ही क्यों हैं? तबादले उम्र, लिंग और संबंधों के आधार पर होते हैं या योग्यता, स्थान विशेष पर व्यक्ति  की जरूरत के आधार पर? यह स्थापित सत्य है कि नेता के पास पहुंच जाओ,
तबादला हो जाएगा या रुक जाएगा। हमारे बीच कई लोग हैं जो मंत्री से परिचय को अपनी शान समझते हैं। अपना आदमी है जो कहेंगे हो जाएगा, ऐसी शेखी  बघारने वाले हम आप ही हैं।
परिचय के इस खेल में एक गिरोह तैयार होता है जो सैटिंग के आधार पर
सब कुछ कराना चाहता है। अपनी महत्वाकांक्षाओं को हवा देना चाहता है।
ऐसे में नैतिकता जैसे सवाल मंत्रालय, पुलिस थानों की देहरी पर ही छोड़ दिए
जाते हैं। लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेता अब कहां जो रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपना पद छोड़ देते थे। पद पर रहते हुए जांच प्रभावित होगी इससे कौन इनकार कर सकता
है। इस मामले में आरोपी मंत्री महिपाल मदेरणा पद पर ही बने हुए हैं।
 भंवरी देवी के मामले में पुलिस
अकर्मण्य और संवेदनशून्य रही है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जोधपुर उच्च
न्यायालय में तलब हुए हैं। पुलिस ने साक्ष्य देने वालों को इनाम की घोषणा
कर दी है। क्या होता है इनाम? कोई आओ और हमें बताओ कि इस महिला
का अपराधी कौन है। वह कोई डाकू गब्बर सिंह है जो जनता उसका पता
बताने के लिए आगे आएगी। यह तो सीधे-सीधे अपनी असफलता का ढिंढोरा पीटना है। पुलिस की संवेदना पर तो इंदौर की एक घटना इंसानियत का सिर झुकवा देती है। रेलवे प्लेटफॉर्म पर एक मासूम से पुलिस ने सौ रुपए में कटा हुआ सर उठाने के लिए कहा और काम हो जाने पर पैसे भी नहीं दिए।हमारी पुलिस आज भी  अंग्रेजों के जमाने की पुलिस कहलाती है लेकिन
हालात यह है कि ब्रिटेन में हर मामला दर्ज किया जाता है फिर चाहे वह पहली
नजर में ही बेहद कमजोर क्यों  ना हो। पुलिस स्वविवेक से फैसला करती है।
नेता और न्यायालय का उस पर इस कदर अविश्वास नहीं होता। यहाँ तो पूरा शिकंजा है. हमने
पुलिस के विवेक और कार्रवाई को कभी  विश्वसनीय नहीं माना। गर्दन
फंसने पर सीबीआई का नाम लेने लगते हैं। खामियों का लंबा सिलसिला
मौजूद है। महिलाओं को बेहतर जीवन देने के अधिकार इन खामियों के बीच
जब-तब कुचलते चले जाते हैं।
 भंवरी से  भंवरी तक कुछ नहीं
बदला है। दो दशक पहले
भटेरी की भंवरी देवी [जिला जयपुर] की भंवरी देवी के साथ दुष्कर्म
हुआ था। उन्होंने ऊंची जाति का एक बालविवाह रुकवाया था। वह साथिन
थीं और सरकारी दायित्व पूरा कर रही थी। सबक सिखाने के लिए सामूहिक
बलात्कार किया गया। उन्हें आज तक न्याय नहीं मिला है। नेता से न्यायालय
तक सबने उन्हें ही दोषी माना। न्यायलय कि तो टिपण्णी थी कि कोई ऊंची जातवाला नीची जातवाली के साथ बलात्कार कैसे कर सकता है ? जोधपुर की 
भंवरी देवी तो अपने साथ हुए
अन्याय को बताने के लिए भी नहीं है। वह जिंदा है या मार दी गईं, यह भी नहीं
मालूम। कोई लेगा इसकी जिम्मेदारी  कि राज्य की एक नागरिक कहां हैं?
वह कैसी थी, उसका आचरण कैसा था इन सब बातों से परे यह महत्वपूर्ण है
कि वह गायब कर दी गई है और इस षड्यंत्र में पूरी व्यवस्था शामिल है।

Saturday, October 1, 2011

आदम और हव्वा


माटी होने जा रही  देह को

उस दिन क्या याद आएगा
मोबाइल का ब्रांड
कम्प्युटर की स्पीड
या फिर वह कार
जिसकी खरोंच
भी 
 दिल पर लगती थी

उसे याद आएंगी
महबूब की आँखें
जिसमें देखी थी
उसने
सिर्फ मोहब्बत

माटी होते हुए भी
वह मुकम्मल
और 
मुतमइन होगी
कि उसने देखी थी
मोहब्बत में समर्पित स्त्री
एक पुरुष में .

Saturday, September 24, 2011

जाना

 जाना
कितना मुश्किल है
किसी रूह का
रूह के भीतर जाना
हमारे बीच कैसे
हँसते-खेलते
हो गया सब
पाक जज़्बे-सा 
यह गठजोड़ .... 


मेरा शीश अब
वहीँ झुका जाता है
मेरा शिवाला वही
मेरा काबा वहीँ
फिर भी  मैं 
हूँ काफ़िर  तो
वही सही .

Thursday, September 1, 2011

ANNAtomy of the politicians

om puri and kiran bedi at ramleela ground
अनशन तो अन्ना का था लेकिन विषैले
पदार्थ नेताओं के शरीर से निकल रहे
हैं। ईमानदार वरिष्ठ नागरिक, अपने
झोले में समाज की चिंताए लेकर चलने
वाले, कम संसाधनों के बावजूद जीवट
से आगे बढऩे वाले जिस तेजी से खुद
को हाशिए पर धकेले जाते हुए देख  रहे
थे, वे अब फिर से खुद को मुख्यधारा में
महसूस कर  रहे हैं। उनकी सोच को जैसे आवाज मिल गई है, चेहरा मिल गया है।
इस बड़ी सफलता में छोटी-मोटी परेशानियां  आई हैं। प्रशांत भूषण,किरण बेदी और ओम पुरी के खिलाफ संसद में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया गया है। किरण ने
साफ कह दिया है कि वे माफी नहीं मांगेगी और जरूरत पड़ी तो अपने पक्ष
की पैरवी भी खुद करेंगी। कुछ देर के लिए मान भी  लिया जाए कि किरण उस दिन
अपने आचरण से अलग नजर आईं। दुपट्टा ओढ़कर जो कटाक्ष उन्होंने
किए वे तीर की तरह चुभे। इसकी वजह शायद नेताओं का लगातार
बदलता रवैया रही होगी। किरण ने साफ कहा था कि ये नेता हमसे कुछ
बात करते हैं, मीडिया से कुछ कहते हैं और अन्ना के पास फोन कुछ और आता है। मानना पड़ेगा कि टीम अन्ना का समन्वय आला दर्जे का था अन्यथा थोड़ी सी चूक पूरे आंदोलन को कमजोर कर सकती थी।

किरण बेदी से अगर माफी की अपेक्षा है तो क्या
शरद यादव टाइम्स नाऊ के ख्यात पत्रकार अर्णव गोस्वामी से माफी मांगेगे? गौहाटी, आसाम में जन्में अर्णव के दादा मशहूर वकील और कांग्रेस के नेता रहे हैं। नाना आसाम में
कई साल तक विपक्ष के नेता के साथ स्वतंत्रता सेनानी और  लेखक। स्वयं अर्णव सैन्य अधिकारी के बेटे हैं। कोलकाता में टेलिग्राफ अखबार से करिअर शुरू करने वाले अर्णव 1995
में एनडीटीवी से जुड़े ।आज वे
टाइम्स

right now: arnav goswa
नाऊ के लोकप्रिय एंकर हैं और फ्रेंकली स्पीकिंग विथ अर्नव के होस्ट भी हैं. शरद यादव ने जनलोकपाल बिल के प्रस्ताव पर हुई बहस में उन्हें बंगाली मोशाय कहकर
संबोधित किया था। वे कहते हैं, इस बंगाली बाबू में कोई तहजीब नहीं, वह किसी की नहीं सुनता। सबको चुप
करा रहा है, हम कांग्रेसियों से पूछते हैं कि वे वहां जाते ही क्यों  हैं जब वह उन्हें बोलने ही नहीं देता। हम तो दस साल से नहीं गए। यह डिब्बा  (टीवी) दिन रात चिल्ला-चिल्ला कर एक ही बात कर रहा है। सोने नहीं देता। क्या  शरद यादव का यह आचरण पत्रकार की
अवमानना नहीं है? 

किरण बेदी पर आते हैं। उनकी मुश्किलें बढ़ी हैं। एक टीवी चैनल पर
मुस्लिम महिला ने उन पर आरोप लगाया कि जब वह आंदोलन में शामिल
होना चाहती थी, उनसे कहा गया कि वंदे मातरम् बोलना पड़ेगा तब ही आप मंच
पर जा सकती हैं। जवाब में किरण का कहना था कि उन्होंने कभी ऐसा नहीं
कहा और आंदोलन तो जाति, धर्म, क्षेत्र से ऊपर था। उन्होंने एतराज किया कि
आप इस तरह कैसे लोगों को टीवी पर ले आते हैं। टीवी एंकर का कहना था
कि इन्होंने एफआईआर दर्ज कराई है। 

बहरहाल, वंदे मातरम को लेकर किसी को क्यों एतराज होना चाहिए और ऐसी बातें शाही इमाम ने भी अभी  ही क्यों की? क्या  उन्हें तकलीफ थी कि हक की लड़ाई में हिंदु-मुस्लिम एक होकर डटे हैं?
journo by heart : shahid mirza:
प्रख्यात और लोकप्रिय पत्रकार शाहिद मिर्जा ने वर्ष 2006 में वंदे मातरम् यानी मां, तुझे सलाम शीर्षक से एक लेख लिखा .
उन्होंने लिखा -यह अफसोसनाक है कि राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लेकर मुल्क में फित्ने और फसाद फैलाने वाले सक्रिय
हो गए हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने तय किया कि सात सितंबर वंदे मातरम् का शताब्दी  वर्ष है। इस मौके पर देश भर  के स्कू लों में वंदे
मातरम्  का सार्वजनिक गान किया
जाए। इस फैसले का विरोध दिल्ली की जामा मस्जिद इमाम (वे स्वयं को शाही कहते हैं) अहमद बुखारी ने कर दिया।देश के मुसलमान वंदे मातरम् गाते हैं। उसी तरह जैसे जन-गण-मन गाते हैं। कभी इमाम बुखारी और  कभी  सैयद शहाबुद्दीन जैसे लोग स्वयंभू  नेता बनकर अलगाववादी बात करते रहे हैं। ऐसा करके वे अपनी राजनीति चमका पाते हैं या नहीं, यह शोध का विषय है लेकिन देश के आम मुसलमान का बहुत भारी नुकसान कर देते हैं। आम मुसलमान तो एआर रहमान की धुन पर आज भी यह गाने में संकोच नहीं करता। मां तुझे सलाम... इसमें एतराज की बात ही कहां है? धर्म या इस्लाम कहां आड़े आ गया? अपनी मांको सलाम नहीं करे तो क्या करें? अपने मुल्क को अपनी सरजमीं को मां कहने में किसे दिक्कत  है? 

बेशक, मुल्क को बांटने वाले हर उस दौर में सक्रिय हो जाते हैं जब देश नई ताकत हासिल कर रहा होता है लेकिन वक्त  ने यह खुशियां एक साथ बख्शी हैं। ईद और गणेश चतुर्थी साथ
आई हैं। हर एक दिल उत्साह और उल्लास में है। देश में नई उर्जा का संचरण है। हम एक मजबूत लोकतंत्र हैं, यह पिछले दिनों शिद्दत से महसूस हुआ. वन्दे मातरम्.

Saturday, August 20, 2011

फरेब


बड़े बवंडर थाम लेती हैं ये पलकें
याद का तिनका तूफ़ान ला देता है
 

पथरीले रास्तों में संभल जाती है वो
 नन्हा-सा एक  फूल घायल कर देता है 
 
सेहरा की धूप नहीं जला पाती उसे
बादल का एक टुकड़ा सुखा देता है
 

कभी तो आओ मेरे सुकून ए जां
क्यों  सब गैर ज़रूरी  दिखाई देता है 
 
आज हर तरफ परचम और रोशनी है
लोगों को इसमें भी फरेब दिखाई देता है

Thursday, August 18, 2011

उम्र उधेड़ के, साँसें तोड़ के


आज गुलज़ार साहब की 76 वीं सालगिरह है उन्हीं की एक नज़्म जो मेरे  सवाल का जवाब भी है.
 

रोज़गार के सौदों में जब भाव-ताव करता हूँ
गानों की कीमत मांगता हूँ -
सब नज्में आँख चुराती हैं
और करवट लेकर शेर मेरे
मूंह ढांप लिया करते हैं  सब
वो शर्मिंदा होते हैं मुझसे
मैं उनसे लजाता हूँ
बिकनेवाली चीज़ नहीं पर
सोना भी तुलता है तोले-माशों में
और हीरे भी 'कैरट' से तोले जाते हैं .
मैं तो उन लम्हों की कीमत मांग रहा था
जो
मैं अपनी उम्र उधेड़ के,साँसें तोड़ के देता हूँ
नज्में क्यों नाराज़ होती हैं ?

ps:गुलज़ार साहब की  किताब
छैंया-छैंया के बेक कवर से

Wednesday, July 27, 2011

न चीर होंगे न हरण होगा !!!

पिछले दिनों कनाडा के टोरंटो शहर में एक पुलिस कांस्टेबल ने महिला विद्यार्थियों से कह दिया कि अवॉइड ड्रेसिंग लाइक स्लट्स......
पुलिसवाला नहीं जानता था कि उसकी इस एक टिप्पणी से तूफान आ जाएगा और स्लट वॉक नाम का आंदोलन शुरू हो जाएगा। महिलाएं कम कपड़े पहनकर सड़कों पर निकल आएंगी और  कहेंगी देखो कपडे कम हो या पूरे छेड़छाड़ न हो इसके लिए कपड़े नहीं वह  मानसिकता जिम्मेदार है जो ऐसा करना  अपना हक़ समझती है .
 आंदोलन की सोच ने समूचे कनाडा और अमेरिका को झकझोर डाला। महिलाओं ने यह बताने की कोशिश की कि अगर कम कपड़े पहनने पर आप हमें स्लट् यानी फूहड़, कुलटा और ढीठ की संज्ञा देंगे तो यही सही। ऐसा कहकर आप अपराधी को तो बरी कर देते हैं और स्त्री को अपराधी ठहरा देते हैं। यह और बात है कि सकारात्मक भाव के साथ दिल्ली पुलिस कमिश्नर बी.के. गुप्ता भी यही कह चुके हैं कि देर रात किसी महिला को बाहर निकलना हो तो वह अपने रिश्तेदार या फ्रेंड के साथ हो। जाहिर है पुलिस प्रशासन यह स्वीकार चुका है कि महिलाएं अपने भरोसेमंद पुरुष के साथ ही ज्यादा सुरक्षित हैं। जब स्त्री अपने-आप में ही असुरक्षित है तो उसके कपड़े और कम कपड़े  सुरक्षा की गारंटी को न तो बढ़ाते हैं और न घटाते ।
पूरे कपड़े ही यदि किसी स्त्री को महफूज रख सकते, तो नन्हीं बच्चियों के साथ बदसलूकी नहीं होती। घरों में लड़कियों पर यौनाचार नहीं होता। छोटे लड़कों के साथ अप्राकृतिक कृत्य नहीं होते। यहां प्रोवोक यानी उकसाने जैसी अवधारणा कहीं भी नहीं है, फिर भी अपराध होते हैं।
स्लट वॉक की तर्ज पर दिल्ली की उन्नीस वर्षीय कॉलेज छात्रा उमंग सबरवाल ने भी ऐसे ही आंदोलन की घोषणा की है। अभी वे फेसबुक पर भाव-भूमिका बना रही हैं। नाम रखा गया है स्लटवॉक, 2011 अर्थात बेशर्म मोर्चा। इसे बीस हजार लोगों की भगीदारी मिल चुकी है।
ढाई साल पहले शिवसेना ने वेलेंटाइन्स डे के अवसर पर मिलने वाले जोड़ों की शादी करा देने की बात कही थी, तब महिलाओं ने उन्हें पिंक चड्डी भेंट करने का अभियान चलाया था। यह विरोध भी स्लट वॉक की तर्ज पर ही था कि आप जैसा सोचते हैं हम उसी पर खरे उतरेंगे।  मंगलौर में श्रीराम सेना ने लड़कियों के पब में जाने का विरोध किया था तब तत्कालीन महिला एवं विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने पब भरो आंदोलन का समर्थन किया था। सच कहा जाए तो कम कपड़ों में सड़कों पर मोर्चा निकालना हो या पिंक चड्डी भेंट करनी हो या पब भरना, ये तरीके किसी वैचारिक चेतना को जाग्रत नहीं करते। तभी ये किसी बड़े अभियान का सूत्रपात भी नहीं कर पाते।
हमें स्वीकारना चाहिए कि समाज में कुंठाएं व्याप्त हैं। अखबार की साइट पर जाकर देखिए सबसे ज्यादा क्लिक किस खबर को मिलते हैं। देह व्यापार, देह पर रिसर्च जैसी शीर्षक वाली खबरें सबसे ज्यादा पढ़ी जाती हैं। आप खुशफहमी पाल सकते हैं कि शायद पाठक खबर से जुड़े रिसर्च में भी उतनी ही दिलचस्पी रखता हो। फिल्म पब्लिसिटी के तमाम हथकंडे इसी मानसिकता को ध्यान में रखकर अपनाए जाते हैं। खबरें कहती हैं कैटरीना कैफ ने इस फिल्म में रितिक रोशन को किस जरूर किया है, लेकिन अब उन्होंने तौबा कर ली है कि वे  किसी फिल्म में किस सीन नहीं करेंगी यहां तक की सलमान  के साथ भी नहीं। दर्शक सोचता है यही मौका है देख लो भाई।
स्लट वॉक या बेशर्म मोर्चा निकालने से मानसिकता में बदलाव आना दूर की कौड़ी लगती है। बुनियादी बात है सम्मान। अगर आप किसी का सम्मान नहीं करते तो सकारात्मक भाव नहीं ला सकते। स्त्री को मान देना हमने नहीं सीखा है। वह गर्भ से ही  बोझ है। बोझ इसलिए कि उसके पालन-पोषण में हजार दिक्कते हैं। इन हजार दिक्कतों के मूल में वही डर है कि वह कहीं भी कभी भी छेड़ी जा सकती है।  बलात्कार, दहेज जैसी तकलीफों से उसे मुक्ति मिल जाए तो शायद माता-पिता बेटी के जन्म पर भी थाली ही पीटेंगे।
 कम कपड़े पहनकर आप यदि यह समझाना चाह रही हैं कि हम सीमाओं में न बांधें  तो यह मुश्किल ही लगता है क्योंकि सती का विरोध सती होकर नहीं किया जा सकता और न ही
डायन बनकर यह व्यथा समझाई जा सकती है . बहरहाल, चीन का चाऊमीन, इटली का पीत्जा और अमेरिका से बर्गर के साथ अहंकार का आयात तो हमने कर लिया है अब आंदोलनों का भी आयात हो रहा है। यूरोपीय संदर्भ हमसे अलग है। उन्हें हमारे दौर से निकले हुए आधी सदी से ज्यादा बीत चुकी है।...फिर भी यदि दिल्ली में निकाले जा रहे बेशर्म मोर्चे से किसी एक की भी सोच बदलती है तो यह सार्थक होगा, न  चीर  होंगे  न  हरण होगा.

Thursday, July 21, 2011

दो बच्चों के साथ लापता मां का सुराग नहीं


खाली छोड़े गए फ्रेम में आप एक स्त्री
और दो बच्चों की तस्वीर की कल्पना
कर लीजिए। दो बच्चों के साथ लापता
मां का सुराग नहीं
शीर्षक के साथ यह खबर मय तस्वीर के मंगलवार को जयपुर के एक एक बड़े अखबार में प्रकाशित हुई है । खबर के अनुसार थाने में 13
जुलाई को रिपोर्ट दर्ज कराई गई कि
12 जुलाई को सुबह ग्यारह बजे उसकी [पति का नाम ]
पत्नी (27), बेटी (11) और बेटा (2)
के साथ कहीं चली गई। उसके पास
चालीस हजार रुपए भी हैं। यह रकम
पति ने मकान का पट्टा प्राप्त करने के
लिए दी थी। पति और उसके परिजनों ने
महिला को किसी व्यक्ति द्वारा बहलाकर
ले जाने की आशंका व्यक्त की है।
सवाल यह उठता है कि किसी भी
महिला की तस्वीर छापकर या उसे
'भगौरिया घोषित कर हम क्या बताना
चाहते हैं। वह  वयस्क और दो
बच्चों की मां है। बच्चे भले ही नाबालिग
हों, मां बालिग है और अपने फैसले ले सकती है। ऐसी खबरें किसी भी
स्त्री के आत्न्सम्मान को ठेस ही
पहुंचाएगी। यह कहकर भी
अपमान किया गया है कि कोई उसे
बहला-फुसलाकर ले गया और वह
चालीस हजार रुपए लेकर गई है यानी
चोर कहने से भी कोई बाज नहीं आया
है। यह सूचना मय स्त्री और बच्चों की
तस्वीर के है। एक किशोर होती बच्ची
और मासूम बेटे को गैर-इरादतन दंडित
करने की यह मिसाल समाज में स्त्री को
अपनी भूमिका पर गौर करने के लिए
प्रेरित करती है।
शायद यहां पत्रकार का इरादा उस
महिला का सुराग भर लगाने का रहा
हो, लेकिन  एक अखबार किस हद तक जाकर सुराग लगाने की कोशिश कर 

सकता है इस पर भी विचार ज़रूरी है .यह मीडिया डॉन [मुग़ल नहीं] रूपर्ट मर्डोक से कम बड़ा अपराध नहीं कि लोगों की निजता में इतना दखल हो और स्त्री का घर से जाना भी सुर्ख़ियों में हो .
ऐसी ही अवमानना से स्त्री को बचाने के
लिए सर्वोच्च न्यायालय ने बलात्कार जैसे
मामलों में स्त्री का नाम न छापने के दिशा निर्देश दिए हैं, यहां तक कि

वेश्यावृत्ति कानून के तहत आप उनकी
तस्वीर भी  आम नहीं कर सकते। न्याय
प्रक्रिया के दौरान भी बलात्कार पीड़िता की पहचान
उजागर करना जरूरी नहीं है। रास्ते
निकाल लिए गए है मुंह पर कपड़ा
डालकर तस्वीरें छाप दी जाती हैं।
बहुत कम पीडि़त स्त्रियां इस हिम्मत  के साथ सामने आई होंगी कि हां
हमें इंसाफ चाहिए, हमारे साथ हुआ है
अन्याय। दरअसल, समूची परिस्थितियां
ही काफी शर्मिंदगी उठाने वाली होती हैं,
जो उन्हें बलात्कार जैसी दरिंदगी जितनी
ही खौफनाक लगती हैं।
बहरहाल भारतीय दंड विधान की
धारा 366 के तहत किसी महिला को
उसकी मर्जी के खिलाफ ले जाने
और उसके साथ ज्यादती करने पर
अधिकतम दस साल की सजा और
जुर्माने का प्रावधान है। आपराधिक
खबरों को पढ़ते हुए पाठक महसूस
करता है कि वह एक बने बनाए फ्रेम में
होती हैं, जैसे मामला दर्ज करने से
पहले उसे कानूनी धाराओं में फिट
करना हो।  इन ख़बरों में अक्सर लड़कियां या महिलाएं
बहला-फुसलाकर ही ले जाई जाती हैं,
वे घर से धन लेकर भी भागी होती हैं।
इस मामले में भी यही है। स्त्री की
तस्वीर देकर  उसे घोषित अपराधी बना दिया गया है
कई वर्षों से अखबार में क्राइम
रिपोर्टिंग  संभाल रहे
वरिष्ठ पत्रकार का कहना है- ऐसे
मामले वाकई संवेदनशील हैं किसी ने
इस बारे में आवाज नहीं उठाई, इसलिए
ऐसा चल रहा है। यहां अखबार और
पुलिस का इरादा महिला को नुकसान
पहुंचाने का नहीं होगा, लेकिन ऐसा हो
जाता है। ऐसी खबरों से दूरी बरता जाना
ही बेहतर होता है।
दरअसल, हमारी निगाह में महिला
के निर्णय का कोई मान नहीं है। यही
माना जाता है कि वह इस्तेमाल
हो सकती है। कोई स्त्री कभी अपने पति
के लिए ऐसा मुकदमा दर्ज नहीं करा
सकती कि उसका पति पैसे लेकर दो
बच्चों के साथ चला गया है। यह तो
उसका हक है, वह जहां चाहे जाए। न
मुकदमा दर्ज होगा, ना अखबार में
तस्वीर छपेगी।
स्त्री को अब भी अबोध [ बेवक़ूफ़  भी ] और मिल्कियत
माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ बरसों
से शहरी इलाकों में शिक्षा पर दिए जा
रहे जोर से उसमें फैसला लेने की ताकत
आई है। उसके फैसलों को नासमझी
और नादानी बताने की होड़ चारों तरफ
है। ऐसे में कई बार वह जलील भी की
जाती है। अपने फैसलों को मान दिला
पाने की लड़ाई लंबी है। कई बार उसके
दिमाग पर देह को हावी कर दिया जाता
है। स्त्री देह पाने का मतलब यह नहीं है
कि वह दिमाग भी नाजुक-सा लेकर
पैदा हुई है। उसे गरिमा से जीने का हक
तो हमें देना ही होगा। यूं बेवजह अपराधी
बनने के लिए उसे भी प्रस्तुत नहीं होना
चाहिए। खुद को बुलंद करने के बाद ही
खुदा की रजामंदी मिलती है।

Wednesday, July 13, 2011

मेरे करीब मेरे पास

यादों में मसरूफ़ एक सुबह















तुम्हारे आते ही भीग जाती हैं ये आंखें
इतनी शिद्दत से कोई नहीं आता मेरे पास


ये जो धरती का सिंगार देख रहे हो इन दिनों
  इतना हरापन तुम्हीं से आया है मेरे पास
 
हर मुश्किल हालात में मेरा तेरी ओर ताकना
अब कहीं से कोई जवाब नहीं आता मेरे पास

टूटते तारे का नज़र आना भी अच्छा होता है
कभी गम में शरीक होने ही आ जाओ मेरे पास


ये जो मधुर कलरव हमारे पंछियों का है
तुम हो यहीं
मेरे बेहद करीब मेरे पास

Sunday, July 10, 2011

जान का सदका





मैं फिर जिंदा हो जाना चाहती हूँ
तेरी जान का सदका लेना चाहती हूँ
 
नज़र ए बद से दुआ का सफ़र
एक  पल में करना चाहती हूँ
 


ये जो ख्वाहिश  दिल ने की है अल सुबह
तेरे ज़ख्मों में खुद को पैबस्त करना चाहती हूँ

 माजी कहकर भूलने को न कहना दोस्त
स्वर्णिम दौर को लौटा लाना चाहती हूँ
 

पाषाण युग से यही आरज़ू  रही है मेरी
तेरे लिए कायनात किनारे कर देना चाहती हूँ
 
यह लोह-ओ-क़लम  भी ले जा रहा है तेरे  करीब
मैं तो बस इसमें सवार हो जाना चाहती हूँ
 
होगी जब कभी क़यामत एक रोज़
 मैं  पूरी तरह सज जाना चाहती हूँ

Friday, July 1, 2011

जीना नहीं आएगा

 इसमें न कविता की लय है न ग़ज़ल का सलीका ...एक असर है जो बस मुखर हो जाना चाहता है . . .



तेरे बिना जीना नहीं आएगा
बिन
बरसे सावन  कैसे जाएगा
 

बेमायने है सहज होने की कल्पना
समंदर
अपना अक्स छोड़  ही जाएगा
 
 
 
ये जो सीली-सीली सी आँखें हैं मेरी
एक दिन आएगा पानी सूख जाएगा

जानते हो वह दिन क़यामत का होगा
तेरा-मेरा सिलसिला फिर जुड़ जाएगा

 

  इसे विलाप का आलाप न समझना दोस्त
आस का यह दिया अब नहीं बुझाया जाएगा

Friday, June 24, 2011

वह चुप है

राजस्थान विश्वविद्यालय के परिसर में लों की परीक्षा देकर लौट रही एक छात्रा को छात्र छेड़ने के बाद पीटते रहे लेकिन कोई आगे नहीं आया और तो और घटना  के बाद प्रतिकार  स्वरुप किसी नेता, छात्र नेता का बयान भी नहीं आया  है ...यदि एक भी नेता/कुलपति  यह कह दे कि यदि दोबारा ऐसी घटना परिसर हुई तो ऐसे छात्रों का विश्वविद्यालय में पढ़ना मुश्किल हो जाएगा तब शायद अनुशासन का सायरन बजे. शायद तब भी नहीं .यहाँ तो न किसी को पढ़ना है न पढ़ाना . होठ तो अब छात्रा ने भी सी लिए हैं ...यह चुप्पी चौंकाती है और संकेत देती है कि सब कुछ ऐसे  ही चलता रहेगा
शुभदा अपनी उम्र के तीन दशक पार
कर चुकी हैं, लेकिन आज वे चौदह
की उम्र में घटे जिस वाकये को
सहजता से सुना रही थीं तब दिल में
केवल दहशत थी। बचपन से ही
खेलने-कूदने में शुभदा की
दिलचस्पी थी। नए बन रहे मकानों
की
छतों से रेत के ढेरों पर कूदना
शुभदा के ग्रुप के बच्चों का शौक था।
उस दिन शुभदा ने घेरदार स्कर्ट
पहन रखी थी। नीचे कूदते ही वह
स्कर्ट छतरी की तरह खुल गई।
शुभदा बहुत घबरा गई और उसे खुद
पर शर्म आने लगी। बाजू से
शरारती लड़कों का समूह गुजर रहा
था। उनकी
सीटियों  और तालियों ने शुभदा को रुआंसा कर दिया 
और वे आज भी जैसे उसके कानों में गूंजती हैं
बात वहीं खत्म नहीं हुई थी। शुभदा
जब भी घर से निकलती ये लड़के
चिल्ला कर छेड़ते... उड़ गई रे!
घटना भी जैसे उड़कर पूरे मोहल्ले
के लड़कों की जुबां में समा गई थी।
शुभदा जहां से गुजरती, यही फिकरे
सुनने को मिलते। घर से निकलने में
डर लगता। स्कूल जाना  भारी
पड़ता। मां कोई काम कहती तो वह
टाल देती। सपने में उसे उड़ गई
रे... का अट्टाहस सुनाई देता। वह
खुद को अपराधी महसूस करने
लगी। उसे उस स्कर्ट से ही नफरत
हो गई ।
आज शुभदा कहती हैं, मैंने
इसके बारे में किसी को नहीं बताया।
क्या बताती मम्मी पापा को। मेरी
शिकायत में 
क्या दम था। मैं तो खुद
को ही दोषी मान रही थी। लेकिन
उन लड़कों के फिकरों ने मुझे तीन
साल तक सहज नहीं रहने दिया।
थोड़ी समझ आई तो खुद ही इसका
नोटिस लेना बंद कर दिया। बाद में
इंजीनियरिंग में चयन हो गया तो
उनकी जुबां को भी ताले लग गए।
... लेकिन आज कोई मुझसे पूछे
तो मैं कहूंगी मेरे जीवन के सर्वाधिक
मुश्किल साल वही थे। भय और
अपराधबोध ने मुझसे मेरा वह समय
छीन लिया था। अब लगता है कि
क्यों नहीं मैं गूंज गई किसी सायरन
की तरह। मेरी गलती ही
क्या थी जो
मैंने यह सब सहा? शुभदा जैसे उस
दौर से निकल ही नहीं पा रही थी।
आज यही सब जयपुर में
एलएलबी की वह छात्रा सह रही है।
सोमवार को जब वह एलएलबी का
पर्चा देकर लौट रही थी तो तीन-चार
लड़कों (कथित छात्र) ने उसे छेड़ा।
जब लड़की ने छेडख़ानी का विरोध
किया तो उन्होंने उसे पीटना शुरू कर
दिया। उसके स्कूटर में तोडफ़ोड़
करनी शुरू कर दी। वहां मौजूद
किसी ने भी इस लड़की की मदद
नहीं की। लड़की
हिम्मत कर
उनसे छूटी और मोबाइल से 100
नंबर डायल कर पुलिस सहायता की
गुहार लगाई। छात्रावास में रह रही
इस लड़की के साथ राजस्थान
विश्वविद्यालय परिसर में घटी यह
घटना इसलिए भी शर्मनाक है,योंकि बचाने के लिए कोई आगे
नहीं आया। लड़की ने लड़कों का
मुकाबला करने की कोशिश की थी।
उनहें यह कब बर्दाश्त होता। 
'हैप्पी एंडिंग  ' होती अगर लड़की की
शिकायत पर लड़के हवालात में होते।
मंगलवार की सुबह डेली न्यूज
रिपोर्टर करुणा शर्मा जब छात्रावास
पहुंची, तो वहां मरघट-सा सन्नाटा
पाया। भीतर जाने की इजाजत
किसी को नहीं थी। पुलिस के दो
जवान लड़की के बयान दर्ज करने
आए थे। महिला पुलिस नहीं थी।
वार्डन ने साफ कहा कि लड़की कोई
बयान नहीं देना चाहती। यहां सब
कल से परेशान हैं और लड़की सुबह
से सिर्फ रोए जा रही है।
क्यों  रो रही है वह? क्या
गलती है उसकी? वह लॉ की
परीक्षा दे रही है और लॉ में ही
उसका यकीन नहीं? यूं तो सारी
घटना सबके सामने है, लेकिन
औपचारिक तौर पर वह कोई बयान
दर्ज नहीं कराना चाहती। नहीं आना
चाहती किसी के सामने। उसे भय है
कि वे लड़के हैं और वह लड़की।
उसका बाहर निकलना मुश्किल हो
सकता है। अभी तो हमला किया है
आगे किसी भी हद तक जा सकते
हैं। यही आशंकाएं उसे चुप रहने पर
मजबूर कर रही हैं। लड़कियों की
इन्हीं आशंकाओं (बेशक ये निर्मूल
नहीं हैं) ने बदमाशों की
कारस्तानियों को हवा दी है। वे
चाहते हैं कि वे हमारी छेडख़ानियों
को सर झुकाकर लें। ट्रैफिक
सिग्नल पर गलती करने वाले लड़के
को बोलकर देखिए कुछ, उसके अहं
को ऐसी चोट लगती है कि वह
आपको कट-मारकर गिरा देना
चाहता है। उसे बर्दाश्त नहीं कि आप
कुछ भी कहें। आपकी
चुप्पी में
उसका सुख है।
एलएलबी करने वाली बहादुर
लड़की... हिमत मत हारो।
आंसुओं में मत डूबो।
तुम्हारी कोई
गलती नहीं। गलती तो अब होगी गर
चुप रह
गयी

Wednesday, June 15, 2011

जय डे

jyotirmay dey ie  j dey
 चार साल पहले एक लड़की आई थी। दीदी मेरा बहुत मन है पत्रकारिता की पढ़ाई करने का।  चयन हो गया और मैं इस फील्ड में अपना करियर बनाना चाहती हूं। फिर दिक्कत क्या है? ... 'पापा मना कर रहे हैं, एक बार आप चलकर उनसे बात कर लो शायद वे मान जाएं।' उसने कहा। आखिर, वे मना क्यों कर रहे हैं। 'पापा को लगता है कि इस फील्ड में खतरा ज्यादा है और पैसा भी नहीं। वे चाहते हैं कि मैं एमबीए कर लूं या फिर कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स देकर  सेफ करियर चुनूं। 'लिखने -पढऩे वाली लड़की थी। पापा का सम्मान करती थी। पत्रकारिता में नहीं आई, आज उसके  पास बढिय़ा सरकारी नौकरी है।
इससे कुछ और पहले एक लड़का भी पत्रकारिता में आया था। बड़े पैशन के साथ लेकिन मनमाफिक काम नहीं मिलने और कम तनख्वाह ने उसके पैशन की हवा निकाल दी। कुछ समर्पण और प्रतिबद्धता की भी कमी रही होगी, जो ये दोनों अखबारनवीसी को अपना नहीं पाए। सवालों के इन चक्रव्यूहों से निकलकर जो युवा इस विधा को अपना पेशा बनाता है, वह बेशक प्रतिबद्ध होता है, सुनिश्चित होता है। पैसा भले कम सही, लेकिन समाज के लिए कुछ नेक काम वह  कर जाना चाहता है। उसका पेशा उन्हें उन लोगों से अलग करता है जो प्रोडक्ट बेचने की कवायद में किसी भी हद तक जा सकते हैं। मार्केटिंग से जुड़े लोगों के लिए अखबार भी किसी प्रोडक्ट से कम नहीं, लेकिन एक पत्रकार को अब भी ऐसे शब्दों पर ऐतराज होता है। यहां उन लोगों की बात नहीं हो रही है जो पत्रकारिता में भी सिफारिशी  सीढिय़ां लांघ कर आए हैं।
सच्ची खबर लिखने वाले पत्रकार थे जे डे। पूरा नाम ज्योतिर्मय डे जिन्हे मुंबई [पवई ] में 11  जून की दोपहर चार बंदूकधारियों ने आठ गोलियां मारकर मौत के घाट उतार दिया। मुंबई से प्रकाशित मिड डे के इस खोजी क्राइम रिपोर्टर की अंतिम स्टोरीज पर गौर कीजिए-
1 अठारह मई 2011 को प्रकाशित जे की स्टोरी में 109 साल पुरानी सीताराम बिल्डिंग को जमींदोज कर दस माले की बिल्डिंग बनाने का विरोध किया था ताकि ऊंचाई से मुंबई पुलिस कमिश्नर ऑफिस को निशाना ना बनाया जा सके।   
2 सोलह मई को पेट्रोल के दाम बढ़ते ही उन्होंने स्टोरी ब्रेक की जो मुंबई के दस हजार करोड़ रुपए के तेल गिरोह  का भंडा फोड़ कर रही थी।
दस मई की एक स्टोरी में जे ने बताया था कि ओसामा की मौत दाऊद को लंबा जीने में मदद करेगी क्योंकि भारत के मोस्ट वांटेड के लिए पाकिस्तानी आईएसआई ने सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है।
तेरह जून को मुंबई के तमाम पत्रकारों ने रैली निकालकर मुख्यमंत्री से मांग की कि जे डे की हत्या की जांच सीबीआई से कराई जाए, लेकिन सरकारों में अब सुनने का चलन कहां है। दो सालों में मुंबई के 180 पत्रकार हमले के शिकार हुए हैं। पत्रकार जे डे ईमानदार थे। उनकी पुस्तक जीरो डायल के  विमोचन में अभिनेता अजय देवगन मौजूद थे। अजय ने उन्हें  करीबी मित्र बताते हुए कहा है कि वे बहुत ही विनम्र थे और नपा-तुला बोलते थे, लेकिन उनका काम हजार शब्दों में बात करता था। जीरो डायल पुलिस इन्फॉरमर्स के बारे में लिखी किताब है और खल्लास में उन शब्दावलियों का खुलासा है जो अंडरवर्ल्ड में बतौर कोडवर्ड चलती हैं। मौत से पहले तक जे डे अंडरवर्ल्ड और ऑइल माफिया से जुड़ी किताब पर काम कर रहे थे। मिड डे से पहले इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स में काम कर चुके जे डे की सारी समझ जैसे माफिया के खिलाफ थी और माफिया कब अपने खिलाफ कुछ बरदाश्त करता है। जे डे नई पीढ़ी को बेहतर प्रशिक्षण देने में यकीन रखते थे। उम्मीद है कि जे डे की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। पत्रकारिता में प्रतिबद्ध लोगों का ही प्रवेश होगा। करियर से बड़ा मिशन होगा जो चोरी और सीनाजोरी का  पर्दाफाश करेगा। जय डे।

Friday, June 10, 2011

या हुसैन !!

naman: in mumbayee at mahboob studio..image shahid mirza
मकबूल फिदा हुसैन से दिल्ली, मुंबई और इंदौर में हुईं आठ मुलाकातें उन पर लिखने का हक नहीं दे देतीं, न ईरानी होटल में उनके साथ ली गई चाय की चुस्की और न ही कफ परेड स्थित उनके फ्लैट पर खाई बिरियानी , न महबूब स्टूडियो में गजगामिनी के लिए लगाया गया सेट, न वरली नाका में उनका एक साथ पांच बड़े पैनल पर रंगों से खेलना और न ही इंदौर के कॉफी हॉउस में घंटों उनकी सोहबत। दरअसल, हुसैन बाबा से हुईं ये सारी मुलाकातें एक भीतरी परिवर्तन के दौर से गुजरने की कवायद है। आप एक कायांतरण सा महसूस करते हैं, आप विकसित होते चले जाते हैं, आपके भ्रम टूटते चले जाते हैं, माधुरी पर लट्टू एक बूढ़े की छवि तहस-नहस होती है। हमारे देवी-देवताओं को नग्न चित्रित करने वाला दृष्टिकोण चकनाचूर हो जाता है, जब आप उनकी फिल्म गजगामिनी के चरित्रों में भारतीय दर्शन को महसूस करते हैं। उनकी कला में छुपे दर्शन को उनके विरोधियों ने नहीं पहचाना। इसी के चलते उन्हें देश छोड़ना पड़ा। वे कभी लंदन तो कभी दुबई के बीच झूलते रहे। कुछ लोगों ने इसे ओढ़ा हुआ निर्वासन कहा। इस बीच किसी सरकार या समूह ने हुसैन को यह भरोसा नहीं दिया कि हे भारत! के चितेरे, तुम निर्भय होकर आओ, हम तुम्हारे साथ हैं। चार साल तक ठोकरें खाने के बाद उन्होंने कतर को चुना। शायद उस देश को, जिसने उन्हें बेखौफ जीने का आश्वासन दिया होगा।
m. f. hussain n shahid mirza at indian coffee house indore
वे कहीं भी गए, लेकिन उनके पोर-पोर से इस देश की माटी की खुशबू आती है। कहीं से न फिरके का बोध होता न अहंकार का, जिंदा रहने को आतुर एक ऎसा शख्स, जो अगले पल क्या करेगा, खुद उसे भी ख्याल नहीं, गजगामिनी की शूटिंग के दौरान रात दो-ढाई बजे माधुरी दीक्षित से लेकर स्पॉट बॉय तक उबासी लेने लगते, लेकिन तब अस्सी साल के बाबा के चेहरे पर थकान का नामों निशां नहीं होता। वे बहुत थोड़ा-थोड़ा खाते। पसंदीदा ग्वार फली की सब्जी भी उन्हें ज्यादा खाने के लिए उकसा नहीं पाती थी। चाय के  घूँट उन्हें हर आधे घंटे हलक में उतरने के लिए मजबूर करते। एक बार बाबा की प्लेट में बिरियानी परोसी गई। गोश्त के टुकड़े शायद कुछ कम होंगे, बाबा बोल पड़े... बिरियानी की आबरू आज कुछ कम सी लग रही है। ऎसे न जाने कितने लम्हें आज आ-जा रहे हैं। वे शाहिद मिर्ज़ा साहब को गजगामिनी के गीत सुनाना चाहते थे . समय कम था एक ही उपाय था कफ़ परेड से मुम्बई सेंट्रल की दूरी तय करते हुए इसे सुना जाए...बाबा ने गाडी का स्टेरिंग थमा और पूरे रास्ते न केवल गीत बजाए बल्कि उनकी व्याख्या भी करते गए...यह अलग कहानी कि उस दिन हमने ट्रेन पकड़ी भी या नहीं.
एक बार बिना तैयारी से आए किसी पत्रकार ने उनसे पूछ लिया... आप घोड़े ही क्यों बनाते हैं? वे तपाक से बोल पड़े...आपने ये लाल कमीज ही क्यों पहन रखी है, यह काला चश्मा क्यों लगा रखा है...मैं भी घोड़े बनाता हूं...इसका क्या जवाब हो सकता है। कम लोग जानते होंगे की बाबा शेर-ओ-शायरी पर कमाल की पकड़ रखते थे। उन्होंने फिल्म गजगामिनी के गीत और "मीनाक्षी अ टेल ऑव थ्री सिटीज" के लिए कव्वाली भी लिखी थी उनका एक शेर...
न आब्लों से पाँव के घबरा गया था मैं, 
जी खुश हुआ है राह को पुरखार देख कर।...
पांव के छाले देख मैं घबरा गया था, लेकिन अब राह में कांटे ही कांटे ही देख कर मन प्रसन्न हो रहा है। जीवन की चुनौतियों को हंसते-हंसते स्वीकारने वाले बाबा की सिर्फ देह ने हमसे विदा ली है, उनकी कला और उससे भी बड़ा उनका भारत प्रेम कइयों को अनंत काल तक स्पंदित करता रहेगा और कई लोगों को वह दर्द भी, जो उन्हें एक भारतीय होने के नाते मिला। दुनिया अपने कवि और कलाकारों की पूजा करती है और हम उन्हें देश से बाहर जीने-मरने के लिए मजबूर करते हैं। उन्हें उस आबोहवा से दूर करते हैं, जो उनके लिए प्रेरणा का काम करती रही है।

हुसैन औए पिकासो
पूरी दुनिया में ख्यात स्पेनिश पेंटर पाब्लो पिकासो के नाम पर हुसैन को भी भारत का पिकासो कहकर याद किया जा रहा  है । यूं पचहत्तर पूरे करते हुए हुसैन ने कहा भी था कि पिकासो की जीवन में दो ही इच्छाएं थीं लम्बा जीवन और जीवन के अंत में खूब सारा काम छोड़ जाना उनकी इच्छाएं पूरी भी हुईं। वे ९२ साल तक जीए और अंतिम २० वर्ष  उन्होंने खूब सारा काम किया। हुसैन बाबा ने भी खूब काम किया है इतना कि पीढियां अचरज करेंगी, उनकी उम्र और ऊर्जा, उनसे लगतार काम करवाती रही। यह धरोहर बेशकीमती है। उम्मीद है कि अब किसी हुसैन गुफा या हुसैन के स्टूडियो को आतातायियों का शिकार नहीं होना पड़ेगा। न किसी अदालत में मकबूल फिदा हुसैन हाजिर हो की गुहार लगेगी। मौत के हिस्से भी कुछ सुकून तो आते ही हैं। भारत के इस खूबसूरत चितेरे को नमन...

Wednesday, June 8, 2011

क्या होता है दुर्भाग्यपूर्ण ?

दुर्भाग्यपूर्ण । भारतीय राजनीति में इस एक  शब्द का जितना
दुरुपयोग हुआ है वह वाकई दुर्भाग्यपूर्णहै। क्या होता है यह दुर्भाग्यपूर्ण? सत्ता आपके पास है, फैसले आप लेते हो, डंडे
आप चलाते हो और ऊपर से कहते हो दुर्भाग्यपूर्ण। दुर्भाग्यपूर्ण
आप खुद  ही तो नहीं। इस देश के लिए। प्रजातंत्र के लिए।
ईमानदारी के लिए। महंगाई के लिए। फेहरिस्त लंबी है। गिनते
चले जाइए। आधी रात के बाद यदि यह भीड़  को तितर-बितर करने का
षड्यंत्र था, तो बेशक यह लोकतंत्र के खिलाफ था। भीड़
यदि खतरा है, तो प्रजातंत्र  भी  खतरा है। स्वयं आपकी सरकार खतरा है, क्योंकि यह सब भीड़ का ही नतीजा है। शायर अल्लामा इकबाल ने कहा भी है  जम्हूरियत यानी प्रजातंत्र वह तर्ज
-ए-हुकूमत है, जहां बंदों को तौला नहीं, गिना जाता है।
बाबा रामदेव कितने सच्चे
हैं, उन्हें योग सि खा ना चाहिए,
राजनीति नहीं करनी चाहिए, इन
सब बातों का रामलीला मैदान
पर हुए अनशन से कोई ताल्लुक
नहीं होना चाहिए। बच्चन साहब एक्टर  हैं एक्टिंग  ही करनी
चाहिए, अरुण शौरी को सिर्फपत्रकारिता और किरण बेदी को सामाजिक कार्यकर्ता की सरहद नहीं लांघनी चाहिए। कौन तय करेगा यह?. . . और किसी नेस्वयं तय कर लिया है, तो वह सरकार नियोजित डंडे खाने के लिए तैयार रहे। चार जून की देर रात को हुई उस धोखाधड़ी
की कार्रवाही के दौरान 75 फीसदी लोगों को चोट आई।
इक्यावन वर्षीय राजबाला को रीढ़ की हड्डी पर गहरी चोट है
और 24 साल के सुनील का सिर फूट चुका है। दोनों ही जीवन और मृत्यु से संघर्ष कर रहे हैं। 
बेशक ,यह अलग मुद्दे हैं
कि बाबा रामदेव से श्रेष्ठ अन्ना हजारे हैं कि बाबा रामदेव ने
विदेश में लंबी चौड़ी जमीनें खरीदी हैं कि उन्होंने अनशन को
अतिरिक्त  भव्यता दी कि पढ़ा -लिखा  युवा अन्ना हजारे से
स्वत:स्फूर्त जुड़ गया था कि बाबा रामदेव राजनीतिक पार्टी
का निर्माण कर चुके हैं। इनमें से सारी बातें अगर सच भी हैं
तब भी चार जून की रात के घटनाक्रम को न्यायोचित नहीं
ठहराया जा सकता। यूं ही लोगों को जनरल डायर की करतूत
याद नहीं आई। अंग्रेजी हुकूमत के इस जनरल ने 13 अप्रैल
1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में
अंधाधुंध गोलियां चलवाई थीं। स्त्री-पुरुष, बच्चे सब निहत्थे थे।
डेढ़ हजार से ज्यादा लाशें बिछी थीं तब। यहां रामलीला मैदान में
सब उनिंदे थे। जिस संस्कृति में सोते हुए पेड़-पौधों को जगाना भी अपराध है वहां लाठियां बरसाई गईं। आंसू गैस छोड़ी
गई।
गौरतलब है कि जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हवा बन गई थी।
लकवे का शिकार डायर अंतिम
समय में यही बुदबुदाते हुए मर
गया - 'कुछ लोग कहते हैं मैंने
ठीक किया और कुछ कहते हैं
गलत किया। अब मैं मर जाना
चाहता हूं और गॉड से पूछना
चाहता हूं कि मैं सही था या
गलत।
हमारी हुकूमत करने की शैली अंग्रेजों जैसी है। कुछ देते
हैं, तो एहसान की मुद्रा में और छीनते हैं, तो डाकू और हत्यारों
की तरह। इन दिनों एक छपा हुआ विज्ञापन हर जगह नजर
आता है। तस्वीर में  भूखे बच्चे स्कूल आकर खाना खाते हैं।
सरकार उन्हें पौष्टिक भोजन देती है। आजादी के 64 सालों बाद
तक सरकार को अपनी जनता को  भीख  देनी पड़ रही है। खाना
देंगे, स्कूल आओ पढऩे के लिए। ये तरीके एक नागरिक के भीतर स्वाभिमान नहीं जगाते होंगे। उल्टे रौंदते हैं। भूखे बच्चों
की इन कतारों के ऊपर दो तस्वीरें चस्पा होती हैं। सत्ताधारी
उम्रदराज पुरुष और स्त्री की। यह जताते हुए कि देखो , हम कितना कर रहे हैं इन लोगों के लिए। दरअसल, एक बड़ी खाई बन चुकी है हुकूमत और जनता के बीच। भरोसा उठ चुका है। यह महत्वपूर्ण समय काल
है। संक्रमण का दौर है। समय सबको दर्ज करेगा। जो चुप हैं
उनका भी हिसाब लिखा जाएगा।

Thursday, June 2, 2011

भाषा की समझ

पिछले दिनों एक कविता पढ़ी...अच्छी लगी...आप भी देखें.


भाषा की समझ

 अजितकुमार

फर्क था बहुत
मेरी और उनकी बोली में।
जब वे मांगते थे पानी
उठा लाता था मैं  कपड़े।
जब मैं चाहता था एकांत
सुलगा देते थे वे अंगीठी।
एक पुस्तक थी हमारे पास
जाने किस भाष में लिखी,
मैं कहता था ज फ ग ट ह
वे  न म ल व र
उच्चारण ही क्यों,
अर्थग्रहण में भी
अंतर था।
बावजूद इसके,
 जब तक प्रेम था हमारे बीच
वह समझ में आता रहा।
फिर विरक्ति को भी हम
धीर-धीरे
समझने लगे।

Wednesday, May 25, 2011

पाक कलश

nature smiles: kalash woman


 wonder vally : kalash
दुनिया का सबसे चर्चित मुल्क पाकिस्तान। आतंकियों को पनाह देने वाला, लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने वाला] सैनिक-गैर सैनिक हुक्मरानो की अदूरदर्शी नीतियों का शिकार पाकिस्तान। अमेरिका की गोद में बैठकर उसी से नफरत करने वाला पाकिस्तान। औरतों के हक की अनदेखी करता पाकिस्तान और पड़ोसी भारत को बेवजह हौव्वा मानने वाला पाकिस्तान।
... लेकिन इसी पाकिस्तान में एक बेहद खूबसूरत जगह है कलश। नाम जितनी ही पवित्र और सुंदर। पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम और हिंदु कुश हिमालय पर्वत शृखलाओं के बीच बसी जन्नत के नजारे वाली इस घाटी के बाशिंदे आजाद खयाल हैं। स्त्री परदे में नहीं है।  एक ऐसा त्योहार भी इस घाटी में मनता है जब एक लड़की के लिए सब कुछ मुमकिन है। वह अपने प्रेम का इजहार कर सकती है और अपनी शादी को तोड़ सकती है। बेशक, यह पाकिस्तान की आम औरतों की जिंदगी से बिलकुल अलग है। बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप से अलग है।
बीबीसी वेब पर प्रकाशित एक आलेख के मुताबिक कलश घाटी के लोग इस्लाम धर्म की बजाय तमाम देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। पहाड़ी घर आपस में सटे हुए हैं। छत और बरामदे जुड़े हैं। छोटा और बंद समाज है। रास्ता मुश्किल है इसलिए बाहरी असर ना के बराबर है। घाटियों में मंदिर बने हैं, जहां मुसलमानों और औरतों के जाने पर पाबंदी है। अजीब यह भी है कि गर्भावस्था और खास दिनों के दौरान स्त्रियां गांव से बाहर अलग घर में रहती हैं। यह परंपरा पुरानी है, लेकिन ज्यादती की शिकायतें नहीं मिलती हैं।
कलश घाटी की अपनी भाषा और संगीत है। संस्कृति पर इंडो-ग्रीक असर हावी है। रंगत और नैन-नक्श काफी कुछ यूरोप का अक्स पैदा करते हैं। भाषा खोवार है। भाषा पर गौर कीजिये हड्डी को अथी [संस्कृत में अस्थि ]; गाँव को ग्रोम [ग्राम]; बेटे को पुट [पुत्र ];नाश को वे भी नाश ही कहते हैं । इस भाषा का लिखित प्रयोग ना के बराबर है। बहुत कोशिश की गई कि खोवार भाषा को रोमन लिपि में ही लिखा जाए, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। लिखा-पढ़ी उर्दू में ही होती है।यहां के लोगों को खो कहा जाता है
माना जाता है कि तीन से चार हजार साल पहले इनके पुरखे यहां आकर बसे थे। सिकंदर महान भी यहां आए थे। सिकंदर के इतिहास में  दर्ज है कि जब वे इस इलाके से गुजरे तो वहां उन्होंने जिन लकडिय़ों का इस्तेमाल आग जलाने के लिए किया वे कोफीन थे, जिसमें मृत देह को रखा जाता था। वहां के लोगों को बेहद गोरे और नाजुक देहवाला बताया गया यानी ठीक वैसा ही जैसे वे  खुद थे। घाटी के लोग एक खास  धर्म को मानने वाले थे, जो युनानी देवी-देवताओं से काफी मिलता-जुलता था। ऐसा नहीं है कि यूनानी मूल के लोग यहां आकर बसे, बल्कि दोनों का ही मूल एक रहा होगा। एक मत यह भी कहता है कि सिकंदर के कुछ सैनिक यहीं बस गए थे और ये उन्हीं के वंशज है।
बहरहाल,  पवित्र और बाहरी हस्तक्षेप से अछूते इलाके में अब पाकिस्तान सरकार को पर्यटन की बेशुमार संभावनाएं नजर आने लगी हैं । कलश के लोग नहीं चाहते कि यहां की पाक जमीं पर बाहरी दखल हो। होटल बने। इलाका खाली बोतलों और कांच के गिलासों से पट जाए। छोटी-सी घाटी में इस कचरे को दफनाने का कोई उपाय नहीं है। कलश के लोग दुखी हैं। वे आग्रह करते हैं कि घाटी को इस दबाव से मुक्त किया जाए।
मौसम बच्चों की छुट्टियों का है। वे माता-पिता के साथ पहाड़ों पर जाना चाहते हैं। पर्यटन ज्ञान और समझ बढ़ाने का बेहतरीन जरिया है, लेकिन क्या जरूरी है कि प्रचलित पहाड़ ही चुने जाएं। वहां भीड़ और होटल्स के अलावा बहुत कम जानने के लिए होता है। क्यों नहीं वे इलाके चुनें जाएं जो थोड़े भीतरी हो। वहां की सभ्यता से जोड़ते हो। क्यों सैर का मकसद डायरी में एक शहर की उपस्थिति भर हो? कलश के बाशिंदों का भी यही एतराज है कि सरकार इस इलाके को एक मुश्त दुह लेना चाहती है वरना, मेल-जोल से किसे दिक्कत है। इस्माइल मेरठी ने तो कहा भी है
सैर कर दुनिया की गाफिल
जिंदगानी फिर कहां
जिंदगानी गर रही तो
 नौजवानी फिर कहां