Wednesday, November 17, 2010

बंदिनी की कविता और बिंदासी का आतंक

आंग सान सू की  और राखी सावंत। इन दो स्त्रियों में कोई  जोड़ नहीं, कोई समानता नहीं। एक फख्र तो दूसरी फिक्र। एक दो दशक तक नजरबंद रहकर भी अर्श पर तो दूसरी आधे दशक से अपनी देह और शब्दों से चीखते रहने के बावजूद फर्श पर। क्या पब्लिसिटी और काम पाने की लालसा के मायने यही रह गए हैं कि जितनी बकवास कर सकते हो, करो। सामने बैठे को रौंद दो अपनी जहरबुझी जुबां से। एक कम पढ़ी-लिखी कुंठित स्त्री चैनल और टीआरपी के खेल में किस कदर इस्तेमाल हो सकती है, इसकी मिसाल है राखी सावंत। सलाह दी जा सकती है कि मत देखो। अव्वल तो यह कुतर्क है। आदिम युग से ही देखने और बोलने की चाहत रही है इनसान की। यह अनंत और अराजक है। भाषा और देह की मर्यादा गढऩे की जरूरत भी तभी से महसूस हुई होगी।

आज इस दौर में सब ताक पर है। विध्वंस मचा रखा है इन चैनलों ने। कलर्स के बिग-बॉस को सुहागरात बेचकर टीआरपी कमानी है। इमेजिन को नपुंसक कहकर मार डालना है, बिंदास टीवी को ‘चक्करों’ का भंडाफोड़ दिखाना है, सोनी को कॉमेडी सरकस  में भद्दे इशारों के साथ द्विअर्थी सवांद बोलने हैं। जिंदा इनसानों के बीच इस कसाईनुमा आचरण की पैरवी कौन कर रहा है?
देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी आती थीं ‘आपकी कचहरी’ लेकर। जाति मसलों, क्रूरता पर बात उसमें भी होती थी, लेकिन बात कहने का सलीका होता था। एक मानसिक तौर पर परिपक्व और संयत व्यक्तित्व का तरीका। पत्नी से देह व्यापार करवाने वाले पति से लेकर क्रूर सास तक के बारे में उन्होंने कचहरी का फैसला सुनाया। यहां तो इंसाफ करने वाली राखी खुद अपने ही जीवन में अनिर्णय की शिकार हैं । जो भी करती हैं , उस पर खुद  का ही यकीन नहीं। चैनल पर शादी भी रचाई। टीआरपी तो बढी़, शादी रसातल में चली गई। सदियों पुरानी स्वयंवर की अवधारणा को चूर-चूर कर स्वयं कहीं पहुंच गईं और वर कहीं। दरअसल, ये चैनल ऐसे अपराध रच रहे हैं, जो कानून की सीमा-रेखा से बहुत परे हैं। एक समूची पीढ़ी को वे पथभ्रष्ट कर रहे हैं। हम मध्यमवर्गीय परिवारों ने जिस टीवी और केबल कनेक्शन को अपनी बैठक का अनिवार्य हिस्सा बना रखा है, उससे मुक्त होने  का  वक्त आ गया है। वरना विदेशी तर्ज पर स्त्री-पुरुष के अंतरंग दृश्यों को देखने के लिए तैयार रहना होगा । वहां ऐसा रिएलिटी शो चल रहा है और यह सब होगा  प्राइम  टाइम पर। देर रात और प्राइम टाइम का फर्क मिटा दिया है इन चैनलों ने. बिग बॉस में हालीवुड से पामेला को लाकर इन्होने अपने इरादे भी ज़ाहिर कर दिए हैं. मार्केट से पैसा उगाना है. गोरी देह रास्ते आसान करती है  और तो और कार्टून्स तक में बच्चों को बहलाया और बहकाया जा रहा है। वाकई केबल नाम के वाइरस के उठावने का यही सही समय है।
बात पड़ोसी देश की महान स्त्री की। आंग सान सू की [६५] को रिहाई मिल गई है। अपने बच्चों से दूर सू के पास कोई फोन ,इन्टरनेट नहीं था. पति का केंसर से देहांत[१९९९] हो चुका है और  बेटों को बर्मा आने की इजाज़त नहीं थी. म्यांमार (बर्मा) को अंग्रेजों से आजाद कराने वाले आंग सान की बेटी बर्मा को सैनिक शासन से मुक्त करा वहां लोकतंत्र के बीज रोपना चाहती हैं।   नोबल शांति पुरस्कार विजेता के लिए यह आसान नहीं, क्योंकि दुनिया के ही दो रवैए हैं। स्वशासी चीन तमाम प्रतिबंधों से मुक्त, जबकि बर्मा जकड़ा हुआ। हाथ, गले और बालों में फूल सजाए सू की उम्मीद जिंदा है। कभी पिआनो से गहरा नाता रखनेवाली  सू की एक कविता


मेरा घर...


जहां मैं पली-बढ़ी
बेहद खूबसूरत व अपना था
अब वहां अंधेरा व दहशत है।


मेरा परिवार...

जहां मेरा वजूद बना
बेहद खुश और जिंदा था
आज वहां भय और आतंक है

मेरे दोस्त ...


जिनसे मैंने जिंदगी साझा की
बेहद पवित्र और मस्त थे
अब टूटे दिलों से जी रहे हैं।


एक आजाद पंछी...


जो अभी-अभी आजाद हुआ है
कैद से
अब उड़ रहा है
अपनी प्रिय जगह के लिए
जैतून की डाली के साथ
आजाद पंछी आजाद बर्मा की ओर।

मुझे क्यों लडऩा पड़ रहा है?