Friday, September 17, 2010

आज मकबूल फ़िदा हुसैन की सालगिरह है


बीस साल पहले जब कलाकारों के समूह 'फनकार' ने मकबूल फ़िदा हुसैन को इंदौर बुलाया तो पूरे शहर ने बंदनवार सजाये. तब हुसैन 75 के थे.ख्यात पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा ने तब उन पर एक लेख लिखा. आज जब हुसैन 95 के हो रहे हैं पेश हैं उन झलकियों की झलक .हुसैन खुद को देश निकला दे चुके हैं और इन दिनों क़तर में हैं. इस मुबारक दिन इन पचड़ों में न पड़ते हुए हुसैन का स्केच शाहिद मिर्ज़ा की कलम से





art attach not attack: makbool fida hussain
                         and shahid mirza  image: ramesh pendse                              
    

सचमुच मकबूल फ़िदा हुसैन पर लिखना बहुत मुश्किल काम है, क्योंकि जो भी आप लिखेंगे,यकीन मानिये हुसैन अपनी रचनात्मक ऊर्जा से उसे पुराना, प्राणहीन और निष्प्रभ कर डालेंगे. सारे मास्टर पेटर्स ने यही किया है, फिर भले ही वे पश्चिम के वान गौफ़ हों, रेम्ब्रां हों, पॉल  क्ली हों या फिर हमारे इंदौर की छावनी और पारसी मोहल्ले के हुसैन ही क्यों न हों. फ़िदा हुसैन उनके पिता का नाम है, जो पंढरपुर से १९१७ में इंदौर आये थे और आज सारा ज़माना 'फ़िदा नंदन' पर दिलो-जान से फ़िदा है, निसार है . अनजाने ही फ़िदा हुसैन अपने बेटे का नाम मकबूल[लोकप्रिय] रख गए हुसैन की लोकप्रियता का आलम यह है कि दुनिया के   चारों  कोनों में आज एक भी आर्ट गलेरी नहीं जहाँ हुसैन के चित्र अनिवार्यतः सहेज कर  रखे नहीं गए हों . हुसैन   की कृतियाँ लाखों  रुपये में धड़ल्ले से बिक रही हैं . असल तो असल कला बाज़ार के लोगों ने नक़ल तक बेच डाली है और हुसैन को जैसे इन सबसे कोई मतलब ही नहीं. बाज़ार की मांग  और फैशन के अनुरूप उन्होंने कभी चित्र रचना नहीं की , न पहले,जब उन्हें कम लोग जानते थे न अब जब सारा ज़माना उन पर  फ़िदा है.

हुसैन ने  नौ  बरस की  उम्र  में अपना पहला चित्र बनाया था, इंदौर में. मुर्गी और उसके बच्चे.धोती पहने मारवाड़ी सेठ भी उनके आरंभिक कामों में है. छावनी में रामलीला हुसैन ने भी देखी. उन्हें धीरोदात्त राम और उछलकूद करनेवाले हनुमान आकर्षित करते थे सीता माता की क़ुरबानी का अहसास भी उन्हें था. बाद में अपने दोस्त समाजवादी विचारक डॉ राम मनोहर लोहिया ने उनसे अनुरोध किया कि वे रामकथा पर चित्र रचना करें. साठ के दशक में हुसैन ने बाकायदा तुलसी बाबा को पढ़ा,और वाल्मीकि-कृत रामायण का अध्ययन किया

हुसैन और स्त्री

हरेक इंसान कि तरह हुसैन ने भी प्रेम किया है, प्रेम-पत्र भी लिखे हैं लेकिन स्त्री के प्रति हुसैन का रवैया एक दार्शनिक का रवैया है. हाँ अफलातूनी नहीं. स्त्री और हुसैन का रिश्ता संवेदनशील, गहरा और तलस्पर्शी है. स्त्री उनके दिल-दिमाग और सोच में दाखिल है. भारतीय दार्शनिक-पौराणिक सिलसिले पर चलते हुए हुसैन भी औरत को शक्तिरूपा [दुर्गा] मानते हैं. इंदिरा गाँधी से लेकर सोनल मानसिंह तक विदुषी स्त्रियों से हुसैन का गहरा और नजदीकी रिश्ता रहा है और इन्हें हुसैन ने बहुत तन्मयता के साथ आँका है. सीता और द्रौपदी के बहुत अलग किस्म के अंकन भी उनके यहाँ मिलेंगे. माँ टेरेसा पर उन्होंने एक चित्र श्रंखला रची है .हिस्से कि अपनी माँ तब चल बसी थी जब वे महज डेढ़ साल के थे  पिता ने एक और विवाह कर लिया था अपनी दोनों मतों के अंकन उन्होंने किए  हैं. देवराला के सती प्रसंग पर उन्होंने खुद को स्त्री के पक्ष में खड़ा किया था . हुसैन ने डकैत फूलनदेवी को भी चित्रित किया और ऐसी स्रियाँ भी एकाधिक हैं जिन्हें नजदीकी दोस्ती के चलते हुसैन ने बार-बार चित्रों में ढाला है . हुसैन हर हाल में औरत के साथ इन्साफ के पक्षधर हैं और ऐसा किसी फेमिनिस्ट आन्दोलन के दबाव में नहीं,बल्कि उसके बरक्स है.


 मेरे बरक्स इस दिन बस एक ही आवाज़ गूंजती है बाबा..
योम ए पैदाइश मुबारक हो ......

Thursday, September 2, 2010

ईट-प्रे-लव

आराधना, भक्ति, वंदना, स्मरण जो नाम दीजिए, आशय एक  जगह पहुंचने से है, जहां शांति हो, सुकून हो। मकसद चित्त को एकाग्र करने से है। तो क्या बार-बार श्रीकृष्ण जपने से मन शांत हो जाता है या फिर पूजा-पाठ की तमाम विधियां मन को राहत देती हैं? हालांकि  भक्ति को विभक्त ·करना निरी मूर्खता होगी, लेकिन इसके दो प्रकार तो हैं ही। एक तो हमें बचपन से ही सिखा दी जाती है कि सुबह-शाम पवित्र होकर ईश्वर के आगे दीप प्रज्ज्वलित करो और आरती गाओ। या फिर वक्त निर्धारित कर दिए जाते हैं कि इस दिशा में बैठकर इसी मुद्रा में प्रार्थना ·करो। तरीके हमें विरसे में मिलते हैं और हम सब अपने-अपने मौला को याद करते हैं। फिर  दूसरे किस्म की भक्ति क्या है? किसी ऐसे को याद करना, जिसके लिए दुनिया ने आपको कोई निजाम नहीं दे रखा। वह आपके भीतर समाता चला जाता है। आपको वह वक्त से याद नहीं आता। सुबह-शाम, दिन-रात की मर्यादा से परे वह बस आ धमकता है। यह भक्ति उसके लिए है, जिसके लिए आपके भीतर स्वीकार्य भाव है।

श्रीकृष्ण के लिए वैसा ही स्वीकार्य भाव द्वापर युग से चला आ रहा है। मोर मुकुट, बंसी, पीतांबर और मोहक मुस्कान धारण करने भर से कोई किसी की भी तरफ खिंच जाता है क्या? नहीं, वह आसक्त होता है उस समभाव पर, जहां उसे लगता है कि वह निडर है। सबकुछ कह सकता है। वह अभय और अपनापन  कान्हा देते हैं। वह खुलने देते हैं व्यक्ति को परत-दर-परत। सुनते हैं उसकी। सख्त नहीं होते, क्योंकि सख्त होते ही व्यक्ति रास्ता बदल लेता है। व्यक्ति प्रवृत्ति से वहां जाना चाहता है, जहां कोई उसकी सुने, कोई उसे समझने वाला हो। कृष्ण भक्त को यही सब सहज उपलब्ध कराते हैं। कंस की एक दासी थीं कुब्जा. बेहद कुरूप. कान्हा ने उसे आभास कराया कि तुम सुन्दर हो. वह कुब्जा जो कंस के लिए चन्दन का लेप बनाते-बनाते भूल चुकी थी कि प्रेम पर उसका भी हक़ है. यह हक़ और इच्छा कृष्ण ने कुब्जा में उपजाई.रूप-अरूप का भेद तो यहाँ मिटता ही है वर्ग का भेद भी नहीं नज़र आता.

दरअसल महर्षि वेदव्यास रचित ग्रंथ ‘महाभारत’ स्वत: ही कानों पर हाथ रखवा लता है, क्योंकि  किसी भी रचयिता के  लिए इतने पात्रों को साधना अत्यंत असाधारण काम है। इस ग्रंथ ·को भले ही घर में रखने पर पाबंदी की बात कही जाती हो, लेकिन मानवीय गुण-दोषों का जीवंत दस्तावेज है यह। रामायण और महाभारत दोनों ही ग्रंथ हम भारतीयों को दुनिया में अलग और खास बनाते है । परिष्कृत भारतवासी। काल-खंड ·को दर्ज करने की कितनी समृद्ध परंपरा से आते हैं हम। इन ग्रंथों का असर भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर भी है।

अमेरिकन एलिजाबेथ गिलबर्ट ने ‘ईट प्रे लव’ नाम से एक· उपन्यास लिखा है। ईट से इटली, प्रे से भारत और लव से ताल्लुक इंडोनेशिया का है। ईट और लव के लिए दुनिया का कोई भी मुल्क चुना जा सकता है, लेकिन प्रे के स्थान पर भारत के अलावा कुछ भी नहीं रखा जा सकता। अध्यात्म और इबादत का भारत, जहां आकर इकतालीस वर्षीय इस लेखिका ने भारतीय दर्शन को समझा कि रुद्राक्ष की माला में 108 मनके क्यों होते हैं और एक मनका अकेला क्यों छोड़ा जाता है? उपन्यास के कवर पर ईट नूडल्स से, प्रे रुद्राक्ष से और लव फूलों की पंखुरी से लिखा गया है। बेस्ट सेलर उपन्यास पर आधारित फिल्म में जूलिया रॉबट्र्स नायिका हैं। फिल्म बहुत पसंद की जा रही है और तो और शूटिंग के दौरान जूलिया को भारत से इतना अनुराग हो गया है कि उन्होंने हिंदू धर्म  अमल में लाना शुरू कर दिया है।

बहरहाल, वसुधैव कुटुंबकम की महान अवधारणा वाले भारत के अपने हिस्से  विखंडन की कगार पर ही हैं। हाल ही एक  न्यूज चैनल पर जारी बहस में युवा कश्मीरी अपने इरादों से बार-बार चौंका रहे थे। वे भारत सरकार से कोई इत्तेफाक नहीं रखते। वे गरीब और अनपढ़ भी नहीं थे  आप सजाए रखिए कश्मीर को ताज के बतौर। वे वहां बदल चुके हैं। हुक्मरानों की ऐसी हार देखने के लिए मजबूर शेष भारत दुविधा में है। इतने सैनिक शहीद कर दिए, न अमन लौटा, न घाटी। इबादत के साथ रमजान के रोजे चल रहे हैं और प्रार्थना ·के साथ जन्माष्टमी का भी व्रत रखा जा रहा है । एक  ही तो मूल है दोनों का और दोनों साथ-साथ हैं। बिना इबादत के जहां रोजा फाका है, वहीं बिना कृष्ण को याद किए जन्माष्टïमी का उपवास भी नहीं है। फिर भी दूरी है तो है। इस पावन अवसर पर हम सब दुआ में हाथ ही उठा सकते हैं कि अमन-चैन भी बरसे। आइए, हाथ उठाएं हम भी।