Thursday, April 1, 2010

लिव- इन रिश्ता बोले तो . . . अप्रैल fool !!!

इस दौर में जब हर शख्स एक दूसरे को टोपी पहनाकर अपना ·काम निकालना चाहता है मूर्ख दिवस की बात करना कोई मायने नहीं रखता। हर रोज कोई न कोई, कहीं न कहीं छला जा रहा है। छलने से याद आया लिव-इन-रिलेशनशिप यानी बिना शादी के साथ-साथ रहना। सामाजिक विश्लेषको का मानना है कि इसमें स्त्री ही छली जाती है। रिश्ते ·की अनिश्चितता उसे अंत में तबाह करती है। वह रोती है, बिसूरती है और पुरुष चट्टान कि तरह अडिग। उसका कुछ नहीं बिगड़ता है।
ब्रिटेन में रह रहीं भारतीय नागरिक नीरा जी ने एक पोस्ट के कमेन्ट में लिखा है कि ऐसे देश में रहती हूं जहां लिव-इन टुगेदर  आम बात है। इसका अंजाम मैंने देखा है कि नॉन कमिटल मर्दों के साथ अकेली मांओं ·की संख्या बढ़ी है। नारीवादी हूं। दो बेटियों की मां भी। कल अगर वे ऐसा करना चाहें तो खुशी-खुशी करने दूंगी, कह नहीं सकती।
यह भाव सिर्फ और सिर्फ इसलिए आता है की स्त्री के पास मातृत्व ·की जिम्मेदारी है।  पुरुष मुक्त है। वह  इस रास्ते में पल्ला झाड़कर आगे निकल जाता है और स्त्री वहीं की वहीं ठहरी हुई। यह ठहराव उसे पीड़ा देता है। लिव-इन में हम इसी ठहराव को देखते हैं और विरोध करते हैं। न्यायालय भी केवल और केवल इसलिए इसकी पैरवी करता है कि स्त्री ठगी न जाए उसे वे हक मिलें जो कानूनन विवाहित स्त्री के पास होते हैं। यह कोशिश है इन रिश्तों को विधि सम्मत बनाने की क्योंकि सामाजिक मठों के होते हुए भी हम इस पर काबू नहीं पा सके हैं और न पा सकेंगे

ईमानदारी किसी भी रिश्ते की पहली ईंट होती है। इसके अभाव में कोई ईमारत खड़ी नहीं हो सकती। प्रतिबद्धता यानी कमिटमेंट से बंधे इन संबंधों में कई बार पुरुष भी बेहद ईमानदार होते हैं। वे साफ कहते हैं कि यदि रिश्ते को नाम देना संभव नहीं तो बेहतर है लौट जाएं। यह व्यभिचार है। कमजोर स्त्री लोकलाज परिवार के भय से फैसला नहीं ले पाती। आत्मविश्वास से भरपूर पुरुष स्त्री में भी यही भरोसा जगाते हैं। यही प्रतिबद्धता उन्हें अपने रिश्ते की मजबूती और दुनिया के सामने मुखर होने का आधार देती है। शादी जयघोष है अपने प्रेम के स्वीकार्य का। कमजोर स्त्री लिव-इन में नहीं प्रेम विवाह में भी कमजोर साबित होगी, उसे अपने फैसले पर ऐतबार जो नहीं। किसी विवाहित के साथ तो वह और ज्यादा आशंकित रहेगी। अपने निर्णय पर पछताने वाले लिव-इन में ही नहीं दुनिया के हर रिश्ते में नाकाम होंगे। यदि निर्णय गलत भी है तब भी रोइये-पीटिये मत उसका मान ·कीजिए क्योंकि फैसला आपका था। अपनी राह खुद बनाई थी तो उसका काटे भी आप ही को सोरने होंगे। अव्वल तो फैसला लीजिए मत और लिया है तो खुद पर यकीन  रखिए। मत भूलिए ·कि रिश्ता आगे बढ़ेगा तो बच्चे भी होंगे। ... और आपको लगता है कि आप छली गई हैं या आपके साथ धोखा हुआ है तो अब आपके साथ कानून है। लंबे सह-जीवन को भारतीय कानून संरक्षण देता है। यह स्त्री के हक में है।
 राधा-कृष्ण इन संबंधों से बहुत ऊपर हैं। वे शाश्वत हैं मानो ईश्वर और सृष्टि। एक में एक समाए हुए। लिव-इन शब्द यहां बौना है। शादी जहां जीवनभर जिम्मेदारी लेने की स्वीकृति है तो लिव-इन तात्कालिक· जरूरत को पूरा करने के लिए साथ रहने की इच्छा । राधा-कृष्ण को इनमें से किसी की जरूरत नहीं है। उनके अलौकिक प्रेम को ·किसी प्रमाण की दरकार नहीं। धर्मवीर भारती ने कनुप्रिया में राधा के सांवरे से सवाल पर लिखा है
अक्सर जब तुम ने
दावाग्नि में सुलगती डालियों,
टूटते वृक्षों, हहराती हुई लपटों और
घुटते हुए धुएँ के बीच
निरुपाय, असहाय, बावली-सी भटकती हुई
मुझे
साहसपूर्वक अपने दोनों हाथों में
फूल की थाली-सी सहेज कर उठा लिया
और लपटें चीर कर बाहर ले आये
तो मैंने आदर, आभार और प्रगाढ़ स्नेह से
भरे-भरे स्वर में कहा है:
‘कान्हा मेरा रक्षक है, मेरा बन्धु है
सहोदर है।’


अक्सर जब तुम ने वंशी बजा कर मुझे बुलाया है
और मैं मोहित मृगी-सी भागती चली आयी हूँ
और तुम ने मुझे अपनी बाँहों में कस लिया है
तो मैंने डूब कर कहा है:
‘कनु मेरा लक्ष्य है, मेरा आराध्य, मेरा गन्तव्य!’
वैसे ही मीरा को भी नहीं क्योंकि इनमें से ·किसी भी रिश्ते में कोई अपेक्षा नहीं। दुनियावी तामझाम से अलग यह आपसी भरोसे के मंदिर हैं जहां हम भी शीष नवाते हैं।