Wednesday, March 3, 2010

सौ रुपये में nude pose

'वे जो कला को नहीं समझते मेरे काम को भी सम्मान नहीं दे सकते.मेरी बस्ती के लोग जो मेरे काम को जानते हैं मुझे वैश्या ही कहते हैं. क्या कहूं  खुद भी तो पहले ऐसा ही समझती थी.'


निशा यही नाम है उसका. दक्षिण मुंबई के आर्ट्स कॉलेज की न्यूड मॉडल है. तीस विद्यार्थियों और एक प्रोफ़ेसर की  मौजूदगी में वह अपने कपड़े उतार  देती है. जीती जगती निशा सफ़ेद पन्नों पर रेखाओं में दर्ज होती जाती है. यहाँ उसके भीतर की शंकाएँ और सवाल कोई शोर नहीं मचाते. कला के विद्यार्थियों के लिए वह सिर्फ एक मॉडल है जिसके कर्व्ज उनके सामने कला की नई चुनौती रखते हैं. वह छह घंटे की सिटिंग देती है, बदले में उसे १०० रूपए मिल जाते हैं पहले सिर्फ ५० मिलते थे. वह कहती है वे केवल मेरा शरीर देखते हैं. मन नहीं इसलिए मैं बिलकुल सहज बनी रहती हूँ वे. सब मेरा सम्मान करते हैं.

दो बेटे हैं. पति जब तक रहे काम करने की नौबत नहीं आयी .फिर लोगों के घरों में काम करना पड़ा. एक दिन मेरी मौसी ने इन कोलेजवालों से मिलवाया. वे भी यही करती हैं. शुरू में मुझे बहुत झिझक हुई लेकिन अब कोई दिक्कत नहीं. मेरे बच्चों को नहीं पता कि  मैं क्या काम करती हूँ. मुझे डर है की जब उन्हें पता चलेगा तब वे मेरा सम्मान नहीं कर पाएंगे. क्या करूं कोई और काम आता नहीं. झाड़ू बर्तन के काम से गुज़ारा नहीं चलता . मैं जानती हूँ मेरे स्केच बनाते हुए कई छात्र बहुत बड़े कलाकार हो गए हैं. कभी मिलते हैं तो मान ही देते हैं. बस्तीवाले ज़रूर तंग करते हैं, मैं क्या करूं बता भी नहीं पाती अपने काम के बारे में....

निशा का यह साक्षात्कार मैंने अभी-अभी फेमिना में पढ़ा है. निशा कला या उसके आन्दोलन के बारे में कोई लम्बी-चौड़ी बात नहीं जानती लेकिन उसकी सहज-सी बात कि जिन्हें कला कि समझ नहीं वे मेरे काम का सम्मान नहीं कर सकते भीतर तक मथ देती हैं . क्यों नहीं निशा के काम का सम्मान किया जा सकता ? वह क्यों अलग है उन औरतों से जो दफ्तरों में काम करती हैं? क्या वाकई उसका काम असम्मानजनक है? यदि नहीं तो हर पल क्यों यह भय उसे सताता है कि जिस दिन बच्चे समझ जाएँगे वे भी बस्तीवालों कि तरह उसे स्वीकार नहीं करेंगे ?

न्यूड पेंटिंग्स ...सॉरी न्यूड स्केचेस ...क्या यह बहस जायज़ है ?



image courtesy: http://matthewjamestaylor.com/art/girl-leaning-over-fromback
artist Matthew James Taylor