Thursday, January 21, 2010

मौत और ज़िन्दगी यानी दो नज्में



पिछले दिनों अनीसुर्रहमान सम्पादित 'शायरी मैंने ईजाद की 'पढ़ी जिसमें आधुनिक उर्दू शायरी का समावेश है. जीवन और अंत से जुडी दो कवितायेँ वहीँ से.


क्या करोगे ?

शाइस्ता हबीब

तुम मेरे मरने पर ज्यादा से ज्यादा क्या कर लोगे?
कुछ देर तक आंखें हैरत में गुम रहेंगी
एक सर्द सी आह तुम्हारे होटों को छूते हुए उड़ जाएगी
और तुम्हें कई दिनों तक मेरे मरने का यकीन नहीं आएगा

फिर एक दिन...
तुम अपने दोस्तों के साथ बैठै हुए
कहकहे लगा रहे होगे
मैं एक अजनबी आंसू की तरह तुम्हारे गले में जम जाऊंगी

और तुम...
तुम उस आंसू को निगलने की कोशिश में
सचमुच रो पड़ोगे
कि मैं वाकई मर गई हूं


 

यह मुहब्बत की नज़्म है

जीशान साहिल


इसे पानी पे लिखना चाहिए
या किसी कबूतर के पैरों से बांध कर
उड़ा देना चाहिए
या किसी खरगोश को
याद करा देना चाहिए
या फिर किसी पुराने पियानो में
छुपा देना चाहिए
यह मुहब्बत की नज्म है
इसे बालकनी में नहीं पढऩा चाहिए
और खुले आसमान के नीचे
याद नही करना चाहिए
इसे बारिश में नहीं भूलना चाहिए
और आंखों से  ज्यादा करीब नहीं रखना चाहिए






                                       

Sunday, January 3, 2010

सुबह चांदनी मिली




नए साल की पहली सुबह जब आँख खुली तो चांदनी मिली . पूरे चाँद की चांदनी. २००९ के ही चाँद की चांदनी. ज़ाहिर है सूरज की पहली किरण से हम रूबरू नहीं हो सके . ऐसी ही एक सर्द सुबह रणथम्भौर की थी जब शेर के दर्शन को तरसती आँखों के साथ हम कैंटर में सवार हुए .जिन्होंने भी जंगल सफारी का आनंद लिया है वे समझ सकते हैं की जंगल के राजा का दिखना क्या होता है. इस सफारी में हमें एक ऐसा नायाब पक्षी मिला जो आपके सर पर आकर बैठ जाता है.. और जब वह उड़ जाता है तो लगता है सारा अनर्गल हर ले गया. सर्दी में ठिठुरायी   पोस्ट १ जनवरी २००९ की डायरी से.

आते और जाते साल के संगम के दौरान मानस पर जो अंकित हुआ वही साझा कर रही हूं। रणथम्भौर के एक होटल में डीजे पर सारे गेस्ट थिरक रहे हैं। काळयो कूद पड्यो मेला में .. से लेकर ब्राजील... पर क्या गोरे क्या काले खूब ताल मिला रहे हैं। होटल क्या है पूरा-पूरा बाघालय है। फर्नीचर, क्रॉकरी, चादर, पर्दों पर, यहां तक कि तस्वीरों में भी बाघ  ही हैं । इतने बाघ यहां है तो जंगल में क्या आलम होगा। यही सोचकर परिवार खासकर उसमें शामिल बच्चे बेहद उत्सुक थे। 31 दिसंबर की पार्टी के बाद सुबह छह बजे जंगल सफारी पर जाना था। खुले केंटर में भीषण सर्दी का प्रकोप शरीर को सुन्न किए जा रहा था। टूरिस्ट रजाइयां लेकर ही केंटर में चढ़ गए थे। पूरी रफ़्तार से बाघ की तलाश शुरू हो चुकी थी। ढाई घंटे की सफारी में बाघ के पदचिन्ह देखते-देखते ऊब ही रहे थे कि ......बाघ दिखा या नहीं अभी रहस्य है।
एक बात रणथम्भौर यात्रा में शिद्दत से महसूस हुई कि टूर आयोजक गोरे-काले टूरिस्ट में फर्क करने लगे हैं। सफेद चमड़ी वाले सैलानी उन्हें ज्यादा अपील करते हैं। देसी सैलानी उन्हें कम समझदार, कुछ ज्यादा ही मितव्ययी और बेकायदे के लगते हैं।
बहरहाल, देवकिशन गुर्जर उर्फ़ देवा की चर्चा के बगैर यह ब्यौरा अधूरा रहेगा। वह ट्रेवल टेक्सियों का ड्राइवर है। उम्र छब्बीस की । पिछले नौ सालों से सैलानियों को राजस्थान की सैर करवा रहा है। किसी अच्छे ढाबे पर भोजन के लिए गाड़ी रोकने की बात सुन देवा ने एक जगह फोन लगाया। दाल बाटी चलेगी साब...। सब बेहद खुश हो गए। गाड़ी जयपुर की दिशा में बढ़ रही थी। देवा ने यकायक गाड़ी कच्चे में मोड़ दी। कीचड़ सनी सड़के देख कुछ समझ न आया। थोड़ी ही देर में हम एक कच्चे लेकिन सुंदर घर के सामने थे। दीवारों पर गेरु और खड़ी से चिड़िया और मांडने उकेरे हुए थे। गाड़ी को गांव के बच्चों ने घेर लिया था। भीतर जा कर हम फिर खुले में थे। आंगन में नीम का पेड़ था।
देवा की पत्नी जिसका नाम सुशीला था, पूरियां तल रही थी। घूंघट इतना लंबा था कि कुछ भी समझना मुश्किल। कनखियों से जब वह बार-बार देवा को देख रही थी तब ही उसका सुंदर मुखड़ा दिखाई दिया। बहुत-बहुत रोशन चेहरा । देवा के माता-पिता इतने प्रसन्न मानो कोई बरसों पुराना परिचित घर आ गया हो। इतनी जल्दी में पू़ड़ी ही बना सके। पिता ने सकुचाते हुए कहा। दूसरे चूल्हे पर कच्ची हांड़ी चढ़ी मूंग और चने की दाल की सौंधी महक पूरे माहौल में थी। पास ही बंधी गाय-भैंस परिवार का हिस्सा मालूम होती थीं। देवा और सुशीला अब भी कनखियों से ही निहार रहे हैं।  भोजन,बातचीत में भी दोनों आमने-सामने नहीं हुए। यह देवा का गांव था। सूंथड़ा जिला टोंक। आबादी तीन-चार हजार। दो स्कूल, एक डिस्पेंसरी है लेकिन डॉक्टर कभी कभार ही मिलता है। पानी की परेशानी है। कई बीघा जमीन है जिसमें सरसों बोया है। पानी की कमी से सरसों भी कमजोर पैदा हुई है। भोजन के बाद पिता ने चाय का आग्रह किया। सब ने हां कहा लेकिन शायद चाय पत्ती खत्म थी सो दूध परोसा गया। दूध न पीने वाले भी गाय का ताजा दूध पीने से खुद को रोक नहीं पाए। आंगन के उस नीम से लेकर जिसे देवा के परदादे ने बोया था,सब कुछ बेहद अपनत्व भरा मालूम होता था। इतना अपना कि पर्यटन पर छाई पूरी व्यावसायिकता को लील गया।
रणथम्भौर के सूखे जंगलों में तेज गति से दौड़ते केंटर में बाघ की तलाश जारी थी। वहां बयालीस बाघ हैं। होटलों और रिसोर्ट तक में नजर आ जाते हैं। खैर बाघ नहीं दिखा। अफसोस इस बात का है कि बाघ की आस में हिरण ,साम्भर और रंगीन चिड़ियाओं से भी ठीक से मुलाकात नहीं हुई। शायद अगले ट्रिप में। पिछले अक्टूबर 2008 में अलवर के समीप पांडूपोल में ऐसे ही एक लेपर्ड अनायास सामने आ गया था। रणथम्भौर में जंगल किंग न मिला हो लेकिन सूंथड़ा गांव में जो मिला वह ताउम्र मानस पर छपा रहेगा। नए साल की इससे बेहतर मेजबानी और कहीं नहीं हो सकती।
ps: आज सुबह से जयपुर भीग रहा है मावठ की बूंदों में ...