Friday, October 8, 2010

आशंकाओं का जनाज़ा

बीता सप्ताह हर   हिन्दुस्तानी को  फ़क्र से भर गया, वह भी तब जब वह सबसे ज्यादा आशंकित था .३० सितम्बर  और ३ अक्तूबर की तारीख केवल तारीखभर नहीं बल्कि हमारी नज़र और नज़रिए का विकास है. इन दोनों ही घटनाओं को द हिन्दू  के कार्टूनिस्ट केशव की नज़रों से देखना भी दिलचस्प होगा . अयोध्या फैसले के बाद उन्होंने दो पंछी बनाये जो एक पतली-सी डाली को साझा किये  उड़े  जा रहे हैं और राष्ट्रमंडल  खेलों के उद्घाटन समारोह के बाद एक मस्त हाथी जो आशंकाओं के गुबार को  पीछे छोड़ अपनी मतवाली चाल से चला जा रहा है .
बेशक इस भव्य समोराह ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया है. भारत का समूचा वैविध्य इन तीन घंटों में ऐसे सिमटा जैसे एक रंगीन दुनिया जादू के पिटारे में. कितने खूबसूरत हैं हम. कितना सौंदर्य भरा पड़ा है हममें. इंग्लॅण्ड के अखबार ने लिखा कोई कुत्ता बीच में नहीं आया कहीं ध्वनि नहीं टूटी और कोई बिजली गुल नहीं हुई यानी कि  यही सब अपेक्षित था .
फ़र्ज़ कीजिये अगर समारोह फीका -फीका सा रहता और भारत के बजाय  इंडिया झांकता  तो? बतौर भारतवासी  हम कैसा अनुभव करते?  इतने बड़े आयोजन किसी एक व्यक्ति की बपौती नहीं होते,पूरे मुल्क का  सम्मान जुड़ा रहता है इससे. विदेशों में बसे भारतीय इसी रौशनी में देखे जाते हैं. कॉमन वेल्थ  के नाम पर एतराज़ हो सकता है. विक्टोरिया बैटन पर भी लेकिन खेलों पर नहीं. मैडल यहाँ भी परिश्रम के हक़ में ही हैं और हर खिलाड़ी कसौटी पर. हमारे प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु की अगुआई में बना था निर्गुट देशों का  समूह यानी वे देश जो किसी गुट में नहीं थे . अच्छा लगता था स्वाभिमान से भरे राष्ट्राध्यक्षों को देख. यासिर अराफात इंदिरा गाँधी को 'ग्रेट सिस्टर' कहकर मिलते तो क्यूबा  के फिदेल कास्रो उन्हें गले लगाकर बधाई  देते. अब कोई निर्गुट सम्मलेन नहीं होता. नष्ट हो गया सब कुछ. सार्क [दक्षिण  एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन] की भी साँसे टूट गयीं. पड़ोसी देश साथ बैठकर बातें करते तो दक्षिण एशिया  की समस्याओं के पैर उखड़ जाते.
बात अयोध्या फैसले की. इस दिन हमारा मुल्क जीता है.अमन चैन की जीत हुई है नेताओं के बयान सींग तान कर आ रहे हैं और औन्धे   मुंह गिर रहे हैं. हर पार्टी अब खम्बा नोचती दिखाई दे रही है. कोई भव्यता की बात करता है तो सरकार में बैठा ढांचा गिरानेवालों को सजा दिलाने की तो किसी को एक तबके की सारी दुआएं आज ही ले लेनी हैं. इन सबमें उपर खड़े नज़र आते हैं मोहम्मद हाशिम अंसारी. नब्बे वर्षीय अंसारी इस मामले में सबसे पहले याचिका  दायर करनेवालों में हैं . वे कहते हैं 'मेरे लिए यह अध्याय बंद है. हिन्दुओं को राम मंदिर बनाने की इजाज़त मिल जानी चाहिए,' मैं  मुस्लिम नेतृत्व से गुज़ारिश  करूँगा कि मुद्दे को समाप्त किया जाये और सुप्रीम कोर्ट न ले जाया जाए.' इस उदारता की जवाब किसी भी ओर से नहीं आया है, उलटे उन्हें जान से मार देने कि धमकी ज़रूर मिल गयी है. आशंकाओं का जनाज़ा अभी उठा नहीं है  शायद.  

8 comments:

sandeep jayant said...

duniya hamari chmta per itna shk krti hai k woh hame kabhi sanjeeda he nahi leti...lekin aankhe kholne per he toh samne ki roshni dikhayi deti hai ..woh roshni bharat ne duniya ko dikha di hai chahe commonwealth ho ya ayodhya...aur ab roshni ho ya aankhen dono band nahi honi chahiye

neelkamal said...

pahle baat faisle ki....aasankaon ke beech faisle ne ek aisi dhara pravahit ki jisne sachmuch aasankaon ka zanaza nikal diya...faisle ke tatkal bad desh ke "bade log" to shyad vishleshan me hi lage the rss chief ka bayan aaya ye na kisi ki jeet hai na kisi ki har..ye bayan nischit tour par faisle ke swagat ka bayan hai...bantware me kya kabhi koi jeeta hai? aap anyatha na len meediya ne faisle ke tatkal baad apni joraazmaish ki sambhav hai unhone aag ki uthti lapten live dikhne ki tayyari kar rkhi ho...jaisi 1984 me dikhai...1990 me dikhai...1992 me dikhai godhara aur uske baad dikhai..kuchh bayan bhi dilwaye 6th dec 92 ko bhi bar bar dikhaya shukra hai inke pas desh ke bantware ke chitra video clipngs nahi thi dikhane ko...mera manna hai nischst rup se bade tabke ne bade bhai ka dharm nibhaya hai...ayoddhya me bahut se muslim pariwar hain jab jab vahan bheed juti hai vahan kuchh nahi hua ye ullekhniy hai...ansari badhai ke patra hain unhone insaniyat ke zinda hone ka ehsas karaya hai...
khelon par to hamare siyasatdano ne unka apna asli khel dikhaya hai ek dusre ko patkhni dene me desh ko badnam karne ki bharpur koshish ki..ye sach hai ki in khelon ka sheershak uski mashal gulami ka prateek hain lekin khel to fir bhi khel hain khel ki bhawna jagi rahni chahiye khel jarur khele jane chahiye gaon gaon tak suvidhayen honi chahiye...hamari mahila pratisprdhiyon ko hardik badhai jo hame sone ke tamge dilwakar hamara maan badha rahi hain...
aapko bhi bahut achha lekh likhne ke liye hardik badhai....

Kishore Choudhary said...

बहुत बढ़िया लिखा है.
हम उम्मीद रखें कि बाजारीकरण के दुष्प्रभावों में कोई फायदा भी दिखे, ऐसे मुद्दों को अपनी प्राथमिकता की सूची से बाहर कर पाएं.

वाणी गीत said...

मुद्दत बाद अपने देश में किसी सकारात्मक पहल और कृत्य से ख़ुशी हुई और भारतीय कहलाने पर गर्व भी ..अभिमान की यह अवधि कितनी लम्बी रहेगी , यही देखना है ..!

प्रवीण पाण्डेय said...

हम देशवासियों को निश्चय ही सद्बुद्धि मिलेगी।

चेतना के स्वर said...

bhrastachar aadi mamle me do desh hindostan ko kam aankte hain unke liye itna kaafi hai.

pahle nazar daalo apni wafaon par
fir ilzam lagana hamari wafaon par.

achchhi post ke liye congrats!

अपूर्व said...

यह काफ़ी कुछ उस मिथकीय फीनिक्स पक्षी की कथा की तरह लगता है..जो हर बार अपनी ही राख से पुनरवतरित कर पंख झाड़ कर उड़ जाता है..वो हफ़्ता जिसका आपने जिक्र किया और जिसकी ओर तमाम दुनिया अपनी आशंकाओं और अपेक्षाओं से देख रही थी..हमें थोड़ा सा और समझदार साबित कर गया..थोड़ा सा धैर्यशील बना गया..और खुद पे भरोसा करने की जरूरत भी जता गया..शायद कुछ मुद्दों मे हम सकारात्मक रहे हैं फिल कुछ वक्तों मे..
..मगर जरूरत अभी भी अपने गिरेबाँ मे झाँकने की और अपनी कमियों पर फोकस करने की है...अभी भी जरूरत है खुद को बेहतर बनाने की..कि राजनीति नफ़रतों के फ़स्ल हमारे सीने पर न उगा पाये..और भ्रष्टाचार किसी मिस्प्लेस्ड राष्ट्रीय आत्मसम्मान के आंचल मे न छुपने पाय...बहुत लम्बा सफ़र बाकी है अभी..और सांझ होने को है!!

अखिलेश शुक्ल said...

कामनवेल्थ खेलों व उसकी विसंगतियों, अयोध्या विवाद पर एक अच्छी विचार योग्य पोस्ट।