Thursday, September 2, 2010

ईट-प्रे-लव

आराधना, भक्ति, वंदना, स्मरण जो नाम दीजिए, आशय एक  जगह पहुंचने से है, जहां शांति हो, सुकून हो। मकसद चित्त को एकाग्र करने से है। तो क्या बार-बार श्रीकृष्ण जपने से मन शांत हो जाता है या फिर पूजा-पाठ की तमाम विधियां मन को राहत देती हैं? हालांकि  भक्ति को विभक्त ·करना निरी मूर्खता होगी, लेकिन इसके दो प्रकार तो हैं ही। एक तो हमें बचपन से ही सिखा दी जाती है कि सुबह-शाम पवित्र होकर ईश्वर के आगे दीप प्रज्ज्वलित करो और आरती गाओ। या फिर वक्त निर्धारित कर दिए जाते हैं कि इस दिशा में बैठकर इसी मुद्रा में प्रार्थना ·करो। तरीके हमें विरसे में मिलते हैं और हम सब अपने-अपने मौला को याद करते हैं। फिर  दूसरे किस्म की भक्ति क्या है? किसी ऐसे को याद करना, जिसके लिए दुनिया ने आपको कोई निजाम नहीं दे रखा। वह आपके भीतर समाता चला जाता है। आपको वह वक्त से याद नहीं आता। सुबह-शाम, दिन-रात की मर्यादा से परे वह बस आ धमकता है। यह भक्ति उसके लिए है, जिसके लिए आपके भीतर स्वीकार्य भाव है।

श्रीकृष्ण के लिए वैसा ही स्वीकार्य भाव द्वापर युग से चला आ रहा है। मोर मुकुट, बंसी, पीतांबर और मोहक मुस्कान धारण करने भर से कोई किसी की भी तरफ खिंच जाता है क्या? नहीं, वह आसक्त होता है उस समभाव पर, जहां उसे लगता है कि वह निडर है। सबकुछ कह सकता है। वह अभय और अपनापन  कान्हा देते हैं। वह खुलने देते हैं व्यक्ति को परत-दर-परत। सुनते हैं उसकी। सख्त नहीं होते, क्योंकि सख्त होते ही व्यक्ति रास्ता बदल लेता है। व्यक्ति प्रवृत्ति से वहां जाना चाहता है, जहां कोई उसकी सुने, कोई उसे समझने वाला हो। कृष्ण भक्त को यही सब सहज उपलब्ध कराते हैं। कंस की एक दासी थीं कुब्जा. बेहद कुरूप. कान्हा ने उसे आभास कराया कि तुम सुन्दर हो. वह कुब्जा जो कंस के लिए चन्दन का लेप बनाते-बनाते भूल चुकी थी कि प्रेम पर उसका भी हक़ है. यह हक़ और इच्छा कृष्ण ने कुब्जा में उपजाई.रूप-अरूप का भेद तो यहाँ मिटता ही है वर्ग का भेद भी नहीं नज़र आता.

दरअसल महर्षि वेदव्यास रचित ग्रंथ ‘महाभारत’ स्वत: ही कानों पर हाथ रखवा लता है, क्योंकि  किसी भी रचयिता के  लिए इतने पात्रों को साधना अत्यंत असाधारण काम है। इस ग्रंथ ·को भले ही घर में रखने पर पाबंदी की बात कही जाती हो, लेकिन मानवीय गुण-दोषों का जीवंत दस्तावेज है यह। रामायण और महाभारत दोनों ही ग्रंथ हम भारतीयों को दुनिया में अलग और खास बनाते है । परिष्कृत भारतवासी। काल-खंड ·को दर्ज करने की कितनी समृद्ध परंपरा से आते हैं हम। इन ग्रंथों का असर भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर भी है।

अमेरिकन एलिजाबेथ गिलबर्ट ने ‘ईट प्रे लव’ नाम से एक· उपन्यास लिखा है। ईट से इटली, प्रे से भारत और लव से ताल्लुक इंडोनेशिया का है। ईट और लव के लिए दुनिया का कोई भी मुल्क चुना जा सकता है, लेकिन प्रे के स्थान पर भारत के अलावा कुछ भी नहीं रखा जा सकता। अध्यात्म और इबादत का भारत, जहां आकर इकतालीस वर्षीय इस लेखिका ने भारतीय दर्शन को समझा कि रुद्राक्ष की माला में 108 मनके क्यों होते हैं और एक मनका अकेला क्यों छोड़ा जाता है? उपन्यास के कवर पर ईट नूडल्स से, प्रे रुद्राक्ष से और लव फूलों की पंखुरी से लिखा गया है। बेस्ट सेलर उपन्यास पर आधारित फिल्म में जूलिया रॉबट्र्स नायिका हैं। फिल्म बहुत पसंद की जा रही है और तो और शूटिंग के दौरान जूलिया को भारत से इतना अनुराग हो गया है कि उन्होंने हिंदू धर्म  अमल में लाना शुरू कर दिया है।

बहरहाल, वसुधैव कुटुंबकम की महान अवधारणा वाले भारत के अपने हिस्से  विखंडन की कगार पर ही हैं। हाल ही एक  न्यूज चैनल पर जारी बहस में युवा कश्मीरी अपने इरादों से बार-बार चौंका रहे थे। वे भारत सरकार से कोई इत्तेफाक नहीं रखते। वे गरीब और अनपढ़ भी नहीं थे  आप सजाए रखिए कश्मीर को ताज के बतौर। वे वहां बदल चुके हैं। हुक्मरानों की ऐसी हार देखने के लिए मजबूर शेष भारत दुविधा में है। इतने सैनिक शहीद कर दिए, न अमन लौटा, न घाटी। इबादत के साथ रमजान के रोजे चल रहे हैं और प्रार्थना ·के साथ जन्माष्टमी का भी व्रत रखा जा रहा है । एक  ही तो मूल है दोनों का और दोनों साथ-साथ हैं। बिना इबादत के जहां रोजा फाका है, वहीं बिना कृष्ण को याद किए जन्माष्टïमी का उपवास भी नहीं है। फिर भी दूरी है तो है। इस पावन अवसर पर हम सब दुआ में हाथ ही उठा सकते हैं कि अमन-चैन भी बरसे। आइए, हाथ उठाएं हम भी।

8 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

तथास्तु !

वाणी गीत said...

वह आसक्त होता है उस समभाव पर, जहां उसे लगता है कि वह निडर है। सबकुछ कह सकता है। वह अभय और अपनापन कान्हा देते हैं। वह खुलने देते हैं व्यक्ति को परत-दर-परत। ...

कृष्ण के इस रूप के बारे में ज्यादा शोर शराबा नहीं है ..

राधा और गोपियों के साथ रास रचाते कन्हैया पर ही सब मोहित है ...क्यूंकि इसमें सुविधा है ..?
कृष्ण के देवकी , यशोदा , सुभद्रा , द्रौपदी , अर्जुन और मीरा के साथ प्रेम को जानने समझने वाले लोंग कम क्यूँ हैं ...!

dimple said...

भक्ति, वंदना से शुरू होके पोस्ट प्रार्थना के रास्ते किसी पहाड़ी यात्रा सी कई दृश्य साकार करती हुई कृष्णमय रंगों से शिखर छोटी पे अमन-चैन की बारिश कर गयी...आइए, हाथ उठाएं हम भी

प्रवीण पाण्डेय said...

भारत में अब प्रार्थना का ही महत्व रह गया है।

Kishore Choudhary said...

खूबसूरत पोस्ट है, रजनीगंधा के बीच एक गुलाब अलग से महक रहा है.
मुझे ये खास पसंद आया "...दूसरे किस्म की भक्ति क्या है? किसी ऐसे को याद करना, जिसके लिए दुनिया ने आपको कोई निजाम नहीं दे रखा। वह आपके भीतर समाता चला जाता है। आपको वह वक्त से याद नहीं आता। सुबह-शाम, दिन-रात की मर्यादा से परे वह बस आ धमकता है। यह भक्ति उसके लिए है, जिसके लिए आपके भीतर स्वीकार्य भाव है।"

अखिलेश शुक्ल said...

क्यों न कृष्ण पर कुछ इस तरह से विचार किया जाए?
K -king
R -Religious
I -Impressive
S -Soul
H -Honesty
N -Necessary

दीपक 'मशाल' said...

किशोर चौधरी की बात को ही मेरा मान लें.. ब्लोगरोल में लगाने लायक ब्लॉग है आपका..

अपूर्व said...

कहीं पढ़ा एक प्रसंग याद आता है कि शाही खानदान के सैय्यद इब्राहिम को जब फ़ारसी अनुवादित भद्वत्गीता ने इतना मोह लिया कि उन्होने सीधे वृन्दावन आ कर विट्ठलदास जी के सामने श्रीनाथ से साक्षात्कार की उत्कंठा व्यक्त कर दी...तो विट्ठल ने उनसे कहा कि उनके दर्शन के लिये तुम्हे कहीं जाने या कोई कर्मकांड करने की जरूरत नही है..बस ध्यान करने से अपने पवित्र मन के आगार मे वे खुद तुमसे मिलेंगे..और सैय्यद इब्राहिम ने उसी जगह पर कुछ घंटों के ध्यान के बाद जब आँखें खोलीं तो विट्ठल ने खुद उन्हे गले लगा लिया..कि तुम्हारे विरही मन की पवित्रता सालों की साधना और ध्यान-अभ्यास से भारी है!..और यह कथा एक सांसारिक इंसान के रसखान बनने की ही नही है..बल्कि खुद मे उसको ढ़ूँढ़ पाने की..खुदी को बुलंद करने की भी है..किस्मत से कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर वृंदावन मे ही था..और उन स्पीरिचुअल वाइब्स को महसूस कर सकता था..जो लोगों को दुनिया के रगड़े छोड़ कर उन्मत्त हो जाने पर मजबूर कर देता है..और वहाँ की कृष्णभक्ति का सबसे सबल पक्ष मुझे लगता है कि वो प्रेम के लिये प्रचिलित धार्मिक प्रतीकों/मिथकों का सहारा नही लेता..वो संसार छोड़ने की प्रेरणा नही देता..वरन बड़े साधारण से और सांसारिक प्रतीकों के आसपास ही उस प्रेम को रचता है..उसके लिये कोई बड़े यज्ञ, कर्मकांड नही करने पड़ते..न गहरी किताबों की घोटना पड़ता है..वह प्रेम गाय चराने, दूध से मक्खन निकालने, यमुना किनारे बैठने और कान्हा से मीठे उलाहने कर नाराज हो जाने से विकसित होता है..हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से भागने की प्रेरणा नही देता..वरन खुद उसी मे घुल जाता है!....कृष्ण से प्रेम कहीं संस्कृतज्ञ, उच्चजातीय या पढे-लिखे लोगों की विरासत नही है..न इसके लिये वीतरागी होने की जरूरत है..यह संसार को पाप का घर मान कर मोक्ष की कामना नही करता..यह भक्ति अपनी शुद्धता के लिये, अपने फायदे के लिये भी नही है..यह तो कभी खग बन कर, कभी गाय बन कर तो कभी पाहन बन कर वृंदावन की उन्ही गलियों मे फिर-फिर आने की ख्वाहिश रखता है.. कृष्णभक्ति की यही खासियत मुझे लगती है..कि यह किसी खास पद्धति, किसी खास संप्रदाय या धर्म की जंजीरों मे नही बँधा है..बस सिर्फ़ एक यूनिफ़ाइंग चीज है..प्रेम..शाश्वत सत्य!