Thursday, August 19, 2010

भला काहे देखें पीपली लाइव

क्योंकि फिल्म लीक हटकर है? कि सारे पात्र हकीकत की दुनिया से आये लगते हैं ? कि यह किसी भी महिला निर्देशक कि बेहतरीन फिल्म है? कि एक भी गीत ठूंसा हुआ नहीं लगता? कि यह यथार्थ का सिनेमा है और किसी को प्रेमचंद तो किसी को सत्यजीत रे याद आ रहे हैं ?
नहीं इनमे से किसी के लिए भी पीपली लाइव मत देखिये.. ..
इसे देखिये क्योंकि यह भारत कि सत्तर फीसदी आबादी का सिनेमा है. उस भारत की कहानी है जिसके पास रोज़मर्रा कि बेहिसाब मुश्किलें हैं और जिसे मौत,ज़िन्दगी से आसान लगती है ....
ये बच्चा   किसक  बच्चा है
जो रेत पे तन्हा बैठा है
न उसके  पेट में रोटी है
न उसके तन पर कपड़ा है..
पिता ने इब्ने इंशा की वह कविता वेरा को लिख दी। वेरा ने भी उसे याद कर लिया। मैम के सामने कविता रखते हुए वेरा की आंखें चमक रही थीं। लेकिन मैम ने घूर कर वेरा को देखा- ‘यह क्या भिखारी पर कविता लिख लाई। यह नहीं चलेगी’। वेरा की आंखें बुझ गईं। वह पूरे समय क्लास में उदास बैठी रही।

देस मेरा ‘अंगरेज‘
anusha rizvi onkaardaas manikpuri
 and malika shinoy
आशय यह कि   इस खूबसूरत दुनिया में भिखारी (दरअसल वह कविता एक  भिखारी बच्चे ·की नहीं,  उस तन्हा बच्चे की है जिसका दुनिया में कोई नहीं) का गान कोई नहीं सुनना चाहता। इस रंग-बिरंगी दुनिया में काला-सफेद बिलकुल नहीं चलता। अगर कहीं है भी तो कवर करो। दूर करो नजरों से। यह गरीबी भी तो ब्लेक एंड वाइट नजर आती है। ससुरा दूसरा कोई रंग ही नहीं दिखता। सत्यजीत रे ने पाथेर पांचाली बनाई थी वह भी श्वेत-श्याम फिर अस्सी के दशक में प्रेमचंदकी कहानी पर सद्गति बनाई वह भी काली काली ही नजर आती थी और आज जब अनुषा रिजवी पीपली को लाइव दिखाती हैं तो वह भी रंगहीन ही नजर आता है। इस दौर में जब सब कुछ सनसनीखेज या फिर लिपा-पुता दिखाने की अनिवार्यता हो, सच्चाई पर अघोषित पाबंदी हो तो अनुषा रिजवी को झुक कर सलाम करने को जी चाहता है क्योंकि उन्होंने यह रिस्क ली है। अपना कमिटमेंट जाहिर किया है। स्विट्जरलैंड, सिल्क और शिफॉन के सिनेमा के बीच यथार्थ को दिखाना वैसा ही है जैसा एक शाही महल में मक्खी भिनभिनाते, खांसते गरीब की टूटी-फूटी चारपाई।
हां, गालियां हैं
हम गालियों से बिदकते हैं। लगता है किसी ने कानों में पिघला सीसा डाल दिया हो। फिल्म में गालियां एकदम जरूरी और सटीक लगती हैं। कान खुले रखते हुए निकल जाइए किसी भी शहर की किसी भी गली में। गालियां सुनाई दे ही जाएंगी। आंख-कान बंद करते हुए हरा ही हरा देखना है तो मान लीजिए आप असल भारत से मुंह मोड़ रहे हैं... और मौका मिले तो आप विदेश में जाकर समृद्ध और सुविधा की जिंदगी जीना चाहते हैं। सच है कि आज का मध्यम वर्ग इस सत्तर फीसदी भारत से गर्दन टेढ़ी कर लेना चाहता है। यह वर्ग उसे जूते पुछवाने और मैला ढोने के लिए तो ठीक  लगता है लेकिन साथ बिठाने से उसे एलर्जी है। आजादी ·के सवा छह दशक· बाद भी छुआछूत है, अस्पृश्यता है। गरीब हमें नासूर लगता है। शाइनिंग इंडिया पर बदनुमा दाग।

पीपली खोलती है पोल
पीपली लाइव इसी बदनुमा दाग में दाखिल है। अभाव और शोषण का कच्चा-चिट्ठा है यह। अपनी जमीन का कर्ज चुकाने और आत्महत्या कर मुआवजा हासिल करने वाला मरेगा या नहीं उसके पीछे सारा देश पड़ा है लेकिन मिट्टी खोदते-खोदते मर जाने वाले होरी महतो में किसी की दिलचस्पी नहीं। मरेगा कि नहीं जैसी जिज्ञासा और टीआरपी बढ़ाने का माद्दा मजदूर की सूखी देह में कहां। ऐसे में हिंदी पट्टी के एक अखबारनवीस की संवेदनाएं तार-तार होने लगती है। वह कब मर जाता है किसी को पता नहीं चलता।
नामचीन पत्रकार फील्ड में गला फाड़कर रिपोर्टिंग करते हैं वहीं स्टूडियो में कैसे मंत्रियों से ट्यून्ड रहते हैं। पीपली में यह भी है। एहसान की मुद्रा में गरीब नत्था के घर सरकार एक  लाल बहादुर पटक  देती है। लाल बहादुर बोले तो लालबहादुर शास्त्री योजना के तहत एक  हैंडपंप। गरीब नत्था के लिए हैंडपंप ऐसा ही है जैसे पोपले मुंह में बादाम। सरकारों की खोखली संवेदनाओं पर टिकी  अनुषा रिजवी की व्यंग्यात्मक निगाहें उनके तगड़े स्क्रिप्ट राइटर होने की गवाही देती हैं ।

गरीबी में लिहाज नहीं पलते
सास-बहू में खुलकर गाली-गलौच चलती है। बहू जेठ को सख्त नापसंद करती है लेकिन  नत्था के जाते ही वह जेठ को पानी का गिलास थमाती है। एक दबंग स्त्री  भी भलीभांति जानती है कि समाज मर्दों से ही चलता है। पीपली चुपचाप संकेत करती है। संकेत में व्यंग्य का पुट परदे पर किस तरह उतारा जाता है पीपली इसकी मिसाल है। आदरणीय हबीब तनवीर जिनके  नाटको में ग्रामीण चेहरे जस के तस प्रस्तुत होते थे वही अंदाज पीपली का भी है। भीष्म साहनी का लिखा मुआवजे भी आसपास से झांकता है। पीपली हमें बाहर से हंसाता है तो अंदर छेदता है, भेदता है। यह आम आदमी का सिनेमा है जो सब कुछ सहता है और उफ़ भी नहीं करता। बस हाथ जोड़े खड़ा रहता है। वह विलायती बीज बोता है लेकिन पानी के लिए ऊपर ही निहारता है। ऐसी ही आधी-अधूरी तरक्की है हमारी। पिछले एक दशक  में लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं और करोड़ों किसानी छोड़ चुके हैं। अकेले आन्ध्र  प्रदेश में सरकार ने तीन लाख एकड़ जमीन खींचीं है, जिससे पचास हजार किसान मजदूर बन गए हैं। मायावती सरकार  किसानों पर गोलियां चला रही है। यही उपलब्धि है 63 सालों की।  संपन्न भारत गरीब भारत की ओर नहीं देखना चाहता। वेरा की टीचर की तरह। 



                                                                                    अनुषा का परिवार
anusha rizvi and mahmood farooqui
  यूं अनुषा के माता-पिता उन्हें दूरदर्शन पर आने वाली बांग्ला फिल्में दिखाते थे। वह भी सत्यजीत रे और रित्विक  घटक· की फिल्में। पीपली लाइव के साथ उनके पति महमूद फारूकी का भी नाम जुड़ा है। वे कास्ट डायरेक्टर और सह-निर्देशक हैं। दोनों की मुलाकात आठ साल पहले एनडीटीवी में काम करते हुए हुई थी। दोनों के परिवार उत्तरप्रदेशी और पढ़ी-लिखी पृष्ठभूमि से हैं। महमूद गोरखपुर के पुरबिया हैं तो अनुषा पश्चिम उत्तर प्रदेश से  रखती हैं। अनुषा शिया हैं तो महमूद सुन्नी। अनुषा ने दिल्ली के सेंट स्टीफन्स से पढ़ाई की है तो महमूद दून स्कूल में पढ़े हैं और ऑक्सफोर्ड से भी। बाद में फिल्म इंडस्ट्री को समझने के लिए दोनों मुंबई शिफ्ट हो गए.

 

12 comments:

इमरान अंसारी said...

aapne jigyasa jaga di hai aaj hi dekhne jata hoon pprpli live..

Kishore Choudhary said...

इतना कुछ पढ़ने के बाद भला कहे को देखें पीपली लाइव

फिल्म कि समीक्षा कहूं उससे बेहतर होगा कि इसे एक फौरी अध्ययन कहा जाये. कहानी, कला, चित्रण, विषय, सोच, परिवेश, मुश्किलों यानि ज़िन्दगी के हार पहलू की दृष्टि से आपने इस फिल्म को देखा है. बनी कैसी है वह चित्र तो सिर्फ इस आलेख को पढ़ कर ही बना है. ज्यादा क्या लिखूंगा आपको बधाई देना चाहता हूँ कि ऐसा पढ़े हुए, बहुत दिन हुए थे.

Kishore Choudhary said...

इतना कुछ पढ़ने के बाद भला काहे को देखें पीपली लाइव

फिल्म की समीक्षा कहूं उससे बेहतर होगा कि इसे एक फौरी अध्ययन कहा जाये. कहानी, कला, चित्रण, विषय, सोच, परिवेश, मुश्किलों यानि ज़िन्दगी के हर पहलू की दृष्टि से आपने इस फिल्म को देखा है. बनी कैसी है वह चित्र तो सिर्फ इस आलेख को पढ़ कर ही बना है. ज्यादा क्या लिखूंगा ? आपको बधाई देना चाहता हूँ कि ऐसा पढ़े हुए, बहुत दिन हुए थे.

कुश said...

पीपली को देखकर जो पहले विचार मन में आये उन्हें आपके विचारों से मेल खाते हुए पाया है.. होरी महतो का किरदार छोटा होते हुए भी बहुत बड़ा है और मूल कहानी से इतर होने के बावजूद अपनी छाप छोड़ता है.. यह निर्देशकीय कौशल ही है.. वैसे इन सब मुद्दों पर कई लोगो ने बाते की है.. लेकिन इलेक्ट्रोनिक मिडिया की जो बखिया उधेडी गयी है फिल्म में उसका जिक्र कम ही हो रहा है..
देखिये आपने भी उतना नहीं किया जितना होना चाहिए.. :)

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर समीक्षा परिस्थितियों की व फिल्म की।

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

वाणी गीत said...

समीक्षा पढ़कर भी कोई क्यूँ नहीं देखे पीपली लाइव ...
चकाचौंध के बीच वास्तविकता को दिखाना साहसिक कार्य है ...
ऐसा साहस कर ना सके मगर सराहा तो जा ही सकता है ...!

Asma Khan said...

I was dying to watch Peepli and today just bunked d colg unexpectedly. I celebrated Onam in the Anusha-way!!
This movie can tickle the funny bone and at the same time it can force the audience to be damn serious!!
We were laughing at the miseries of the farmers but at the end, got eyes wet!
Hats off to Anusha and Aamir!! :-)

चेतना के स्वर said...

aaj aapki post dubara padhi. ye film agar aap banati to bhi hit hoti aisa vishwas hain. didi aap banao to natthha wala role mujhe dena. plz

हमारीवाणी.कॉम said...

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प्रदीप कांत said...

पीपली लाइव इसी बदनुमा दाग में दाखिल है। अभाव और शोषण का कच्चा-चिट्ठा है यह। अपनी जमीन का कर्ज चुकाने और आत्महत्या कर मुआवजा हासिल करने वाला मरेगा या नहीं उसके पीछे सारा देश पड़ा है लेकिन मिट्टी खोदते-खोदते मर जाने वाले होरी महतो में किसी की दिलचस्पी नहीं। मरेगा कि नहीं जैसी जिज्ञासा और टीआरपी बढ़ाने का माद्दा मजदूर की सूखी देह में कहां। ऐसे में हिंदी पट्टी के एक अखबारनवीस की संवेदनाएं तार-तार होने लगती है। वह कब मर जाता है किसी को पता नहीं चलता।

पीपली लाइव नहीं --- हिन्दुस्तान लाइव है ।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

पीपली लाईव पर कबाड़खाना में जो समीक्षा रामकुमार तिवारी ने की है मेरी उससे सहमति है…