Thursday, June 24, 2010

गलियाँ गालियों की


आज जाने क्यों उस पर लिखने के लिए बाध्य हो गयीं हूँ जिस पर सभ्य घरों में सोचना भी मना है. इन दिनों पसरती  धूल ने किताबों को भी नहीं बख्शा है. धूल ही झाड़ने की कोशिश में राही मासूम रज़ा की लिखी ओस की बूँद हाथ आ गयी.  धूल  कम, हर्फ़ ज्यादा दिखाई देने लगे . फ्लैप  पढ़ा तो बस वहीँ रह गयी.
मेरे परिवार में आधा गाँव, ओस की बूँद  उनके ये दोनों ही उपन्यास वर्जित थे .उसी तरह शेखर कपूर  की बेंडिट क्वीन भी. लेकिन अब गलियाँ मुझे भली लगती हैं .क्योंकि किसी ने मुझे उसका भी गणित समझाया...कि यह बेवजह नहीं होती ...कि इनको कह देने के बाद मन निष्पाप हो जाता है... कि आम इंसान को समझना है तो उसकी भाषा को समझो. बस तबसे जब भी सड़क पर गालियों के स्वर सुनती हूँ तो चिढ़ नहीं जाती और न ही वित्रष्णा होती है . पहले यही सब होता था.  कोई होता है जिसके मुख से  अपशब्द भी सोने-से खरे लगते हैं . वे बेवजह नहीं होते. कई बार सोचती हूँ  कि यहाँ से गाली हटा कर किस शब्द को रखूँ कि बात में वजन पड़ जाए लेकीन यकीन मानिये मेरी हार होती. सामान्य शब्दों में शायद वह धार ही नहीं होती जो गाली में होती है. शायद आप जानते हों गलियों के भी शोर्ट फोर्म्स होते हैं. कहनेवाला बात भी कह देता और इज्ज़त भी बनी रहती है
... जो मित्र समझ रहे हैं वे मुझे बख्शेंगे नहीं कि कोई यूं भी यादों को याद करता है. क्या करें याद तो याद ठहरी सही समय पर सही धुन बजाने से तो रही. संक्षेप में बस इतना ही कि मैंने गालियों  को किसी कि गोद में बच्चों कि तरह खेलते देखा है . पास बैठे को धूजने कि बजाय रस लेते देखा है और तो और तो और कुछ समय बाद उसे वही सब जपते हुए भी देखा है. इसी बीच गलियाँ सुनानेवला कब काबा और शिवाला कि गलियों में खो जाता है कोई नहीं समझ पाता.
पहले एक नामुराद-सा शेर और फिर मुरादों वाले रज़ा साहब के वे शब्द जो उन्होंने आधा गाँव लिखने के बाद ओस की बूँद की भूमिका में लिखे हैं . 

तेरी खुशबू आती है इन किताबों से

फिर जाने क्यों  होश अपना नहीं रहता 

बड़े-बूढ़ों  ने कई बार कहा की गलियां न लिखो जो आधा गाँव में इतनी गालियाँ न होती तो तुम्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार अवश्य मिल गया होता,परन्तु मैं  सोचता हूँ की क्या में उपन्यास इसलिए लिखता हूँ की मुझे पुरस्कार मिले ?पुरस्कार मिलने में कोई नुकसान नहीं फायदा ही है. परन्तु मैं एक साहित्यकार हूँ . मेरे पात्र यदि गीता बोलेंगे तो मैं गीता के श्लोक लिखूँगा. और वह गालियाँ बकेंगे तो मैं अवश्य उनकी गालियाँ लिखूँगा . मैं कोई नाज़ी साहित्यकार नहीं हूँ कि अपने उपन्यास के शहरों पर अपना हुक्म चलाऊँ और हर पात्र को एक शब्दकोष थमाकर हुक्म दे दूं कि जो एक शब्द अपनी तरफ से बोले तो गोली मार दूंगा. कोई बड़ा बूढ़ा बताए कि जहाँ मेरे पात्र गाली बकते हैं. वहां मैं गालियाँ हटाकर क्या लिखूं ? डोट डोट डोट ?
तब तो लोग अपनी तरफ से गालियाँ गढ़ने लगेंगे और गालियों के सिलसिले में अपने पत्रों के अलावा किसी पर भरोसा नहीं है

ओस की बूँद के पात्र भी कहीं-कहीं गालियाँ बकते हैं. यदि आपने कभी गाली सुनी ही न हो तो आप यह उपन्यास न पढ़िए. मैं आपको ब्लश करवाना नहीं चाहता.

ps: दरअसल,गाली देना कोई वीरता का काम नहीं लेकिन कमबख्त गाली की जगह जाने क्यों गाली ही सटीक बैठती है. आधा गाँव पढ़कर और फूलन देवी की कथा पर आधारित फिल्म द बेंडिट क्वीन देखकर तो यह धारणा और मज़बूत होती है.

20 comments:

शिवम् मिश्रा said...

आपने कुछ हद तक सोचने पर विवश कर दिया कि सच में गलियों की जगह कौन से शब्द इस्तमाल किये जा सकते है !?
पर आप की ही तरह जवाब मिला ................गलियाँ !!
बढ़िया लिख आपने, आभार!

वाणी गीत said...

@ दरअसल,गाली देना कोई वीरता का काम नहीं लेकिन कमबख्त गाली की जगह जाने क्यों गाली ही सटीक बैठती है. आधा गाँव पढ़कर और फूलन देवी की कथा पर आधारित फिल्म द बेंडिट क्वीन देखकर तो यह धारणा और मज़बूत होती है....

इसके बाद गालियों की भाषा पर कौन प्रश्नचिंह लगा सकता है ...

@ कोई होता है जिसके मुख से अपशब्द भी सोने-से खरे लगते हैं . वे बेवजह नहीं होते...

मुझे भी यह खुशफहमी/ग़लतफ़हमी है कि मैं अपशब्दों का इस्तेमाल (जब भी करती हूँ ) बेवजह नहीं करती ....:):)

अशोक कुमार पाण्डेय said...

आपने कभी इस पर ध्यान दिया है कि किस तरह गालियां पितृसत्तात्मक मूल्यों को बनाये रखने वाले और उनकी आक्रामकता को प्रदर्शित करने वाले औज़ार के रूप में सामने आती हैं।

सारी गालियां स्त्रियों की यौनिकता का अपमान होती हैं। उनके साथ के दुर्व्यवहार की चेतावनी। राही साहब से शिकायत नहीं, लेकिन इस ओर भी ध्यान देना ज़रूरी है।

varsha said...

ji ashokji zaroor dhyaan diya hai...jis din ulta ho jayega yani stri satta sthapit ho jayegi gaaliyaan bhi ulti ho jaengi lekin mein aisa katayee nahin chahti. donon ek platform par honge to koi gaali gaali nahin lagegi.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

तब शायद ऐसी गालियां हों - बेईमान, भ्रष्ट, अवसरवादी, शोषक,… :-)

अखिलेश शुक्ल said...

दरअसल गालियां तब तक ही गालियां होती हैं जब तक वे शब्दों पर आश्रित होती हे। लेकिन जब वे अर्थ केन्द्रित हो जाती है तब उनके मायने सामान्य न होकर विशिष्ट हो जाते हैं। यही रज़ा जी के लेखन में हुआ है,इसलिए मेरे विचार से वह गलत नही है।

cartoonist ABHISHEK said...

गालियाँ.. बे-वस इंसान की सबसे बड़ी ताक़त हैं वरना बेचारा घुट घुट कर मर जाये
कभी कभी इंसान मन ही मन में गालियाँ दे कर अपना गुस्सा ठंडा कर लेता है.
क्योंकि देखा गया है ताक़तवर कभी गाली नहीं बकता सीधे हाथ छोड़ता है..
सरकार दाम बढाए तो लाचार-बेवस जनता क्या करे....चार गालियाँ भी ना दे...????

कई ब्लोगरों को ही ले लो टिप्पड़ी करने के बहाने चुपके से बेनाम हो कर, गाली बक कर पतली गली से खिसक लेते हें..इस बहाने कम से कम ये 'दुर्बल लोग' अपनी खुन्नस तो दूर कर ही लेते हें वरना मारे कुंठा के पागल हो जाएँ...(सूत्र बतातें हें कुछ तो हो भी गये हें )

"बको बको जल्दी बको
कहीं ऐसा न हो बकने से
पहले मौत आ जाये...."
( स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी से क्षमा याचना सहित )

Kishore Choudhary said...

बहुत सुंदर और मेरे लिए तो प्रतीक्षित आलेख कि मैं इस विषय पर अक्सर सोचता हूँ.
गालियाँ शायद भाषा के साथ ही बड़ी हुई होंगी, उनकी पहचान भले ही देशज हों किन्तु वे सब सीमाओं से परे हैं. सभ्य होने के लिए गालियों से मुक्त होना कोई अनिवार्य है क्या ?
अभी एक बार फिर से पढूंगा कि आपने आधा गाँव से जिस तरह विषय को जानदार बनाया है... आपको बधाई.

अपूर्व said...

आधा गाँव पढी थी..मगर मुझे लगता है कि साहित्य मे पात्रों की भाषा के आधार पर हमारे वास्तविक जीवन मे गालियों के प्रयोग को न्यायोचित ठहरा पाना सही नही है...कथा मे पात्रानुकूल भाषा जहाँ जरूरी है..कोई अनपढ़ पात्र संस्कृत की सूक्तियाँ नही बोलेगा..मगर अपनी खीज निकालने के लिये दैनिन्दिन जीवन मे बातों-बातों मे किसी के परिवार की स्त्रियों से प्रगाढ़ सबंध बनाना मन को निष्पाप नही वरन कलुषित ही करता है..

प्रदीप कांत said...

गाली तो गाली ही है। अच्छी तो नहीं ही कही जा सकती। ख़ास कर तमाम वे गालियाँ जिन्हे लेकर अशोक भाई ने आपत्ति की है जो स्त्रियों का अपमान ही करती है।

varsha said...

सिर्फ दो बातें कि कैसे गालियाँ आम आदमी का औज़ार बनती हैं .कल ही की बात है दूध डेरी के सामने एक अधेढ़ ने मंहगाई को लेकर तीन चार गालियाँ दी. मौजूद सभी लोगों ने सुनी और महसूस किया कि यह उन्हीं के भीतर कि आवाज़ है. वह कोई अपराधी नहीं था और न ही किसी स्त्री के अपमान का उसका कोई इरादा था.
अक्सर कचरा बीननेवाली लड़कियों को जब कोई छेड़ता है तो वे उग्र होकर लगातार गालियाँ बकती हैं.यहाँ अपशब्द उनके बचाव का हथियार हैं .क्या वे पीट सकती हैं उन बदमाशों को...बस इरादे ज़ाहिर कर देती हैं. यहाँ कोई सूक्ति फिट बैठती हो तो स्वागत है.

Kishore Choudhary said...

गाँव से कस्बों में आ बसे हैं मगर परम्पराएँ अभी नब्बे फीसद वही हैं. जिनमे कुछ बदलाव आया है वह नरम प्रवृति के कारण हैं. अभी फरवरी माह में कजिन की शादी थी, तीन दिन बाद उसके ससुराल जाने की रस्म थी. मैं भी गया यानि जाना ही पड़ा. वहां जबरन घी खिलाया गया बेहूदा तरीकों से... और फिर जी भर के गालियां गाई ससुराल की औरतों ने. जीमण पर बैठे लोगों के मुंह से कोई आवाज़ नहीं निकली तो उन्होंने आवाज़ दे कर पुछवाया कि क्या हुआ ज्यादा खाना खाने से मुंह आवाज़ नहीं निकल रही या बरसों के भूखे लोगों ने हमारी मीठी बातें सुनी ही नहीं.
वे उल्लासित थी और अपनी गालियों पर दाद चाह रही थी. उनके कलेजे के टुकडे को हम ले गए थे इसलिए दिल से उपजी गालियों पर वे खुद को एक सुंदर शाबासी का हकदार मान रही थी. उन्होंने गीतों में गालियों के जरिये अपनी प्रिय सखी, भतीजी या फिर भांजी को ले जाने वालों को कोसा... फिर वे खिलंदड हंसी में डूब गई. उनके शब्दों के आगे ससुराल वाले भी बेबस थे. वे किसी की नहीं सुन रही थी. कहती जाती कि कैसे बेशर्म लोग मिले हैं कि हम उनको गालियां दे रहीं हैं और ये भूखे खाए ही जा रहे हैं. मेजबान थे कि थोड़ा और थोड़ा और किये ही जा रहे थे....
असीम आत्मीयता, अद्भुत रिवाज और जबरदस्त माहौल जिसमे शर्म, हास्य, नाजुकता, नए रिश्तेदार और तुर्रा ये कि सब पर भारी गालियां. 'बनड़ा ऊँचो झांक थारी माँ लटके...' ओ दुल्हे राजा ऊपर देख तेरी माँ लटक रही है.

हमारे यहाँ तो गालियां जीवन का हिस्सा है, उनके बिना सब अधूरा है. यह असभ्यता है तो भी मैं खुश हूँ.

Dileepraaj Nagpal said...

Jab We Mate Ki Kareena Kapoor Gaaliyan Dekhar Kaise Apna Dil Halka Karti Hai...Gaaliyaan Main Bhi Khoob Deta Hun Per Short Form Me... :)

boletobindas said...

हाहाहाहाहा आपका ये संस्मरण पढ़ को जोरदार हंसी आ गई। भई सवाल तो जबरदस्त है। गाली की जगह कौन सा शब्द होना चाहिए। आज तक किसी ने नहीं बताया। ये किताब अबतक नहीं पढ़ी थी। अब पढ़नी ही पढ़ेगी। यहां हाल तो ये है कि दिल्ली के दोस्तों से बातचीत में गाली नहीं आती तो उन्हें लगता है कि मैं बीमार हूं। पर गाली के बिना भाषा का भी ज्ञान है सो कभी कभी फंस जाता हूं। किसी सेमीनार(अधिकतर सो कॉल्ड) से निकलने के बाद दोस्तों के बीच पहुंचते ही थोड़ी देर में गालिंयो की बौछार झेलनी पड़ती है। फिर अपना गियर चेंज करके दोस्तो वाली भाषा पर आना पड़ता है।

बैंडिट क्वीन फिल्म देखी है। शेखर कपूर का बेजोड़ शाहकार है। देख कर बैचेनी हुई थी..कितना झेला होगा फूलन देवी ने। ऐसे में वो गाली नहीं देती तो क्या करती। किसी के पास कोई जवाब नहीं है।

वैसे पुरुषों को लेकर भी गालियां है ही। एक दो ही सही।

kailash said...

ashokji ki bat ko jodkar kahana chahuta hu ki jitni bhi suni galiya unme mahila aur dalito par apman ,kamtar dikhane ki varchsvavadi mansikata hoti hai,,,,,,,,,,,,,,kuchch sal pahale gali par kam karana shuru kiya tha,,,,

डॉ महेश सिन्हा said...

एक कमजोर व्यक्ति सहारा लेता है गालियों का .
गालियों का महिमामंडन याने व्यक्ति ने अपनी जमीन खो दी है

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...
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Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...
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Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

गालियो का भी एक अजीब रिवाज है.. बचपन मे यही सीखा था कि गालिया देना बुरा होता है... उन्ही दिनो एक बार गुस्से मे पापा को देते सुनी थी..
स्कूल मे भी एक दो बार दी फ़िर जब वो आदतन घर पर भी निकलने लगी.. सोते मे मै नीद मे बडबडाने लगा तो फ़िर उनसे विरक्त होना ही उचित समझा.. फ़िर कई सालो बाद दी.. और वो दिन मुझे याद है कि जब किसी ने मुझे इतना इरीटेट कर दिया था कि मेरे मुह से गाली निकल गयी थी.. और वो गाली सुनकर घन्टो हसा था जैसे मैने महाभारत युद्ध मे चक्र उठा लिया था और गाली देकर भी मै ही हारा था..

फ़िर उसके बाद कब क्या बदला और क्यू बदला.. हा लेकिन गालियो का जेन्डर बाएस होना मुझे भी कभी पसन्द नही आया...

शायद एक बार गाली कहके/लिखकर आप कम्फ़र्ट ज़ोन मे आ जाते है.. बहुत अपने पास.. दो अनजाने लोग तीसरे को गाली देते हुए ऎसे ही तो करीब आ जाते है.. जैसे गालियो के बाद कोई फ़ार्मेलिटी ही नही बचती..

किशोर जी ने अच्छा वाक्या याद दिलाया.. गाव मे शादी थी और हमारे यहा भी शादियो मे औरते गालिया गाती है.. मै थोडा गुस्सैल प्रवृत्ति का था तो मम्मी ने अलग से हिदायत थी कि बेटा गालिया लगती थोडे न है.. बुरा नही मानना और बोलेगी तो चुपचाप सुन लेना.. उसके बावजूद मै किसी लडकी को टाईट करके आया था...

इतना कुछ कहने और समझने के बाद भी मै कन्फ़्यूज्ड हू और खुद अपने आप को किसी तरफ़ नही रख पा रहा हू..
ठीक है गालिया बुरी है फ़िर गालियो की जगह क्या कह सकते है? सवाल ही छोडकर जा रहा हू..

प्रवीण पाण्डेय said...

आह भर कर गालियाँ दो,
पेट भर कर बददुआ ।