Wednesday, June 9, 2010

मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं...

तमाम हिंसा और आवेग के दृश्यों के बावजूद प्रकाश झा की फिल्म राजनीति सोचने के लिए मजबूर करती है कि अगर एक स्त्री राजनीति में है तो वह या तो अपनी देह कुर्बान कर रही है या फिर परिवार में हुए किसी हादसे के नतीजतन राजनीति में है।....और जो इरादतन (पात्र का नाम भारती) राजनीति में है, उसे केवल इसलिए सब छोड़ना पड़ता है क्योंकि वह अपने ही गुरु को सर्वस्व अर्पित कर बिन ब्याही मां बन जाती है। लाल झण्डा लिए गुरु पलायन कर जाते हैं और वह एक राजनीतिक परिवार की बहू। यह ब्याह भी जोड़-तोड़ की भावी राजनीति का बीज बोने के लिए होता है।
फिल्म में एक कैरेक्टर उस युवती का है जो सीतापुर के टिकट के लिए खुद को सौंपती चली जाती है लेकिन टिकट है कि उसे ही शटल कॉक बना देता है। इस गन्दी राजनीति पर बहुत हौले से कैमरा घूमता है। नायिका इन्दु प्रताप सिंह (कैटरीना कैफ) भी इसलिए मैदान में उतरी है क्योंकि उनके ससुर और पति की हत्या हो चुकी है और सहानुभूति का पूरा वोट उनकी झोली में गिरने वाला है। यही जमीनी हकीकत है हमारे देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की।राजनीति के बहाने निर्देशक प्रकाश झा ने रिश्तों की बुनावट को जिस प्रकाश में देखा है वह फिल्म का प्राण बन गया है। रिश्ते जो स्वार्थ की भेंट चढ़े हैं  अपना वजूद दूसरे के मिटने में ही देख रहे हैं । 

कुछ लोगों को एतराज है कि जितनी हिंसा फिल्म में दिखाई गई है उतनी कभी नहीं होती। एक परिवार की रंजिश से ऊपर उठकर सोचें तो हमने बापू , इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी को राजनीतिक बिसात पर कुरबान किया है। ख्यात  बैडमिंटन खिलाड़ी सैयद मोदी की हत्या में कौन शामिल था? उनके मरने के बाद अमिता मोदी और पोलिटिशियन संजय सिंह ने शादी क्यों की? अमरमणि त्रिपाठी ने कविता लिखने वाली मधुमिता शुक्ल को क्यों मरवाया? पड़ौसी देश नेपाल में राजकुमार ज्ञानेन्द्र और उनके पुत्र पारस ने खून की होली क्यों खेली? इल्जाम है कि उन्होंने अपने बड़े भाई और गद्दी के हकदार पुत्र दीपेन्द्र समेत राजपरिवार के कई सदस्यों की गोली मारकर हत्या कर दी।

एक वरिष्ठ रिपोर्टर हुआ करते थे लखनऊ में। समाजवादी पार्टी उनकी बीट (कार्यक्षेत्र) थी। साथीगण अकसर कहते, आपका तो बहुत याराना है मुलायम सिंह से। वे साफ कहते यह राजनीति है। यदि विरोधी दल आश्वासन दे कि गद्दी आपकी, आप रिपोर्टर का सर ले आइए तो मेरा सर जाने में पल भी नहीं लगेंगे। बाद में इन रिपोर्टर की एक दुर्घटना में मौत हो गई।

फिल्म की बात करें तो भारतवर्ष महाभारत की राजनीति से सुपरिचित है जहां इनसान सत्ता के सुख के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। नैतिकता धृतराष्ट्र की तरह पट्टी बांधे पड़ी रहती है। सारे गणित वर्चस्व हासिल करने के लिए होते हैं। हमारी वर्तमान राजनीति भी इससे अलग नहीं। अव्वल तो देश का पढ़ा-लिखा युवा इस ओर जाने से कतराता है लेकिन यदि जाना चाहता है तो यह फिल्म उसके लिए होमवर्क का काम कर सकती है।

आम आदमी की भूमिका यहां केवल ढोल बजाने और माला पहनाने के लिए है। वह इस कदर लुटा-पिटा है कि जब दलित सूरज (कर्ण के अक्स वाला पात्र अजय देवगन  ) मारा जाता है तब भी उसके ड्राइवर पिता उन्हीं शक्तिशाली कदमों में गिरते हैं जो उसके बेटे के हत्यारे हैं। आम आदमी इस लड़ाई में केवल इस्तेमाल होता है और प्रकाश झा इसे भूले नहीं हैं। स्विट्जरलैण्ड, शिफॉन और करवाचौथ के बीच यह यथार्थ  का सिनेमा है। हमें इसकी आदत नहीं। इतनी अच्छी हिन्दी सुनने की भी नहीं। स्क्रिप्ट  रोमन लिपि की नहीं, आंचलिक हिन्दी की है। भोपाल शूटिंग के लिहाज से मशहूर शहर नहीं लेकिन लोकेशन्स लुभावनी हैं। शहर हैरत में है। दर्द में है। पच्चीस साल से भी लम्बे समय से न्याय की राह देख रहे लोगों के अपराधियों को पच्चीस हजार के मुचलके पर छोड़ दिया गया है। गरीब देश के गरीब शहर, रोजगार के नाम पर ऐसे ही जहरीले छलावों के शिकार होते हैं। राजनीति यहां भी है।


ps: मोरा पिया बस जब -तब प्रष्ठभूमि में बजता .है और बेहद मधुर है .  कैटरिना आखिर में नयी नज़र आती हैं. अजय देवगन खूब गुस्से में हैं .रणवीर ने  चौंकाया है.. नाना सहज और शानदार .चेतन पंडित बढ़िया .अर्जुन रामपाल आकर्षक .नसीर सुपर्ब लेकिन छोटे रोले में और श्रुति सेठ ने सीतापुर का टिकट नए अंदाज़ में माँगा है. लास्ट बट नोट लीस्ट मनोज वाजपेयी की जोरदार वापसी है राजनीति. कमाल है इत्ते सारे और सब के सब ज़रूरी .

17 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

समीक्षा तो अच्छी है ही उस बहाने की गयी चर्चा और सन्दर्भ भी मूल्यवान हैं. राष्ट्र को धृत-राष्ट्रों से मुक्ति कब मिलेगी?

दिलीप said...

sameeksha achchi par...film kuch atishayokti thi....haan hatyayein hoti hain par itni jaldi sab saamany nahi hota....chunaav radd ho jaate hain....yahan to godfather se drishy chura chura ke apni film bana di...kunti karn ke samvaad haasyaspad hai....mudda achcha bhi utha liya ho...par agar parde pe sahi se na dikhaya to bekaar....film dekhne gaye na na ki samajhne ki ye aur hota to achcha par fir bhi theek hai...

Jandunia said...

राजनीति को लेकर आपकी समझ काबिल-ए-तारीफ। आपने जिन बातों को उठाया है वो काफी गंभीर हैं और भारतीय राजनीति की दशा और दिशा की तरफ साफ इशारा करते हैं।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

आपने कनफ़्यूज कर दिया…अब तक सारे दोस्तों ने इसे बकवास बताके पैसा और वक़्त बचाने की सलाह दी थी…अब सोच रहा हूं कि क्या करुं?

शिवम् मिश्रा said...

एक उम्दा आलेख, बहुत बहुत आभार आपका !

Udan Tashtari said...

देख आये यह मूवी..अच्छी समीक्षा!

वाणी गीत said...

लोकतंत्र होने के बावजूद राजनीति इतनी भ्रष्ट हो गयी है कि परंपरागत राजनैतिक या औद्योगिक घरानों के अलावा किसी अन्य सामान्य महिला को बहुत मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ता है ...
मोरा पिया मोसे बोलत नाही... बहुत ही मधुर और कर्णप्रिय गीत है ...
समीक्षा अच्छी लगी ...!!

Kishore Choudhary said...

फिल्म नहीं देख पाया हूँ
हाँ, इंटरनेट पर त्वरित प्रतिक्रियाएं बहुत सी देखी. फिल्म निर्माण के सामाजिक दायित्व और फिल्म से जुड़े लोगों की अपेक्षाएं अलग अलग हुआ करती है.
आपकी बातें बहुत बढ़िया है क्योंकि मैं एक आम दर्शक हूँ जो ये नहीं जानता कि सिनेमा इतिहास इस फिल्म को किस दृष्टि से देखते हुए कलमबद्ध करेगा. इस नयी सदी में पैदा होने वाले कितने प्रतिशत बच्चे "दो बीघा ज़मीन" और "पाथेर पांचाली" देखेंगे, यह सोचता हूँ तो लगता है कि फिल्म एक तीन घंटे लम्बा आवेश है जो शायद कुछ और घंटे आपके आस पास मंडराता रहता है. फ़िल्में हमारे संस्कारों को प्रभावित जरूर करती है मगर इससे भी त्वरित माध्यमों ने हमें जकड़ रखा है इसलिए मुझे ये कभी अपील नहीं कर पाती.
आपने कई सारे प्रसंगों के हवाले से सच्ची बातें कही हैं उनसे जायज सवाल उभरे हैं. आम आदमी के प्रति प्रकाश जी की समझ को सराह कर आपने एक फ़िल्मकार को जरूरी सम्मान दिया है.

निखिल आनन्द गिरि said...

फिल्म को समझने का आपका नज़रिया अच्छा लगा....स्त्रीवादी नज़रिए से देखें तो फिल्म अच्छी भई लग सकती है...मगर फिर वही बात, निर्देशक ने कोई नया मोड़ नहीं दिया है स्त्री-विमर्श को....बैठक पर समीक्षा लिखी है हमने भी....पढने आईएगा ज़रूर..

sandeep sharma said...

वर्षा mam,
फिल्म की समीक्षा के साथ-साथ आज के हालत भी बखूबी दिखा दिए हैं...
मैंने भी फिल्म देखी है.. बहुत खूबसूरत है...
आपकी पोस्ट में आम आदमी की हालत के साथ ही नारी, और आखिर में आते-आते भोपाल त्रासदी का जिक्र होना भी आपकी संवेदनशीलता को दर्शाता है...

संदीप

चेतना के स्वर said...

khammaghani! didi
bahut achchha laga. pahle padha par samajh nahi aaya. aaj film dekhi to abhubhoot hua.

achchhi samiksha

भूतनाथ said...

acchhi sameekshaa.........

cartoonist ABHISHEK said...

फिल्म 'राजनीति ' सत्ता के नशे के आदी हो चुके लोंगों की,
आपसी संघर्ष की कहानी है..
इतिहास उठाकर देख लीजिये सिंहासन के लिए
बाप-भाई की हत्या कोई नयी बात नहीं है..
निर्द्रेशक के बात कहने के तरीके पर बहस हो सकती है
मगर फिल्म में जो है वो राजनीति की कडवी सच्चाई है..
किसी को पसंद आये या नहीं...
वर्षा की 'फिल्म समीक्षा' सराहनीय है...

neelima sukhija arora said...

अभी तक सब बता रहे थे कि फिल्म पैसे और वक्त की बरबादी है पर वर्षा जी आपकी समीक्षा पढ़कर तो लग रहा है कि यथार्थ की राजनीति तो देखनी पड़ेगी

boletobindas said...

मेरा भी मूड बदल रहा है। अब फिल्म देखनी होगी। तीन घंटे तक मारकाट देखने का मन नहीं था। न ही आसपास की परिचित राजनीति को पर्दे पर देखने का शौक। पर प्रकाश झा के कारण देख लेता हूं। मिश्रित प्रतिक्रिया मिल रही है अब तक फिल्म की। धन्यवाद समीक्षा के लिए।

अपूर्व said...

बहुत्त बेहतरीन और सटीक प्रतिक्रिया है आपकी राजनीति पर..लोग सवाल करते हैं कि प्रकाश झा ने फ़िल्म मे महिला चरित्रों से न्याय नही किया..मैं पूछता हूँ कि भारतीय राजनीति ने ही कितना न्याय किया है महिलाओं के साथ..यहाँ राजनीति मे औरत के लिये ऊपर के पायदान चढ़ना कभी आसान नही रहा..सफ़लता के लिये या तो कैटरीना की तरह ऊँचे राजनीतिक खानदान से होना जरूरी है..या श्रुति के चरित्र की तरह खुद को आकाओं के हाथों मे सौंप देना..तीसरा रास्ता मिल पाना असंभव की हद तक मुश्किल है..आज के राजनीतिक परिदृश्य मे माया, ममता जैसे अपवादों को छोड़ दें तो बहुत कम उदाहरण मिलेंगे महिलाओं के जो सिर्फ़ अपने दम पर अपनी ठोस जगह बना पायी हैं..एम पी और एम एल ऐज मे तमाम ज्यादातर किसी पारिवारिक विरासत की नाव पर सवार नजर आती हैं..पंचायती चुनावों मे कमोवेश यही हालत है..मगर अगले कुछ दशकों मे इसके बेहतर होने की उम्मीद करता हूँ..खास बात यह लगी कि फ़िल्म मे इंदु भी मुख्यमंत्री बनती है..मगर तभी जब परिवार मे बचा कोई और पुरुष इस जिम्मेदारी को नही उठाता है..और इंदु की स्थिति भी फ़िलर जैसी है..जिसके लिये प्रदेश का मुखिया होने से ज्यादा महत्वपूर्ण परिवार की राजनैतिक विरासत को संभालने वाले वारिस को जन्म देना है..
फ़िल्म से हालाँकि मेरी भी अपेक्षाएं ज्यादा ही थीं..मगर आपकी समीक्षा पसंद आयी...

Mrs. Asha Joglekar said...

फिल्म ठीक ठाक है । नाना पाटेकर और मनोज वाजपेयी का काम बहुत बढिया ।