Wednesday, February 17, 2010

मिल जा कहीं समय से परे ....

तुम्हारे आते ही  भीग जाती हैं ये आंखें
इतनी शिद्दत से कोई नहीं आता मेरे पास

प्रेम ऐसा ही स्वतःस्फूर्त भाव है जो एक इंसान का दूसरे के लिए उपजता है। यह भाव इस कदर हावी होता है कि उसके सोचने समझने की ताकत छिन जाती है। यूं कहें कि वह इंसान दिल के आगे इतना मजबूर होता है कि लगता है दिमाग कहीं सात तालों में बन्द पड़ा है। ...लेकिन दुनिया तो यही मानती है कि प्रेम अंधा होता है। दरअसल प्रेम है ही आंखों को बन्द कर डूबने का जज्बा। जिसमें यह नहीं वह दुनिया की सारी चीजें कर सकता है, प्रेम नहीं।

इश्क आपको दिशा देता है। एक मार्ग। शायद वैसे ही जैसे गुरु अपने शिष्य को। ईश्वर अपने भक्त को। प्रेम में डूबा शख्स  नृत्य की मुद्रा में दिखाई देता है। स्पन्दित सा। एक धुन लगी रहती है उसे। वह खिल- सा जाता है कि कोई है जो पूरी कायनात में सबसे ज्यादा उसे चाहता है। यह चाहत उसे इतनी ताकत देती है कि वह सारी दुनिया से मुकाबला करने के लिए तैयार हो जाता है। यह जज्बा केवल और केवल मनुष्य के बीच पनपता है। किसी मशीन या जानवर ने अब तक ऐसे कोई संकेत नहीं दिए हैं। ... और सच पूछिए तो हमारे यहां इस जज्बे से निपटने के प्रयास अब भी मशीनी और कुछ हद तक जानवरों जैसे ही हैं। हमें कई बार इनका पता पुलिस से चलता है। हमारे यहां प्रेम प्रसंगों से पुलिस ही दो चार होती है। दो दिलों को समझने के सारे मामले पुलिस के सुपुर्द कर दिए जाते हैं।
ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं। कल यानी सोलह फरवरी को जयपुर के सभी अख़बार में दो ख़बरें हैं।  कैप्टन पति को छोड़ प्रेमी संग भागी और दूसरी एक हिन्दू स्त्री को बाद में पता चला कि उसका शौहर मुस्लिम है। परिजनों का आरोप है कि पहले आर्य समाज में उससे शादी की और फिर उसे धार्मिक साहित्य पढ़ने को दिया ताकि वह धर्म बदल ले। ये दोनों ही घटनाएं प्रेम खाते में पुलिस के हत्थे चढ़ीं। दरअसल, दोनों ही मामलों में हमारी सामाजिक वर्जनाएं सर उठाती नज़र आती हैं। पहले में जहां लड़की पर शादी का दबाव रहा होगा वहीं दूसरे में हिन्दू-मुस्लिम शादी को सामाजिक स्वीकृति न मिलना। लड़की का शादी के बाद धन और जेवर लेकर भागने और धर्म छिपाकर शादी करने की बात एक बड़े धोखे की ओर इशारा करती है और यही पुलिस केस बनने के लिए जरूरी है। हर प्यार तब ही रोजनामचे में एंट्री पाता है जब उस पर धोखे का लेप लगाया जाए। यह काम सदियों से होता आया है। अरेंज मैरिज को बचाने और प्रेम -विवाह को तोड़ने की कोशिश समाज के प्राथमिक कर्तव्यों में एक नज़र आती है। इस आग के दरिया में कई प्रेम जलकर भस्म हो जाते हैं और कुछ ही हंसते हुए बाहर निकलते हैं। यह दोनों की आपसी प्रतिबद्धता की जीत होती है।

फिर कहना चाहूंगी कि यह सुकून बहुत बड़ा है कि कोई है जो आपके वजूद को जरूरी मानता है। स्त्री होने के नाते कह सकती हूं कि एक स्त्री इस चाहत के दम पर पूरी उम्र गुजार सकती है। वह प्रवृत्ति और प्रकृति से ऐसी ही है. समय से परे मिलने की ख्वाहिश उसके भीतर कभी नहीं मरती.

सावित्री ले आई सत्यवान को छीनकर भगवान से...

अहिल्या सजीव हुई राम के स्पर्श से...

शंकुतला भी जी गई जंगल को दुष्यन्त की याद में ...

अर्जुन के लिए ही वरे द्रोपदी ने पांच पति...

मीरा भी समाई अपने कृष्ण में..

और सीता समा गई धरती में राम की बेरुखी पर।
क्योंकि स्त्री जानती है कि अपने प्रियतम के बिना वह सिर्फ पत्थर है। पत्थर जो केवल सतह पर ही दुनिया का असर लेता है। भीतर तो वही शून्य है जिसमें नृत्य करती हैं  वह और उसकी यादें।

16 comments:

वाणी गीत said...

बहुत अच्छा लग रहा है यहाँ पढ़कर ...जबकि सुबह पढ़ चुकी थी ...
भीतर वही शून्य है जिसमे यादें नृत्य करती हैं ...आपकी यादे हर बार मेरे अंतस को छू जाती हैं ...!!

हृदय पुष्प said...

"पत्थर जो केवल सतह पर ही दुनिया का असर लेता है। भीतर तो वही शून्य है जिसमें नृत्य करती हैं वह और उसकी यादें"
भावोत्कर्ष - रेखांकित करने के लिए और भी बहुत कुछ है आपके शानदार आलेख में.

डिम्पल said...

तुम्हारे आते ही भीग जाती हैं ये आंखें
इतनी शिद्दत से कोई नहीं आता मेरे पास
इसके बाद कुछ कहूँ तो बेमाया होगा...

abhishek said...

बहुत भावभीना,,

अशोक कुमार पाण्डेय said...

सहमत हूं आपसे
हालांकि मुझे लगता है कि मनुष्य (इसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हैं) अपनी प्रवृति से थोड़ा चंचल, एडवेंचरस और परिवर्तन प्रेमी होता है और सारे नैतिक नियम इसके उलट ज़िंदगी का प्रस्ताव करते हैं-- तमाम दिक्कतें इसी वज़ह से आती हैं।
और धोखे की बुनियाद पर खड़े रिश्ते का तो यही हाल होना है।

Kishore Choudhary said...

शेर बहुत खूबसूरत है.
और ये पंक्ति भी "यह सुकून बहुत बड़ा है कि कोई है जो आपके वजूद को जरूरी मानता है।"

दीप्ती जी सबकी चहेती रही हैं और उनका फोटो ऐसे दीखता है जैसे एक चेहरे में कोई बीस चेहरे समा गए हों. संजय जी को बधाई.

कुश said...

बात तो बड़ी गहरी कही आपने..

manav vikash vigyan aur adytam said...

bahoot achha laga

अविनाश वाचस्पति said...

बधाई। आग का दरिया शीर्षक से यह पोस्‍ट आज 25 फरवरी 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में प्रकाशित हुई है।

varsha said...

avinaashji
aapka bahut-bahut shukriya.

vineet said...

i read your piece in 'Jansatta' today & just felt like posting a comment as it was supremely simple yet profoundly deep column on the most pure aspect of life.hope to learn more from gems like u.my best,vineet

वृजेश सिंह said...

ek jindagi hai aapki is rachna me,aur beshak ye seedhe dil pe dastak deti hai aur kahti hai,ek hamsafar ka saath hone ka ehsas kitne rang bharta hai hamari jindagi ke canvaas par.happy holi aapko.

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

अच्‍दा लिखा, लेकिन हिंदू-मुस्लिम विवाह वाले मामले में जो खबर छपी, उसमें लड़की को 'पाकिस्‍तानी इस्‍लामी साहित्‍य पढ़ने के लिए मजबूर किया गया', यह वाक्‍य हजम नहीं हुआ। क्‍योंकि जहां तक मेरी जानकारी है, लड़की उर्दू नहीं जानती और पाकिस्‍तान में हिंदी में इस्‍लामी साहित्‍य नहीं छपता। यह हिंदी पत्रकारिता की गलती है, जो बिलावजह एक सीधे-सादे धोखाधड़ी वाले प्रेम प्रकरण में भी पाकिस्‍तान और इस्‍लाम को ले आए। बहुत गैर जिम्‍मेदार पत्रकारिता है यह। आपने इस पक्ष को क्‍यों छोड़ दिया।
जबर्दस्‍ती अरेंज्‍ड मैरिज को अब युवतियां नहीं स्‍वीकारेंगी, यह पहली प्रेमकथा का सार है। मैं उस लड़की के हौसले को सलाम करता हूं, जिसने धोखे से ही सही, वक्‍त मिलने पर अपनी राह चुनी।

प्रदीप कांत said...

फिर कहना चाहूंगी कि यह सुकून बहुत बड़ा है कि कोई है जो आपके वजूद को जरूरी मानता है। स्त्री होने के नाते कह सकती हूं कि एक स्त्री इस चाहत के दम पर पूरी उम्र गुजार सकती है। वह प्रवृत्ति और प्रकृति से ऐसी ही है. समय से परे मिलने की ख्वाहिश उसके भीतर कभी नहीं मरती.

यह बात एक स्त्री को ही नहीं वरन पूरे समाज को मानना चाहिये कि एक स्त्री की सहनशीलता और ताकत दोनो ही पुरुषों से कहीं ज़्यादा होती है।

varsha said...

shukriya dosto...yakeenan sare comments bahut achche hain.

ANKUR JAIN said...

adbhut...lajavab...