Thursday, January 21, 2010

मौत और ज़िन्दगी यानी दो नज्में



पिछले दिनों अनीसुर्रहमान सम्पादित 'शायरी मैंने ईजाद की 'पढ़ी जिसमें आधुनिक उर्दू शायरी का समावेश है. जीवन और अंत से जुडी दो कवितायेँ वहीँ से.


क्या करोगे ?

शाइस्ता हबीब

तुम मेरे मरने पर ज्यादा से ज्यादा क्या कर लोगे?
कुछ देर तक आंखें हैरत में गुम रहेंगी
एक सर्द सी आह तुम्हारे होटों को छूते हुए उड़ जाएगी
और तुम्हें कई दिनों तक मेरे मरने का यकीन नहीं आएगा

फिर एक दिन...
तुम अपने दोस्तों के साथ बैठै हुए
कहकहे लगा रहे होगे
मैं एक अजनबी आंसू की तरह तुम्हारे गले में जम जाऊंगी

और तुम...
तुम उस आंसू को निगलने की कोशिश में
सचमुच रो पड़ोगे
कि मैं वाकई मर गई हूं


 

यह मुहब्बत की नज़्म है

जीशान साहिल


इसे पानी पे लिखना चाहिए
या किसी कबूतर के पैरों से बांध कर
उड़ा देना चाहिए
या किसी खरगोश को
याद करा देना चाहिए
या फिर किसी पुराने पियानो में
छुपा देना चाहिए
यह मुहब्बत की नज्म है
इसे बालकनी में नहीं पढऩा चाहिए
और खुले आसमान के नीचे
याद नही करना चाहिए
इसे बारिश में नहीं भूलना चाहिए
और आंखों से  ज्यादा करीब नहीं रखना चाहिए






                                       

22 comments:

रंजना said...

WAAH .....DONO HI KHAYAAL KHOOBSOORAT HAIN !!!

निर्मला कपिला said...

दोनो कवितायें एक से बढ कर एक है। इन्हें पढवाने के लिये शुक्रिया।

dipayan said...

बहुत सुन्दर है दोनो कविताऐं, खासकर, पहले वाली तो दिल को छूं गयी. धन्यवाद.

पारूल said...

और तुम...
तुम उस आंसू को निगलने की कोशिश में
सचमुच रो पड़ोगे..

बहुत अच्छे..

Kulwant Happy said...

सुंदरम, सुंदरम, सुंदरम, सुंदरम,

डॉ .अनुराग said...

दूसरे वाली बेमिसाल है ........

dimple said...

क्या करोगे ?
सही ही तो है कोई किसी के चले जाने पे क्या कर पता है
तुम मेरे मरने पर ज्यादा से ज्यादा क्या कर लोगे?
या मेरे दूर जाने से?

कुछ ही दिनों में फिर महफिले,कहकहे,मगर अपने अपने मकाम पर कभी तुम नहीं कभी हम नहीं.
और तुम्हें कई दिनों तक मेरे मरने का यकीन नहीं आएगा
यकीन आता भी नहीं जो दिल में रहते है उनके जुदा होने का यकीन नहीं हो पता.

मुहब्बत की नज़्म है पे अभी चुप हूँ के अभी क्या करोगे से उभरी नहीं हूँ.

Kishore Choudhary said...

शाइस्ता हबीब और जीशान साहिल दोनों की नज़्में उम्दा है. मुझे जाने क्यों हमेशा ग्रे शेड्स और उनसे उपजे अवसाद भरे अनुभव आकर्षित करते रहते हैं. इन दोनों नज़्मों में वह सब नहीं है फिर भी पहली नज़्म को मैंने अपने करीब फील किया है. साहिल की नज़्म में मुझे की गयी जादूगरी दिखाई दी गोया कि कोई बुद्धिमान होने का सबूत देने के लिए लफ़्ज़ों को चबा चबा कर बोलता हों. आपका साधुवाद कि आज के दौर में हर कोई सबकुछ नहीं पढ़ सकता तो वह दोस्तों से अपेक्षा करता है कि कुछ अच्छा पढ़ा सुना हों तो शेयर करे.

अपूर्व said...

गज़ब..ऑसम..क्या कहूँ..जादू ऐसा सर चढ़ के बोला कि फ़र्क करना मुश्किल रहा कि किसका जादू ज्यादा चढ़ा..क्या सच जिंदगी इतनी दिलकश और मौत इतनी दिलफ़रेब होती है..पता नही!
....और आँखों का क्या जुर्म है जो बिछोह का आँसू गले मे जम जाता है तो मुहब्बत की नज़्म आँखों की सोहबत से बिदकती है..
..इस किताब को खोजना अब मेरी लिस्ट मे शामिल हो गया है..

वाणी गीत said...

जीवन और मृत्यु ...दोनों ही अवश्यम्भावी ...जिन पर इंसान का कोई वश नहीं ....
रोने वाले भी रोते रोते थक जाते हैं ...आखिर एक वक़्त के बाद आंसू भी सूख जाते हैं ...!!

चेतना के स्वर said...

didi! bahut hi achchhi nazm hai

job ke karan bahut si mauten dekhi hai to sangharsh karti zindgiyan bhi. philosophy ka student hoon isliye zindgi or maut ke bare me padha to bahut hai. par umra ke hisab se na to zindgi ko jee nahin paya hoon or na maut ke ghamon ka ehsas kar paya hoon. par meri maan aksar kahti hai "beta! zindgi maut ki amanat hai. ise jaise bhi jiyo par aaine ke aage khade hokar khud ko jawab na de sako aisa kaam kabhi mat karna." shayad nahin nishchit yahi sach hai kyonki yah baat meri maan kahti hai. unke kahe ke aage meri sari philosophy fail hai.

aapka collection bahut achchha hai or blog par likhne ka salection bhi.

achchha lagta hai aapko padhkar or aapka blog dekhkar. usse bhi achchha lagta hai aapko comment karke or nishchit aapko didi ka sambodhan dekar bhi.

sadar
pradeep

प्रदीप कांत said...

इसे पानी पे लिखना चाहिए
या किसी कबूतर के पैरों से बांध कर
उड़ा देना चाहिए
या किसी खरगोश को
याद करा देना चाहिए

__________


नज़्मे अच्छी हैं।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

दोनो कवितायें अच्छी लगीं. "क्या करोगे?" से जुड़ पाना सहज है. शुक्रिया!

अशोक कुमार पाण्डेय said...

एक लाईन में कहूं वर्षा जी-- तो अद्भुत!

एक अजीब सी रुमानियत जो भीतर तक भिगों जाती है

sanjay vyas said...

उम्दा है!

Abhinav Sabyasachi Paul said...

kya baat hai!

cartoonist ABHISHEK said...

ye rachnayen umda hen...
behad prabhavshaali
rachnakaaron ko salaam....

Fauziya Reyaz said...

behad emotional...but hi khoobsurat

varsha said...

shukriya doston...
ajeeb dastan hai ye zindagi bhi mohabaat to mout bhi mohabbat...jaane kahan se shuru hoti hai aur kahan khatm.

Arun Aditya said...

ये नज्में पढ़कर मुहब्बत, जिंदगी और मौत पर 'फ़ैज़' का एक शे'र याद आ गया।
मकाम 'फ़ैज़' कोई राह में जंचा ही नहीं,
जो कूए-यार से निकले तो सूए-दार चले।

कुश said...

मोहब्बत की नज़्म तो पहले पढ़ चुका हूँ.. शायद आहा ज़िन्दगी में पढ़ी थी..

पर पहली वाली ने तो रौंगटे खड़े कर दिए.. ऐसे शायरों से परिचय होता रहे.. तो सुकून रहे..

Parul said...

sir..aapka jawaab nahi...