Sunday, January 3, 2010

सुबह चांदनी मिली




नए साल की पहली सुबह जब आँख खुली तो चांदनी मिली . पूरे चाँद की चांदनी. २००९ के ही चाँद की चांदनी. ज़ाहिर है सूरज की पहली किरण से हम रूबरू नहीं हो सके . ऐसी ही एक सर्द सुबह रणथम्भौर की थी जब शेर के दर्शन को तरसती आँखों के साथ हम कैंटर में सवार हुए .जिन्होंने भी जंगल सफारी का आनंद लिया है वे समझ सकते हैं की जंगल के राजा का दिखना क्या होता है. इस सफारी में हमें एक ऐसा नायाब पक्षी मिला जो आपके सर पर आकर बैठ जाता है.. और जब वह उड़ जाता है तो लगता है सारा अनर्गल हर ले गया. सर्दी में ठिठुरायी   पोस्ट १ जनवरी २००९ की डायरी से.

आते और जाते साल के संगम के दौरान मानस पर जो अंकित हुआ वही साझा कर रही हूं। रणथम्भौर के एक होटल में डीजे पर सारे गेस्ट थिरक रहे हैं। काळयो कूद पड्यो मेला में .. से लेकर ब्राजील... पर क्या गोरे क्या काले खूब ताल मिला रहे हैं। होटल क्या है पूरा-पूरा बाघालय है। फर्नीचर, क्रॉकरी, चादर, पर्दों पर, यहां तक कि तस्वीरों में भी बाघ  ही हैं । इतने बाघ यहां है तो जंगल में क्या आलम होगा। यही सोचकर परिवार खासकर उसमें शामिल बच्चे बेहद उत्सुक थे। 31 दिसंबर की पार्टी के बाद सुबह छह बजे जंगल सफारी पर जाना था। खुले केंटर में भीषण सर्दी का प्रकोप शरीर को सुन्न किए जा रहा था। टूरिस्ट रजाइयां लेकर ही केंटर में चढ़ गए थे। पूरी रफ़्तार से बाघ की तलाश शुरू हो चुकी थी। ढाई घंटे की सफारी में बाघ के पदचिन्ह देखते-देखते ऊब ही रहे थे कि ......बाघ दिखा या नहीं अभी रहस्य है।
एक बात रणथम्भौर यात्रा में शिद्दत से महसूस हुई कि टूर आयोजक गोरे-काले टूरिस्ट में फर्क करने लगे हैं। सफेद चमड़ी वाले सैलानी उन्हें ज्यादा अपील करते हैं। देसी सैलानी उन्हें कम समझदार, कुछ ज्यादा ही मितव्ययी और बेकायदे के लगते हैं।
बहरहाल, देवकिशन गुर्जर उर्फ़ देवा की चर्चा के बगैर यह ब्यौरा अधूरा रहेगा। वह ट्रेवल टेक्सियों का ड्राइवर है। उम्र छब्बीस की । पिछले नौ सालों से सैलानियों को राजस्थान की सैर करवा रहा है। किसी अच्छे ढाबे पर भोजन के लिए गाड़ी रोकने की बात सुन देवा ने एक जगह फोन लगाया। दाल बाटी चलेगी साब...। सब बेहद खुश हो गए। गाड़ी जयपुर की दिशा में बढ़ रही थी। देवा ने यकायक गाड़ी कच्चे में मोड़ दी। कीचड़ सनी सड़के देख कुछ समझ न आया। थोड़ी ही देर में हम एक कच्चे लेकिन सुंदर घर के सामने थे। दीवारों पर गेरु और खड़ी से चिड़िया और मांडने उकेरे हुए थे। गाड़ी को गांव के बच्चों ने घेर लिया था। भीतर जा कर हम फिर खुले में थे। आंगन में नीम का पेड़ था।
देवा की पत्नी जिसका नाम सुशीला था, पूरियां तल रही थी। घूंघट इतना लंबा था कि कुछ भी समझना मुश्किल। कनखियों से जब वह बार-बार देवा को देख रही थी तब ही उसका सुंदर मुखड़ा दिखाई दिया। बहुत-बहुत रोशन चेहरा । देवा के माता-पिता इतने प्रसन्न मानो कोई बरसों पुराना परिचित घर आ गया हो। इतनी जल्दी में पू़ड़ी ही बना सके। पिता ने सकुचाते हुए कहा। दूसरे चूल्हे पर कच्ची हांड़ी चढ़ी मूंग और चने की दाल की सौंधी महक पूरे माहौल में थी। पास ही बंधी गाय-भैंस परिवार का हिस्सा मालूम होती थीं। देवा और सुशीला अब भी कनखियों से ही निहार रहे हैं।  भोजन,बातचीत में भी दोनों आमने-सामने नहीं हुए। यह देवा का गांव था। सूंथड़ा जिला टोंक। आबादी तीन-चार हजार। दो स्कूल, एक डिस्पेंसरी है लेकिन डॉक्टर कभी कभार ही मिलता है। पानी की परेशानी है। कई बीघा जमीन है जिसमें सरसों बोया है। पानी की कमी से सरसों भी कमजोर पैदा हुई है। भोजन के बाद पिता ने चाय का आग्रह किया। सब ने हां कहा लेकिन शायद चाय पत्ती खत्म थी सो दूध परोसा गया। दूध न पीने वाले भी गाय का ताजा दूध पीने से खुद को रोक नहीं पाए। आंगन के उस नीम से लेकर जिसे देवा के परदादे ने बोया था,सब कुछ बेहद अपनत्व भरा मालूम होता था। इतना अपना कि पर्यटन पर छाई पूरी व्यावसायिकता को लील गया।
रणथम्भौर के सूखे जंगलों में तेज गति से दौड़ते केंटर में बाघ की तलाश जारी थी। वहां बयालीस बाघ हैं। होटलों और रिसोर्ट तक में नजर आ जाते हैं। खैर बाघ नहीं दिखा। अफसोस इस बात का है कि बाघ की आस में हिरण ,साम्भर और रंगीन चिड़ियाओं से भी ठीक से मुलाकात नहीं हुई। शायद अगले ट्रिप में। पिछले अक्टूबर 2008 में अलवर के समीप पांडूपोल में ऐसे ही एक लेपर्ड अनायास सामने आ गया था। रणथम्भौर में जंगल किंग न मिला हो लेकिन सूंथड़ा गांव में जो मिला वह ताउम्र मानस पर छपा रहेगा। नए साल की इससे बेहतर मेजबानी और कहीं नहीं हो सकती।
ps: आज सुबह से जयपुर भीग रहा है मावठ की बूंदों में ...

17 comments:

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

यात्राएं ऐसे संस्‍मरण और प्रसंगों से यादगार बनती हैं। अक्‍सर लोग उन आम लोगों को भूल जाते हैंजो हर सफर को बेहद खूबसूरत बनाते हैं। आपने देवा की चर्चा कर बहुत अच्‍छा किया। सुंदर संस्‍मरण के लिए बधाई, नववर्ष की शुभकामनाएं।

रावेंद्रकुमार रवि said...

नए साल में आपको बेहतर मेजबानियाँ ऐसे ही मिलती रहें!

नया वर्ष हो सबको शुभ!

जाओ बीते वर्ष

नए वर्ष की नई सुबह में

महके हृदय तुम्हारा!

Apoorv said...

हमारी दादी जी बताती थीं कि अगर नीलकंठ अगर सर पे बैठ जाये तो तमाम मुश्किलें हर लेता है..हमारे सर पे तो उसका साया नही पड़ा मगर उसे याद करना अच्छा लगा..यह चित्र देख कर..
इन्क्रेडिबल इंडिया की वास्तविक हास्पिटलिटी करोड़ो के एडवर्टाइजमेंट्स और लाइमलाइट से परे सूथड़ा गांव जैसी अयाचित और अप्रत्याशित जगहों पर ही जिंदा है..
अनुभव को बांटने के लिये शुक्रिया

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

एक नए साल की इससे अच्छी शुरूआत क्या हो सकती है? नववर्ष की हार्दिक बधाइयां!

Udan Tashtari said...

अच्छा संस्मरण रहा. नव वर्ष शुभ रहे.

Kishore Choudhary said...

असीम इच्छाएं यूं कभी एक साथ मिली नहीं, बस ऐसे ही छोटे छोटे टुकड़ों में ही खोजना पड़ा है. ये गुलगुले चेहरे पर पर बैठा पंछी तो एक बहाना है सच तो है कि आपका मन किस से मुक्त होना और किस से जकड़ा रहना चाहता है वही होता है. तस्वीर बहुत सुंदर लग रही है और उसके अभिप्राय को जानने के बाद तो और अधिक सुंदर.
आंगन के उस नीम से लेकर जिसे देवा के परदादे ने बोया था,सब कुछ बेहद अपनत्व भरा मालूम होता था। इतना अपना कि पर्यटन पर छाई पूरी व्यावसायिकता को लील गया।
आपके इस ओबजर्वेशन पर मैं चित्त हो जाता हूँ और भी कुछ बातों के लिए बधाई देने को जी चाहता है. बधाई.

वाणी गीत said...

नव वर्ष पर आपका यह संस्मरण रोचक रह रहा ..
किसी फाईव स्टार होटल में मनाई गयी नव वर्ष की पूर्व संध्या क्या इतनी खुशनुमा हो सकती थी ....!!

अशोक कुमार पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर तस्वीरें

नया साल आपको बहुत-बहुत मुबारक़

चेतना के स्वर said...

aadarniya didi!

aapne bahut achchhi post likhi hai. man ke bhaw ythesht roop me ukerna bahut pasand aaya. kya neelkanth wala photo aapka hai?

aapne maulikta ki bahut achchi bat likhi hai. sarkari prayas aankdon tak simat kar nahi rahne chahiye. iske liye yatharth par utar kar kam karna hoga.


or han! ek information aapse sheyar karna jaroori samajhta hoon. naye sal me is "ladkhadati lau" ko patrika ne "shahid mirza Beuro campen award" me teesra award diya hai.
teesre sthan ki jagah award ka nam mahattwapoorn hai. itne bade or ek aadarsh patrakar ke nam ka award jeewan me safaltaon ke rang jaroor gholega. esa mujhe vishwas bhi hai or mere prayas bhi.

banawat ke rang jab andhere ki or jate hain.
chetna ke swar hum ujale ki or late hain.


Happy New Year and my best and glorious wishes for ur's ambitious life.

with regard
pradeep

कुश said...

हमने भी सोचा था रणथम्भोर जायेंगे.. पर जा ही नहीं पाए.. :)

cartoonist ABHISHEK said...

badhayee...

cartoonist ABHISHEK said...

apne blog par photo ko jagah dene ke liye aabhaar

प्रदीप कांत said...

रोचक.......|

Ek ziddi dhun said...

Lagta hai BAGH sirf tasveeron men hi rahe honge.
apke saath hamen bhi shabdon ke jariye safar par le jaane ke liye shukriya

sandeep sharma said...

खूबसूरत संस्मरण है मैम,
आपने न्यू इयर एन्जॉय तो कर लिया, हम तो बस उसी फटीचरी में लगे रहे...

Unseen Rajasthan said...

Beautiful post !! Explanation of the season is really fantastic !! Wish you a New Year full of Fun and enjoyment !!

Prerna said...

wah! wah! kya baat hai..