Wednesday, November 17, 2010

बंदिनी की कविता और बिंदासी का आतंक

आंग सान सू की  और राखी सावंत। इन दो स्त्रियों में कोई  जोड़ नहीं, कोई समानता नहीं। एक फख्र तो दूसरी फिक्र। एक दो दशक तक नजरबंद रहकर भी अर्श पर तो दूसरी आधे दशक से अपनी देह और शब्दों से चीखते रहने के बावजूद फर्श पर। क्या पब्लिसिटी और काम पाने की लालसा के मायने यही रह गए हैं कि जितनी बकवास कर सकते हो, करो। सामने बैठे को रौंद दो अपनी जहरबुझी जुबां से। एक कम पढ़ी-लिखी कुंठित स्त्री चैनल और टीआरपी के खेल में किस कदर इस्तेमाल हो सकती है, इसकी मिसाल है राखी सावंत। सलाह दी जा सकती है कि मत देखो। अव्वल तो यह कुतर्क है। आदिम युग से ही देखने और बोलने की चाहत रही है इनसान की। यह अनंत और अराजक है। भाषा और देह की मर्यादा गढऩे की जरूरत भी तभी से महसूस हुई होगी।

आज इस दौर में सब ताक पर है। विध्वंस मचा रखा है इन चैनलों ने। कलर्स के बिग-बॉस को सुहागरात बेचकर टीआरपी कमानी है। इमेजिन को नपुंसक कहकर मार डालना है, बिंदास टीवी को ‘चक्करों’ का भंडाफोड़ दिखाना है, सोनी को कॉमेडी सरकस  में भद्दे इशारों के साथ द्विअर्थी सवांद बोलने हैं। जिंदा इनसानों के बीच इस कसाईनुमा आचरण की पैरवी कौन कर रहा है?
देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी आती थीं ‘आपकी कचहरी’ लेकर। जाति मसलों, क्रूरता पर बात उसमें भी होती थी, लेकिन बात कहने का सलीका होता था। एक मानसिक तौर पर परिपक्व और संयत व्यक्तित्व का तरीका। पत्नी से देह व्यापार करवाने वाले पति से लेकर क्रूर सास तक के बारे में उन्होंने कचहरी का फैसला सुनाया। यहां तो इंसाफ करने वाली राखी खुद अपने ही जीवन में अनिर्णय की शिकार हैं । जो भी करती हैं , उस पर खुद  का ही यकीन नहीं। चैनल पर शादी भी रचाई। टीआरपी तो बढी़, शादी रसातल में चली गई। सदियों पुरानी स्वयंवर की अवधारणा को चूर-चूर कर स्वयं कहीं पहुंच गईं और वर कहीं। दरअसल, ये चैनल ऐसे अपराध रच रहे हैं, जो कानून की सीमा-रेखा से बहुत परे हैं। एक समूची पीढ़ी को वे पथभ्रष्ट कर रहे हैं। हम मध्यमवर्गीय परिवारों ने जिस टीवी और केबल कनेक्शन को अपनी बैठक का अनिवार्य हिस्सा बना रखा है, उससे मुक्त होने  का  वक्त आ गया है। वरना विदेशी तर्ज पर स्त्री-पुरुष के अंतरंग दृश्यों को देखने के लिए तैयार रहना होगा । वहां ऐसा रिएलिटी शो चल रहा है और यह सब होगा  प्राइम  टाइम पर। देर रात और प्राइम टाइम का फर्क मिटा दिया है इन चैनलों ने. बिग बॉस में हालीवुड से पामेला को लाकर इन्होने अपने इरादे भी ज़ाहिर कर दिए हैं. मार्केट से पैसा उगाना है. गोरी देह रास्ते आसान करती है  और तो और कार्टून्स तक में बच्चों को बहलाया और बहकाया जा रहा है। वाकई केबल नाम के वाइरस के उठावने का यही सही समय है।
बात पड़ोसी देश की महान स्त्री की। आंग सान सू की [६५] को रिहाई मिल गई है। अपने बच्चों से दूर सू के पास कोई फोन ,इन्टरनेट नहीं था. पति का केंसर से देहांत[१९९९] हो चुका है और  बेटों को बर्मा आने की इजाज़त नहीं थी. म्यांमार (बर्मा) को अंग्रेजों से आजाद कराने वाले आंग सान की बेटी बर्मा को सैनिक शासन से मुक्त करा वहां लोकतंत्र के बीज रोपना चाहती हैं।   नोबल शांति पुरस्कार विजेता के लिए यह आसान नहीं, क्योंकि दुनिया के ही दो रवैए हैं। स्वशासी चीन तमाम प्रतिबंधों से मुक्त, जबकि बर्मा जकड़ा हुआ। हाथ, गले और बालों में फूल सजाए सू की उम्मीद जिंदा है। कभी पिआनो से गहरा नाता रखनेवाली  सू की एक कविता


मेरा घर...


जहां मैं पली-बढ़ी
बेहद खूबसूरत व अपना था
अब वहां अंधेरा व दहशत है।


मेरा परिवार...

जहां मेरा वजूद बना
बेहद खुश और जिंदा था
आज वहां भय और आतंक है

मेरे दोस्त ...


जिनसे मैंने जिंदगी साझा की
बेहद पवित्र और मस्त थे
अब टूटे दिलों से जी रहे हैं।


एक आजाद पंछी...


जो अभी-अभी आजाद हुआ है
कैद से
अब उड़ रहा है
अपनी प्रिय जगह के लिए
जैतून की डाली के साथ
आजाद पंछी आजाद बर्मा की ओर।

मुझे क्यों लडऩा पड़ रहा है?

Friday, October 8, 2010

आशंकाओं का जनाज़ा

बीता सप्ताह हर   हिन्दुस्तानी को  फ़क्र से भर गया, वह भी तब जब वह सबसे ज्यादा आशंकित था .३० सितम्बर  और ३ अक्तूबर की तारीख केवल तारीखभर नहीं बल्कि हमारी नज़र और नज़रिए का विकास है. इन दोनों ही घटनाओं को द हिन्दू  के कार्टूनिस्ट केशव की नज़रों से देखना भी दिलचस्प होगा . अयोध्या फैसले के बाद उन्होंने दो पंछी बनाये जो एक पतली-सी डाली को साझा किये  उड़े  जा रहे हैं और राष्ट्रमंडल  खेलों के उद्घाटन समारोह के बाद एक मस्त हाथी जो आशंकाओं के गुबार को  पीछे छोड़ अपनी मतवाली चाल से चला जा रहा है .
बेशक इस भव्य समोराह ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया है. भारत का समूचा वैविध्य इन तीन घंटों में ऐसे सिमटा जैसे एक रंगीन दुनिया जादू के पिटारे में. कितने खूबसूरत हैं हम. कितना सौंदर्य भरा पड़ा है हममें. इंग्लॅण्ड के अखबार ने लिखा कोई कुत्ता बीच में नहीं आया कहीं ध्वनि नहीं टूटी और कोई बिजली गुल नहीं हुई यानी कि  यही सब अपेक्षित था .
फ़र्ज़ कीजिये अगर समारोह फीका -फीका सा रहता और भारत के बजाय  इंडिया झांकता  तो? बतौर भारतवासी  हम कैसा अनुभव करते?  इतने बड़े आयोजन किसी एक व्यक्ति की बपौती नहीं होते,पूरे मुल्क का  सम्मान जुड़ा रहता है इससे. विदेशों में बसे भारतीय इसी रौशनी में देखे जाते हैं. कॉमन वेल्थ  के नाम पर एतराज़ हो सकता है. विक्टोरिया बैटन पर भी लेकिन खेलों पर नहीं. मैडल यहाँ भी परिश्रम के हक़ में ही हैं और हर खिलाड़ी कसौटी पर. हमारे प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु की अगुआई में बना था निर्गुट देशों का  समूह यानी वे देश जो किसी गुट में नहीं थे . अच्छा लगता था स्वाभिमान से भरे राष्ट्राध्यक्षों को देख. यासिर अराफात इंदिरा गाँधी को 'ग्रेट सिस्टर' कहकर मिलते तो क्यूबा  के फिदेल कास्रो उन्हें गले लगाकर बधाई  देते. अब कोई निर्गुट सम्मलेन नहीं होता. नष्ट हो गया सब कुछ. सार्क [दक्षिण  एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन] की भी साँसे टूट गयीं. पड़ोसी देश साथ बैठकर बातें करते तो दक्षिण एशिया  की समस्याओं के पैर उखड़ जाते.
बात अयोध्या फैसले की. इस दिन हमारा मुल्क जीता है.अमन चैन की जीत हुई है नेताओं के बयान सींग तान कर आ रहे हैं और औन्धे   मुंह गिर रहे हैं. हर पार्टी अब खम्बा नोचती दिखाई दे रही है. कोई भव्यता की बात करता है तो सरकार में बैठा ढांचा गिरानेवालों को सजा दिलाने की तो किसी को एक तबके की सारी दुआएं आज ही ले लेनी हैं. इन सबमें उपर खड़े नज़र आते हैं मोहम्मद हाशिम अंसारी. नब्बे वर्षीय अंसारी इस मामले में सबसे पहले याचिका  दायर करनेवालों में हैं . वे कहते हैं 'मेरे लिए यह अध्याय बंद है. हिन्दुओं को राम मंदिर बनाने की इजाज़त मिल जानी चाहिए,' मैं  मुस्लिम नेतृत्व से गुज़ारिश  करूँगा कि मुद्दे को समाप्त किया जाये और सुप्रीम कोर्ट न ले जाया जाए.' इस उदारता की जवाब किसी भी ओर से नहीं आया है, उलटे उन्हें जान से मार देने कि धमकी ज़रूर मिल गयी है. आशंकाओं का जनाज़ा अभी उठा नहीं है  शायद.  

Friday, September 17, 2010

आज मकबूल फ़िदा हुसैन की सालगिरह है


बीस साल पहले जब कलाकारों के समूह 'फनकार' ने मकबूल फ़िदा हुसैन को इंदौर बुलाया तो पूरे शहर ने बंदनवार सजाये. तब हुसैन 75 के थे.ख्यात पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा ने तब उन पर एक लेख लिखा. आज जब हुसैन 95 के हो रहे हैं पेश हैं उन झलकियों की झलक .हुसैन खुद को देश निकला दे चुके हैं और इन दिनों क़तर में हैं. इस मुबारक दिन इन पचड़ों में न पड़ते हुए हुसैन का स्केच शाहिद मिर्ज़ा की कलम से





art attach not attack: makbool fida hussain
                         and shahid mirza  image: ramesh pendse                              
    

सचमुच मकबूल फ़िदा हुसैन पर लिखना बहुत मुश्किल काम है, क्योंकि जो भी आप लिखेंगे,यकीन मानिये हुसैन अपनी रचनात्मक ऊर्जा से उसे पुराना, प्राणहीन और निष्प्रभ कर डालेंगे. सारे मास्टर पेटर्स ने यही किया है, फिर भले ही वे पश्चिम के वान गौफ़ हों, रेम्ब्रां हों, पॉल  क्ली हों या फिर हमारे इंदौर की छावनी और पारसी मोहल्ले के हुसैन ही क्यों न हों. फ़िदा हुसैन उनके पिता का नाम है, जो पंढरपुर से १९१७ में इंदौर आये थे और आज सारा ज़माना 'फ़िदा नंदन' पर दिलो-जान से फ़िदा है, निसार है . अनजाने ही फ़िदा हुसैन अपने बेटे का नाम मकबूल[लोकप्रिय] रख गए हुसैन की लोकप्रियता का आलम यह है कि दुनिया के   चारों  कोनों में आज एक भी आर्ट गलेरी नहीं जहाँ हुसैन के चित्र अनिवार्यतः सहेज कर  रखे नहीं गए हों . हुसैन   की कृतियाँ लाखों  रुपये में धड़ल्ले से बिक रही हैं . असल तो असल कला बाज़ार के लोगों ने नक़ल तक बेच डाली है और हुसैन को जैसे इन सबसे कोई मतलब ही नहीं. बाज़ार की मांग  और फैशन के अनुरूप उन्होंने कभी चित्र रचना नहीं की , न पहले,जब उन्हें कम लोग जानते थे न अब जब सारा ज़माना उन पर  फ़िदा है.

हुसैन ने  नौ  बरस की  उम्र  में अपना पहला चित्र बनाया था, इंदौर में. मुर्गी और उसके बच्चे.धोती पहने मारवाड़ी सेठ भी उनके आरंभिक कामों में है. छावनी में रामलीला हुसैन ने भी देखी. उन्हें धीरोदात्त राम और उछलकूद करनेवाले हनुमान आकर्षित करते थे सीता माता की क़ुरबानी का अहसास भी उन्हें था. बाद में अपने दोस्त समाजवादी विचारक डॉ राम मनोहर लोहिया ने उनसे अनुरोध किया कि वे रामकथा पर चित्र रचना करें. साठ के दशक में हुसैन ने बाकायदा तुलसी बाबा को पढ़ा,और वाल्मीकि-कृत रामायण का अध्ययन किया

हुसैन और स्त्री

हरेक इंसान कि तरह हुसैन ने भी प्रेम किया है, प्रेम-पत्र भी लिखे हैं लेकिन स्त्री के प्रति हुसैन का रवैया एक दार्शनिक का रवैया है. हाँ अफलातूनी नहीं. स्त्री और हुसैन का रिश्ता संवेदनशील, गहरा और तलस्पर्शी है. स्त्री उनके दिल-दिमाग और सोच में दाखिल है. भारतीय दार्शनिक-पौराणिक सिलसिले पर चलते हुए हुसैन भी औरत को शक्तिरूपा [दुर्गा] मानते हैं. इंदिरा गाँधी से लेकर सोनल मानसिंह तक विदुषी स्त्रियों से हुसैन का गहरा और नजदीकी रिश्ता रहा है और इन्हें हुसैन ने बहुत तन्मयता के साथ आँका है. सीता और द्रौपदी के बहुत अलग किस्म के अंकन भी उनके यहाँ मिलेंगे. माँ टेरेसा पर उन्होंने एक चित्र श्रंखला रची है .हिस्से कि अपनी माँ तब चल बसी थी जब वे महज डेढ़ साल के थे  पिता ने एक और विवाह कर लिया था अपनी दोनों मतों के अंकन उन्होंने किए  हैं. देवराला के सती प्रसंग पर उन्होंने खुद को स्त्री के पक्ष में खड़ा किया था . हुसैन ने डकैत फूलनदेवी को भी चित्रित किया और ऐसी स्रियाँ भी एकाधिक हैं जिन्हें नजदीकी दोस्ती के चलते हुसैन ने बार-बार चित्रों में ढाला है . हुसैन हर हाल में औरत के साथ इन्साफ के पक्षधर हैं और ऐसा किसी फेमिनिस्ट आन्दोलन के दबाव में नहीं,बल्कि उसके बरक्स है.


 मेरे बरक्स इस दिन बस एक ही आवाज़ गूंजती है बाबा..
योम ए पैदाइश मुबारक हो ......

Thursday, September 2, 2010

ईट-प्रे-लव

आराधना, भक्ति, वंदना, स्मरण जो नाम दीजिए, आशय एक  जगह पहुंचने से है, जहां शांति हो, सुकून हो। मकसद चित्त को एकाग्र करने से है। तो क्या बार-बार श्रीकृष्ण जपने से मन शांत हो जाता है या फिर पूजा-पाठ की तमाम विधियां मन को राहत देती हैं? हालांकि  भक्ति को विभक्त ·करना निरी मूर्खता होगी, लेकिन इसके दो प्रकार तो हैं ही। एक तो हमें बचपन से ही सिखा दी जाती है कि सुबह-शाम पवित्र होकर ईश्वर के आगे दीप प्रज्ज्वलित करो और आरती गाओ। या फिर वक्त निर्धारित कर दिए जाते हैं कि इस दिशा में बैठकर इसी मुद्रा में प्रार्थना ·करो। तरीके हमें विरसे में मिलते हैं और हम सब अपने-अपने मौला को याद करते हैं। फिर  दूसरे किस्म की भक्ति क्या है? किसी ऐसे को याद करना, जिसके लिए दुनिया ने आपको कोई निजाम नहीं दे रखा। वह आपके भीतर समाता चला जाता है। आपको वह वक्त से याद नहीं आता। सुबह-शाम, दिन-रात की मर्यादा से परे वह बस आ धमकता है। यह भक्ति उसके लिए है, जिसके लिए आपके भीतर स्वीकार्य भाव है।

श्रीकृष्ण के लिए वैसा ही स्वीकार्य भाव द्वापर युग से चला आ रहा है। मोर मुकुट, बंसी, पीतांबर और मोहक मुस्कान धारण करने भर से कोई किसी की भी तरफ खिंच जाता है क्या? नहीं, वह आसक्त होता है उस समभाव पर, जहां उसे लगता है कि वह निडर है। सबकुछ कह सकता है। वह अभय और अपनापन  कान्हा देते हैं। वह खुलने देते हैं व्यक्ति को परत-दर-परत। सुनते हैं उसकी। सख्त नहीं होते, क्योंकि सख्त होते ही व्यक्ति रास्ता बदल लेता है। व्यक्ति प्रवृत्ति से वहां जाना चाहता है, जहां कोई उसकी सुने, कोई उसे समझने वाला हो। कृष्ण भक्त को यही सब सहज उपलब्ध कराते हैं। कंस की एक दासी थीं कुब्जा. बेहद कुरूप. कान्हा ने उसे आभास कराया कि तुम सुन्दर हो. वह कुब्जा जो कंस के लिए चन्दन का लेप बनाते-बनाते भूल चुकी थी कि प्रेम पर उसका भी हक़ है. यह हक़ और इच्छा कृष्ण ने कुब्जा में उपजाई.रूप-अरूप का भेद तो यहाँ मिटता ही है वर्ग का भेद भी नहीं नज़र आता.

दरअसल महर्षि वेदव्यास रचित ग्रंथ ‘महाभारत’ स्वत: ही कानों पर हाथ रखवा लता है, क्योंकि  किसी भी रचयिता के  लिए इतने पात्रों को साधना अत्यंत असाधारण काम है। इस ग्रंथ ·को भले ही घर में रखने पर पाबंदी की बात कही जाती हो, लेकिन मानवीय गुण-दोषों का जीवंत दस्तावेज है यह। रामायण और महाभारत दोनों ही ग्रंथ हम भारतीयों को दुनिया में अलग और खास बनाते है । परिष्कृत भारतवासी। काल-खंड ·को दर्ज करने की कितनी समृद्ध परंपरा से आते हैं हम। इन ग्रंथों का असर भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर भी है।

अमेरिकन एलिजाबेथ गिलबर्ट ने ‘ईट प्रे लव’ नाम से एक· उपन्यास लिखा है। ईट से इटली, प्रे से भारत और लव से ताल्लुक इंडोनेशिया का है। ईट और लव के लिए दुनिया का कोई भी मुल्क चुना जा सकता है, लेकिन प्रे के स्थान पर भारत के अलावा कुछ भी नहीं रखा जा सकता। अध्यात्म और इबादत का भारत, जहां आकर इकतालीस वर्षीय इस लेखिका ने भारतीय दर्शन को समझा कि रुद्राक्ष की माला में 108 मनके क्यों होते हैं और एक मनका अकेला क्यों छोड़ा जाता है? उपन्यास के कवर पर ईट नूडल्स से, प्रे रुद्राक्ष से और लव फूलों की पंखुरी से लिखा गया है। बेस्ट सेलर उपन्यास पर आधारित फिल्म में जूलिया रॉबट्र्स नायिका हैं। फिल्म बहुत पसंद की जा रही है और तो और शूटिंग के दौरान जूलिया को भारत से इतना अनुराग हो गया है कि उन्होंने हिंदू धर्म  अमल में लाना शुरू कर दिया है।

बहरहाल, वसुधैव कुटुंबकम की महान अवधारणा वाले भारत के अपने हिस्से  विखंडन की कगार पर ही हैं। हाल ही एक  न्यूज चैनल पर जारी बहस में युवा कश्मीरी अपने इरादों से बार-बार चौंका रहे थे। वे भारत सरकार से कोई इत्तेफाक नहीं रखते। वे गरीब और अनपढ़ भी नहीं थे  आप सजाए रखिए कश्मीर को ताज के बतौर। वे वहां बदल चुके हैं। हुक्मरानों की ऐसी हार देखने के लिए मजबूर शेष भारत दुविधा में है। इतने सैनिक शहीद कर दिए, न अमन लौटा, न घाटी। इबादत के साथ रमजान के रोजे चल रहे हैं और प्रार्थना ·के साथ जन्माष्टमी का भी व्रत रखा जा रहा है । एक  ही तो मूल है दोनों का और दोनों साथ-साथ हैं। बिना इबादत के जहां रोजा फाका है, वहीं बिना कृष्ण को याद किए जन्माष्टïमी का उपवास भी नहीं है। फिर भी दूरी है तो है। इस पावन अवसर पर हम सब दुआ में हाथ ही उठा सकते हैं कि अमन-चैन भी बरसे। आइए, हाथ उठाएं हम भी।

Thursday, August 19, 2010

भला काहे देखें पीपली लाइव

क्योंकि फिल्म लीक हटकर है? कि सारे पात्र हकीकत की दुनिया से आये लगते हैं ? कि यह किसी भी महिला निर्देशक कि बेहतरीन फिल्म है? कि एक भी गीत ठूंसा हुआ नहीं लगता? कि यह यथार्थ का सिनेमा है और किसी को प्रेमचंद तो किसी को सत्यजीत रे याद आ रहे हैं ?
नहीं इनमे से किसी के लिए भी पीपली लाइव मत देखिये.. ..
इसे देखिये क्योंकि यह भारत कि सत्तर फीसदी आबादी का सिनेमा है. उस भारत की कहानी है जिसके पास रोज़मर्रा कि बेहिसाब मुश्किलें हैं और जिसे मौत,ज़िन्दगी से आसान लगती है ....
ये बच्चा   किसक  बच्चा है
जो रेत पे तन्हा बैठा है
न उसके  पेट में रोटी है
न उसके तन पर कपड़ा है..
पिता ने इब्ने इंशा की वह कविता वेरा को लिख दी। वेरा ने भी उसे याद कर लिया। मैम के सामने कविता रखते हुए वेरा की आंखें चमक रही थीं। लेकिन मैम ने घूर कर वेरा को देखा- ‘यह क्या भिखारी पर कविता लिख लाई। यह नहीं चलेगी’। वेरा की आंखें बुझ गईं। वह पूरे समय क्लास में उदास बैठी रही।

देस मेरा ‘अंगरेज‘
anusha rizvi onkaardaas manikpuri
 and malika shinoy
आशय यह कि   इस खूबसूरत दुनिया में भिखारी (दरअसल वह कविता एक  भिखारी बच्चे ·की नहीं,  उस तन्हा बच्चे की है जिसका दुनिया में कोई नहीं) का गान कोई नहीं सुनना चाहता। इस रंग-बिरंगी दुनिया में काला-सफेद बिलकुल नहीं चलता। अगर कहीं है भी तो कवर करो। दूर करो नजरों से। यह गरीबी भी तो ब्लेक एंड वाइट नजर आती है। ससुरा दूसरा कोई रंग ही नहीं दिखता। सत्यजीत रे ने पाथेर पांचाली बनाई थी वह भी श्वेत-श्याम फिर अस्सी के दशक में प्रेमचंदकी कहानी पर सद्गति बनाई वह भी काली काली ही नजर आती थी और आज जब अनुषा रिजवी पीपली को लाइव दिखाती हैं तो वह भी रंगहीन ही नजर आता है। इस दौर में जब सब कुछ सनसनीखेज या फिर लिपा-पुता दिखाने की अनिवार्यता हो, सच्चाई पर अघोषित पाबंदी हो तो अनुषा रिजवी को झुक कर सलाम करने को जी चाहता है क्योंकि उन्होंने यह रिस्क ली है। अपना कमिटमेंट जाहिर किया है। स्विट्जरलैंड, सिल्क और शिफॉन के सिनेमा के बीच यथार्थ को दिखाना वैसा ही है जैसा एक शाही महल में मक्खी भिनभिनाते, खांसते गरीब की टूटी-फूटी चारपाई।
हां, गालियां हैं
हम गालियों से बिदकते हैं। लगता है किसी ने कानों में पिघला सीसा डाल दिया हो। फिल्म में गालियां एकदम जरूरी और सटीक लगती हैं। कान खुले रखते हुए निकल जाइए किसी भी शहर की किसी भी गली में। गालियां सुनाई दे ही जाएंगी। आंख-कान बंद करते हुए हरा ही हरा देखना है तो मान लीजिए आप असल भारत से मुंह मोड़ रहे हैं... और मौका मिले तो आप विदेश में जाकर समृद्ध और सुविधा की जिंदगी जीना चाहते हैं। सच है कि आज का मध्यम वर्ग इस सत्तर फीसदी भारत से गर्दन टेढ़ी कर लेना चाहता है। यह वर्ग उसे जूते पुछवाने और मैला ढोने के लिए तो ठीक  लगता है लेकिन साथ बिठाने से उसे एलर्जी है। आजादी ·के सवा छह दशक· बाद भी छुआछूत है, अस्पृश्यता है। गरीब हमें नासूर लगता है। शाइनिंग इंडिया पर बदनुमा दाग।

पीपली खोलती है पोल
पीपली लाइव इसी बदनुमा दाग में दाखिल है। अभाव और शोषण का कच्चा-चिट्ठा है यह। अपनी जमीन का कर्ज चुकाने और आत्महत्या कर मुआवजा हासिल करने वाला मरेगा या नहीं उसके पीछे सारा देश पड़ा है लेकिन मिट्टी खोदते-खोदते मर जाने वाले होरी महतो में किसी की दिलचस्पी नहीं। मरेगा कि नहीं जैसी जिज्ञासा और टीआरपी बढ़ाने का माद्दा मजदूर की सूखी देह में कहां। ऐसे में हिंदी पट्टी के एक अखबारनवीस की संवेदनाएं तार-तार होने लगती है। वह कब मर जाता है किसी को पता नहीं चलता।
नामचीन पत्रकार फील्ड में गला फाड़कर रिपोर्टिंग करते हैं वहीं स्टूडियो में कैसे मंत्रियों से ट्यून्ड रहते हैं। पीपली में यह भी है। एहसान की मुद्रा में गरीब नत्था के घर सरकार एक  लाल बहादुर पटक  देती है। लाल बहादुर बोले तो लालबहादुर शास्त्री योजना के तहत एक  हैंडपंप। गरीब नत्था के लिए हैंडपंप ऐसा ही है जैसे पोपले मुंह में बादाम। सरकारों की खोखली संवेदनाओं पर टिकी  अनुषा रिजवी की व्यंग्यात्मक निगाहें उनके तगड़े स्क्रिप्ट राइटर होने की गवाही देती हैं ।

गरीबी में लिहाज नहीं पलते
सास-बहू में खुलकर गाली-गलौच चलती है। बहू जेठ को सख्त नापसंद करती है लेकिन  नत्था के जाते ही वह जेठ को पानी का गिलास थमाती है। एक दबंग स्त्री  भी भलीभांति जानती है कि समाज मर्दों से ही चलता है। पीपली चुपचाप संकेत करती है। संकेत में व्यंग्य का पुट परदे पर किस तरह उतारा जाता है पीपली इसकी मिसाल है। आदरणीय हबीब तनवीर जिनके  नाटको में ग्रामीण चेहरे जस के तस प्रस्तुत होते थे वही अंदाज पीपली का भी है। भीष्म साहनी का लिखा मुआवजे भी आसपास से झांकता है। पीपली हमें बाहर से हंसाता है तो अंदर छेदता है, भेदता है। यह आम आदमी का सिनेमा है जो सब कुछ सहता है और उफ़ भी नहीं करता। बस हाथ जोड़े खड़ा रहता है। वह विलायती बीज बोता है लेकिन पानी के लिए ऊपर ही निहारता है। ऐसी ही आधी-अधूरी तरक्की है हमारी। पिछले एक दशक  में लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं और करोड़ों किसानी छोड़ चुके हैं। अकेले आन्ध्र  प्रदेश में सरकार ने तीन लाख एकड़ जमीन खींचीं है, जिससे पचास हजार किसान मजदूर बन गए हैं। मायावती सरकार  किसानों पर गोलियां चला रही है। यही उपलब्धि है 63 सालों की।  संपन्न भारत गरीब भारत की ओर नहीं देखना चाहता। वेरा की टीचर की तरह। 



                                                                                    अनुषा का परिवार
anusha rizvi and mahmood farooqui
  यूं अनुषा के माता-पिता उन्हें दूरदर्शन पर आने वाली बांग्ला फिल्में दिखाते थे। वह भी सत्यजीत रे और रित्विक  घटक· की फिल्में। पीपली लाइव के साथ उनके पति महमूद फारूकी का भी नाम जुड़ा है। वे कास्ट डायरेक्टर और सह-निर्देशक हैं। दोनों की मुलाकात आठ साल पहले एनडीटीवी में काम करते हुए हुई थी। दोनों के परिवार उत्तरप्रदेशी और पढ़ी-लिखी पृष्ठभूमि से हैं। महमूद गोरखपुर के पुरबिया हैं तो अनुषा पश्चिम उत्तर प्रदेश से  रखती हैं। अनुषा शिया हैं तो महमूद सुन्नी। अनुषा ने दिल्ली के सेंट स्टीफन्स से पढ़ाई की है तो महमूद दून स्कूल में पढ़े हैं और ऑक्सफोर्ड से भी। बाद में फिल्म इंडस्ट्री को समझने के लिए दोनों मुंबई शिफ्ट हो गए.

 

Thursday, July 29, 2010

काउच सॉरी.....कोच

एक अगस्त को पड़ रहे फ्रेंडशिप डे को  दर्ज करने से पहले आपके साथ चौदह साल पीछे जाने का मन है। सोलह साल की लड़की पर खेलों का जुनून सवार था। वह बास्केटबॉल खेलती थी और बिला नागा सुबह सवा पांच बजे अपना घर छोड़ देती। उसकी सायकल उसे पंद्रह मिनट में स्टेडियम पहुंचा देती। कभी-कभी तो वह सबसे पहले पहुंचने वालों में होती। कोच रामाराव उसके आदर्श थे। अभी बॉल की ड्रिबलिंग से वह सुबह का मौन तोड़ ही रही थी कि पीछे से आकर कोच ने उसे पकड़ लिया। उसका सिर घुमाकर वह उसे चूमना चाहता था लेकिन वह फुर्तीली लड़की उसकी पकड़ से छूट निकली। लड़की का दिल यूं धड़क रहा था मानो  बाहर ही निकल आएगा। छलनी विश्वास के साथ वह सीधे एसोसिएशन के अध्यक्ष के घर पहुंची। शिकायत सुनते ही रामराव को कोच के पद से हटा दिया गया।

जुनूनी खिलाड़ी का जुनून उतर चुका था। उसने फिर कभी बॉस्केटबॉल नहीं खेला। कुछ ही अर्से बाद रामाराव फिर कोच बना दिया गया था। एसोसिएशन ने इस बार उसकी नहीं सुनी। साथी लड़कियों के साथ उसने एक बोल्ड स्टेप लिया। प्रेस वार्ता कर डाली। पत्रकारों के सवालों ने उसे यह बोलने पर मजबूर कर दिया कि उसके साथ ही ऐसा हुआ है। इंदौर शहर के टीवी चैनल्स के कैमरे और रिपोर्टरों की निगाहें उसी पर जमी हुई थीं। वार्ता खत्म होते ही वह घबरा गई कि अब क्या होगा। वह तो इनडायरेक्टली कहना चाहती थी। माता-पिता का चेहरा घूम गया। एक-एक से हाथ जोड़कर निवेदन किया कि प्लीज टीवी पर ना दिखाएं। भले थे। भारतीय लड़की की बेबसी समझी और खबर बनने से पहले ही दम तोड़ गई।

इस घटना को लिखने का मकसद कुछ और नहीं बल्कि मणिपुर की अंतरराष्ट्रीय भारतीय हॉकी खिलाड़ी टी एस रंजीता को सलाम करना है। उन्हें इस भय ने नहीं घेरा। उन्होंने कोच की पोली खोली। उनका बयान है  "चीन ट्रिप के दौरान एक रात कौशिक सर ने मुझे रूम में बुलाया और कहने लगे, तुम सुंदर हो, तुम मुंबई में अकेली रहती हो, तुम्हें जिंदगी के मजे लेने चाहिए। उन्होंने यहां तक कहा कि वह मेरे लिए 24 घंटे उपलब्ध हैं। ऐसा उन्होंने एकाध बार नहीं बल्कि पांच बार कहा, उन्होंने कई बार पलंग की तरफ इशारा किया।"

अब सिडनी ओलंपिक्स [वेटलिफ्टिंग] में भारत को कांसे का तमगा दिलाने वाली कर्णम मल्लेश्वरी भी सामने आई हैं। उन्होंने साफ कहा है कि कोच रमेश मल्होत्रा के साथ लड़कियां सुरक्षित नहीं है, उन्हें बदला जाना चाहिए। हमारा देश ओलपिंक पदक विजेता और एक महिला की कितनी इज्जत करता है यह इस बात जाहिर होता है कि कोच पर कार्रवाई करने की बजाय, देश के सर्वोच्च खेल अवार्ड द्रोणाचार्य के लिए नामांकित कर दिया। सच है हम न खेलों की इज्जत करते हैं न महिलाओं की। अव्वल तो खेलों से माता-पिता का भरोसा उठा हुआ है और उस पर ऐसे कोच और अधिकारी।

कुछ लोगों का कहना है कि लड़कियों के पास यही आखिरी हथियार होता है। वे पुरुषों पर इसी से वार करती हैं। एकाधिक मामलों में ऐसा हो सकता है, लेकिन सत्चरित्र इसमें से बेदाग बाहर भी निकलते हैं. अधिकांश मामलों में लड़की का मुखर होना उतना आसान नहीं क्योंकि हम लड़कियों में ही दोष देखते हैं। उसी को कठघरे में खड़ा करते हैं। ऐसा करने पर उसकी सामाजिक हैसियत नहीं के बराबर रह जाती है। साफ-साफ कहे तो ऐसी स्वाभिमानी लड़कियों के साथ कोई रिश्ता नहीं जोडऩा चाहता।

फिल्म चक दे इंडिया की बिंदिया भी याद आती है जो खुद को कोच कबीर खान को समर्पित करना चाहती है, लेकिन कबीर अपने आचरण से बिंदिया को गलती का एहसास करा देते हैं। यही एक गुरु का दायित्व है। काउच की ओर इशारा करने वाले कोच खेलों को दाव पर लगाए बैठे हैं। हॉकी खिलाड़ी परगट सिंह ने साफ कहा है कि इस पूरे मसले को बच्चे की तरह ट्रीट किया गया है। भारतीय ओलंपिक संघ पर बरसों से एक चेहरा  काबिज़ है। सवा अरब की आबादी वाला देश मेडल को तरसता है। इक्का-दुक्का पदक आते भी हैं  तो व्यवस्था से लड़कर। खेलों का बजट न जाने किस तहखाने में समा रहा है। अखेल अधिकारी, कोच अंतरराष्ट्रीय टूर पर जाकर कर्तव्य की इतिश्री मान रहे हैं। खेलों के साथ हमारी मित्रता बेहद कमजोर है।

आपको आराधना गुप्ता और रुचिका गहरोत्रा की दोस्ती याद होगी। हरियाणा के आईजी राठौड़ लॉन टेनिस एसोसिएशन के अध्यक्ष थे। चौदह साल की टेनिस प्लेयर रुचिका के यौन शोषण में लिप्त राठौड़ का कच्चा चिट्ठा खोलने में उसकी दोस्त ने दिन-रात एक कर दिया। रुचिका ने तंग आकर खुदकुशी कर ली थी। न्याय मिलने में उन्नीस साल लगे। राठौड़ आज जेल में है। खेलों की ऐसी दुर्गति और दोस्ती की ऐसी सदगति की शानदार मिसाल शायद ही कहीं और मिले। फ्रेंडशिप डे मुबारक हो। अग्रिम.

Thursday, June 24, 2010

गलियाँ गालियों की


आज जाने क्यों उस पर लिखने के लिए बाध्य हो गयीं हूँ जिस पर सभ्य घरों में सोचना भी मना है. इन दिनों पसरती  धूल ने किताबों को भी नहीं बख्शा है. धूल ही झाड़ने की कोशिश में राही मासूम रज़ा की लिखी ओस की बूँद हाथ आ गयी.  धूल  कम, हर्फ़ ज्यादा दिखाई देने लगे . फ्लैप  पढ़ा तो बस वहीँ रह गयी.
मेरे परिवार में आधा गाँव, ओस की बूँद  उनके ये दोनों ही उपन्यास वर्जित थे .उसी तरह शेखर कपूर  की बेंडिट क्वीन भी. लेकिन अब गलियाँ मुझे भली लगती हैं .क्योंकि किसी ने मुझे उसका भी गणित समझाया...कि यह बेवजह नहीं होती ...कि इनको कह देने के बाद मन निष्पाप हो जाता है... कि आम इंसान को समझना है तो उसकी भाषा को समझो. बस तबसे जब भी सड़क पर गालियों के स्वर सुनती हूँ तो चिढ़ नहीं जाती और न ही वित्रष्णा होती है . पहले यही सब होता था.  कोई होता है जिसके मुख से  अपशब्द भी सोने-से खरे लगते हैं . वे बेवजह नहीं होते. कई बार सोचती हूँ  कि यहाँ से गाली हटा कर किस शब्द को रखूँ कि बात में वजन पड़ जाए लेकीन यकीन मानिये मेरी हार होती. सामान्य शब्दों में शायद वह धार ही नहीं होती जो गाली में होती है. शायद आप जानते हों गलियों के भी शोर्ट फोर्म्स होते हैं. कहनेवाला बात भी कह देता और इज्ज़त भी बनी रहती है
... जो मित्र समझ रहे हैं वे मुझे बख्शेंगे नहीं कि कोई यूं भी यादों को याद करता है. क्या करें याद तो याद ठहरी सही समय पर सही धुन बजाने से तो रही. संक्षेप में बस इतना ही कि मैंने गालियों  को किसी कि गोद में बच्चों कि तरह खेलते देखा है . पास बैठे को धूजने कि बजाय रस लेते देखा है और तो और तो और कुछ समय बाद उसे वही सब जपते हुए भी देखा है. इसी बीच गलियाँ सुनानेवला कब काबा और शिवाला कि गलियों में खो जाता है कोई नहीं समझ पाता.
पहले एक नामुराद-सा शेर और फिर मुरादों वाले रज़ा साहब के वे शब्द जो उन्होंने आधा गाँव लिखने के बाद ओस की बूँद की भूमिका में लिखे हैं . 

तेरी खुशबू आती है इन किताबों से

फिर जाने क्यों  होश अपना नहीं रहता 

बड़े-बूढ़ों  ने कई बार कहा की गलियां न लिखो जो आधा गाँव में इतनी गालियाँ न होती तो तुम्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार अवश्य मिल गया होता,परन्तु मैं  सोचता हूँ की क्या में उपन्यास इसलिए लिखता हूँ की मुझे पुरस्कार मिले ?पुरस्कार मिलने में कोई नुकसान नहीं फायदा ही है. परन्तु मैं एक साहित्यकार हूँ . मेरे पात्र यदि गीता बोलेंगे तो मैं गीता के श्लोक लिखूँगा. और वह गालियाँ बकेंगे तो मैं अवश्य उनकी गालियाँ लिखूँगा . मैं कोई नाज़ी साहित्यकार नहीं हूँ कि अपने उपन्यास के शहरों पर अपना हुक्म चलाऊँ और हर पात्र को एक शब्दकोष थमाकर हुक्म दे दूं कि जो एक शब्द अपनी तरफ से बोले तो गोली मार दूंगा. कोई बड़ा बूढ़ा बताए कि जहाँ मेरे पात्र गाली बकते हैं. वहां मैं गालियाँ हटाकर क्या लिखूं ? डोट डोट डोट ?
तब तो लोग अपनी तरफ से गालियाँ गढ़ने लगेंगे और गालियों के सिलसिले में अपने पत्रों के अलावा किसी पर भरोसा नहीं है

ओस की बूँद के पात्र भी कहीं-कहीं गालियाँ बकते हैं. यदि आपने कभी गाली सुनी ही न हो तो आप यह उपन्यास न पढ़िए. मैं आपको ब्लश करवाना नहीं चाहता.

ps: दरअसल,गाली देना कोई वीरता का काम नहीं लेकिन कमबख्त गाली की जगह जाने क्यों गाली ही सटीक बैठती है. आधा गाँव पढ़कर और फूलन देवी की कथा पर आधारित फिल्म द बेंडिट क्वीन देखकर तो यह धारणा और मज़बूत होती है.

Wednesday, June 9, 2010

मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं...

तमाम हिंसा और आवेग के दृश्यों के बावजूद प्रकाश झा की फिल्म राजनीति सोचने के लिए मजबूर करती है कि अगर एक स्त्री राजनीति में है तो वह या तो अपनी देह कुर्बान कर रही है या फिर परिवार में हुए किसी हादसे के नतीजतन राजनीति में है।....और जो इरादतन (पात्र का नाम भारती) राजनीति में है, उसे केवल इसलिए सब छोड़ना पड़ता है क्योंकि वह अपने ही गुरु को सर्वस्व अर्पित कर बिन ब्याही मां बन जाती है। लाल झण्डा लिए गुरु पलायन कर जाते हैं और वह एक राजनीतिक परिवार की बहू। यह ब्याह भी जोड़-तोड़ की भावी राजनीति का बीज बोने के लिए होता है।
फिल्म में एक कैरेक्टर उस युवती का है जो सीतापुर के टिकट के लिए खुद को सौंपती चली जाती है लेकिन टिकट है कि उसे ही शटल कॉक बना देता है। इस गन्दी राजनीति पर बहुत हौले से कैमरा घूमता है। नायिका इन्दु प्रताप सिंह (कैटरीना कैफ) भी इसलिए मैदान में उतरी है क्योंकि उनके ससुर और पति की हत्या हो चुकी है और सहानुभूति का पूरा वोट उनकी झोली में गिरने वाला है। यही जमीनी हकीकत है हमारे देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की।राजनीति के बहाने निर्देशक प्रकाश झा ने रिश्तों की बुनावट को जिस प्रकाश में देखा है वह फिल्म का प्राण बन गया है। रिश्ते जो स्वार्थ की भेंट चढ़े हैं  अपना वजूद दूसरे के मिटने में ही देख रहे हैं । 

कुछ लोगों को एतराज है कि जितनी हिंसा फिल्म में दिखाई गई है उतनी कभी नहीं होती। एक परिवार की रंजिश से ऊपर उठकर सोचें तो हमने बापू , इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी को राजनीतिक बिसात पर कुरबान किया है। ख्यात  बैडमिंटन खिलाड़ी सैयद मोदी की हत्या में कौन शामिल था? उनके मरने के बाद अमिता मोदी और पोलिटिशियन संजय सिंह ने शादी क्यों की? अमरमणि त्रिपाठी ने कविता लिखने वाली मधुमिता शुक्ल को क्यों मरवाया? पड़ौसी देश नेपाल में राजकुमार ज्ञानेन्द्र और उनके पुत्र पारस ने खून की होली क्यों खेली? इल्जाम है कि उन्होंने अपने बड़े भाई और गद्दी के हकदार पुत्र दीपेन्द्र समेत राजपरिवार के कई सदस्यों की गोली मारकर हत्या कर दी।

एक वरिष्ठ रिपोर्टर हुआ करते थे लखनऊ में। समाजवादी पार्टी उनकी बीट (कार्यक्षेत्र) थी। साथीगण अकसर कहते, आपका तो बहुत याराना है मुलायम सिंह से। वे साफ कहते यह राजनीति है। यदि विरोधी दल आश्वासन दे कि गद्दी आपकी, आप रिपोर्टर का सर ले आइए तो मेरा सर जाने में पल भी नहीं लगेंगे। बाद में इन रिपोर्टर की एक दुर्घटना में मौत हो गई।

फिल्म की बात करें तो भारतवर्ष महाभारत की राजनीति से सुपरिचित है जहां इनसान सत्ता के सुख के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। नैतिकता धृतराष्ट्र की तरह पट्टी बांधे पड़ी रहती है। सारे गणित वर्चस्व हासिल करने के लिए होते हैं। हमारी वर्तमान राजनीति भी इससे अलग नहीं। अव्वल तो देश का पढ़ा-लिखा युवा इस ओर जाने से कतराता है लेकिन यदि जाना चाहता है तो यह फिल्म उसके लिए होमवर्क का काम कर सकती है।

आम आदमी की भूमिका यहां केवल ढोल बजाने और माला पहनाने के लिए है। वह इस कदर लुटा-पिटा है कि जब दलित सूरज (कर्ण के अक्स वाला पात्र अजय देवगन  ) मारा जाता है तब भी उसके ड्राइवर पिता उन्हीं शक्तिशाली कदमों में गिरते हैं जो उसके बेटे के हत्यारे हैं। आम आदमी इस लड़ाई में केवल इस्तेमाल होता है और प्रकाश झा इसे भूले नहीं हैं। स्विट्जरलैण्ड, शिफॉन और करवाचौथ के बीच यह यथार्थ  का सिनेमा है। हमें इसकी आदत नहीं। इतनी अच्छी हिन्दी सुनने की भी नहीं। स्क्रिप्ट  रोमन लिपि की नहीं, आंचलिक हिन्दी की है। भोपाल शूटिंग के लिहाज से मशहूर शहर नहीं लेकिन लोकेशन्स लुभावनी हैं। शहर हैरत में है। दर्द में है। पच्चीस साल से भी लम्बे समय से न्याय की राह देख रहे लोगों के अपराधियों को पच्चीस हजार के मुचलके पर छोड़ दिया गया है। गरीब देश के गरीब शहर, रोजगार के नाम पर ऐसे ही जहरीले छलावों के शिकार होते हैं। राजनीति यहां भी है।


ps: मोरा पिया बस जब -तब प्रष्ठभूमि में बजता .है और बेहद मधुर है .  कैटरिना आखिर में नयी नज़र आती हैं. अजय देवगन खूब गुस्से में हैं .रणवीर ने  चौंकाया है.. नाना सहज और शानदार .चेतन पंडित बढ़िया .अर्जुन रामपाल आकर्षक .नसीर सुपर्ब लेकिन छोटे रोले में और श्रुति सेठ ने सीतापुर का टिकट नए अंदाज़ में माँगा है. लास्ट बट नोट लीस्ट मनोज वाजपेयी की जोरदार वापसी है राजनीति. कमाल है इत्ते सारे और सब के सब ज़रूरी .

Wednesday, May 12, 2010

कल बदनाम लेखक मंटो का जन्मदिन था

कल उर्दू के बेहतरीन अफसानानिगार सआदत अली हसन मंटो की ९८वीं सालगिरह थी.उनके अंदाज़े बयां को सजदा करते हुए एक अफ़साना और एक हकीकत  उन हमज़ुबां दोस्तों के नाम जो कुछ अच्छा पढ़ने की उम्मीद में इस ब्लॉग पर आते हैं .  यूं तो मंटो के बारे में कहने को इतना कुछ है कि मंटो पढ़ाई-लिखाई में कुछ ख़ास नहीं थे कि मंटो कॉलेज में उर्दू में ही फ़ेल हो गए थे कि शायर फैज़ अहमद फैज़ मंटो से केवल एक साल बड़े थे कि उन्हें भी चेखोव कि तरह टीबी था कि वे बेहद निडर थे कि उनकी कई कहानियों पर अश्लीलता के मुक़दमे चले कि बटवारे के बाद वे  पकिस्तान चले गए कि उन्होंने दंगों की त्रासदी को भीतर तक उतारा कि वे मित्रों को लिखा करते कि यार मुझे वापस बुला लो कि उन्होंने ख़ुदकुशी की नाकाम कोशिश  की और ये भी कि वे बहुत कम [४३] उम्र जी पाए गोया कि  चिंतन और जीवन का कोई रिश्ता हो . उफ़... उनके बारे में पढ़ते-लिखते दिल दहल जाता है और उनकी कहानियाँ तो बस इंसान को चीर के ही रख देती हैं. बेशक मंटो का फिर पैदा होना मुश्किल है. हमारा नसीब कि उनका लिखा अभी मिटा नहीं है. एक अर्थ में मंटो सव्यसाची थे हास्य व्यंग्य पर उनका बराबर का अधिकार था. पहले पेश है उनकी एक छोटी लेकिन मार्मिक कहानी ...

लूट का माल वापस पाने के लिए पुलिस ने छापे डालने शुरू कर दिए. भय के मारे लोग लूटे हुए माल को वापस फेंकने लगे. कुछ लोगों ने मौका पाते ही इस माल से मुक्ति पा ली ताकि वे क़ानून के चंगुल से बच जाएं. एक आदमी मुश्किल में पड़ गया . उसके पास किराने के व्यापारी से लूटी हुई शकर के दो बोरे थे . एक तो उसने जैसे-तैसे करके पास के कुँए में फेंक दी. दूसरी जब फेंकने गया तो अपना संतुलन खो बैठा और बोरी के साथ खुद भी कुँए में गिर पड़ा. छपाक आवाज़ सुनकर लोग इकट्ठे हो गए, कुँए में रस्सी उतारी गयी . दो युवक कुँए में उतरकर उस आदमी को बहर ले आये पर कुछ समय में ही वह चल बसा. दूसरे दिन जब लोगों ने कुँए का पानी पीने के लिए निकला तो वह मीठा था. इस तरह उस आदमी की कब्र पर आज भी घी के दीये जलते हैं

...और अब एक हकीकत

मुग़ल ए आज़म से प्रसिद्धि पानेवाले के. आसिफ उन दिनों नए-नए डिरेक्टर थे और फूल नाम कि फिल्म बना रहे थे. इसी काम के लिए वे एक  दिन मंटो के घर गए. मंटो से कहा कि कहानी सुनाने आया हूँ . मंटो ने मजाक किया -'तुम्हें पता है  कहानी सुनने  की भी फीस लेता हूँ ' यह सुनकर आसिफ उलटे पैर लौट गए मंटो मानाने के लिए दौड़े लेकिन आसिफ तब तक जा चुके थे. मंटो को बड़ा पछतावा हुआ.

कुछ दिन बाद एक आदमी लिफाफा लेकर मंटो के घर आया .मंटो ने लिफाफा खोला तो उसमें सौ-सौ के पांच नोट थे और एक चिट्ठी भी- 'फीस भेजी है कल आ रहा हूँ'. मंटो स्तब्ध रह गए उन दिनों कहानी लिखने के ही उन्हें बमुश्किल ३०-३५ रुपये मिलते, और कहानी वह भी किसी और की लिखी हुई को सिर्फ सुनने का पांच सौ रूपया. दूसरे दिन सुबह नौ बजे आसिफ उनके घर पहुंचे. -'डॉक्टर साहब फीस मिल गयी न ? मंटो शर्मिंदा महसूस करने लगे. पल भर सोचा  कि रुपये वापस कर दूं, तभी आसिफ बोले यह पैसा मेरे या मेरे पिता का नहीं है प्रोड्यूसर का है. मेरी यह भूल थी कि आपकी फीस के बारे में सोचे बगैर ही आपके पास आ गया. चलिए कहानी सुनने के लिए तैयार हो जाइए . किसी और की लिखी कहानी सुनाने के बाद आसिफ ने पूछा-'कैसी है ?'

'बकवास है', मंटो ने जोर देकर कहा. 'क्या कहा?' अपने होंठ काटते हुए आसिफ ने कहा. मंटो ने फिर कहा बकवास. आसिफ ने उन्हें समझाने का का प्रयास किया. मंटो ने कहा - 'देखिये आसिफ साहब, आप एक बड़ा वज़नदार पत्थर लाकर भी मेरे सर पर रख दो फिर ऊपर बड़ा हथौड़ा मारो तब भी यही कहूँगा कि यह कहानी बेकार है . आसिफ ने मंटो का हाथ चूमते हुए कहा सचमुच ही बकवास है आपके पास यही सुनने आया था . आसिफ ने उस कहानी पर फिल्म बनाने का इरादा छोड़ दिया. मंटो कि साफगोई पर आसिफ फ़िदा हो गए थे वर्ना ५०० रुपये में इतनी ताकत है कि वह कचरा कहानी को भी बेमिसाल कहला सके.
पुस्तक सन्दर्भ 'मंटो एक बदनाम लेखक ' का है जिसे गुजराती के ख्यात व्यंग्य रचनाकार विनोद भट्ट ने मंटो कि तलाश में लिख डाला है. पुस्तक के प्रारंभ में विनोदजी लिखते हैं


लाहौर कि उस कब्र को
जिसमें युगांतरकारी कथाकार
सआदत अली हसन मंटो लम्बी नींद सो रहा है
प्लीज़!डोंट डिस्टर्ब हिम

Wednesday, May 5, 2010

झुमरी तलैया से चीत्कार


बरसों तक झारखण्ड के इस क़स्बे के साथ मीठी फर्माइशों का नाम जुड़ा रहा है. आकाशवाणी के विविध भारती चैनल  पर कई मधुर गीत केवल यहीं के बाशिंदों के आग्रह पर बजते रहे हैं. आज एक बार फिर यह नाम सुर्ख़ियों में है लेकिन इस बार सुर-ताल के लिए नहीं बल्कि एक लड़की की चीत्कार के लिए. बाईस साल की निरुपमा पत्रकार थी और प्रियभान्शु रंजन नाम के हमपेशा लड़के को हमसफ़र बनाना चाहती थी. लड़की ब्राह्मण और लड़का कायस्थ. दोनों दिल्ली में थे .
छोटे शहरों से झोला उठाकर चलनेवाले लड़के-लड़कों में माता-पिता तमाम ख्वाब भर देते हैं लेकिन उसका अहम् हिस्सा अपने कब्ज़े में रखना चाहते हैं . खूब पढो, अच्छा जॉब चुनों, ज्यादा कमाओ लेकिन जीवनसाथी? वह मत चुनों. बेटी को खुला आसमान देनेवाले पढ़े-लिखे अभिभावक भी यहाँ पहुंचकर उनके पंख कतरना चाहते हैं. निरुपमा के साथ भी यही हुआ. पुलिस ने माँ को गिरफ्तार करते हुए आरोप लगाया की उसने ख़ुदकुशी नहीं की उसकी गला दबाकर हत्या की गयी है वह दस हफ्ते के गर्भ से थी.
दरअसल, हर मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार के भीतर एक खांप जिंदा है.हम उस खांप से बहार आना नहीं चाहते. शादी के ज़रिये हम यह साबित करते हैं की हमारे बच्चों पर हमारी कितनी नकेल है.यह कसी हुई रहे तो ही बेहतर. अपने बच्चों को जी-जान से पालनेवाले आखिर इतने कटु और सख्त क्यों हो जाते हैं? क्यों उन्हें  कथित सम्मान अपनी संतान से प्यारा हो जाता है? क्यों वे राहत की सांस  केवल तब लेते हैं जब उनकी शिक्षित बेटी उनकी कही जगह पर ब्याह कर विदा हो जाती है?

शायद वे समाज से डरते हैं . उन्हें लगता है की वे बिरादरी का सामना नहीं कर पाएंगे . वही बिरादरी जो उनके छोटे-बड़े समारोहों में महज़ औपचारिकता पूरी करने के लिए इकट्ठी हो जाती है, उन्हें अपनी लगती है. शादी हो यां मौत बड़ी भीड़ सभी को प्रभावित करती है . ख़ुशी और गम में चंद करीबियों का साथ हमें सुकून नहीं देता . हम सब ऐसी शादियों के साक्षी हैं जहाँ दूल्हा-दुल्हन बिना जाने आनेवालों के लिए नकली मुस्कान बिखेरते ही चले जाते हैं . सच तो यह है कि हम एक नकली समाज हैं जो भ्रम में जीता है . और माता-पिता इसी समाज का हिस्सा. ऐसे मामलों में वे खुद को ठगा हुआ ही नहीं मृत मान लेते हैं या मार डालते हैं. पीढ़ियों से यह भारतीय परिवारों की कश्मकश है और अब इस संघर्ष के और बढ़ने की आशंका है .

निरुपमा के मामले में दुःख इसलिए भी होता है क्योंकि यह एक पढ़ा-लिखा परिवार है. पिता बैंक में बड़ा भाई इनकम टैक्स में छोटा भाई रिसर्च स्कोलर . बात एक निरपराध निरुपमा की नहीं बल्कि उन सब लड़कियों की है जिन्हें हम आज़ादी तो दे रहे हैं लेकिन नाप-तौल के . ऐसे समाज के लिए क्या यही बेहतर नहीं की बचपन में ही लड़की का ब्याह कर दे   . नकेल कसी रहेगी . न वह दुनिया देखेगी न उसके ख्वाब जागेंगे . हमने देखा-देखी आधुनिक नीयम कायदे तो बना दिए हैं लेकिन हैं लकीर के फ़कीर. शिक्षित  लड़की जब अपनी राह चुनती  है तो बर्दाश्त नहीं कर पाते. जाति का दंभ पशुता पर उतर आता है . आज इसी दंभ के खिलाफ निरुपमा के मित्र एक हो गए हैं. अँधेरे में केवल यही एक उम्मीद बाकी दिखाई देती है


.

Saturday, May 1, 2010

एक ख़त, मई दिवस १९८१ का

यह ख़त एक लड़की का है. मुम्बई डेटलाइन से. मुझे तब मिला होता तो मेरे लिए सिर्फ नीले कागज़ का पुर्जा भर होता . कोई ताल्लुक इस ख़त से नहीं है लेकिन इस ख़त की खुशबू मुझे बहुत अपील करती है. मुझे अच्छा लगता है कि कोई कितनी शिद्दत से जिया है उन पलों को. उन सरोकारों को. पहले वह ख़त और फिर पानेवाले कि तात्कालिक प्रतिक्रिया जो उसी ख़त के हाशिये पर लिख दी गयी है.

प्रिय .........

आपका पत्र २९ को मिला, टेलीग्राम कल और फ़ोन भी कल ही . इन सारी शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद. कल शाम को तो मैं सारा सामान उठा कर दरवाज़े से बहार निकलने को ही थी कि आपका फ़ोन आया . धन्यवाद.

जन्मदिन ठीक ही रहा. दिन भर दफ्तर , शाम खार में एक छोटे बच्चे कि जन्दीन पार्टी में

आज मजदूर दिवस के उपलक्ष्य में सबको छुट्टी थी लेकिन हमारे दफ्तर में तो सबने बराबर मजदूरी की है . गर्मी आज अचानक ही बढ़ गयी है और काम करना भी मुश्किल हो रहा था. खैर इस वक्त तो मैं अपने कमरे में हूँ . मेरी रूम मेट्स पढ़-पढ़ कर परेशान हो रही हैं और मुझे देखकर उन्हें बड़ी कोफ़्त हो रही है. आपकी शुभकामनाएँ उन तक पहुंचा दी हैं और अब उनका धन्यवाद आप तक पहुंचा रही हूँ.

शुभकामनाएँ ..........

आज सुबह आपका एक और कार्ड मिला जो आपने २८ अप्रैल को पोस्ट किया था. इतने सारे माध्यमों से बधाई! आश्चर्य हो रहा है . खैर..... धन्यवाद

अब जो पत्र पाने वाले ने हाशिये पर लिखा है

में क़ुबूल करता हूँ

रोज़ बरोज़ मैंने


देखा है तुम्हारा ख्वाब


देखा है


नीला बेहद नीला और खुला आसमान


गाते मुस्कुराते हरे-हरे ऊंचे पेड़


लगातार चहकती चिड़ियाएँ


और मौसम में


भरपूर बरखा

ताकि कहीं कुछ

सूखा न बचे .

Thursday, April 1, 2010

लिव- इन रिश्ता बोले तो . . . अप्रैल fool !!!

इस दौर में जब हर शख्स एक दूसरे को टोपी पहनाकर अपना ·काम निकालना चाहता है मूर्ख दिवस की बात करना कोई मायने नहीं रखता। हर रोज कोई न कोई, कहीं न कहीं छला जा रहा है। छलने से याद आया लिव-इन-रिलेशनशिप यानी बिना शादी के साथ-साथ रहना। सामाजिक विश्लेषको का मानना है कि इसमें स्त्री ही छली जाती है। रिश्ते ·की अनिश्चितता उसे अंत में तबाह करती है। वह रोती है, बिसूरती है और पुरुष चट्टान कि तरह अडिग। उसका कुछ नहीं बिगड़ता है।
ब्रिटेन में रह रहीं भारतीय नागरिक नीरा जी ने एक पोस्ट के कमेन्ट में लिखा है कि ऐसे देश में रहती हूं जहां लिव-इन टुगेदर  आम बात है। इसका अंजाम मैंने देखा है कि नॉन कमिटल मर्दों के साथ अकेली मांओं ·की संख्या बढ़ी है। नारीवादी हूं। दो बेटियों की मां भी। कल अगर वे ऐसा करना चाहें तो खुशी-खुशी करने दूंगी, कह नहीं सकती।
यह भाव सिर्फ और सिर्फ इसलिए आता है की स्त्री के पास मातृत्व ·की जिम्मेदारी है।  पुरुष मुक्त है। वह  इस रास्ते में पल्ला झाड़कर आगे निकल जाता है और स्त्री वहीं की वहीं ठहरी हुई। यह ठहराव उसे पीड़ा देता है। लिव-इन में हम इसी ठहराव को देखते हैं और विरोध करते हैं। न्यायालय भी केवल और केवल इसलिए इसकी पैरवी करता है कि स्त्री ठगी न जाए उसे वे हक मिलें जो कानूनन विवाहित स्त्री के पास होते हैं। यह कोशिश है इन रिश्तों को विधि सम्मत बनाने की क्योंकि सामाजिक मठों के होते हुए भी हम इस पर काबू नहीं पा सके हैं और न पा सकेंगे

ईमानदारी किसी भी रिश्ते की पहली ईंट होती है। इसके अभाव में कोई ईमारत खड़ी नहीं हो सकती। प्रतिबद्धता यानी कमिटमेंट से बंधे इन संबंधों में कई बार पुरुष भी बेहद ईमानदार होते हैं। वे साफ कहते हैं कि यदि रिश्ते को नाम देना संभव नहीं तो बेहतर है लौट जाएं। यह व्यभिचार है। कमजोर स्त्री लोकलाज परिवार के भय से फैसला नहीं ले पाती। आत्मविश्वास से भरपूर पुरुष स्त्री में भी यही भरोसा जगाते हैं। यही प्रतिबद्धता उन्हें अपने रिश्ते की मजबूती और दुनिया के सामने मुखर होने का आधार देती है। शादी जयघोष है अपने प्रेम के स्वीकार्य का। कमजोर स्त्री लिव-इन में नहीं प्रेम विवाह में भी कमजोर साबित होगी, उसे अपने फैसले पर ऐतबार जो नहीं। किसी विवाहित के साथ तो वह और ज्यादा आशंकित रहेगी। अपने निर्णय पर पछताने वाले लिव-इन में ही नहीं दुनिया के हर रिश्ते में नाकाम होंगे। यदि निर्णय गलत भी है तब भी रोइये-पीटिये मत उसका मान ·कीजिए क्योंकि फैसला आपका था। अपनी राह खुद बनाई थी तो उसका काटे भी आप ही को सोरने होंगे। अव्वल तो फैसला लीजिए मत और लिया है तो खुद पर यकीन  रखिए। मत भूलिए ·कि रिश्ता आगे बढ़ेगा तो बच्चे भी होंगे। ... और आपको लगता है कि आप छली गई हैं या आपके साथ धोखा हुआ है तो अब आपके साथ कानून है। लंबे सह-जीवन को भारतीय कानून संरक्षण देता है। यह स्त्री के हक में है।
 राधा-कृष्ण इन संबंधों से बहुत ऊपर हैं। वे शाश्वत हैं मानो ईश्वर और सृष्टि। एक में एक समाए हुए। लिव-इन शब्द यहां बौना है। शादी जहां जीवनभर जिम्मेदारी लेने की स्वीकृति है तो लिव-इन तात्कालिक· जरूरत को पूरा करने के लिए साथ रहने की इच्छा । राधा-कृष्ण को इनमें से किसी की जरूरत नहीं है। उनके अलौकिक प्रेम को ·किसी प्रमाण की दरकार नहीं। धर्मवीर भारती ने कनुप्रिया में राधा के सांवरे से सवाल पर लिखा है
अक्सर जब तुम ने
दावाग्नि में सुलगती डालियों,
टूटते वृक्षों, हहराती हुई लपटों और
घुटते हुए धुएँ के बीच
निरुपाय, असहाय, बावली-सी भटकती हुई
मुझे
साहसपूर्वक अपने दोनों हाथों में
फूल की थाली-सी सहेज कर उठा लिया
और लपटें चीर कर बाहर ले आये
तो मैंने आदर, आभार और प्रगाढ़ स्नेह से
भरे-भरे स्वर में कहा है:
‘कान्हा मेरा रक्षक है, मेरा बन्धु है
सहोदर है।’


अक्सर जब तुम ने वंशी बजा कर मुझे बुलाया है
और मैं मोहित मृगी-सी भागती चली आयी हूँ
और तुम ने मुझे अपनी बाँहों में कस लिया है
तो मैंने डूब कर कहा है:
‘कनु मेरा लक्ष्य है, मेरा आराध्य, मेरा गन्तव्य!’
वैसे ही मीरा को भी नहीं क्योंकि इनमें से ·किसी भी रिश्ते में कोई अपेक्षा नहीं। दुनियावी तामझाम से अलग यह आपसी भरोसे के मंदिर हैं जहां हम भी शीष नवाते हैं।

Wednesday, March 3, 2010

सौ रुपये में nude pose

'वे जो कला को नहीं समझते मेरे काम को भी सम्मान नहीं दे सकते.मेरी बस्ती के लोग जो मेरे काम को जानते हैं मुझे वैश्या ही कहते हैं. क्या कहूं  खुद भी तो पहले ऐसा ही समझती थी.'


निशा यही नाम है उसका. दक्षिण मुंबई के आर्ट्स कॉलेज की न्यूड मॉडल है. तीस विद्यार्थियों और एक प्रोफ़ेसर की  मौजूदगी में वह अपने कपड़े उतार  देती है. जीती जगती निशा सफ़ेद पन्नों पर रेखाओं में दर्ज होती जाती है. यहाँ उसके भीतर की शंकाएँ और सवाल कोई शोर नहीं मचाते. कला के विद्यार्थियों के लिए वह सिर्फ एक मॉडल है जिसके कर्व्ज उनके सामने कला की नई चुनौती रखते हैं. वह छह घंटे की सिटिंग देती है, बदले में उसे १०० रूपए मिल जाते हैं पहले सिर्फ ५० मिलते थे. वह कहती है वे केवल मेरा शरीर देखते हैं. मन नहीं इसलिए मैं बिलकुल सहज बनी रहती हूँ वे. सब मेरा सम्मान करते हैं.

दो बेटे हैं. पति जब तक रहे काम करने की नौबत नहीं आयी .फिर लोगों के घरों में काम करना पड़ा. एक दिन मेरी मौसी ने इन कोलेजवालों से मिलवाया. वे भी यही करती हैं. शुरू में मुझे बहुत झिझक हुई लेकिन अब कोई दिक्कत नहीं. मेरे बच्चों को नहीं पता कि  मैं क्या काम करती हूँ. मुझे डर है की जब उन्हें पता चलेगा तब वे मेरा सम्मान नहीं कर पाएंगे. क्या करूं कोई और काम आता नहीं. झाड़ू बर्तन के काम से गुज़ारा नहीं चलता . मैं जानती हूँ मेरे स्केच बनाते हुए कई छात्र बहुत बड़े कलाकार हो गए हैं. कभी मिलते हैं तो मान ही देते हैं. बस्तीवाले ज़रूर तंग करते हैं, मैं क्या करूं बता भी नहीं पाती अपने काम के बारे में....

निशा का यह साक्षात्कार मैंने अभी-अभी फेमिना में पढ़ा है. निशा कला या उसके आन्दोलन के बारे में कोई लम्बी-चौड़ी बात नहीं जानती लेकिन उसकी सहज-सी बात कि जिन्हें कला कि समझ नहीं वे मेरे काम का सम्मान नहीं कर सकते भीतर तक मथ देती हैं . क्यों नहीं निशा के काम का सम्मान किया जा सकता ? वह क्यों अलग है उन औरतों से जो दफ्तरों में काम करती हैं? क्या वाकई उसका काम असम्मानजनक है? यदि नहीं तो हर पल क्यों यह भय उसे सताता है कि जिस दिन बच्चे समझ जाएँगे वे भी बस्तीवालों कि तरह उसे स्वीकार नहीं करेंगे ?

न्यूड पेंटिंग्स ...सॉरी न्यूड स्केचेस ...क्या यह बहस जायज़ है ?



image courtesy: http://matthewjamestaylor.com/art/girl-leaning-over-fromback
artist Matthew James Taylor

Wednesday, February 17, 2010

मिल जा कहीं समय से परे ....

तुम्हारे आते ही  भीग जाती हैं ये आंखें
इतनी शिद्दत से कोई नहीं आता मेरे पास

प्रेम ऐसा ही स्वतःस्फूर्त भाव है जो एक इंसान का दूसरे के लिए उपजता है। यह भाव इस कदर हावी होता है कि उसके सोचने समझने की ताकत छिन जाती है। यूं कहें कि वह इंसान दिल के आगे इतना मजबूर होता है कि लगता है दिमाग कहीं सात तालों में बन्द पड़ा है। ...लेकिन दुनिया तो यही मानती है कि प्रेम अंधा होता है। दरअसल प्रेम है ही आंखों को बन्द कर डूबने का जज्बा। जिसमें यह नहीं वह दुनिया की सारी चीजें कर सकता है, प्रेम नहीं।

इश्क आपको दिशा देता है। एक मार्ग। शायद वैसे ही जैसे गुरु अपने शिष्य को। ईश्वर अपने भक्त को। प्रेम में डूबा शख्स  नृत्य की मुद्रा में दिखाई देता है। स्पन्दित सा। एक धुन लगी रहती है उसे। वह खिल- सा जाता है कि कोई है जो पूरी कायनात में सबसे ज्यादा उसे चाहता है। यह चाहत उसे इतनी ताकत देती है कि वह सारी दुनिया से मुकाबला करने के लिए तैयार हो जाता है। यह जज्बा केवल और केवल मनुष्य के बीच पनपता है। किसी मशीन या जानवर ने अब तक ऐसे कोई संकेत नहीं दिए हैं। ... और सच पूछिए तो हमारे यहां इस जज्बे से निपटने के प्रयास अब भी मशीनी और कुछ हद तक जानवरों जैसे ही हैं। हमें कई बार इनका पता पुलिस से चलता है। हमारे यहां प्रेम प्रसंगों से पुलिस ही दो चार होती है। दो दिलों को समझने के सारे मामले पुलिस के सुपुर्द कर दिए जाते हैं।
ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं। कल यानी सोलह फरवरी को जयपुर के सभी अख़बार में दो ख़बरें हैं।  कैप्टन पति को छोड़ प्रेमी संग भागी और दूसरी एक हिन्दू स्त्री को बाद में पता चला कि उसका शौहर मुस्लिम है। परिजनों का आरोप है कि पहले आर्य समाज में उससे शादी की और फिर उसे धार्मिक साहित्य पढ़ने को दिया ताकि वह धर्म बदल ले। ये दोनों ही घटनाएं प्रेम खाते में पुलिस के हत्थे चढ़ीं। दरअसल, दोनों ही मामलों में हमारी सामाजिक वर्जनाएं सर उठाती नज़र आती हैं। पहले में जहां लड़की पर शादी का दबाव रहा होगा वहीं दूसरे में हिन्दू-मुस्लिम शादी को सामाजिक स्वीकृति न मिलना। लड़की का शादी के बाद धन और जेवर लेकर भागने और धर्म छिपाकर शादी करने की बात एक बड़े धोखे की ओर इशारा करती है और यही पुलिस केस बनने के लिए जरूरी है। हर प्यार तब ही रोजनामचे में एंट्री पाता है जब उस पर धोखे का लेप लगाया जाए। यह काम सदियों से होता आया है। अरेंज मैरिज को बचाने और प्रेम -विवाह को तोड़ने की कोशिश समाज के प्राथमिक कर्तव्यों में एक नज़र आती है। इस आग के दरिया में कई प्रेम जलकर भस्म हो जाते हैं और कुछ ही हंसते हुए बाहर निकलते हैं। यह दोनों की आपसी प्रतिबद्धता की जीत होती है।

फिर कहना चाहूंगी कि यह सुकून बहुत बड़ा है कि कोई है जो आपके वजूद को जरूरी मानता है। स्त्री होने के नाते कह सकती हूं कि एक स्त्री इस चाहत के दम पर पूरी उम्र गुजार सकती है। वह प्रवृत्ति और प्रकृति से ऐसी ही है. समय से परे मिलने की ख्वाहिश उसके भीतर कभी नहीं मरती.

सावित्री ले आई सत्यवान को छीनकर भगवान से...

अहिल्या सजीव हुई राम के स्पर्श से...

शंकुतला भी जी गई जंगल को दुष्यन्त की याद में ...

अर्जुन के लिए ही वरे द्रोपदी ने पांच पति...

मीरा भी समाई अपने कृष्ण में..

और सीता समा गई धरती में राम की बेरुखी पर।
क्योंकि स्त्री जानती है कि अपने प्रियतम के बिना वह सिर्फ पत्थर है। पत्थर जो केवल सतह पर ही दुनिया का असर लेता है। भीतर तो वही शून्य है जिसमें नृत्य करती हैं  वह और उसकी यादें।

Thursday, January 21, 2010

मौत और ज़िन्दगी यानी दो नज्में



पिछले दिनों अनीसुर्रहमान सम्पादित 'शायरी मैंने ईजाद की 'पढ़ी जिसमें आधुनिक उर्दू शायरी का समावेश है. जीवन और अंत से जुडी दो कवितायेँ वहीँ से.


क्या करोगे ?

शाइस्ता हबीब

तुम मेरे मरने पर ज्यादा से ज्यादा क्या कर लोगे?
कुछ देर तक आंखें हैरत में गुम रहेंगी
एक सर्द सी आह तुम्हारे होटों को छूते हुए उड़ जाएगी
और तुम्हें कई दिनों तक मेरे मरने का यकीन नहीं आएगा

फिर एक दिन...
तुम अपने दोस्तों के साथ बैठै हुए
कहकहे लगा रहे होगे
मैं एक अजनबी आंसू की तरह तुम्हारे गले में जम जाऊंगी

और तुम...
तुम उस आंसू को निगलने की कोशिश में
सचमुच रो पड़ोगे
कि मैं वाकई मर गई हूं


 

यह मुहब्बत की नज़्म है

जीशान साहिल


इसे पानी पे लिखना चाहिए
या किसी कबूतर के पैरों से बांध कर
उड़ा देना चाहिए
या किसी खरगोश को
याद करा देना चाहिए
या फिर किसी पुराने पियानो में
छुपा देना चाहिए
यह मुहब्बत की नज्म है
इसे बालकनी में नहीं पढऩा चाहिए
और खुले आसमान के नीचे
याद नही करना चाहिए
इसे बारिश में नहीं भूलना चाहिए
और आंखों से  ज्यादा करीब नहीं रखना चाहिए






                                       

Sunday, January 3, 2010

सुबह चांदनी मिली




नए साल की पहली सुबह जब आँख खुली तो चांदनी मिली . पूरे चाँद की चांदनी. २००९ के ही चाँद की चांदनी. ज़ाहिर है सूरज की पहली किरण से हम रूबरू नहीं हो सके . ऐसी ही एक सर्द सुबह रणथम्भौर की थी जब शेर के दर्शन को तरसती आँखों के साथ हम कैंटर में सवार हुए .जिन्होंने भी जंगल सफारी का आनंद लिया है वे समझ सकते हैं की जंगल के राजा का दिखना क्या होता है. इस सफारी में हमें एक ऐसा नायाब पक्षी मिला जो आपके सर पर आकर बैठ जाता है.. और जब वह उड़ जाता है तो लगता है सारा अनर्गल हर ले गया. सर्दी में ठिठुरायी   पोस्ट १ जनवरी २००९ की डायरी से.

आते और जाते साल के संगम के दौरान मानस पर जो अंकित हुआ वही साझा कर रही हूं। रणथम्भौर के एक होटल में डीजे पर सारे गेस्ट थिरक रहे हैं। काळयो कूद पड्यो मेला में .. से लेकर ब्राजील... पर क्या गोरे क्या काले खूब ताल मिला रहे हैं। होटल क्या है पूरा-पूरा बाघालय है। फर्नीचर, क्रॉकरी, चादर, पर्दों पर, यहां तक कि तस्वीरों में भी बाघ  ही हैं । इतने बाघ यहां है तो जंगल में क्या आलम होगा। यही सोचकर परिवार खासकर उसमें शामिल बच्चे बेहद उत्सुक थे। 31 दिसंबर की पार्टी के बाद सुबह छह बजे जंगल सफारी पर जाना था। खुले केंटर में भीषण सर्दी का प्रकोप शरीर को सुन्न किए जा रहा था। टूरिस्ट रजाइयां लेकर ही केंटर में चढ़ गए थे। पूरी रफ़्तार से बाघ की तलाश शुरू हो चुकी थी। ढाई घंटे की सफारी में बाघ के पदचिन्ह देखते-देखते ऊब ही रहे थे कि ......बाघ दिखा या नहीं अभी रहस्य है।
एक बात रणथम्भौर यात्रा में शिद्दत से महसूस हुई कि टूर आयोजक गोरे-काले टूरिस्ट में फर्क करने लगे हैं। सफेद चमड़ी वाले सैलानी उन्हें ज्यादा अपील करते हैं। देसी सैलानी उन्हें कम समझदार, कुछ ज्यादा ही मितव्ययी और बेकायदे के लगते हैं।
बहरहाल, देवकिशन गुर्जर उर्फ़ देवा की चर्चा के बगैर यह ब्यौरा अधूरा रहेगा। वह ट्रेवल टेक्सियों का ड्राइवर है। उम्र छब्बीस की । पिछले नौ सालों से सैलानियों को राजस्थान की सैर करवा रहा है। किसी अच्छे ढाबे पर भोजन के लिए गाड़ी रोकने की बात सुन देवा ने एक जगह फोन लगाया। दाल बाटी चलेगी साब...। सब बेहद खुश हो गए। गाड़ी जयपुर की दिशा में बढ़ रही थी। देवा ने यकायक गाड़ी कच्चे में मोड़ दी। कीचड़ सनी सड़के देख कुछ समझ न आया। थोड़ी ही देर में हम एक कच्चे लेकिन सुंदर घर के सामने थे। दीवारों पर गेरु और खड़ी से चिड़िया और मांडने उकेरे हुए थे। गाड़ी को गांव के बच्चों ने घेर लिया था। भीतर जा कर हम फिर खुले में थे। आंगन में नीम का पेड़ था।
देवा की पत्नी जिसका नाम सुशीला था, पूरियां तल रही थी। घूंघट इतना लंबा था कि कुछ भी समझना मुश्किल। कनखियों से जब वह बार-बार देवा को देख रही थी तब ही उसका सुंदर मुखड़ा दिखाई दिया। बहुत-बहुत रोशन चेहरा । देवा के माता-पिता इतने प्रसन्न मानो कोई बरसों पुराना परिचित घर आ गया हो। इतनी जल्दी में पू़ड़ी ही बना सके। पिता ने सकुचाते हुए कहा। दूसरे चूल्हे पर कच्ची हांड़ी चढ़ी मूंग और चने की दाल की सौंधी महक पूरे माहौल में थी। पास ही बंधी गाय-भैंस परिवार का हिस्सा मालूम होती थीं। देवा और सुशीला अब भी कनखियों से ही निहार रहे हैं।  भोजन,बातचीत में भी दोनों आमने-सामने नहीं हुए। यह देवा का गांव था। सूंथड़ा जिला टोंक। आबादी तीन-चार हजार। दो स्कूल, एक डिस्पेंसरी है लेकिन डॉक्टर कभी कभार ही मिलता है। पानी की परेशानी है। कई बीघा जमीन है जिसमें सरसों बोया है। पानी की कमी से सरसों भी कमजोर पैदा हुई है। भोजन के बाद पिता ने चाय का आग्रह किया। सब ने हां कहा लेकिन शायद चाय पत्ती खत्म थी सो दूध परोसा गया। दूध न पीने वाले भी गाय का ताजा दूध पीने से खुद को रोक नहीं पाए। आंगन के उस नीम से लेकर जिसे देवा के परदादे ने बोया था,सब कुछ बेहद अपनत्व भरा मालूम होता था। इतना अपना कि पर्यटन पर छाई पूरी व्यावसायिकता को लील गया।
रणथम्भौर के सूखे जंगलों में तेज गति से दौड़ते केंटर में बाघ की तलाश जारी थी। वहां बयालीस बाघ हैं। होटलों और रिसोर्ट तक में नजर आ जाते हैं। खैर बाघ नहीं दिखा। अफसोस इस बात का है कि बाघ की आस में हिरण ,साम्भर और रंगीन चिड़ियाओं से भी ठीक से मुलाकात नहीं हुई। शायद अगले ट्रिप में। पिछले अक्टूबर 2008 में अलवर के समीप पांडूपोल में ऐसे ही एक लेपर्ड अनायास सामने आ गया था। रणथम्भौर में जंगल किंग न मिला हो लेकिन सूंथड़ा गांव में जो मिला वह ताउम्र मानस पर छपा रहेगा। नए साल की इससे बेहतर मेजबानी और कहीं नहीं हो सकती।
ps: आज सुबह से जयपुर भीग रहा है मावठ की बूंदों में ...