Wednesday, December 23, 2009

जायज हो जिस्मफरोशी ?


पीला हाउस की असंख्य रंडिये
शाम ढलते ही
सस्ता पावडर और शोख लिपस्टिक पोत कर खड़ी होने लगी हैं
फाकलैण्ड स्ट्रीट के दोनों तरफ
क्या बसा है उनकी उजाड़ आंखों में
सुकून नहीं
इसरार नहीं
ललक नही

उम्मीद नहीं
खौफ हां
भूख हां
बेचैनी हां
अवमानना हां
बेपनाह बोझे जैसी बेबसी बसी है
पेट और उसके अतराफ
अलाव की शक्ल में
लोग कहते हैं एड्स दे रही हैं ये रंडियें
कोई नहीं कहता
हम उन्हें आखिर क्या देते हैं


फाकलैंड रोड मुंबई का रेडलाइट एरिया है। विख्यात पत्रकार शाहिद मिर्जा की दो दशक पहले लिखी यह कविता आज भी सवाल करती है कि हम उन्हें आखिर क्या देते हैं। चंद रुपए, दलालों की सोहबत, बेहिसाब बीमारियां, पकड़े जाने पर हवालात, पुलिस की गालियां। और जो कभी जूतों की ठोकरें कम पड़ीं तो यही पुलिस अखबारों में उनकी चेहरा ढकी तस्वीरें दे कर उन्हें सरेआम बेपर्दा कर देती है कि लो देखो ये धंधेवालियां हैं। क्यों बनती हैं ये धंधेवालियां ?
पिछले बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए चौंकाने वाली टिप्पणी की कि सदियों पुराने इस व्यवसाय को यदि कानून के जरिए बंद नहीं किया जा सकता सरकार को इसे वैध कर देना चाहिए। जस्टिस दलवीर भंडारी और एके पटनायक की खंडपीठ ने यह बात एनजीओ बचपन बचाओ आंदोलन और चाइल्ड लाइन की सुनवाई के दौरान कही। एनजीओ का कहना था कि इस व्यवसाय में छोटी-छोटी बच्चियाँ धकेल दी जाती हैं जो उनके सामाजिक, आर्थिक विकास को तबाह कर देता है। 
          खंडपीठ ने माना कि इसका सीधा संबंध गरीबी से है और सरकार गरीबी पर नियंत्रण पाने में विफल रही है। उन्होंने कहा कि हम जीडीपी को बढ़ता हुआ दिखाते हैं तो फिर क्यों गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले परिवारों की संख्या 30 से बढ़कर 37 फीसदी हो गई है? अगर विकास की रफ़्तार यही रही तो कोई मदद नहीं कर सकता। पीठ का मानना है कि इस पेशे को वैध कर दिए जाने के बाद वेश्याओं के पुनर्वास और एचआईवी/एड्स जैसी बीमारियों से लड़ने में मदद मिलेगी। मेट्रो सिटीज में तो यह धंधा किसी कारपोरेट व्यवसाय की तरह चल रहा है जिसकी हवा भी नहीं लग पाती। जाहिर है इस पेशे की दो समानांतर रेखाएं चल रही हैं। गरीबी से त्रस्त परिवारों की बच्चियाँ धोखे से इस काम में धकेल दी जाती हैं। ये ही पकड़ी भी जाती हैं। पैसा देकर काम पूर्ति करने वालों पर कोई शिकंजा नहीं, दलाल भी आजाद हैं। जब तक ये सक्रिय हैं, पेशे पर रोक कैसे लग सकती है। यह तो फिर पनपेगा तो फिर इसका लीगलाइज्ड हो जाना ही उचित है क्योंकि दूसरी ओर यही सब संभ्रात तरीके से बेरोक जारी है। कोईं शिकंजे में नहीं फंसता। एक ही तरह के व्यवसाय के लिए दो मानदंड क्यों ?    
                      आदिकाल से यह पेशा पुरूष की हसरतों से जुड़ा है इसलिए इसे जड़ से खत्म करना नामुमकिन है। राजे रजवाड़ों के समय से ही हर शहर में एक इलाका होता था। समाज की मूल धारा से अलग-थलग, कटा हुआ। आज भी शहरों में यह निशां मौजूद है। जाहिर है सख्ती , कानून इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। दो साल पहले महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने भी इस कानून में सुधार की बात कही, लेकिन अब जब सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी आई है तो बचाव में सरकार के सॉलीसिटर जनरल ने भी सरकारी एजेंसियों और सरकार के विचार जानने की बात कही है। जर्मनी, नीदरलेंड जैसे देशों में देह व्यापार वैध है। हम तो अभी भी यह माने बैठे हैं कि बुराई वेश्यावृति करने में ही है। स्त्री ही अपनी देह का सौदा कर पुरुष को चरित्रहीन बनाती है। वह समाज को गंदा करती है। वही अपराधिनी है। दूसरा पक्ष तो यहां है ही नहीं। सारी कानूनी बरछियां उसी पर चलती हैं। पुरुष की कामलिप्सा में डूबी निगाह का यहां कोई दोष नहीं। शायद इसी निगाह पर सुप्रीम कोर्ट की नजर गई है और इसे वैध करने की बात की जा रही है  । ऐसे में शायद वे सामने आ सकें. उनके पुनर्वास के लिए ठोस योजनाएं बन सकें। नारी निकेतन जैसी नहीं जहां फिर स्त्री की देह ही उस पर भारी पड़ती है। उम्मीद करें कि यहां से उन्हें कुछ देने की शुरुआत हो सकती है।

Friday, December 4, 2009

एक लड़की की डायरी से


एकता चौहान की कविताएं

ये कविताएँ सीधे तेईस साल की एकता चौहान की डायरी से आयी हैं , जब उन्होंने पढ़ाईं तो लगा ताज़ा हवा का झोंका छूकर गुज़र गया. हालाँकि मेरी कविताओं की समझ बहुत सीमित है. हो सके तो आप बेहतर कीजियेगा.बतौर विसुअल डेली न्यूज़ की मगज़ीन खुशबू साथ है.

मेरा पता

शहर के बीचों-बीच
वो जो चार लेन की रोड है

दाएं-बाएं बंगले जिसके
और बड़े-बड़े मॉल हैं

वहीं आगे मोड़ पे
एक लंबा काला नाला है

घास वहां कचरे में पलती
कीचड़ से सनी जमीन है

और जो छठा तम्बू , किनारे
वही मेरा घर है!


2.
संदूक संभालें आओ जरा...
गुड़िया,मोती,चवन्नी

कहीं फिर से
कट्टा ना हो जाएं!

3.
सुबह-सुबह जब उठता हूं
वो पहले से आ जाती है

मैं उन्हें देख मुस्काता हूं
वो मुझे देख मुस्काती हैं

दाना डालो, भूख लगी है
अपनी बोली में बतलाती हैं

जाता हूं मैं, ये कह दूं तो
हामी में सिर वो हिलाती हैं

4.
डूबता है पर्वत के
डूबता वो नीर में
मन के भीतर डूबता
वो डूबता शरीर में
उलझा-सुलझा पहेली-सा
शंकाओं से घिरा हुआ वो
हर अक्षर में डूबता
ढूंढता खुद को
स्याही की लकीर में

5
चौक में
प्रतिदिन
तुलसी सींची जाती है
प्रतिदिन
भोगली से
फूंक-फूंक के
आंखें भी...

हाण्डियों पे
प्रतिदिन
घिसती है बानी
प्रतिदिन
हाथों में
बढ़ती लाख भी...

6.
कुछ माटी में रम जाती
कुछ पत्तों पे थम जाती

गिरती कुछ छज्जे से
कुछ मुण्डेर से लुढ़क जाती

तन को गीला करती
और कुछ
मन को भिगा जाती
बूंदें...