Wednesday, September 30, 2009

पाँच हजार रुपये में बेच दी बच्ची


बाज़ार में इन दिनों जहाँ कबाड़ से लेकर महल तक बिक रहे हैं वहीँ जिंदगियां भी दाव पर लगी हैं उसने अपनी नवजात बच्ची को बेच दिया. यह पहली बार नहीं था कि धन के नीचे संवेदना कुचली गयी हो. नवरात्र में कन्या जिमाने का दस्तूर है लेकिन उसने अपना अंश किसी और के सुपुर्द कर दिया था. अगर आप मान रहे कि वह बिटिया थी इसलिए ऐसा हुआ तो आप भूल करेंगे

यह बेटी तेईस साल की भव्या की चौथी संतान है। पति नंदू खास कमाता नहीं। पड़ोसी थे, शादी कर ली। दोनों के माता-पिता की सहमति इस शादी में नहीं थी। अपनी संतान से मुंह मोड़ पाना कब किस के बस में रहा है [लेकिन भव्या -नंदू के बस में तो है]वे धीरे-धीरे जुड़ने लगे।
धन का अभाव अमावस के अंधेरे की तरह इनके साथ लगा हुआ था। कामचोर पति का साथ निभाते हुए भव्या ने कई छोटी-मोटी नौकरियां की, लेकिन कोई भी कायम नहीं रही। पहली संतान एक बेटा हुआ, जो कुपोषण का शिकार था। दो महीने बाद ही वह दुनिया छोड़ गया। दसवीं फेल भव्या कभी किसी पार्लर में, कभी कैटरिंग सर्विस में और कभी सेल्स में काम करती रही। बेटे की मौत के एक साल बाद दूसरी संतान उसकी गोद में थी। पालने के लिए न समय था, न पैसा। भव्या की सास ने उसे पाल लिया। वह बच्ची को दिलोजान से चाहती है और वह दादी को ही मां बुलाती है। उसके माता-पिता उसकी ओर से बेखबर हैं। सवा साल बाद एक और पुत्र भव्या की झोली में था। आम मानसिकता होती है अब तो बेटा भी हो गया है, भव्या-नंदू का परिवार पूरा । अभाव के मारे ये दोनों पति-पत्नी केवल पांच हजार रुपए में बेटा बेच आए। तब भव्या का कहना था कि मन तो रोता था, लेकिन उसकी जिंदगी संवर जाएगी। हम उसे क्या दे सकते थे। भव्या की सास ने बहुत रोका,चीखी-चिल्लाई, लेकिन डील हो चुकी थी।
अब भव्या ने अपनी नवजात बेटी के साथ भी यही किया है। नंदू भी इन सबमें शामिल है। इस बार का सौदा थोड़ा बेहतर है। बच्ची गोद लेने वाले ने पांच हजार नकद दिए हैं और नंदू का आठ हजार रुपए का पुराना कर्ज चुकाने का वादा भी किया है। भव्या के नौ माह के गर्भ और दर्द की कीमत तेरह हजार रुपए लगी है। त्योहार है। खूब खरीद-फरोख्त जारी है, लेकिन ऐसा व्यापार? दिल दहल जाता है। खून सूखने लगता है। लगातार दो बार यह स्त्री अपनी संतान किसी और के हवाले कर चुकी है। कोई उम्मीद नहीं कि वह कभी उसे देख पाएगी, छू सकेगी। यह संवेदनाओं का खात्मा है या गरीबी का अभिशाप। शायद संवेदनाओं को पलने के लिए भी रोजी-रोटी का सहारा चाहिए। अभाव में जब संतान पेट में आ सकती है तो फिर उसे पालने-पोसने का संकल्प क्यों नहीं? क्या अपना कलेजा किसी को सौंप देना आसान है। वे बच्चे जो मां के दूध से लगे हैं, यकायक दूर हो जाते हैं। कितना कठिन फैसला होगा यह मां के लिए और संतान, उसका तो यह फैसला भी नहीं।
लगातार दो बार अपने बच्चों को बेचने की घटना हैरान करती है, वह मामूली राशि के लिए। भव्या कहती है, मैं बच्चे बेच नहीं रही हूं। बस उनकी परवरिश बेहतर हो जाए। ओह... यह कैसी परवरिश होगी, जो मां के बगैर हो और कैसी दुनियादारी कि जहां धन है, वहां बच्चे नहीं और जहां बच्चे हैं वहां धन नहीं। धन के गणित ने बच्चों से उनके माता-पिता छीन लिए। यहां यह भूमिका यमराज ने नहीं, माया ने अदा की है। जयपुर में ऐसी कई भव्याएं हैं। त्योहार के इस शुभ मुहूर्त में जीवन भी बिक रहे हैं।?
painting by husain baba.

Thursday, September 17, 2009

हर चेहरा विदा....


क्या वाकई तिथियों के साथ गम भी विदा हो जाते हैं ? काश यादों का भी तर्पण हो सकता और यदि नहीं तो कागे की जगह एक बार ही वह दिखाई दे जाता जिसके लिए आँखों से नमी का नाता टूट ही नहीं पा रहा है.
सांझ
सां .....झ
हर चेहरा विदा.

अन्तिम तीन पंक्तियाँ कवि अशोक वाजपेयी की हैं जो उन्होंने 1959 में लिखी थीं । क्या वाकई हर चेहरा विदा है? विदा होते ही सब कुछ खत्म हो जाता है कि कुछ रह जाता है तलछट की तरह। सालता, भिगोता, सुखाता और फिर सराबोर करता। कभी किसी प्रेम में डूबे को देखा है आपने? एक ऐसे सम पर होता है जहां चीजें एक लय ताल में नृत्य करती हुई नजर आती हैं। इतना सिंक्रोनाइज्ड कि कोई चूक नहीं। समय से बेखबर बस वह उसी में जड़ हो जाता है। यह जड़ता तब टूटती है जब दोनों में से कोई एक बिखरता है। विदा होता है। अवचेतन टूटता है। चेतना जागती है। तकलीफ, दुख, पीड़ा जो भी नाम दें, सब महसूस होने लगते हैं। एहसास होता है जिंदा होने का। एहसास होता है उस ...ताकत का जो इस निजाम को चला रही है। इससे पहले तक लगता है जैसा हम चाह रहे हैं वही हो रहा है। हमने यह कर दिया, वह कर दिया। हमारे प्रयास से ही सब बेहतर हुआ। फिर पता चलता है कि आपके हाथ से सारे सूत्र निकल गए। आप खाली हाथ रह जाते हैं और वह उड़कर जाने किस जहां में खो जाता है। उस दिन आपको यकीन होने लगता है कि आपकी हस्ती से बड़ी कोई बहुत बड़ी हस्ती है जिसके चलाए सब चल रहे हैं। यह सृष्टि भी और इसमें जी रही चींटी भी। आपकी बिसात कुछ नहीं। यह आपको अपनी हार लग सकती है। आप ठगे से रह जाते हैं कि जिसकी आवाज कानों में मिश्री घोला करती थीं... बांहें भरोसा देती थी... आंखें उम्मीद बंधाया करती थी.... वह आज नहीं है। वह खत्म है। अतीत है। उसके साथ थां जुड़ गया है। नाम के आगे स्वर्गीय लगाना पड़ रहा है और नगर निगम ने उसका मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया है। यह सब एक जिंदा शख्स को मृत्यु की कगार पर लाने से कम नहीं होता है। जीते जी मरने की यह तकलीफ सिर्फ वही पाता है जिसका अपना उससे विदा ले गया हो।
1987 में वाजपेयी जी ने फिर लिखा विदा शीर्षक से-
तुम चले जाओगे
पर थोड़ा-सा यहां भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सोंधी सी गंध
भोर के उजास में
थोड़ा सा चंद्रमा
खंडहर हो रहे मंदिर में
अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार।

तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति
छंद की तरह गूंजता
तुम्हारे पास होने का अहसास।

तुम चले जाओगे
और थोड़ा सा यहीं रह जाओगे!
यही अंत में शुरूआत है? यह कोशिश होती है चीजों को बड़े फलक पर देखने की। एक कमरे से घर, घर से शहर, शहर से देश और देश से दुनिया और दुनिया से ब्रह्मांड को देखने की। इस तुलना में आपको अपना गम छोटा लगने लगता है। सूरज आपको अस्त होता हुआ लगता है लेकिन वह कहीं उदय हो रहा होता है। अंत कहीं नहीं है। एक चक्र है जो चलता है सतत निर्बाध जब हमारे मन का होता है तब हमें भी सब चलता हुआ लगता है और जब नहीं होता तब खंडित होता हुआ। एक और कवि हरिवंश राय बच्चन की बात गौर करने लायक है। मन का हो तो अच्छा है और मन का न हो तो और भी अच्छा। गौर कीजिएगा। शायद जिंदगी आसान हो जाए.

Saturday, September 5, 2009

हाउ अनहैप्पी इज हर टीचर्स डे ?


happy teachers day की ध्वनियों के बीच वह कहीं उदास कोने में बैठी होगी.लड़ रही होगी हालात से.बिखर रही होगी या शायद बिखरकर जुड़ रही होगी वह 14 की और प्रिंसिपल 48
शिक्षक दिवस यानी डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन। हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति और एक समर्पित शिक्षक। हमेशा की तरह इस दिन को भी श्रद्धा भाव से मनाने की कोशिश थी। गुरु को ईश्वर से भी बड़ा दर्जा देने वाले इस देश की परंपरा में कुछ और विचारने का मन भी नहीं करता, लेकिन जब जयपुर के महाराजा पब्लिक स्कूल के संचालक और प्रिंसिपल का कृत्य उजागर हुआ तो लगा जैसे शिक्षक ही इस परंपरा को चुनौती दे रहे हैं। वे इस दर्जे से नाखुश हैं। यह वाकये का सामान्यीकरण करने की कोशिश नहीं है, लेकिन अनेकानेक घटनाएं हैं, जो नैतिक पतन की ओर इशारा करती हैं। हमें यह बिलकुल नहीं भूलना चाहिए कि दुष्कर्म की शिकार इस बच्ची की उम्र चौदह है और अपराधी की 48।
रिपोर्टर की छानबीन बताती है कि दुष्कर्म के बाद स्कूल संचालक ने लड़की को अच्छे नंबरों से पास करने का लालच दिया। लड़की की मां ने ताड़ लिया था, लेकिन डर के मारे उसने कुछ भी नहीं बताया। दूसरे दिन उसने वही हरकत फिर दोहराई। लड़की की पीड़ा अब सब्र तोड़ चुकी थी। उसने सब-कुछ मां को बता दिया। किशोरी की तकलीफ देखिए। अबोध की बात पर विश्वास न करते हुए परिजनों ने पहले उसका परीक्षण कराया और फिर मुकदमा दर्ज कराया। तीन दिन आईसीयू और एक दिन जनरल वार्ड में रहने के बाद सोमवार को पीड़ित बालिका को छुट्टी दे दी गई। वह तीन दिन तक चलने-फिरने की हालत में नहीं थी। जरा संभली ही थी कि सरकार की ओर से पांच लाख की एफडी और पुनर्वास के संकेत मिल गए। पांच लाख रुपए का ही एक ओर प्रस्ताव आरोपी की तरफ से भी आया है कि कोर्ट-कचहरी ना करें, मामाला बाहर ही सुलटा लें। पीड़िता के दादाजी कातर स्वर में किसी से यह बात साझा कर रहे थे। 'हम गरीब इसके आगे कहां टिक पाएंगे', यही शब्द थे उनके। समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति एक गरीब बच्ची और उसके परिवार की प्रतिष्ठा से खेल गया था। फिर सभी पैसों से उसकी भरपाई करने में लगे थे। इस कवायद में हमें ध्यान रखना होगा कि वह लड़की एक सामान्य लड़की ही बनी रहे। अकेले कर दिए जाने का पूरा खतरा है यहां। एक महिला पुलिसकर्मी (जो अस्पताल में उसकी रक्षा के लिए थी) का कहना था कि पांच लाख मिल गए लड़की, तेरा तो बुढ़ापे तक का इंतजाम हो गया...। दरअसल कुकर्म के प्रति क्षतिपूर्ति का यह अंदाज ही अपराध की आग में घी डालता है। किशोरियों पर कहर की बढ़ती घटनाओं से लगता है कि जैसे इस उम्र को समझने का हमारा कोई इरादा नहीं है। इस उम्र में जब लड़की स्वयं ही एक अनजाने अपराधबोध से घिरी होती है, हम भी उसे भरोसा नहीं दे पाते। जो बिटिया दस साल तक खेलते-कूदते बड़ी हो रही होती है, अचानक अपने माता-पिता की आखों में चिंता के भाव देखने लगती है। बड़ी हाने का यह आभास उसे उन्हीं से होता है। यह सब मित्रवत न होकर भयग्रस्त कराते हुए होता है। इसी समय का लाभ शातिर अपराधी लेते हं। ...और शेष समाज? कभी किसी किशोरी से पूछिएगा। खासकर निम्न-मध्य वर्ग की लड़की। स्कूल से घर तक सैकड़ों निगाहें उसे ऐसे देखती हैं जैसे कोई अजूबा जा रहा हो। आंखों से शरीर भेदती ये निगाहें उसे खुद की नजरों में ही हीन साबित कर देती हैं। स्कूल से बाहर लगा जमावड़ा कभी फिकरे कसता है तो कभी स्पर्श करता हुआ रफूचक्कर हो जाता है। कोई रोज प्रणय निवेदन की रट लगाए हुए घर तक पीछा करता है। अलवर शहर की चालीस लड़कियों ने ऐसी ही छेड़ -छाड और प्रताड़ना से तंग आकर स्कूल छोड़ दिया . परिजन यह दृश्य देखकर लड़की पर ही शक करते हुए उसे कोसना शुरू कर देते हैं। जिस समाज में लड़की के आने पर लक्ष्मी आई है... लक्ष्मी आई है...जैसे शब्दों का मरहम देना पड़ता है, वहां उसके सहज सामान्य विकास की कल्पना बेमायने है। उसकी कमजोर उपस्थिति ही अपराधों की लंबी फेहरिस्त बनाती है।
किशोरियों का बुनियादी हक शिक्षा अब भी उनसे दूर है। कई रोड़े हं उसमें। जाहिर है यह विकास आधा-अधूरा है। जब तक इस तबके तक विकास और विश्वास का संचार नहीं होगा देश की तरक्की नामुमकिन है। कुछ चमक जरूर नजर आती है, लेकिन यह सड़े हुए गोबर पर चांदी के वर्क से ज्यादा कुछ नहीं है।