Monday, June 29, 2009

न्यू यॉर्क के बहाने...


स्लमडॉग मिलिनेअर के बाद, कल संडे को थिएटर का रुख किया। फिल्मों के मामले में खांटी भारतीय हूं, न्यू यॉर्क तक चली गई।[लगा था की फिल्म एवेंइ होगी] अंधेरे में चमकती रुपहली स्क्रीन स्पंदित करती है और न्यू यॉर्क ने तो दिल और दिमाग दोनों को। कबीर नाम से गहरा फेसिनेशन रहा है। चक दे इंडिया का पात्र कबीर खान भी पसंद रहा. संत कबीर के प्रति गहरी आसक्ति है और अब कबीर खान यानी न्यू यॉर्क के डायरेक्टर।
क्या खास है जो न्यूयार्क पर लिखने के लिए बाध्य करता है। कैटरीना, जॉन या नील नितिन मुकेश या फिर हमारे जयपुर के इरफान खान? लेकिन वह घटना जो अमरीकी इतिहास में नासूर की तरह दर्ज हो गई। 9/11 का हादसा कई दिलों में नश्तर चुभो गया। पहले मरने वालों के परिजनों के दिलों में और फिर एक खास मजहब के सीनों में। दर्द में कराहते अमरीका में उन दिनों एफबीआई ने 1200 लोगों को हिरासत में लेकर तफ्तीश की थी जिनका बस नाम ही काफी था। इन कथित कैदियों के दिलों में चुभे नश्तर से फूटता लावा ही न्यू यॉर्क है।
प्रख्यात स्तंभकार आदरणीय जयप्रकाश चौकसे जी सही फरमाते हैं कि पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए´ देखने के बाद न्यू यॉर्क क्लासिक नहीं लग पाती। बाअदब सौ फीसदी सही लेकिन 'सर खुदा के लिए'... आज कितने भारतीय देख पाए हैं। new york ke liye जयपुर का फर्स्ट सिनेमा खचाखच भरा था। जॉन, कैटरीना जैसी पॉपुलर स्टार कास्ट युवाओं को गर्मी भरी दोपहरी में हॉल तक खींच लाई थी। इतनी बड़ी तादाद में कॉलेज गोइंग यूथ को खुदा के लिए...में देख पाना संभव नहीं।
उमर एजाज (नील नितिन मुकेश) को पहले एक मासूम प्रेमी और फिर एफबीआई के लिए इस्तेमाल होते देखना कतई यह आभास नहीं देता कि वे कमजोर कलाकार हैं। ही लुक्स गुड...। उनके दादा और बेहतरीन गायक मुकेश अभिनेता बनने ही मायानगरी आए थे। ख्वाब तीसरी पीढ़ी में साकार हुआ। इरफान खान स्लमडॉग... में भी एक निरपराध अपराधी को डिटेन कर रहे थे और यहां भी . वहां भारतीय खाकी वर्दी का बोझ था यहां एफबीआई का रौब है। इटालियन बीबी का बनाया पास्ता खाकर भले ही उनका पेट गड़बड़ाया हो लेकिन अंत में आतंकी इरादों वाले पिता के बच्चे के आग्रह पर पास्ता खाना टाल नहीं पाते। यही शायद मैसेज भी है कि अन्याय के बावजूद नफरत की पुरानी दुनिया में तड़पने की बजाए उम्मीद की नई दुनिया हमें ही रचनी होगी। हैट्स ऑफ कबीर खान। यहां junoon सा सीने में दिखाई देता है ... मसालों और तड़कों के बीच पौष्टिक आहार देने का। यही शायद सिनेमा का उद्देश्य है। न्यू यॉर्क के बहाने ही सही देश में भी ऐसे हालात रचने से हमें भी बचना होगा।

Tuesday, June 16, 2009

अब कोई अवतार नहीं होनेवाला


विख्यात पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा के व्याख्यान की समापन किस्त
हम पढे़-लिखे देश भी हो रहे हैं। साक्षर देश भी हो रहे हैं। जिम्मेदार निर्वाचन कानून बनाने से मतदाता जिम्मेदार नहीं होगा। और चुनाव आयोग के बूते की भी नहीं है कि वह अपराधियों की पूरी पहचान कर ले। कई बार बडे़ अपराधी भी बडे़ सफेदपोश बन जाते हैं। बडे़ अच्छे रिकॉर्ड्स ले आते हैं। थाने से पंचनामा ही फड़वा देते हैं। तो कई सारा छल-छद्म इसमें होता है। लेकिन मैं शाहिद मिर्जा यदि जयपुर का निवासी हूं तो मैं जानता हूं कि मेरे सांसद महोदय कैसे हैं? किस माजने के हैं? कितने पढे़-लिखे हैं? कितने सक्रिय रहेंगे? जनता से उनको कितना लगाव है? है या नहीं? लेकिन मैं तो पलायनकारी हूं। ना मैं काम करने जाता हूं। मुझे कोई मतलब ही नहीं है कि देश में किस अदा से काम चल रहा है। खासतौर पर शिक्षित मध्यवर्ग है। इसके बारे में पवन वर्मा ने बहुत सुंदर किताब लिखी है, ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास। उन्होंने कहा कहा कि भारत की आजादी लाने वाले यही लोग हैं। लेकिन ये ही अब चोट्टे हो गए हैं। ये ही सबसे अधिक भ्रष्ट हो गए हैं। ये शाम को कहते हैं कि देश में बहुत भ्रष्टाचार है ओर सुबह ही थैली लेकर मंत्री के घर पहुंच जाते हैं। साहब हमारे काम करवा दीजिए। तीन ठेके हैं, सर, अंकल। यह तो बहुत जरूरी है। यह तो करने ही पडे़गे और ये, ये तो रीति नीति है। यह तो भीतर है। इससे mukti नहीं मिलेगी तो समाज को भी mukti नहीं मिलेगी, और लोकतंत्र हमारा दूषित और कलंकित बना रहेगा। इसको छोड़ना बहुत जरूरी है। धनबल से दलाल पंचों को, वार्ड पंचों को खरीद लेते हैं। विधायक को खरीद लेते हैं। भले ही वे अजीम
प्रेम जी न हो लेकिन छुटभैय्ये प्रेमजी का अपराधियों से प्रेम अनवरत चल रहा है। तो उन्हें कौन रोकेगा। मेरा निवेदन है कि अब कोई अवतार नहीं होने वाला है। सब अवतार हो गए। महात्मा बुद्ध हो गए। कृष्णावतार हो गए। दशावतार हो गए। जीसस क्राइस्ट को सलीब ठोक दी। सुकरात को जहर पिला दिया। अब कुछ होने वाला नहीं है। अगर यह दुनिया खराब बन रही है तो यह हमारे कारण बन रही है। और अच्छी सुन्दर और रहने लायक सहनशील और सरस बनेगी, तो भी हमारे कारण ही बनेगी।
अलग-अलग पेशों से राजनीति मे कोई दिक्कत नहीं हैं। गोल्डन मेयर इजराइल के बहुत अच्छे प्रधानमंत्री साबित हुए। इजराइल मंे जो कंसेप्ट है उसमें मीडिया के नुमाइंदों को बुलाकर रखते हैं। फौज के नुमाइंदों को रखते हैं। जब भारत इतने सारे घोषित और अघोषित शत्रुओं से घिरा हुआ है तो फौज के 12 लोग नामांकित क्यों नहीं होते? उन्हें भी आप सहयोग करें। आप यह कल्पना करें कि फील्ड मार्शल मॉनेक शॉ जीत कर आ जाएंगे तो आप उनकी जमानत जब्त करवा देंगे। वो कैपैन नहीं करेंगे। हाथ नहीं जोड़ेंगे, वो झुकेंगे नहीं। वो झूठे वादे नहीं करेंगे तो हार जाएंगे। उनकी तो जमानत जब्त होगी। वो बुढ़ापे में यह अपमान क्यों सहन करें? तो हमारे कानून में कुछ होना चाहिए कि जहां पाकिस्तान की सीमा लगी है, जहां तालिबान खडे़ हो रहे हैं, जहां चीन से सीमा लगी है, जहां यांमार में हमारे खिलाफ ट्रेनिंग कैम्प्स लगते हैं। जहां 2000 आतंकी प्रशिक्षण शिविर पाक अधिकृत कश्मीर में हैं। बांग्लादेश में हैं।
लक्षद्वीप को लेकर श्रीलंका हमें आंख दिखाता है। मालदीव कहता है कि लक्षद्वीप हमारे हैं। तो हम किसी गरीब की जोरू क्यों बनना चाहते हैं? ऐसी क्या हमारी मजबूरी है? हम भारत को एक मजबूत देश क्यों नहीं बनाना चाहते? पिछली शताब्दी कुछ अमेरिकी लोगों से मुझे मिलने का मौका मिला। डेनियल वहां के भारत में राजदूत थे। तो वो बहुत दंभी होकर कहते थे दिस इज अमेरिकन सेन्चुरी। अमेरिका के लोग स्वभाव से ही दंभी हैं। सब यूरोप के जुआरी, चोर, लबारों की संतान हैं। तो ठीक है। आपकी शताब्दी थी, वो गई। अब वो अतीत हो गई। यह हमारी शताब्दी है। भारतीयों की शताब्दी।
pahle do hisse padhne ke liye side bar mein भारत महात्मा गाँधी इंदिरा गाँधी फूलन देवी शाहिद मिर्जा aur तुष्टिकरण लोकतंत्र par click keejiye

Friday, June 5, 2009

जोधाराम ही जोजेफ क्यों बनते हैं?


ख्यात पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा के व्याख्यान का दूसरा हिस्सा
कोई जमील खां, जोजेफ क्यों नहीं बनते? जोधाराम ही जोजेफ क्यों बनते हैं? दंगे से वो भी परेशान हैं। बेरोजगार वो भी हैं। अदक्ष तो वो भी हैं। जैसे जोधाराम हैं वैसे जमील खां हैं। तो इस पर विचार करना चाहिए। मैं हिन्दू नेताओं से कहता हूं। खासतौर पर विश्व हिन्दू परिषद के सभी लोगों से मिलने-जुलने का मौका मिल जाता है। जाति प्रणाली का जिक्र इसलिए किया कि वो अपना उम्मीदवार बनाते हैं। तब यह ध्यान रखते हैं कि अच्छा वो गांव है, यादवों का है। किसी यादव को टिकट दे दो। कोई यादव गाजियाबाद से क्यों नहीं? यादव है तो क्या दिक्कत है। उसे वहां से चुनाव लड़ने दो। मतलब आदमी को भी जाति का टूल बना लिया है और यह बहुत विभाजन करेगा। वोट बैंक पॉलिटिक्स भी इसीलिए हो रही है। तथाकथित तुष्टीकरण की पॉलिटिक्स भी इसी कारण हो रही है। जयपुर विश्वविद्यालय से आई थीं प्रोफेसर। मैंने उनसे कहा कि तुष्टीकरण से मुसलमान का रत्तीभर भी फायदा नहीं होगा। मुसलमान को दो बीघा जमीन नहीं मिली। उनको उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण नहीं मिला। जॉब का वादा नहीं मिला। जीवन जीने की सुरक्षा और दंगे के खिलाफ कभी सुरक्षा का वादा नहीं मिला। तो तुष्टीकरण क्या है? यह फसाद है, एक छल है, छद्म है। आपने रख लिया और आप भूल गए। मैंने कहा जिम्मेदारी से बोलिए। अब मैं मूल विषय पर आता हूं। नई दिल्ली से आई डॉ. सुषमा यादव ने कल सुबह कहा था कि राजनीति में सभी को आने दो। गुलदस्तां बनने दीजिए। हमें आपत्ति होनी चाहिए कि कोई जुआरी, चोर, लबार,लम्पट,गुण्डा, डकैत, हत्यारा संसद में नहीं पहुंचे और प्रायश्चित करे तो फूलनदेवी भी पहुंच जाए। कोई दिक्कत नहीं है। सुधरने का अवसर मिलना चाहिए। अंग्रेजी में तो कहावत है कि एवरी सैंट हैज पास्ट एंड एवरी सिनर हैज अ फ़्यूचर। अपराधी का भविष्य है। संत का अतीत है। अतीत को वो दबाकर रखना चाहता है। पता नहीं क्या था? वो बताना नहीं चाहता। संत बन गए तो उनकी पूजा होती रहती है। लेकिन अपराधी के सामने तो भविष्य है। जब वह अपने पाप से तौबा कर लेगा, तो उसको एक अच्छा आदमी बने की मुख्यधारा में आने की, जनप्रतिनिधि बनने की आजादी होनी चाहिए। लेकिन, जो भूमाफिया है, कातिल है। वो संसद या विधानसभा का सदस्य तो क्या ,पार्षद नहीं बनना चाहिए। ग्राम पंचायत में हम लठैतियों को ही क्यों चुनते हैं? यह किसकी जिम्मेदारी है। कैसे लोग आएं? हमारे सांसद का आचरण कैसा हो? संसद अच्छा गुलदस्ता कैसे बने? यहां कोई पैगंबर नहीं आने वाला है। यह तो हमें ही देखना पडे़गा। हम अपने वोट का इस्तेमाल कैसे करें? 1977 में इंदिरा जी को अपदस्थ करने के लिए जयप्रकाश नारायण जी आए। मैं भी उसमें था, यूथ फोर डेमोक्रेसी के लोग थे। छात्र संघर्ष युवावाहिनी के लोग थे, हमने बूथ पर जाते लोगों को देखा कि लोग रात को ही वोट नहीं छाप लें। हम मतपेटियों की हिफाजत करते थे, तो यदि हम एक चौकन्ना लोकतंत्र है। चौकन्ना मतदाता है तो हमारी राजनीतिक पार्टियाँ भी चौकन्नी बनेंगी। राजनीतिक पार्टियाँ के घोष्णा-पत्र केवल अखबार वालों को दिखाने के लिए नहीं छापे जाएंगे। हमें उन्हें जिम्मेदार बनाना होगा। आखिरकार हमने यह शैली चुनी तो फिर इकबाल की उस पंक्ति की तरह नहीं हो सकते कि जम्हूरियत तर्ज़ ए हुकूमत में बंदों को गिना करते हैं, तौला नहीं करते।´
ठीक है। संख्याबल का महत्व है। बहुमत व्यवस्था का कोई अर्थ होगा कि 100 में से 51 आपके हैं तो आप जीते तो इस पर सवाल हो सकता है। लेकिन जब शैली यह हमने चुन ली, तो इसको दायित्ववान बनाना, इसको जवाबदेह बनाना, ये सभी हमारे काम होने चाहिए। इसे कोई दूसरा थोड़े ही करेगा। तो सभी को आने दीजिए। कलाकार को आने दीजिए। पत्रकार को आने दीजिए। अभिनेता को आने दीजिए। लता मंगेशकर को बुला लिया। और वे संसद में एक दिन नहीं आईं। युसूफ भाई दिलीप कुमार भी शायद एक ही दिन आए हैं। कभी बोले नहीं। विनोद खन्ना आए। शत्रुघ्न सिन्हा आए। ये खूब बोले। राजेश खन्ना चुनकर आए। नरगिस दत्त कुछ बोलती थी, लेकिन एक सुन्दर चेहरा था। 12-13 चेहरों में नामांकन राष्ट्रपति कर सकता है। लेकिन उसमें अलग अलग चेहरे नहीं होते। उसमें स्वास्थ्य के लोग होते ही नहीं, फौज में से लोग नहीं आते। शंकरराय चौधरी राज्यसभा में चले गए। लेकिन निर्वाचन से आए। उन्हें उन 12-13 लोगों में नहीं रखा। 237 की जो हमारी राज्यसभा है उसकी संख्या बढ़ानी चाहिए। अच्छा कोई प्रशासक है। किसी ने कोई बहुत अच्छा काम किया है। तो उसको संसद में लेकर आइये। उसके अनुभवों का लाभ लेने में क्या दिक्कत है?
परगट सिंह अच्छा खिलाड़ी था या सुनील गावस्कर अच्छा क्रिकेटर था तो वे संसद में आकर खेल नीति बनावें और तभी उसका योगदान है। हमारे यहां खेलमंत्री ऐसे आदमी को बनाते हैं, जिसने जीवन में कभी खेल ही नहीं खेला हो। भ्रष्टाचार का खेल किया इसके अलावा उसे दूसरा खेल आता ही नहीं है। और हम उसे खेल मंत्री बना दें। फिर कहते हैं कि हमारा तो मैडल जीतने वालों में नाम ही नहीं हैं। और वह नेता तो टीम के राइट्स को लेकर भी पैसे खा जाता है। तो यह हमें देखना है।