Wednesday, April 22, 2009

वंदे मातरम्-यानी मां, तुझे सलाम

आज मेरे अराध्य शाहिद मिर्जा का लेख आपकी नजर। यह 2006 में राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।

यह अफसोसनाक है कि राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लेकर मुल्क में फित्ने और फसाद फैलाने वाले सक्रिय हो गए हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने तय किया कि 7 सितम्बर वंदे मातरम् का शताब्दी वर्ष है। इस मौके पर देशभर के स्कूलों में वंदे मातरम् का सार्वजनिक गान किया जाए। इस फैसले का विरोध दिल्ली की जामा çस्जद के इमाम (वे स्वयं को शाही कहते हैं) अहमद बुखारी ने कर दिया। बुखारी के मन में राजनीतिक सपना है। वे मुसलमानों के नेता बनना चाहते हैं। बुखारी को देश के मुसलमानों से कोई समर्थन नहीं मिला। देश के मुसलमान वंदे मातरम् गाते हैं। उसी तरह जैसे कि `जन-गण-मनं गाते हैं। `जन-गण-मनं कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेज शासक की स्तुति में लिखा था। बहरहाल जब `जण-गण-मनं को आजाद भारत में राष्ट्रगान का दर्जा दे दिया गया तो देश के मुसलमान ने भी इसे कुबूल कर लिया। `सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारां एक सरल और सांगीतिक गान था लेकिन एकाधिक कारणों से उसे राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान का दर्जा नहीं मिल सका। इसके बावजूद कि कोई बाध्यता, अनिवार्यता नहीं है, राष्ट्रीय दिवसों पर `सारे जहां से अच्छा...जरूर गाया जाता है। यह स्वतःस्फूर्त है। भारत का गुणगान करने वाले किसी भी गीत, गान या आव्हान से देश के मुसलमान को कभी कोई एतराज नहीं रहा। आम मुसलमान अपनी गरीबी और फटेहाली के बावजूद भारत का गान करता है। सगर्व करता है। एतराज कभी कहीं से होता है तो वह व्यक्ति नेता मौलाना या इमाम विशेष का होता है। इस विरोध के राजनीतिक कारण हैं। राजनीति की लपलपाती लिप्साएं हैं। कभी इमाम बुखारी और कभी सैयद शहाबुद्दीन जैसे लोग मुसलमानों के स्वयं-भू नेता बनकर अलगाववादी बात करते रहे हैं। ऐसा करके वे अपनी राजनीति चमका पाते हैं या नहीं, यह शोध का विषय है लेकिन देश के आम मुसलमान का बहुत भारी नुकसान जरूर कर देते हैं। आम मुसलमान तो .आर. रहमान की धुन पर आज भी यह गाने में कभी संकोच नहीं करता कि `मां, तुझे सलाम...इसमें एतराज की बात ही कहां है? धर्म या इस्लाम कहां आड़े गया? अपनी मां को सलाम नहीं करें तो और क्या करें? अपने मुल्क को, अपने वतन को, अपनी सरजमीन को मां कहने में किसे दिक्कत है? वंदे मातरम् का शाब्दिक अर्थ है मां, तुझे सलाम। इसमें एतराज लायक एक भी शब्दनहीं है? जिन्हें लगता है वे इस्लाम और उसकी गौरवपूर्ण परंपरा को नहीं समझते। इस्लामी परंपरा तो कहती है कि ` हुब्बुल वतन मिनल ईमानं अर्थात राष्ट्र प्रेम ही मुसलमान का ईमान है। आजादी की पहली १८५७ में मुगल बादशाह बहादुर शाह `जफरं की अगुवाई में ही लड़ी गई। फिर महात्मा गांधी के नेतृत्व में बादशाह खान सरहदी गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, डॉ. जाकिर हुसैन, डॉ. सैयद महमूद, यूसुफ मेहर अली, सैफउद्दीन किचलू, एक लम्बी परंपरा है भारत के लिए त्याग और समर्पण की। काकोरी काण्ड के शहीद अशफाक उल्लाह खान ने वंदे मातरम् गाते हुए ही फांसी के फंदे को चूमा। कर्नल शाहनवाज खान, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के विश्वस्त सहयोगी थे। पाकिस्तान के साथ युद्धों में कुर्बानी का सिलसिला है। ब्रिगेडियर उस्मान, हवलदार अब्दुल हमीद से लेकर अभी करगिल संघर्ष में मोहत काठात एक देशभक्त और कुर्बानी की प्रेरक कथाएं हैं। इन्हें रचने वाला देश का आम मुसलमान भी है।वंदे मातरम् हो या जन-गण-मन, आपत्ति आम मुसलमान को कभी नहीं रही। वह मामूली आदमी है। शिक्षित नहीं है। अच्छी नौकरियों में भी नहीं है लेकिन ये सारी हकीकत देश प्रेम के उसके पावन जज्बे को जर्रा भर भी कम नहीं करती। साधारण मुसलमान अपनी `मात भौमं से बेपनाह मुहब्बत करता है, अत्यनत निष्ठावान है और उसे अपने मुल्क के लिए दुश्मन की जान लेना और अपनी जान देना बखूबी आता है। अपने राष्ट्र प्रेम का प्रमाण-पत्र उसे किसी से नहीं चाहिए।राष्ट्रगीत को लेकर इने-गिने लोगों की मुखालिफत को प्रचार बहुत मिला। बिना बात का बखेड़ा है, क्योंकि बात में दम नहीं है। मुल्क के तराने को गाना अल्लाह की इबादत में कतई कोई खलल नहीं है। अल्लाह तो लाशरीकलहू (उसके साथ कोई शरीक नहीं) ही है और रहेगा। अल्लाह की जात में कोई शरीक नहीं। बहरहाल मुसलमानों का भी अपना समाज और मुल्क होता है। जनाबे सद्र एपीजे अब्दुल कलाम अगर चोटी के साइंटिस्ट हैं तो उनकी तारीफ होगी है, मोहम्मद कैफ अच्छे फील्डर हैं तो तालियां बटोरेंगे ही, सानिया मिर्जा सफे अव्वल में हैं तो हैं, शाहरुख खान ने अदाकारी में झंडे गाड़े हैं तो उनके चाहने वाले उन्हें सलाम भी करेंगे। इसी तरह बंकिम चन्द्र चटर्जी का राष्ट्रगीत है। शायर अपने मुल्क की तारीफ ही तो कर रहा है। ऐसा करना उसका हक है और फर्ज भी। कवि यही तो कह रहा है कि सुजलाम, सुफलाम, मलयज शीतलाम। कवि ने मातृभूमि की स्तुति की। इसमें एतराज लायक क्या है। धर्म के विरोध में क्या है? जिन निहित स्वार्थी तत्वों को वंदे मातरम् काबिले एतराज लगता है वो अपनी नाउम्मीदी , खीझ और गुस्से में दो रोटी ज्यादा खाएं लेकिन इस प्यारे मुल्क के अमन-चैन और खुशगवार माहौल को खुदा के लिए नजर नहीं लगाएं। वंदे मातरम्

Wednesday, April 15, 2009

मैं सोना को जानती हूं



आज बात एक प्यारी सी लड़की की। नाम है सोना। वाकई सोने जैसी ही दमकती है वह। लेकिन भीतर एक तूफान है। अठारह की उम्र में पहाड़ सा तूफान। बमुश्किल आठवीं पास होगी निम्नवर्गीय परिवार की यह लड़की। पिता नहीं है मां के साथ चारों भाई-बहन रहते हैं। सभी छोटे-मोटे काम करते हैं। गुजारे के लिए। सोना से भी मां की यही अपेक्षा है। वह उसे कैटरिंग के काम के लिए भेजती है। कोई बिचौलिया आता है लड़कियों को साथ ले जाता है। वे समारोहों में खाने की मेज पर खड़ी हो जाती हैं। मेजबान की शान बढ़ती है कि हमने भोजन परोसने के लिए लड़कियों को रखा है। कभी पूरी शाम तो-कभी रात के एक बजे तक वे सब यूं ही हंसती-मुस्कराती खड़ी रहती हैं। इस काम के जयपुर में डेढ़ सौ और जयपुर से बाहर यानी कोटा, सीकर, अलवर तक जाने के ढाई सौ रुपए मिलते हैं। ब्याह समारोह का मौसम नहीं होता तो सोना और ये लड़कियां किसी फिल्म या शूटिंग में ले जाई जाती हैं। कभी फूल बरसाती हैं तो कभी नाचती हैं बतौर एक्स्ट्रा। सोना को शादी कैटरिंग से यहां फिर भी थोड़ा ठीक लगता है। एक बार शादी में किसी लड़के ने उससे पूछ लिया था एक रात का कितना लोगी...? उसका जी किया कि उस आदमी के मुंह पर एक जोरदार तमाचा जड़ दे लेकिन साथ वाली लड़की ने रोक दिया। और वह पूरी तरह जड़ हो गई।
सोना को यह काम बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता। उसने मां से कई बार कहा भी लेकिन मां का कहना है कि तेरी शादी में पैसा लगेगा कहां से लाऊंगी। कहने को दो भाई हैं लेकिन वे भी कुछ खास कमा नहीं पाते न ही उनके मन में ऐसा कोई भाव है कि बहनें उनकी ज़िम्मेदारी हैं। बड़ी बहन की शादी मां ने की थी लेकिन उसका ससुराल उससे घृणित अपेक्षाएं रखता था वो सब छोड़कर मां के पास आ गई। सोना की मां सोना को आलसी और मुंहजोर मानती हैं क्योंकि वह उनसे कह चुकी है कि आप मेरे पीछे क्यों पड़ी रहती हैं। भाई को क्यों नहीं काम पर भेजती। अब तो भाई भी सोना से चिढ़ता है। वह उसे अपशब्द भी कहता है और मां से भी लड़ता है। सोना दिन रात यही प्रार्थना करती है कि या तो उसे मौत आ जाए या फिर एक अच्छा लड़का उसे ब्याहकर ले जाए। सोना पूछती है- मैं जब रात को देर से लौटूंगी तो कौन लड़का मुझसे ब्याह करेगा। मां को यह बात क्यों नहीं समझ आती? मुझसे कई लड़के बात करने की कोशिश में रहते हैं पर मुझे यह सब पसंद नहीं । मां ने एक लड़का पसंद भी किया था, मुझे भी ठीक लगा था लेकिन फिर जन्मपत्री नहीं मिली। मां कहती हैं लड़के तो बहुत हैं पर पैसा मांगते हैं इसलिए सोना से कहती हूं मेहनत करने को। कोई काम बुरा नहीं होता। सोना दुखी रहने लगी सुर्ख चेहरा पीला पड़ने लगा है। क्या इतनी मुश्किल है हमारे यहां लड़कियों की शादी? माफ कीजिएगा गरीब लड़की की शादी। सोना को इंतजार है कोई तो आएगा उसका हाथ मांगने। लड़की की शादी को सर्वोपरि मानने वाले हमारे समाज में ही लड़की की शादी इतनी मुश्किल क्यों?

Friday, April 3, 2009

नो मोर फूल


पिछले सप्ताह जयपुर में एक युवती की कथित प्रेमी ने हत्या कर दी। नाम छिपाने में कोई तुक नहीं क्योंकि हमारी पुलिस अपराधी से पहले पीडिता की सात पुश्तों का पता ठिकाना खोज लाती है। उनतीस साल की सुमन के केस में भी यही हुआ। पुलिस ने कहा, वह लड़के की प्रेमिका थी। शराब पीती थी। दावत होटल में कमरा घंटों से बुक था। लड़के ने लड़की के सारे नाज-नखरे उठाए। यहां तक कि स्कूटर भी खरीदकर दिया। और जब लड़का सुमन के ऐशोआराम का खर्च न उठा सका तो लड़की ने मिलना-जुलना बंद कर दिया। लड़के को बुरा लग गया और उसने लड़की का गला दबाकर कत्ल कर दिया।
ताकत जीती अबला हारी। अफसोस, पुलिस की बयां की गई इस कहानी माफ कीजिए, तफ्तीश को अखबार जस का तस छाप देतें हैं . तहकीकात में आरोपी मनोज चावला के लिए हमदर्दी साफ नजर आती है। पुलिस ने तो कथित तहकीकात का ढिंढोरा सब जगह पीट दिया। सुमन कहां मौत की नींद तोड़कर सच्चाई बताने आने वाली है। लड़की का परिवार वह तो बिटिया के होटल में मिलने से ही अधमरा हो जाता है। उस पर लड़का, शराब यह तो किसी कलंक से कम नहीं। ये दोनों वयस्क थे। मिलना-जुलना आपसी सहमति के आधार पर कहीं भी हो सकता है। पार्क में, रेस्त्रां में या होटल में। यही मामला किसी रसूखदार का होता तो हमें आपको हवा भी न लगती। सवाल लड़की का था एक सामान्य लड़की का। जमकर कीचड़ उछाला गया। क्यों पुलिस हत्या को एक हत्या की तरह देखने की बजाए घटिया कहानियां सुनाने लगती है। लड़की है तो पहली पड़ताल उसके चरित्र हनन से ही शुरु होती है। उस मामले में तो उसे लड़के के पैसों से ऐश करने वाली भी बता दिया है। कोई कैसे एक हत्यारे से इतनी हमदर्दी रख सकता है। चावला कुंठित और हारा हुआ लड़का था। उसका कोई काम और व्यवसाय सफल नहीं हुआ। इसी बीच उसने विवाह भी कर लिया था .अब अगर उसके विवाह के बाद लड़की ने मिलना-जुलना बंद कर दिया हो तो पुलिस उसे महंगे तोहफे न मिल पाने की तोहमत लगा रही है।
इस घटना के बाद हरदम प्रेम की वकालत करने वाले भले मानस ने लड़कियों के बीच चिल्लाकर कहा- लड़कियों अगर किसी लड़के से मिल रही हो तो मत मिलना। कभी कोई हादसा भी हो जाएगा तो तुम्हारी चीर-फाड़ इसी तरह होगी। सच ही है लड़कियों को आंख मूंदकर विश्वास करना बंद करना होगा।। यहां आप छली भी जाएंगी और जान से भी हाथ धोना पड़ेगा। मूर्ख बनने के लिए अब और तैयार न रहें।