Wednesday, February 18, 2009

पब...पिंक...और...

इन दिनों स्त्री विमर्श की दिशा में दो अभियानों की चर्चा है। पब भरो और पिंक चड्डी। आज क्रिएटिविटी की दुनिया में नया करने का जो हल्ला मचा हुआ है उसमें ये दोनों ही कैम्पेन बाजी मार ले गए हैं। बेहद चर्चित। ब्लॉग, अखबार और टीवी बहसों के केंद्र में भी यही हैं। दरअसल, मंगलौर के एम्नेशिया पब में श्रीराम सेना का लड़कियों पर हमला और वेलेंटाइन दिवस पर जोड़ों की जबरदस्ती शादी करा देने जैसे फैसलों के फलस्वरूप इनकी पैदाइश हुई है। केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने पब भरने का आह्वान कर दिया तो दिल्ली की एक पत्रकार ने वेलेंटाइन्स डे का विरोध करने वालों को पिंक ..भेंट देने की पेशकश कर दी। इनसे पूछा गया कि पिंक.. ही क्यों तो उनका कहना था कि पिंक इज द कलर ऑव फन, फेमिनिज्म एंड चड्डी इज एन आइडियोलॉजी जो हम पर दबाव डाल रही है बाकी हमने लोगों के इमेजिनेशन पर छोड़ दिया है। इमेजिनेशन वाले इस आंदोलन की दशा और दिशा का अंदाजा लगाया जा सकता है। जैसा कि डिफरेंट आइडियाज वाले विज्ञापन खूब चर्चित होते हैं ठीक वैसा ही यहां भी है। सवाल यह उठता है कि कितने लोगों के हृदय आप इस कैम्पेन से बदल पाए हैं। इसकी तह में कोई नहीं जाना चाहता है और न ही ऐसा किसी का मकसद है। विरोध का यह तरीका फूहड़ और विवेकहीन भी जान पड़ता है। पब में घुसकर लड़कियों पर हमला करने वाले और साथ में बैठे लड़के-लड़कियों की शादी करा देने वालों के मानस से कम ओछी नहीं लग रही है यह सोच। पब भरने और गुलाबी रंग का वस्त्र भेंट कर देने से ही यह सोच बदल सकती है यह कल्पना ही बचकानी लगती है। अलबत्ता एक तबका है जो मान रहा है कि रचनात्मक तरीके से विरोध प्रकट किये जाने में कोई बुराई नहीं। महिलाओं को एक ही नजरिए से देखने वालों को बदलना चाहिए। कल्पना कीजिए यदि राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का अंत करने के लिए जैसे को तैसा वाला ही रास्ता अपनाया होता तो? बात जहां जीने के समान अधिकार देने की है वहां फूहड़पन के लिए क्या जगह है? राजा राममोहन राय ने स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह की वकालत की थी ताकि वह पुरुषों के साथ एक पायदान पर खड़ी हो सके। आज जब स्त्री यह पायदान साझा कर रही है तो नई तकलीफ पैदा हो गई है। इसके चलते स्त्री एक बार फिर असुरक्षित है। इस बार सामाजिक कुरीतियों से नहीं बल्कि उस वर्ग विशेष की निगाहों में जिसे स्त्री के पब जाने, लड़कों के साथ घूमने पर गहरा एतराज है। कहीं यह तेजी से बदलती स्त्री की दुनिया के साथ खुद को न बदल पाने का मलाल या कुंठा तो नहीं? पिछले दस सालों में उदारीकरण और तकनीक के दखल ने दुनिया को तेजी से बदला है। कुछ ख़ुद को बदल पाने में कामयाब रहे हैं और कुछ नहीं। अमीर-गरीब की खाई भी कुंठा का कारण बन रही है। भारतीय संस्कृति की बात करने वालों को समझना होगा कि यह किसी एक वर्ग, जाति, धर्म या समुदाय की बपौती नहीं बल्कि कई जीवंत सभ्यताओ का मिश्रण है। यह भारत की सांस्कृतिक सहनशीलता है जिसने सभी को आत्मसात किया। पब भरना और गुलाबी अंत:वस्त्र देना न तो इस संस्कृति का हिस्सा लगते हैं और न ही किसी नई चेतना को प्रेरित करते हैं। आप चड्डी देंगे वे साड़ी। प्रताडि़त कहीं ठगी सी निरीह बनकर देखती रहेगी। स्त्री प्रताड़ना की लगातार बढ़ती घटनाओं के बीच इतनी सतही सोच और उसका रातोंरात प्रचार में आ जाना एक नई चिंता की वजह बन रहा है। क्रांतिकारी आंदोलन की अपेक्षा में एक फुस्सी बम सा।