Wednesday, November 25, 2009

हमने चुनी जयपुर की लेडी मेयोर


हमारे शहर जयपुर की प्रथम महिला को हमने सीधे चुना है। किसकी पतंग कटेगी और किसकी उड़ेगी, उससे भी ज्यादा जरूरी है कि कौन शहर की आबो-हवा को खुशनुमा रखेगा। आबो-हवा के मायने शहर की आत्मा को समझने से है। क्या है जयपुर? शानदार ऐतिहासिक विरासत का शहर या मॉल्स, मल्टीप्लैक्स जैसी ऊंची आधुनिक इमारतों का शहर। हम इसके छोटी काशी के स्वरूप से स्नेह करते हैं या आधी रात को सिगरेट के लच्छे बनाते-लहराते युवक-युवतियों के डिस्को थेक से निकलने पर? नहीं यह मोरल पुलिसिंग नहीं है। नैतिकता तजते हुए तो लोग पवित्र परिसरों में भी देखे जा सकते हैं, लेकिन जयपुर दर्शन के लिए आने वाला सैलानी यहां कतई मॉल्स में शॉपिंग करने या डिस्को में थिरकने नहीं आता। शायद इन से भागकर ही आता है। तभी तो कल जयपुर पधारे ग़ज़ल गायक पंकज उधास ने भी कहा 'जयपुर आकर जो शांति और सुकून मिलता है वह दुनिया के किसी कौने में नहीं मिलता बड़े शहरों में सिवाय बिल्डिंग्स और मोल्सके कुछ नजर नहीं आता'
सैलानी आता है उस मरुस्थल को महसूस करने, जहां कभी जिंदा रहना सिर्फ मानवीय जिजीविषा का ही नतीजा था। यहां का बाशिंदा न केवल जिंदा रहा, बल्कि राजस्थान पर पड़ने वाली रजत बूंदों (पानी) को भी उसने खूब सहेजा। आज का राजस्थान इन्हीं बूंदों को सहेजने का परिणाम है। आधुनिक शहर में ये बूंदें भी एक ही वक्त नसीब हो रही हैं।
प्रकृति के निष्ठुर रवैये के बावजूद हमारे लोगों ने जिस अदम्य साहस का परिचय दिया है, वह किसी भी सैलानी को रोमांचित कर सकता है। रेतीले धोरों में गूंजता संगीत और बंधेज के चटख रंग मंत्रमुग्ध कर देने की ताकत रखते हैं। इसी से उन्हें रूबरू कराना है और यह दायित्व जयपुर का है। तभी तो जयपुरवासी पद्मश्री लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत अपनी एक किताब 'सांस्कृतिक राजस्थान' में लिखती हैं,
मारु थारा देस में
निपजे तीन रतन्न।
एक ढोलो, दूजी मारुणी,
तीजो कसूमल रंग।।
ढोला-मारू से कौन अनजान है. इस प्रांत में तीन रत्न पैदा होते हैं। सच्चा प्रेमी, निश्छल प्रेमिका और तीसरा कसूमल रंग, जो शौर्य, प्रेम और जिंदादिली का प्रतीक है। जयपुर से प्रथम नागरिक, जो अब सीधी चुनी गई महिला होंगी , उसे अभाव और उपेक्षा के बीच नई राह बनानी होगी। लेटिन शब्द मेओरं का अर्थ महान से है। उन्हें अलग दिखना होगा। वे कठपुतली नहीं हो सकती। अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एक मेयर शहर को बहुत-कुछ दे सकती है। अभी तो हम ऑटोचालकों को मीटर से चलने की प्रेरणा भी नहीं दे पाए हैं। नागरिक को यह एहसास कराना जरूरी है कि शहरी होने के नाते अनुशासित रहे। दायित्व से मुक्त नहीं . बेहतर सफाई व्यवस्था हो. सड़क किनारे गाड़ी खड़ी करने वालों और थूकनेवालों पर सख्ती हो।
बहरहाल, हाइटैक में जाना है तो हेरिटेज भी संजोना है। शहर की 'स्काई लाइनं' बदल देने का सपना अच्छा है, लेकिन हेरिटेज को बौना करते हुए नहीं। पर्यटन हमारे सोलह छोटे-बड़े उद्योगों की प्राणवायु है। शहर का सोलह सिंगार नई महापौर को करना होगा। कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह भाजपा की सुमन है या कांग्रेस की ज्योति। शहर सबका है। हमारा अपना। हमें किसी के जैसा नहीं बनना। इसकी खुशबू कायम रखनी है बस।

7 comments:

Apoorv said...

हर शहर और जगह की अपनी एक खास तासीर होती है..और यही तासीर उसकी पहचान भी बनती है..जरूरत है दुनिया की भीड़ मे भी शहर की उसी तासीर को जिन्दा रखने की..जिससे कि शहर के बाशिंदे खुद को आइडेन्टिफ़ाइ कर पायें..

Kishore Choudhary said...

जयपुर की मेयोर के बहाने आपने राजस्थान की अनूठी संस्कृति को बेमिसाल शब्दों में प्रस्तुत किया है. हवामहल के आगे मालों और खिड़कियों को गिनती खड़ी दो औरतें... ये भी सीधे सरल लोगों का एक सम्पूर्ण बयां है.
जयपुर के लिए ढेर सारी दुआ कि नया मेयोर और सदस्य इसे खूबसूरत बनाएं.

varsha said...

kush ne kaha

शहर की 'स्काई लाइनं' बदल देने का सपना अच्छा है, लेकिन हेरिटेज को बौना करते हुए नहीं।

अगर वाकई ऐसा हो जाए तो ये बात सच ही होगी कि जयपुर आकर असीम शांति मिलती है..

varsha said...

वर्षा जी, नमस्कार,
रानी लक्ष्मी कुमारी चूडावत जी का योगदान अमूल्य है किन्तु ये राजस्थानी दोहा अपने मूल रूप को खो चुका है. मैंने आकाशवाणी के लिए एक फीचर बनाया था रेगिस्तान का जहाज ऊंट उसी की स्क्रिप्टिंग के दौरान मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. आईदान सिंह भाटी के एक आलेख में इस अपभ्रंश का उल्लेख मिला था. कसूम्बल रंग के बिना राजस्थान अधूरा ही होगा परन्तु इस दोहे में तीसरा रतन " करियो कंकू वरण " है अर्थात कुमकुम के रंग का करिया यानि नौजवान ऊंट. बात मुझे भी समझ आती है कि एक ढोला दूसरी मरवण और तीसरा गहरे रंग का जवान ऊंट

ढोला तमीणे देस में म्हें दीठा तीन रतन
एक ढोलो दूजी मारवी अर करियो कंकू वरण

किशोर

varsha said...

apoorv aur kush aapka bahut-bahut shukriya.kishoreji aapse baadwaali tippani jaisi ki apeksha hamesha rahegi.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

भाई इतनी अराजनीतिक मत बनिये…

हां जयपुर से आपका प्यार हर पंक्ति में झलकता है और हम जानते हैं यह यूं ही नहीं है।

प्रदीप कांत said...

Jaipur jab bhi ata hoon achchha hi lagata hai.

Rochak post