खम्मा घणी

खम्मा घणी
shahid mirza

चला रहा है निजाम ए हस्ती...वो ही खुदा है

Thursday, November 5, 2009


ॐ जय जगदीश
अल्लाह ओ अकबर
बोले सो निहाल सत् श्री अकाल
जय यीशु

यह महज शब्द नहीं बल्कि उस परम पिता परमेश्वर का
जय घोष है जो दुनिया के निजाम को चला रहा है। यह दिन-रात
जोर-जोर से दोहराने, पुकारने का नाम भी नहीं है। यह हर
हाल में अपने मानस को तनाव से मुक्त रखने के लिए है।
क्या हम पूछ सकते हैं कि आज के माता-पिता अपने बच्चों में
इसे रोपने का दायित्व कितना निभा पा रहे हैं ?
कल ही की बात है। नन्हा मोनू दरवाजे से टकराकर गिर गया और जोर-जोर से रोने लगा। घबराई मां दौड़कर रसोई से बाहर आई और मोनू को गोद में उठा पुचकारने लगी। मोनू का रोना कम नहीं हुआ। मां ने एक जोरदार प्रहार दरवाजे पर किया और कहा देख दरवाजे की पिटाई हो गई अब वह रो रहा है। दरवाजे को पिटते देख मोनू चुप हो गया। मोनू की मां अकसर कभी दरवाजे को पीटकर तो कभी जमीन पर धप लगाकर मोनू के लिए झूठ-मूठ की चीटियां मरवाती रहती हं उस दिन साहिल भी स्कूल से चोट लगवाकर आया। हाथ पर घाव था और पट्टी बंधी हुई थी। मां से बेटे का दुख देखा ना गया। चल पड़ी स्कूल राहुल को ढूंढ़ने क्योंकि साहिल ने यही बताया था कि राहुल ने उसे धक्का दिया। दरअसल, यह बहुत ही सेडिस्ट अप्रोचं है। दूसरों को दुखी देखकर खुश होने का यह रवैया मानव की मूलभूत प्रवृति और कुछ हद तक प्रकृति भी है। हम ऐसे ही होना चाहते हैं, लेकिन सीख (धर्म) हमें रोकती है। धर्म विशेष नहीं बल्कि मानव को मानवता का पाठ पढ़ाने वालें सभी धर्म। गौर कीजिए हम जन्म से मृत्यु पर्यन्त किन धार्मिक कार्यों में बंधे हैं। मानव शिशु को दुनिया में लाने का कितना सभ्य और संस्कारी तरीका है सब धर्मों में। ऐसा स्वागत सिर्फ इनसान की पैदाइश पर ही होता है। गौर करते जाइए, अन्न ग्रहण कराने का, शिक्षा, विवाह आदि कितने ही संस्कार कितने जरूरी और विधिवत है। यह सब सदियों पुरानी प्रणाली है। सृष्टि का निजाम यूं ही चलता आ रहा है। यह शरीर जब ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वान अवस्था को पार कर जिस अंत में प्रवेश करता वह अंतिम संस्कार भी कितना वैज्ञानिक और पूर्ण है। चाहे जिस धर्म का अध्ययन कीजिए 'मिटटी' का बड़ा एहतराम है। अन्यथा दुनिया से उठ गए इनसान के लिए जिंदा इनसान का रवैया बदलते देर नहीं लगती, लेकिन सब धर्म अंतिम संस्कार को बेहद पाकीजा कर्तव्य मानते हैं। सिर्फ इसलिए कि इनसान अपने मानवीय फर्ज न भूले। सृष्टि के चलायमान रवैये को सर्वाधिक धर्म ने ही समझा है। धर्म ने ही नैतिकता को बल दिया। यह नैतिकता अभी तक किसी बाजार की शान नहीं बनी है। यह पसरी है आपके भीतर आपके संस्कारों में। ईमानदारी इसलिए नहीं है कि यह बहुत अच्छी चीज है। यह है क्योंकि इसमें सुकून है। दर्प है जो ईमानदार व्यक्ति के चेहरे पर दिखता है। वह आत्मबल का धनी होता है। यही आत्मबल उसे संसार की विकट परिस्थितियों में खड़ा रहने के काबिल बनाता है। झूठ, नफरत, हिंसा तात्कालिक फंडे हो सकते हैं, लेकिन यह एक कमजोर और भीरु इनसान पैदा करते हैं। विकट परिस्थितियों में यह सबसे पहले समर्पण कर सच्चाई का रास्ता छोड़ते हैं।
हर धर्म का दूसरा अनिवार्य पहलू है दान. सबसे बड़ा पुण्य. दान, ज़कात, चैरिटी, के बाद हम पुष्प से हलके हो जाते हैं , यह भी हमारे लिए ही है.
इसे क्या कहा जाए कि घर हो या स्कूल हम बच्चों में बेहिसाब प्रतिस्पर्धा बो रहे हैं। सबको पीछे छोड़ो, बस आगे बढ़ो। जैसे भी हो तुम्हारा नाम सबसे ऊपर चमकना चाहिए। क्लास की टीचर भी उस कमजोर बच्चे के साथ नहीं है। वह अकेला है भीड़ में। माता-पिता यूँ तो सब कुछ बच्चों के लिए कर रहे हैं। तिलक लगा रहे हैं, आरती उतार रहे हैं, लेकिन धर्म की मूल शिक्षा कहीं गुम है। पलंग के नीचे या पेड़ के पीछे भी नहीं, वह तो बस गायब है। हमें बस मोनू और साहिल की तात्कालिक खुशियों की फिक्र है जो चीटी मारकर और दरवाजे को पीटकर मिल ही जाती है। कौन बनेगा इन बच्चों का गॉड फादर, ग्रैंड पेरेंट्स की भूमिका के खात्मे के बाद?

5 टिप्पणियाँ:

Kishore Choudhary November 5, 2009 8:59 PM  

पोस्ट जितनी लाजवाब है उतना ही फोटो भी, इसे देखता जाता हूँ एकटुक और सोचता हूँ कि कुदरत में कितनी समझ भरी पड़ी है बस हम आँख खोल के देखते ही नहीं. इस पोस्ट के बिना ये फोटो भी मुझे अधूरा ही लगता. इसमें वो बात नहीं होती जो इन शब्दों का साथ पाने से मुझमे जगी है. आप संवेदनशील इंसान और एक अच्छी पत्रकार हैं.

वाणी गीत November 6, 2009 5:17 AM  

बच्चों को बहलाने ..चुप कराने के लिए लगभग सभी अभिभावक यही प्रक्रिया अपनाते हैं ...मैं भी ...मगर ये सच है की इस तरह बच्चों में बदला लेने की पाशविक भावना का बीज आरोपित कर रहे होते हैं ...इस ओर ध्यान आकर्षित करने का बहुत आभार ...!!

Nandani Mahajan November 7, 2009 9:24 AM  

आपके यहाँ अपने मन का परिवार और संस्कार...
सभी आलेख गहरी मानवीय चिंताओं से पूर्ण, ख़ुशी और ग़म से सजे हुए. शानदार !

अशोक कुमार पाण्डेय November 9, 2009 7:46 PM  

अच्छे गुणों से कौन इंकार करेगा?

पर अब धर्म के पत्थरों से कोई फूल नहीं उग सकते।

sudhakar soni,cartoonist November 18, 2009 12:21 AM  

photo aur lekh dono k liye ek hi shabda-subhanallah!

हमज़ुबां

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