Thursday, October 29, 2009

मेरा वो सामान लौटा दो


मेरा कुछ सामान

तुम्हारे पास पड़ा है
सावन के कुछ
भीगे भीगे दिन रखे हैं
और मेरे एक खत
में लिपटी रात पड़ी है
वो रात भुला दो,
मेरा वो सामान लौटा दो

गुलजार साहब ने यह पंक्तियाँ फिल्म इजाजत के लिए लिखी थीं। क्या वाकई अतीत का वर्तमान में विश्लेषण कर पाना इतना आसान है? हिसाब हो सकता है इस सामान का? आप पति-पत्नी थे। एक-दूसरे को प्रिय थे। आपने बहुत से अच्छे काम किए, खुशियां साझा की। अब खटकने लगे। अलग हो गए। तलाक हो गया और न्यायलय का फैसला आ गया कि आपका सारा सामान संपत्ति अलग-अलग नहीं होगी किसी एक के पास जाएगी। पति के पास कभी सोचा है आपने कि पति यदि बाहर जाकर पैसे कमा रहा है तो पत्नी कितना कुछ घर में दे रही है। उसके काम की गणना करने की हिम्मत की है किसी ने। उस प्रेम का हिसाब कौन देगा जो उसने अपनी गृहस्थी से किया है। और वे बच्चे जो दोनों कितने जतन और उम्मीद से दुनिया में लाए थे। उन दोनों के प्रेम का नतीजा। उसे कौन और कैसे अलग करेगा। का तो आपने कह दिया पति को मिलेगी लेकिन बच्चे? फिर तो वे भी पति को मिलने चाहिए। कई और भी अच्छे काम हुए होंगे। सब पर उसी का हक है क्योंकि निर्णय तो उसका है। आम स्त्री के पास क्या है न धन न शिक्षा। निर्णय लेगी भी तो किस बूते पर? उसे तो आज्ञा शिरोधार्य करनी है क्योंकि वह कमजोर है, लाचार है।
यह बताने की जरूरत शायद नहीं है कि हमारे समाज में स्त्री पति की छत्रछाया में रहने में ही अपनी भलाई समझती है। यह छाया अगर छाया मात्र भी है तो भी उसे मंजूर है। पति ही उसका सर्वस्व है। उसके अलग होते ही वह खुद को अस्तित्वहीन महसूस करने लगती है। अपना वजूद उसे खोखला लगने लगता है और ऐसा हमेशा प्रेमवश नहीं होता बल्कि सामाजिक ताने-बाने के चलते होता है। अकेली स्त्री समाज को खतरे की घंटी नजर आती है और तलाकशुदा स्त्री .... वह तो छोड़ी हुई है। किसी की परित्यक्त। ऐसे ही जैसे कोई वस्तु अच्छी नहीं लगी या चलने लायक नहीं थी इसलिए त्याग दी गई। ऐसे में स्त्री की पूरी कोशिश होती है कि वह तन-मन से पूर्ण हो। इतनी पूर्ण कि कोई उसे छोड़ने का साहस न करे। तलाकशुदा हमारे यहां किसी गाली से कम नहीं ऐसे में न्यायालय का यह आदेश कि तलाक के बाद की साझा संपत्ति में पत्नी का हक नहीं, सोचने पर मजबूर करता है। प्रकरण विशेष में यह उचित हो सकता है लेकिन महिलाओं में खासकर लड़कियों के माता-पिता में इसे लेकर गहरा क्षोभ है। एक ओर जहां आधुनिक जीवन शैली को आत्मसात करते हुए नए अधिकार दिए जा रहे हैं वहीं दूसरे हाथ में उस्तरे भी थमाए जा रहे हैं। पहले प्रॉपर्टी का प्रलोभन और फिर तलाक के बाद सब कुछ छीन लो। पवित्र रिश्तों की नींव को हम खुद कमजोर कर रहे हैं। किसी एक को अतिरिक्त हक देकर।
भारतीय स्त्री आज भी भावनाओं में जीती है। यही उसे सिखाया गया है। विवाह उसके लिए भावनात्मक निवेश है। सब कुछ पीछे छोड़कर एक नए रिश्ते में बंधने के आग्रह इतने कच्चे और कमजोर होंगे तो कौन शादी और परंपराओं में यकीन करेगा। इसकी अक्षुण्णता बनाए रखनी है तो दोनों को सम पर रखना होगा। एक को महत्व देकर दूसरे को कमतर नहीं आंका जा सकता। वह अपराध में भी बराबरी की हकदार हो तो उपलब्धि में भी यही तो रिश्ते की पहचान है।

ps:A divorced man can claim the property bought by him in the name of his former wife, the Bombay high court ruled last week.


painting courtesy - janab saiyad haidar raza

8 comments:

BAD FAITH said...

पवित्र रिश्तों की नींव को हम खुद कमजोर कर रहे हैं। किसी एक को अतिरिक्त हक देकर। सत्य वचन.

वाणी गीत said...

जो रिश्ते कानून तोड़ सकता है ..या जिन रिश्तो को कानून के डर से निभाया जा रहा हो ...कमजोर होने ही हैं ...!!

Rajey Sha said...

ये इंसान का देखने का सलीका है कि‍ वो रि‍श्‍ते को कानूनी बनाना चाहता है या पवि‍त्र।

Kishore Choudhary said...

जिससे हमें न्याय की आस होती है शिकायतें भी उसी से अधिक हुआ करती है. जिस फैसले के उजाले में आपने इसे लिखा है मैं उससे अपरिचित हूँ इसलिए कुछ कहना उचित नहीं है. स्त्री के के लिए परित्यक्ता शब्द को आपने व्याख्यायित किया तो लगा कि ये अनुचित ही है, किसी स्त्री को सामान या भोग्य वस्तु के रूप में प्रकट करना. आप एक आदमी को भी परित्यक्त कह सकते हैं पर किसे ? सुनने वाले अपनी सुविधा से शब्द और उनका अर्थ ग्रहण किया करते हैं. स्त्री को आर्थिक आज़ादी सबसे पहले पा लेना जरूरी है फिर रिश्तों और व्यवहार में फर्क यकीनन आता है.

Pandit Kishore Ji said...

vakai rishte sambhalne padte hi hain
jyotishkishore.blogspot.com

rafikvisal said...

जिन रिश्तों की इंसान तमाम उम्र लख्ते-जिगर से परवरिश करता ताश के पत्तों के महल की तरह बिखर जाते हैं क्योंकि हालात और जज़्बात विमुख हो जाते हैं. पल में रिश्तों का शीराज़ा बिखर जाता है और खुशबू बन कर महकने वाले रिश्ते भी सड़ांध मारने लगते हैं. मज़हब,समाज और क़ानून के खूंटों से बंधे ये रिश्ते जितने मज़बूत होते हैं उतने ही कमज़ोर भी होते हैं. गुलज़ार साहब ने रिश्तों की नजदीकियों और दूरियों को ह्म्ज़ावियों से देखा है शायद इसीलिए उनकी नज़्मों में रिश्तों का दर्द महसूस होता और रिश्तों की गहराइयां उनकी फिल्मों में भी दिखाई देती हैं. इन्हें पढ़कर या देखकर पुख्ता रिश्तों की नाज़ुकी की अहमियत का अहसास होता है.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

yah galat hai
saaman barabar bantanaa chahiye


vaise bantana to kuch nahii chahiye!!

प्रदीप कांत said...

रिश्ते एसे ही नहीं निभते, हम को तिलान्जलि देनी पडती है.