Wednesday, October 7, 2009

मुझको इतने काम पे रख लो. . .


जब भी सीने पे झूलता लॉकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूं उसको
मुझको इतने काम पे रख लो



फिजा में भीनी -भीनी महक है। प्यारे से रिश्ते की महक। एक-दूजे को खुद को सौंपते हुए सृष्टि को आगे बढ़ाने वाला यह रिश्ता इतना अलौकिक क्यों जान पड़ता है। एकदम डिवाइन-सा। गौर किया जाए तो यही रिश्ता बेहद लौकिक है, यानी पृथ्वी पर तय किया हुआ। माता-पिता, भाई-बहन जैसे तमाम रिश्ते जरूर ईश्वरीय लगते हैं, क्योंकि इन्हें तय करने में हमारी कोई भूमिका नहीं है। यह सौ फीसदी ऊपर वाले के बनाए हैं, लेकिन पति-पत्नी का रिश्ता...। कितना अपना, कितना करीब। कोई तीसरा इसकी थाह नहीं जान सकता। एक हॉलीवुड फिल्म देखी थी पिछले दिनों, शल वी डांस। नायक रिचर्ड गेर [वही शिल्पा शेट्टी का सरेआम चुंबन लेने वाले गेर] और नायिका जेनिफर लोपेज। नायक के बच्चे किशोर हो चुके हैं और वह अपनी वैवाहिक जिंदगी से बेहद खुश है, फिर भी कुछ कमी है। अकसर, नहीं हर रोज़ वह ट्रेन से गुजरते हुए एक डांस क्लास की खिड़की पर खड़ी खूबसूरत डांसर को निहारा करता है। यह कशिश इतनी गहरी है कि वह डांस क्लास में दाखिला ले लेता है। दोनों एक डिवाइन रिश्ते में बंधने लगते हैं। दैहिक नहीं। अपनी पत्नी से उसका सहज-सरल नाता उसे दूसरी देह से जुड़ने नहीं देता। पत्नी यह सब जान शुरू में दुखी होती है, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। वह एक मित्र से सवाल करती है कि हम शादी क्यों करते हैं? जवाब आता है-पैशन के लिए। वह कहती है-नहीं, हम अपनी जिंदगी का एक गवाह चाहते हैं। इस धरती पर करोड़ों लोग हैं, लेकिन हम किसी एक से जुड़ते हैं। हम चाहते हैं कि वह हमारे हर सुख का, दुख का, अच्छाई का, बुराई का सबका साक्षी बने। हम नहीं चाहते कि हमारी पूरी जिंदगी बिना नोटिस किए निकल जाए। लाख टके का सवाल है कि फिर क्यों दूर जाने लगते हैं हम?
बात-बात पर झगड़े, अविश्वास, अपशब्दों ने इस रिश्ते की गरिमा और सादगी क्यों छीन ली है? हम बहुत जटिल हो गए हैं। पत्नियों की बड़ी शिकायत कि मैंने अपने पति को जितना शानदार कोर्टशिप पीरियड के दौरान पाया, अब वे वैसे नहीं हैं। अब तो शादी हो गई है ना...मैं कहां जाने वाली हूं। पति कहते हैं कि मैं हमेशा एक-सा कैसे रह सकता हूं। वक्त के साथ जिम्मेदारियां बढ़ती और बदलती हैं। गुलजार साहब की यह नज्म मुझको इतने काम पे रख लों
कितनी खूबसूरती से रिश्ते की सादगी और नजाकत पर रोशनी डालती है...
जब भी सीने पे झूलता लॉकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूं उसको
मुझको इतने काम पे रख लो

जब भी आवेजा उलझे बालों में
मुस्कुराके बस इतना सा कह दे
आह चुभता है ये अलग कर दो
मुझको इतने काम पे रख लो

जब गरारे में पांव फंस जाए
या दुपट्टा किवाड़ में अटके
एक नजर देख लो तो काफी
मुझको इतने काम पे रख लो


खुद को छोटे-छोटे काम पर रखना कैसे भूल जाते हैं ? समय के साथ सभी बदलते हैं,
लेकिन इतना भी क्या बदलना कि आप अजनबी ही मालूम हों। दूसरे ग्रह से आए हुए। जहां स्त्री तरक्की की सीढ़ी पर अग्रसर है,वहां ऐसी ही शिकायतें पति की भी हो सकती हैं। फर्क हालात का है, लेकिन दोनों ही हालात में असर रिश्ते पर आता है। परिवार पर आता है। आज जब स्त्री प्रार्थना और पूजा भाव से इस रिश्ते की लंबी उम्र और अच्छी सेहत की कामना कर रही है तो आप भी तन-मन-धन से इसमें लग जाएं। निदा फाजली का एक दोहा खास दांपत्य के लिए...
माटी से माटी मिले,
खो के सभी निशान
किसमें कितना कौन है,
कैसे हो पहचान.

13 comments:

ओम आर्य said...

behad bhaawpurn rachana.....

kavita said...

Varsha.....aapki post dil ko chu gaye,I have seen SHALL WE DANCE upteen times.gULZAAR SAHAB TO SHABDO KE JADUGAR HAIN....i am going to read this to my husband (with all the translations).

वाणी गीत said...

करवा चौथ पर पति पत्नी के धुंधलाते रिश्तों पर गहरी सम्यक दृष्टि डाली है आपने ....ऐसे त्यौहार वक़्त और परिस्थितियों के कारण विलग होते अटूट रिश्तों को जोड़ने में मदद करते हैं ...गुलजार की यह नज्म तो खैर खूबसूरत है ही ...
बहुत सुन्दर लेख ...!!

Kishore Choudhary said...

जो लिखा है उसमे ताजे रिश्तों की महक है. एक खिले फूल सी पोस्ट जिसमे शब्द ऊर्जा से भरे हुए हैं.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

क्या कहूं …
रिश्तों का सातत्य सुनने में जितना अच्छा लगता है उतना सरल है नहीं…इसमें भी नवीनता चाहिये,नवोन्मेष्…भीतर न मिले तो बाहर तलाश होती है

sudhakar soni,cartoonist said...

aapki baat dil ko chhu gayee.mujh jaise logon k bahut kam aayegi...

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

बहुत मर्मस्पर्शी आलेख. हार्दिक बधाई.

sanjay vyas said...

एकदम से लगा, सही कहा आपने कि यही रिश्ता पार्थिव है बाकी सभी ऊपर से तय किये हुए.
लगभग हर जगह आपकी बात के लिए 'हाँ' निकलती है.
एक 'कनेक्ट' सा sthapit करती पोस्ट.

Unseen Rajasthan said...

nice post !! Well written.

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

Ati sundar mitr jaree rahe

neelima sukhija arora said...

bahut pyari post hai varshaji, dil ko choo gayi

cartoonist ABHISHEK said...

wah....!!!

pushkar said...

na vo jhulte loket rahe jo ulte sidhe ka fark dikhate the ab to unki desine me ulte sidhe ka fark kho gaya hai...ab kaisa aaveja jo uljhe unsuljhe balon me.ab to vo julfe pareeshan kat kar chhoti ho gayeen...paanv to bas fnse se hain mini skrt me ya jas tas fansaye gaye hain jeens me...kaisa garara....dupatta khud sharmakar muh chhupakar pada hoga kisi kone me....ab kis kam pe rahna chahe hain aap guljar sahab.....