Thursday, September 17, 2009

हर चेहरा विदा....


क्या वाकई तिथियों के साथ गम भी विदा हो जाते हैं ? काश यादों का भी तर्पण हो सकता और यदि नहीं तो कागे की जगह एक बार ही वह दिखाई दे जाता जिसके लिए आँखों से नमी का नाता टूट ही नहीं पा रहा है.
सांझ
सां .....झ
हर चेहरा विदा.

अन्तिम तीन पंक्तियाँ कवि अशोक वाजपेयी की हैं जो उन्होंने 1959 में लिखी थीं । क्या वाकई हर चेहरा विदा है? विदा होते ही सब कुछ खत्म हो जाता है कि कुछ रह जाता है तलछट की तरह। सालता, भिगोता, सुखाता और फिर सराबोर करता। कभी किसी प्रेम में डूबे को देखा है आपने? एक ऐसे सम पर होता है जहां चीजें एक लय ताल में नृत्य करती हुई नजर आती हैं। इतना सिंक्रोनाइज्ड कि कोई चूक नहीं। समय से बेखबर बस वह उसी में जड़ हो जाता है। यह जड़ता तब टूटती है जब दोनों में से कोई एक बिखरता है। विदा होता है। अवचेतन टूटता है। चेतना जागती है। तकलीफ, दुख, पीड़ा जो भी नाम दें, सब महसूस होने लगते हैं। एहसास होता है जिंदा होने का। एहसास होता है उस ...ताकत का जो इस निजाम को चला रही है। इससे पहले तक लगता है जैसा हम चाह रहे हैं वही हो रहा है। हमने यह कर दिया, वह कर दिया। हमारे प्रयास से ही सब बेहतर हुआ। फिर पता चलता है कि आपके हाथ से सारे सूत्र निकल गए। आप खाली हाथ रह जाते हैं और वह उड़कर जाने किस जहां में खो जाता है। उस दिन आपको यकीन होने लगता है कि आपकी हस्ती से बड़ी कोई बहुत बड़ी हस्ती है जिसके चलाए सब चल रहे हैं। यह सृष्टि भी और इसमें जी रही चींटी भी। आपकी बिसात कुछ नहीं। यह आपको अपनी हार लग सकती है। आप ठगे से रह जाते हैं कि जिसकी आवाज कानों में मिश्री घोला करती थीं... बांहें भरोसा देती थी... आंखें उम्मीद बंधाया करती थी.... वह आज नहीं है। वह खत्म है। अतीत है। उसके साथ थां जुड़ गया है। नाम के आगे स्वर्गीय लगाना पड़ रहा है और नगर निगम ने उसका मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया है। यह सब एक जिंदा शख्स को मृत्यु की कगार पर लाने से कम नहीं होता है। जीते जी मरने की यह तकलीफ सिर्फ वही पाता है जिसका अपना उससे विदा ले गया हो।
1987 में वाजपेयी जी ने फिर लिखा विदा शीर्षक से-
तुम चले जाओगे
पर थोड़ा-सा यहां भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सोंधी सी गंध
भोर के उजास में
थोड़ा सा चंद्रमा
खंडहर हो रहे मंदिर में
अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार।

तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति
छंद की तरह गूंजता
तुम्हारे पास होने का अहसास।

तुम चले जाओगे
और थोड़ा सा यहीं रह जाओगे!
यही अंत में शुरूआत है? यह कोशिश होती है चीजों को बड़े फलक पर देखने की। एक कमरे से घर, घर से शहर, शहर से देश और देश से दुनिया और दुनिया से ब्रह्मांड को देखने की। इस तुलना में आपको अपना गम छोटा लगने लगता है। सूरज आपको अस्त होता हुआ लगता है लेकिन वह कहीं उदय हो रहा होता है। अंत कहीं नहीं है। एक चक्र है जो चलता है सतत निर्बाध जब हमारे मन का होता है तब हमें भी सब चलता हुआ लगता है और जब नहीं होता तब खंडित होता हुआ। एक और कवि हरिवंश राय बच्चन की बात गौर करने लायक है। मन का हो तो अच्छा है और मन का न हो तो और भी अच्छा। गौर कीजिएगा। शायद जिंदगी आसान हो जाए.

12 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

Bahut Khub...padh kar achcha laga..
badhayi..

अशोक कुमार पाण्डेय said...

सब होता है पर कमबख़्त ज़िंदगी आसान ही नहीं होती…एक उम्मीद टूटी तो दूसरी दरवाज़ा खटखटाने लगती है, एक किस्सा ख़त्म नहीं होता कि दूसरा पनपने लगता है…

कुलवंत हैप्पी said...

अशोक वाजपेयी की कविताओं का सही उपयोग करते हुए...भावनाओं को शब्दों में आपने खूब डाला।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...
मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी"में पिरो दिया है।
आप का स्वागत है...

वाणी गीत said...

कुछ लोगों के लिए कुछ लोग कभी विदा नहीं होते क्योंकि वे सिर्फ तिथि नहीं होते..अतिथि भी नहीं वे हमारी काया में साँस से शामिल होते है आपकी इस मनोभावना को बखूबी समझ पा रही हूँ..
बहुत मार्मिक आलेख ..!!

Kishore Choudhary said...

कहवा के फूलों के साथ
मेरे दिन अब बड़े हो गए हैं
मेरे बचपन का कोई अर्थ नहीं रहा अब

काश तुम संगीत की तरह होते
प्यासे हृदयों को दूर से ही कर देते आलोड़ित

तुम मुझे सफ़ेद चोगों में लपेट कर एक दिन
दूर ले जाओगे
किसी और दुनिया में

मैं रेत का कण बन गया हूँ
सिहरते समुन्द्र तटों के साथ बहता

तुम दोगे मुझे शरण
तुम जानते हो इस रात्रि की पीड़ा

तुमने अपना चेहरा बदल लिया है
पर मैं तुम्हें तुम्हारे हाथों से जानता हूँ.

[ आईवरी कोस्ट के कवि जोसफ मिजान बोग्निनी की कविता ]

प्रदीप कांत said...

तुम चले जाओगे
पर थोड़ा-सा यहां भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सोंधी सी गंध
भोर के उजास में
थोड़ा सा चंद्रमा
---------------------------
इसी थोडा सा रह जाने का तो सहारा रहता है.

Unseen Rajasthan said...

Wow your words are amazing !! I loved them and they are absolutely true and stunning..Great post..Unseen Rajasthan

sandeep sharma said...

तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति
छंद की तरह गूंजता
तुम्हारे पास होने का अहसास।

तुम चले जाओगे
और थोड़ा सा यहीं रह जाओगे!

बहुत कुछ कहते हैं ये शब्द....

Dileepraaj Nagpal said...

Jaane Waale Thoda-Sa Hamare Paas Nahi Rahte, Balki Thoda-Sa Chale Jaate Hain. Yahi Thoda-Sa Wo Cheez Hai, Jisse Jeeewan Bada-Sa Lagne Lagta Hai. Bhale Hi Jaane Wala Shakhs Laakh Rupya Na Ho Per Uski Jagah Us Ek Rupye Ki Hoti Hai, Jiske Na Rahne Per Laakh Rupya Poora Laakh Nahi Kahlaata.


:(
:)
Yahi Jeewan Hai Per Aisa Hai To Ye Jeewan Kyon Hai...

Vijay Kumar Sappatti said...

varsha ji

namaskar
deri se aane ke liye maafi

aapki is post ko padhkar aankho me nami aa gayi .. kahin padha tha ,out of sight --out of mind.. kuch aisa hi ho jaata hai .. par vidayi ke kshan ...aaaaaaaah .. i am having no words..

is post ke liye meri badhai sweekar kare..

dhanywad

vijay
www.poemofvijay.blogspot.com

varsha said...

shukriya mitron....koi hamare saath hai yahi apeksha kyon? ham bhi to ho sakte hain uske saath vah bhi to akela hi hoga vahan?