Saturday, September 5, 2009

हाउ अनहैप्पी इज हर टीचर्स डे ?


happy teachers day की ध्वनियों के बीच वह कहीं उदास कोने में बैठी होगी.लड़ रही होगी हालात से.बिखर रही होगी या शायद बिखरकर जुड़ रही होगी वह 14 की और प्रिंसिपल 48
शिक्षक दिवस यानी डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन। हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति और एक समर्पित शिक्षक। हमेशा की तरह इस दिन को भी श्रद्धा भाव से मनाने की कोशिश थी। गुरु को ईश्वर से भी बड़ा दर्जा देने वाले इस देश की परंपरा में कुछ और विचारने का मन भी नहीं करता, लेकिन जब जयपुर के महाराजा पब्लिक स्कूल के संचालक और प्रिंसिपल का कृत्य उजागर हुआ तो लगा जैसे शिक्षक ही इस परंपरा को चुनौती दे रहे हैं। वे इस दर्जे से नाखुश हैं। यह वाकये का सामान्यीकरण करने की कोशिश नहीं है, लेकिन अनेकानेक घटनाएं हैं, जो नैतिक पतन की ओर इशारा करती हैं। हमें यह बिलकुल नहीं भूलना चाहिए कि दुष्कर्म की शिकार इस बच्ची की उम्र चौदह है और अपराधी की 48।
रिपोर्टर की छानबीन बताती है कि दुष्कर्म के बाद स्कूल संचालक ने लड़की को अच्छे नंबरों से पास करने का लालच दिया। लड़की की मां ने ताड़ लिया था, लेकिन डर के मारे उसने कुछ भी नहीं बताया। दूसरे दिन उसने वही हरकत फिर दोहराई। लड़की की पीड़ा अब सब्र तोड़ चुकी थी। उसने सब-कुछ मां को बता दिया। किशोरी की तकलीफ देखिए। अबोध की बात पर विश्वास न करते हुए परिजनों ने पहले उसका परीक्षण कराया और फिर मुकदमा दर्ज कराया। तीन दिन आईसीयू और एक दिन जनरल वार्ड में रहने के बाद सोमवार को पीड़ित बालिका को छुट्टी दे दी गई। वह तीन दिन तक चलने-फिरने की हालत में नहीं थी। जरा संभली ही थी कि सरकार की ओर से पांच लाख की एफडी और पुनर्वास के संकेत मिल गए। पांच लाख रुपए का ही एक ओर प्रस्ताव आरोपी की तरफ से भी आया है कि कोर्ट-कचहरी ना करें, मामाला बाहर ही सुलटा लें। पीड़िता के दादाजी कातर स्वर में किसी से यह बात साझा कर रहे थे। 'हम गरीब इसके आगे कहां टिक पाएंगे', यही शब्द थे उनके। समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति एक गरीब बच्ची और उसके परिवार की प्रतिष्ठा से खेल गया था। फिर सभी पैसों से उसकी भरपाई करने में लगे थे। इस कवायद में हमें ध्यान रखना होगा कि वह लड़की एक सामान्य लड़की ही बनी रहे। अकेले कर दिए जाने का पूरा खतरा है यहां। एक महिला पुलिसकर्मी (जो अस्पताल में उसकी रक्षा के लिए थी) का कहना था कि पांच लाख मिल गए लड़की, तेरा तो बुढ़ापे तक का इंतजाम हो गया...। दरअसल कुकर्म के प्रति क्षतिपूर्ति का यह अंदाज ही अपराध की आग में घी डालता है। किशोरियों पर कहर की बढ़ती घटनाओं से लगता है कि जैसे इस उम्र को समझने का हमारा कोई इरादा नहीं है। इस उम्र में जब लड़की स्वयं ही एक अनजाने अपराधबोध से घिरी होती है, हम भी उसे भरोसा नहीं दे पाते। जो बिटिया दस साल तक खेलते-कूदते बड़ी हो रही होती है, अचानक अपने माता-पिता की आखों में चिंता के भाव देखने लगती है। बड़ी हाने का यह आभास उसे उन्हीं से होता है। यह सब मित्रवत न होकर भयग्रस्त कराते हुए होता है। इसी समय का लाभ शातिर अपराधी लेते हं। ...और शेष समाज? कभी किसी किशोरी से पूछिएगा। खासकर निम्न-मध्य वर्ग की लड़की। स्कूल से घर तक सैकड़ों निगाहें उसे ऐसे देखती हैं जैसे कोई अजूबा जा रहा हो। आंखों से शरीर भेदती ये निगाहें उसे खुद की नजरों में ही हीन साबित कर देती हैं। स्कूल से बाहर लगा जमावड़ा कभी फिकरे कसता है तो कभी स्पर्श करता हुआ रफूचक्कर हो जाता है। कोई रोज प्रणय निवेदन की रट लगाए हुए घर तक पीछा करता है। अलवर शहर की चालीस लड़कियों ने ऐसी ही छेड़ -छाड और प्रताड़ना से तंग आकर स्कूल छोड़ दिया . परिजन यह दृश्य देखकर लड़की पर ही शक करते हुए उसे कोसना शुरू कर देते हैं। जिस समाज में लड़की के आने पर लक्ष्मी आई है... लक्ष्मी आई है...जैसे शब्दों का मरहम देना पड़ता है, वहां उसके सहज सामान्य विकास की कल्पना बेमायने है। उसकी कमजोर उपस्थिति ही अपराधों की लंबी फेहरिस्त बनाती है।
किशोरियों का बुनियादी हक शिक्षा अब भी उनसे दूर है। कई रोड़े हं उसमें। जाहिर है यह विकास आधा-अधूरा है। जब तक इस तबके तक विकास और विश्वास का संचार नहीं होगा देश की तरक्की नामुमकिन है। कुछ चमक जरूर नजर आती है, लेकिन यह सड़े हुए गोबर पर चांदी के वर्क से ज्यादा कुछ नहीं है।

11 comments:

Nirmla Kapila said...

बहुत सुन्दर और सार्थक आलेख है शुभकामनायें

bhawna said...

behad sharmnaak ghatana , us sikshak ko pad se kyon nahin hataya gaya ? aur sarkaar ne khud uske khilaaf koi kadam kyon nahin uthaya ? uske dada ji par bhi utana hi gussa aa raha hai jitana us mahila police par . aapne sahi likha " gobar par chandi ka vark "
bahut dukh hota hai

पी.सी.गोदियाल said...

सिक्के के दो पहलू है, जिनमें से एक यह है !

varsha said...

doosra pahloo yah hai ki vah kishori hai...vah gareeb hai... vah sadhanviheen hai...

कुश said...

इस तरह की घटनाओ के बारे में पढता हूँ तो मन क्षोभ से भर जाता है.. क्या ये वही लोग करते है जिन्हें इश्वर ने इंसान बनाया था.. ?

Kishore Choudhary said...

शिक्षक दिवस पर एक गंभीर लेख.
ये घटना पहली नहीं है किन्तु दुर्भाग्य इस बात का है कि ये घटना आखिरी भी नहीं हैं. क्या वर्षा जी ऐसा हो सकता है कि न्यायिक आयोग गठित करने वाली सरकार इस मुकदमे के लिए सरकारी पक्ष को इस बात के लिए बाध्य कर सके कि अगर मुक़दमा सरकार हारती है तो सरकार की ओर से नियुक्त पब्लिक प्रोसिक्यूटर और इससे जुड़े समस्त जांच अधिकारी जिम्मेदार होंगें ? हो सकता है कि मैं कुछ ज्यादा ही अपेक्षा कर रहा हूँ.
आज शिक्षक दिवस पर आपकी इस पोस्ट के समभाव कि एक कविता नंदनी जी के ब्लॉग पर देख कर आया हूँ.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

देश का दुर्भाग्‍य है कि दुर्गाओं की बजाय लक्ष्मियां पैदा कर रहे हैं।

वाणी गीत said...

इस तरह की घटनाएँ गुरु शिष्य के संबंधों को लांछित करती हैं और रिश्तों में अविश्वास की भावना उत्पन्न करती है ...बहुत शर्मनाक ...
शिक्षक दिवस पर आपने इस घटना का उल्लेख कर दरकते सामाजिक और नैतिक मूल्यों को इंगित किया है ...

अशोक कुमार पाण्डेय said...

ऊफ़

कसम से लिखा भी नहीं जा रहा कुछ्…

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. घर के नौकरों की पृष्ठभूमि जांच की बात अक्सर उठती है, शिक्षकों और विद्यालय संचालकों के बारे में क्यों नहीं? बह्चों के संपारी में आने वाले हर व्यवसाय के लिए पहले कड़ी जांच होनी चाहिए.

प्रदीप कांत said...

कौनसी और कैसी प्रतिक्रिया लिखें?

क्या यही हमारा वह समाज है जिसके सपने हमारे स्वतन्त्रता सैनानियों ने देखे थे?

और यदि एसा ही है तो मेरी समझ मे तो टीच्रर्स डे मनाना बन्द कर देना चाहिये.