Wednesday, December 23, 2009

जायज हो जिस्मफरोशी ?


पीला हाउस की असंख्य रंडिये
शाम ढलते ही
सस्ता पावडर और शोख लिपस्टिक पोत कर खड़ी होने लगी हैं
फाकलैण्ड स्ट्रीट के दोनों तरफ
क्या बसा है उनकी उजाड़ आंखों में
सुकून नहीं
इसरार नहीं
ललक नही

उम्मीद नहीं
खौफ हां
भूख हां
बेचैनी हां
अवमानना हां
बेपनाह बोझे जैसी बेबसी बसी है
पेट और उसके अतराफ
अलाव की शक्ल में
लोग कहते हैं एड्स दे रही हैं ये रंडियें
कोई नहीं कहता
हम उन्हें आखिर क्या देते हैं


फाकलैंड रोड मुंबई का रेडलाइट एरिया है। विख्यात पत्रकार शाहिद मिर्जा की दो दशक पहले लिखी यह कविता आज भी सवाल करती है कि हम उन्हें आखिर क्या देते हैं। चंद रुपए, दलालों की सोहबत, बेहिसाब बीमारियां, पकड़े जाने पर हवालात, पुलिस की गालियां। और जो कभी जूतों की ठोकरें कम पड़ीं तो यही पुलिस अखबारों में उनकी चेहरा ढकी तस्वीरें दे कर उन्हें सरेआम बेपर्दा कर देती है कि लो देखो ये धंधेवालियां हैं। क्यों बनती हैं ये धंधेवालियां ?
पिछले बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए चौंकाने वाली टिप्पणी की कि सदियों पुराने इस व्यवसाय को यदि कानून के जरिए बंद नहीं किया जा सकता सरकार को इसे वैध कर देना चाहिए। जस्टिस दलवीर भंडारी और एके पटनायक की खंडपीठ ने यह बात एनजीओ बचपन बचाओ आंदोलन और चाइल्ड लाइन की सुनवाई के दौरान कही। एनजीओ का कहना था कि इस व्यवसाय में छोटी-छोटी बच्चियाँ धकेल दी जाती हैं जो उनके सामाजिक, आर्थिक विकास को तबाह कर देता है। 
          खंडपीठ ने माना कि इसका सीधा संबंध गरीबी से है और सरकार गरीबी पर नियंत्रण पाने में विफल रही है। उन्होंने कहा कि हम जीडीपी को बढ़ता हुआ दिखाते हैं तो फिर क्यों गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले परिवारों की संख्या 30 से बढ़कर 37 फीसदी हो गई है? अगर विकास की रफ़्तार यही रही तो कोई मदद नहीं कर सकता। पीठ का मानना है कि इस पेशे को वैध कर दिए जाने के बाद वेश्याओं के पुनर्वास और एचआईवी/एड्स जैसी बीमारियों से लड़ने में मदद मिलेगी। मेट्रो सिटीज में तो यह धंधा किसी कारपोरेट व्यवसाय की तरह चल रहा है जिसकी हवा भी नहीं लग पाती। जाहिर है इस पेशे की दो समानांतर रेखाएं चल रही हैं। गरीबी से त्रस्त परिवारों की बच्चियाँ धोखे से इस काम में धकेल दी जाती हैं। ये ही पकड़ी भी जाती हैं। पैसा देकर काम पूर्ति करने वालों पर कोई शिकंजा नहीं, दलाल भी आजाद हैं। जब तक ये सक्रिय हैं, पेशे पर रोक कैसे लग सकती है। यह तो फिर पनपेगा तो फिर इसका लीगलाइज्ड हो जाना ही उचित है क्योंकि दूसरी ओर यही सब संभ्रात तरीके से बेरोक जारी है। कोईं शिकंजे में नहीं फंसता। एक ही तरह के व्यवसाय के लिए दो मानदंड क्यों ?    
                      आदिकाल से यह पेशा पुरूष की हसरतों से जुड़ा है इसलिए इसे जड़ से खत्म करना नामुमकिन है। राजे रजवाड़ों के समय से ही हर शहर में एक इलाका होता था। समाज की मूल धारा से अलग-थलग, कटा हुआ। आज भी शहरों में यह निशां मौजूद है। जाहिर है सख्ती , कानून इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। दो साल पहले महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने भी इस कानून में सुधार की बात कही, लेकिन अब जब सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी आई है तो बचाव में सरकार के सॉलीसिटर जनरल ने भी सरकारी एजेंसियों और सरकार के विचार जानने की बात कही है। जर्मनी, नीदरलेंड जैसे देशों में देह व्यापार वैध है। हम तो अभी भी यह माने बैठे हैं कि बुराई वेश्यावृति करने में ही है। स्त्री ही अपनी देह का सौदा कर पुरुष को चरित्रहीन बनाती है। वह समाज को गंदा करती है। वही अपराधिनी है। दूसरा पक्ष तो यहां है ही नहीं। सारी कानूनी बरछियां उसी पर चलती हैं। पुरुष की कामलिप्सा में डूबी निगाह का यहां कोई दोष नहीं। शायद इसी निगाह पर सुप्रीम कोर्ट की नजर गई है और इसे वैध करने की बात की जा रही है  । ऐसे में शायद वे सामने आ सकें. उनके पुनर्वास के लिए ठोस योजनाएं बन सकें। नारी निकेतन जैसी नहीं जहां फिर स्त्री की देह ही उस पर भारी पड़ती है। उम्मीद करें कि यहां से उन्हें कुछ देने की शुरुआत हो सकती है।

Friday, December 4, 2009

एक लड़की की डायरी से


एकता चौहान की कविताएं

ये कविताएँ सीधे तेईस साल की एकता चौहान की डायरी से आयी हैं , जब उन्होंने पढ़ाईं तो लगा ताज़ा हवा का झोंका छूकर गुज़र गया. हालाँकि मेरी कविताओं की समझ बहुत सीमित है. हो सके तो आप बेहतर कीजियेगा.बतौर विसुअल डेली न्यूज़ की मगज़ीन खुशबू साथ है.

मेरा पता

शहर के बीचों-बीच
वो जो चार लेन की रोड है

दाएं-बाएं बंगले जिसके
और बड़े-बड़े मॉल हैं

वहीं आगे मोड़ पे
एक लंबा काला नाला है

घास वहां कचरे में पलती
कीचड़ से सनी जमीन है

और जो छठा तम्बू , किनारे
वही मेरा घर है!


2.
संदूक संभालें आओ जरा...
गुड़िया,मोती,चवन्नी

कहीं फिर से
कट्टा ना हो जाएं!

3.
सुबह-सुबह जब उठता हूं
वो पहले से आ जाती है

मैं उन्हें देख मुस्काता हूं
वो मुझे देख मुस्काती हैं

दाना डालो, भूख लगी है
अपनी बोली में बतलाती हैं

जाता हूं मैं, ये कह दूं तो
हामी में सिर वो हिलाती हैं

4.
डूबता है पर्वत के
डूबता वो नीर में
मन के भीतर डूबता
वो डूबता शरीर में
उलझा-सुलझा पहेली-सा
शंकाओं से घिरा हुआ वो
हर अक्षर में डूबता
ढूंढता खुद को
स्याही की लकीर में

5
चौक में
प्रतिदिन
तुलसी सींची जाती है
प्रतिदिन
भोगली से
फूंक-फूंक के
आंखें भी...

हाण्डियों पे
प्रतिदिन
घिसती है बानी
प्रतिदिन
हाथों में
बढ़ती लाख भी...

6.
कुछ माटी में रम जाती
कुछ पत्तों पे थम जाती

गिरती कुछ छज्जे से
कुछ मुण्डेर से लुढ़क जाती

तन को गीला करती
और कुछ
मन को भिगा जाती
बूंदें...

Wednesday, November 25, 2009

हमने चुनी जयपुर की लेडी मेयोर


हमारे शहर जयपुर की प्रथम महिला को हमने सीधे चुना है। किसकी पतंग कटेगी और किसकी उड़ेगी, उससे भी ज्यादा जरूरी है कि कौन शहर की आबो-हवा को खुशनुमा रखेगा। आबो-हवा के मायने शहर की आत्मा को समझने से है। क्या है जयपुर? शानदार ऐतिहासिक विरासत का शहर या मॉल्स, मल्टीप्लैक्स जैसी ऊंची आधुनिक इमारतों का शहर। हम इसके छोटी काशी के स्वरूप से स्नेह करते हैं या आधी रात को सिगरेट के लच्छे बनाते-लहराते युवक-युवतियों के डिस्को थेक से निकलने पर? नहीं यह मोरल पुलिसिंग नहीं है। नैतिकता तजते हुए तो लोग पवित्र परिसरों में भी देखे जा सकते हैं, लेकिन जयपुर दर्शन के लिए आने वाला सैलानी यहां कतई मॉल्स में शॉपिंग करने या डिस्को में थिरकने नहीं आता। शायद इन से भागकर ही आता है। तभी तो कल जयपुर पधारे ग़ज़ल गायक पंकज उधास ने भी कहा 'जयपुर आकर जो शांति और सुकून मिलता है वह दुनिया के किसी कौने में नहीं मिलता बड़े शहरों में सिवाय बिल्डिंग्स और मोल्सके कुछ नजर नहीं आता'
सैलानी आता है उस मरुस्थल को महसूस करने, जहां कभी जिंदा रहना सिर्फ मानवीय जिजीविषा का ही नतीजा था। यहां का बाशिंदा न केवल जिंदा रहा, बल्कि राजस्थान पर पड़ने वाली रजत बूंदों (पानी) को भी उसने खूब सहेजा। आज का राजस्थान इन्हीं बूंदों को सहेजने का परिणाम है। आधुनिक शहर में ये बूंदें भी एक ही वक्त नसीब हो रही हैं।
प्रकृति के निष्ठुर रवैये के बावजूद हमारे लोगों ने जिस अदम्य साहस का परिचय दिया है, वह किसी भी सैलानी को रोमांचित कर सकता है। रेतीले धोरों में गूंजता संगीत और बंधेज के चटख रंग मंत्रमुग्ध कर देने की ताकत रखते हैं। इसी से उन्हें रूबरू कराना है और यह दायित्व जयपुर का है। तभी तो जयपुरवासी पद्मश्री लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत अपनी एक किताब 'सांस्कृतिक राजस्थान' में लिखती हैं,
मारु थारा देस में
निपजे तीन रतन्न।
एक ढोलो, दूजी मारुणी,
तीजो कसूमल रंग।।
ढोला-मारू से कौन अनजान है. इस प्रांत में तीन रत्न पैदा होते हैं। सच्चा प्रेमी, निश्छल प्रेमिका और तीसरा कसूमल रंग, जो शौर्य, प्रेम और जिंदादिली का प्रतीक है। जयपुर से प्रथम नागरिक, जो अब सीधी चुनी गई महिला होंगी , उसे अभाव और उपेक्षा के बीच नई राह बनानी होगी। लेटिन शब्द मेओरं का अर्थ महान से है। उन्हें अलग दिखना होगा। वे कठपुतली नहीं हो सकती। अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एक मेयर शहर को बहुत-कुछ दे सकती है। अभी तो हम ऑटोचालकों को मीटर से चलने की प्रेरणा भी नहीं दे पाए हैं। नागरिक को यह एहसास कराना जरूरी है कि शहरी होने के नाते अनुशासित रहे। दायित्व से मुक्त नहीं . बेहतर सफाई व्यवस्था हो. सड़क किनारे गाड़ी खड़ी करने वालों और थूकनेवालों पर सख्ती हो।
बहरहाल, हाइटैक में जाना है तो हेरिटेज भी संजोना है। शहर की 'स्काई लाइनं' बदल देने का सपना अच्छा है, लेकिन हेरिटेज को बौना करते हुए नहीं। पर्यटन हमारे सोलह छोटे-बड़े उद्योगों की प्राणवायु है। शहर का सोलह सिंगार नई महापौर को करना होगा। कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह भाजपा की सुमन है या कांग्रेस की ज्योति। शहर सबका है। हमारा अपना। हमें किसी के जैसा नहीं बनना। इसकी खुशबू कायम रखनी है बस।

Wednesday, November 18, 2009

भटेरी की भंवरी देवी


कैसी हैं वे सामूहिक बर्बरता के १७ साल बाद ? उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम आया करता था परख। प्रस्तुत करते थे विनोद दुआ। उसी कार्यक्रम के जरिए इंदौर में रहते हुए राजस्थान के भटेरी गांव की भंवरी देवी की आवाज सुनी थी। आवाज क्या थी दर्द और आक्रोश में डूबा हाहाकार था। इंटरव्यू में भंवरी देवी ने स्वयं पर हुए अत्याचार को जुबां दी थी। वह एक-एक कर पांचों आरोपियों का नाम लेकर खुद पर हुए जुल्म का ब्यौरा दे रही थी। उनका सामूहिक बलात्कार हुआ था। देखने वालों के दिल में उनकी तकलीफ नश्तर की तरह धंसती जा रही थी। यकीन मानिए वह आवाज आज भी कौंधती है।
फिर एक सुबह बाखबर करने वालों का एक एसएमएस मिला कि शहर में आठ महिलाओं की चित्र प्रदर्शनी लग रही है। "द मेल " शीर्षक के इर्द-गिर्द ही चित्रों का ताना-बाना बुना गया है। बतौर अतिथि भंवरी देवी आमंत्रित हैं। न्याय की राह देखती सामूहिक बलात्कार की शिकार स्त्री से द मेल चित्र श्रखला का उद्घाटन। खैर, इस अवधारणा की दाद देने या आलोचना में पड़ने के बजाय बेहतर यह जानना होगा कि आज सत्रह साल बाद भंवरी देवी किस हाल में हैं? वह भंवरी देवी जो साथिन थीं , हैं और रहेंगी। सरकारी रीति-नीति को महिला और बच्चों के विकास में लागू कराने वाली साथिन।
1992 में जयपुर से ६० किमी दूर अपने गाँव भटेरी में भंवरी देवी ने ऊंची जाति में हो रहे एक बाल विवाह को रुकवाया था। निजी कारणों से नहीं बल्कि इसलिए कि वह सरकार की नुमाइंदी थीं और यही उनका फर्ज था। स्वयं उनका भी बाल विवाह हुआ है। बाल विवाह रुकवाना कथित ऊंची जाति वालों को बरदाश्त नहीं हुआ। भंवरी देवी का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया और इस पर भी शांति न मिली तो पांच लोगों ने उसके पति के सामने उसका बलात्कार किया। 22 सितंबर 1992 के बाद से भंवरी देवी मन्ने न्याय चाहिए कि पुकार लगा रहीं हैं और तब से ही उनकी पुकार पर प्रहार का सिलसिला जारी है घटना के ५२ घंटे बाद तक उमका मेडिकल मुआयना नहीं किया गया.वे अपने पेटीकोट को ले लेकर भटकती रहीं. फिर कोर्ट ने तो यहाँ तक कह दिया कोई ऊंची जातवाला नीची जात से बलात्कार कैसे कर सकता है . उन पर दबाव बनाया गया कि मुकदमा वापस ले लें लेकिन उनका कहना था कि अगर ये मेरा मान लौटा सकते हैं तो मैं भी मुकदमा वापस ले लूंगी। यही बात उन्होंने गांव के बुर्जुगों से भी कही। इस बीच खूब राजनीतिक दावपेच खेले गए। सियासत बलात्कारियों की कवच बन गयी . भंवरी देवी के कई रिश्तेदारों ने भी उनसे मुंह मोड़ लिया। सिवाय उनके पति के। वे आज तक उनकी ताकत बने हुए हैं।
कालांतर में उन पर फिल्म भी बनी बवंडर जगमोहन मूंदड़ा निर्देशित फिल्म में भंवरी देवी कि भूमिका नंदिता दास ने अदा की है. फिल्म international फेस्टिवल्स में सराही गयी लेकिन भंवरी देवी का संघर्ष आज भी नहीं थमा है. वे ग्रामीण महिलाओं को भटेरी गाँव में लोन दिलवाती हैं लेकिन उन्हें कहा गया की हमारी तरफ से पैसा दिया जा चुका है अब उन्हें यह चिंता सताए जा रही है की १५ हज़ार रुपये कहाँ से आयेंगे?
अपमान और अभाव से गुजरी भंवरी देवी के लिए वह दिन यादगार हैं जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने उन्हें दस हजार रुपए का बहादुरी अवार्ड दिया और मौजूद दर्शकों ने खड़े होकर उनका सम्मान किया। सचमुच भंवरी देवी स्टेंडिंग ओवेशन के ही लायक हैं। जन्म (जात) लिंग, आर्थिक हालात कुछ भी उनके हक में नहीं था लेकिन हिम्मत हमेशा उनके बस में रही। यह बहादुर स्त्री आज भी उसी गांव में पति के साथ रहते हुए सरकारी योजनाओं का लाभ ग्रामीण महिलाओं तक पहुंचाने में लगी है। चुनौतियों का समंदर यथावत है। कष्ट पहले से ज्यादा हैं लेकिन तसल्ली है कि हौसला कहीं मात नहीं खाया है। मिटटी के बर्तन बनानेवाली भंवरी देवी बेहद सुगढ़ जान पड़ती हैं . कोई भारी भरकम डिग्री नहीं लेकिन विचरों की साफगोई सबको मात देती हुई . ya she is my heroine .हाँ वैसी ही कि में उनका औटोग्राफ ले लूं मुझे ख़ुशी है उनका धैर्य अब तक चूका नहीं है. उनके लब आज़ाद हैं . उनकी जुबां खामोश नहीं. भंवरी देवी को प्रणाम करते हुए.

Thursday, November 5, 2009

चला रहा है निजाम ए हस्ती...वो ही खुदा है


ॐ जय जगदीश
अल्लाह ओ अकबर
बोले सो निहाल सत् श्री अकाल
जय यीशु

यह महज शब्द नहीं बल्कि उस परम पिता परमेश्वर का
जय घोष है जो दुनिया के निजाम को चला रहा है। यह दिन-रात
जोर-जोर से दोहराने, पुकारने का नाम भी नहीं है। यह हर
हाल में अपने मानस को तनाव से मुक्त रखने के लिए है।
क्या हम पूछ सकते हैं कि आज के माता-पिता अपने बच्चों में
इसे रोपने का दायित्व कितना निभा पा रहे हैं ?
कल ही की बात है। नन्हा मोनू दरवाजे से टकराकर गिर गया और जोर-जोर से रोने लगा। घबराई मां दौड़कर रसोई से बाहर आई और मोनू को गोद में उठा पुचकारने लगी। मोनू का रोना कम नहीं हुआ। मां ने एक जोरदार प्रहार दरवाजे पर किया और कहा देख दरवाजे की पिटाई हो गई अब वह रो रहा है। दरवाजे को पिटते देख मोनू चुप हो गया। मोनू की मां अकसर कभी दरवाजे को पीटकर तो कभी जमीन पर धप लगाकर मोनू के लिए झूठ-मूठ की चीटियां मरवाती रहती हं उस दिन साहिल भी स्कूल से चोट लगवाकर आया। हाथ पर घाव था और पट्टी बंधी हुई थी। मां से बेटे का दुख देखा ना गया। चल पड़ी स्कूल राहुल को ढूंढ़ने क्योंकि साहिल ने यही बताया था कि राहुल ने उसे धक्का दिया। दरअसल, यह बहुत ही सेडिस्ट अप्रोचं है। दूसरों को दुखी देखकर खुश होने का यह रवैया मानव की मूलभूत प्रवृति और कुछ हद तक प्रकृति भी है। हम ऐसे ही होना चाहते हैं, लेकिन सीख (धर्म) हमें रोकती है। धर्म विशेष नहीं बल्कि मानव को मानवता का पाठ पढ़ाने वालें सभी धर्म। गौर कीजिए हम जन्म से मृत्यु पर्यन्त किन धार्मिक कार्यों में बंधे हैं। मानव शिशु को दुनिया में लाने का कितना सभ्य और संस्कारी तरीका है सब धर्मों में। ऐसा स्वागत सिर्फ इनसान की पैदाइश पर ही होता है। गौर करते जाइए, अन्न ग्रहण कराने का, शिक्षा, विवाह आदि कितने ही संस्कार कितने जरूरी और विधिवत है। यह सब सदियों पुरानी प्रणाली है। सृष्टि का निजाम यूं ही चलता आ रहा है। यह शरीर जब ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वान अवस्था को पार कर जिस अंत में प्रवेश करता वह अंतिम संस्कार भी कितना वैज्ञानिक और पूर्ण है। चाहे जिस धर्म का अध्ययन कीजिए 'मिटटी' का बड़ा एहतराम है। अन्यथा दुनिया से उठ गए इनसान के लिए जिंदा इनसान का रवैया बदलते देर नहीं लगती, लेकिन सब धर्म अंतिम संस्कार को बेहद पाकीजा कर्तव्य मानते हैं। सिर्फ इसलिए कि इनसान अपने मानवीय फर्ज न भूले। सृष्टि के चलायमान रवैये को सर्वाधिक धर्म ने ही समझा है। धर्म ने ही नैतिकता को बल दिया। यह नैतिकता अभी तक किसी बाजार की शान नहीं बनी है। यह पसरी है आपके भीतर आपके संस्कारों में। ईमानदारी इसलिए नहीं है कि यह बहुत अच्छी चीज है। यह है क्योंकि इसमें सुकून है। दर्प है जो ईमानदार व्यक्ति के चेहरे पर दिखता है। वह आत्मबल का धनी होता है। यही आत्मबल उसे संसार की विकट परिस्थितियों में खड़ा रहने के काबिल बनाता है। झूठ, नफरत, हिंसा तात्कालिक फंडे हो सकते हैं, लेकिन यह एक कमजोर और भीरु इनसान पैदा करते हैं। विकट परिस्थितियों में यह सबसे पहले समर्पण कर सच्चाई का रास्ता छोड़ते हैं।
हर धर्म का दूसरा अनिवार्य पहलू है दान. सबसे बड़ा पुण्य. दान, ज़कात, चैरिटी, के बाद हम पुष्प से हलके हो जाते हैं , यह भी हमारे लिए ही है.
इसे क्या कहा जाए कि घर हो या स्कूल हम बच्चों में बेहिसाब प्रतिस्पर्धा बो रहे हैं। सबको पीछे छोड़ो, बस आगे बढ़ो। जैसे भी हो तुम्हारा नाम सबसे ऊपर चमकना चाहिए। क्लास की टीचर भी उस कमजोर बच्चे के साथ नहीं है। वह अकेला है भीड़ में। माता-पिता यूँ तो सब कुछ बच्चों के लिए कर रहे हैं। तिलक लगा रहे हैं, आरती उतार रहे हैं, लेकिन धर्म की मूल शिक्षा कहीं गुम है। पलंग के नीचे या पेड़ के पीछे भी नहीं, वह तो बस गायब है। हमें बस मोनू और साहिल की तात्कालिक खुशियों की फिक्र है जो चीटी मारकर और दरवाजे को पीटकर मिल ही जाती है। कौन बनेगा इन बच्चों का गॉड फादर, ग्रैंड पेरेंट्स की भूमिका के खात्मे के बाद?

Thursday, October 29, 2009

मेरा वो सामान लौटा दो


मेरा कुछ सामान

तुम्हारे पास पड़ा है
सावन के कुछ
भीगे भीगे दिन रखे हैं
और मेरे एक खत
में लिपटी रात पड़ी है
वो रात भुला दो,
मेरा वो सामान लौटा दो

गुलजार साहब ने यह पंक्तियाँ फिल्म इजाजत के लिए लिखी थीं। क्या वाकई अतीत का वर्तमान में विश्लेषण कर पाना इतना आसान है? हिसाब हो सकता है इस सामान का? आप पति-पत्नी थे। एक-दूसरे को प्रिय थे। आपने बहुत से अच्छे काम किए, खुशियां साझा की। अब खटकने लगे। अलग हो गए। तलाक हो गया और न्यायलय का फैसला आ गया कि आपका सारा सामान संपत्ति अलग-अलग नहीं होगी किसी एक के पास जाएगी। पति के पास कभी सोचा है आपने कि पति यदि बाहर जाकर पैसे कमा रहा है तो पत्नी कितना कुछ घर में दे रही है। उसके काम की गणना करने की हिम्मत की है किसी ने। उस प्रेम का हिसाब कौन देगा जो उसने अपनी गृहस्थी से किया है। और वे बच्चे जो दोनों कितने जतन और उम्मीद से दुनिया में लाए थे। उन दोनों के प्रेम का नतीजा। उसे कौन और कैसे अलग करेगा। का तो आपने कह दिया पति को मिलेगी लेकिन बच्चे? फिर तो वे भी पति को मिलने चाहिए। कई और भी अच्छे काम हुए होंगे। सब पर उसी का हक है क्योंकि निर्णय तो उसका है। आम स्त्री के पास क्या है न धन न शिक्षा। निर्णय लेगी भी तो किस बूते पर? उसे तो आज्ञा शिरोधार्य करनी है क्योंकि वह कमजोर है, लाचार है।
यह बताने की जरूरत शायद नहीं है कि हमारे समाज में स्त्री पति की छत्रछाया में रहने में ही अपनी भलाई समझती है। यह छाया अगर छाया मात्र भी है तो भी उसे मंजूर है। पति ही उसका सर्वस्व है। उसके अलग होते ही वह खुद को अस्तित्वहीन महसूस करने लगती है। अपना वजूद उसे खोखला लगने लगता है और ऐसा हमेशा प्रेमवश नहीं होता बल्कि सामाजिक ताने-बाने के चलते होता है। अकेली स्त्री समाज को खतरे की घंटी नजर आती है और तलाकशुदा स्त्री .... वह तो छोड़ी हुई है। किसी की परित्यक्त। ऐसे ही जैसे कोई वस्तु अच्छी नहीं लगी या चलने लायक नहीं थी इसलिए त्याग दी गई। ऐसे में स्त्री की पूरी कोशिश होती है कि वह तन-मन से पूर्ण हो। इतनी पूर्ण कि कोई उसे छोड़ने का साहस न करे। तलाकशुदा हमारे यहां किसी गाली से कम नहीं ऐसे में न्यायालय का यह आदेश कि तलाक के बाद की साझा संपत्ति में पत्नी का हक नहीं, सोचने पर मजबूर करता है। प्रकरण विशेष में यह उचित हो सकता है लेकिन महिलाओं में खासकर लड़कियों के माता-पिता में इसे लेकर गहरा क्षोभ है। एक ओर जहां आधुनिक जीवन शैली को आत्मसात करते हुए नए अधिकार दिए जा रहे हैं वहीं दूसरे हाथ में उस्तरे भी थमाए जा रहे हैं। पहले प्रॉपर्टी का प्रलोभन और फिर तलाक के बाद सब कुछ छीन लो। पवित्र रिश्तों की नींव को हम खुद कमजोर कर रहे हैं। किसी एक को अतिरिक्त हक देकर।
भारतीय स्त्री आज भी भावनाओं में जीती है। यही उसे सिखाया गया है। विवाह उसके लिए भावनात्मक निवेश है। सब कुछ पीछे छोड़कर एक नए रिश्ते में बंधने के आग्रह इतने कच्चे और कमजोर होंगे तो कौन शादी और परंपराओं में यकीन करेगा। इसकी अक्षुण्णता बनाए रखनी है तो दोनों को सम पर रखना होगा। एक को महत्व देकर दूसरे को कमतर नहीं आंका जा सकता। वह अपराध में भी बराबरी की हकदार हो तो उपलब्धि में भी यही तो रिश्ते की पहचान है।

ps:A divorced man can claim the property bought by him in the name of his former wife, the Bombay high court ruled last week.


painting courtesy - janab saiyad haidar raza

Wednesday, October 7, 2009

मुझको इतने काम पे रख लो. . .


जब भी सीने पे झूलता लॉकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूं उसको
मुझको इतने काम पे रख लो



फिजा में भीनी -भीनी महक है। प्यारे से रिश्ते की महक। एक-दूजे को खुद को सौंपते हुए सृष्टि को आगे बढ़ाने वाला यह रिश्ता इतना अलौकिक क्यों जान पड़ता है। एकदम डिवाइन-सा। गौर किया जाए तो यही रिश्ता बेहद लौकिक है, यानी पृथ्वी पर तय किया हुआ। माता-पिता, भाई-बहन जैसे तमाम रिश्ते जरूर ईश्वरीय लगते हैं, क्योंकि इन्हें तय करने में हमारी कोई भूमिका नहीं है। यह सौ फीसदी ऊपर वाले के बनाए हैं, लेकिन पति-पत्नी का रिश्ता...। कितना अपना, कितना करीब। कोई तीसरा इसकी थाह नहीं जान सकता। एक हॉलीवुड फिल्म देखी थी पिछले दिनों, शल वी डांस। नायक रिचर्ड गेर [वही शिल्पा शेट्टी का सरेआम चुंबन लेने वाले गेर] और नायिका जेनिफर लोपेज। नायक के बच्चे किशोर हो चुके हैं और वह अपनी वैवाहिक जिंदगी से बेहद खुश है, फिर भी कुछ कमी है। अकसर, नहीं हर रोज़ वह ट्रेन से गुजरते हुए एक डांस क्लास की खिड़की पर खड़ी खूबसूरत डांसर को निहारा करता है। यह कशिश इतनी गहरी है कि वह डांस क्लास में दाखिला ले लेता है। दोनों एक डिवाइन रिश्ते में बंधने लगते हैं। दैहिक नहीं। अपनी पत्नी से उसका सहज-सरल नाता उसे दूसरी देह से जुड़ने नहीं देता। पत्नी यह सब जान शुरू में दुखी होती है, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। वह एक मित्र से सवाल करती है कि हम शादी क्यों करते हैं? जवाब आता है-पैशन के लिए। वह कहती है-नहीं, हम अपनी जिंदगी का एक गवाह चाहते हैं। इस धरती पर करोड़ों लोग हैं, लेकिन हम किसी एक से जुड़ते हैं। हम चाहते हैं कि वह हमारे हर सुख का, दुख का, अच्छाई का, बुराई का सबका साक्षी बने। हम नहीं चाहते कि हमारी पूरी जिंदगी बिना नोटिस किए निकल जाए। लाख टके का सवाल है कि फिर क्यों दूर जाने लगते हैं हम?
बात-बात पर झगड़े, अविश्वास, अपशब्दों ने इस रिश्ते की गरिमा और सादगी क्यों छीन ली है? हम बहुत जटिल हो गए हैं। पत्नियों की बड़ी शिकायत कि मैंने अपने पति को जितना शानदार कोर्टशिप पीरियड के दौरान पाया, अब वे वैसे नहीं हैं। अब तो शादी हो गई है ना...मैं कहां जाने वाली हूं। पति कहते हैं कि मैं हमेशा एक-सा कैसे रह सकता हूं। वक्त के साथ जिम्मेदारियां बढ़ती और बदलती हैं। गुलजार साहब की यह नज्म मुझको इतने काम पे रख लों
कितनी खूबसूरती से रिश्ते की सादगी और नजाकत पर रोशनी डालती है...
जब भी सीने पे झूलता लॉकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूं उसको
मुझको इतने काम पे रख लो

जब भी आवेजा उलझे बालों में
मुस्कुराके बस इतना सा कह दे
आह चुभता है ये अलग कर दो
मुझको इतने काम पे रख लो

जब गरारे में पांव फंस जाए
या दुपट्टा किवाड़ में अटके
एक नजर देख लो तो काफी
मुझको इतने काम पे रख लो


खुद को छोटे-छोटे काम पर रखना कैसे भूल जाते हैं ? समय के साथ सभी बदलते हैं,
लेकिन इतना भी क्या बदलना कि आप अजनबी ही मालूम हों। दूसरे ग्रह से आए हुए। जहां स्त्री तरक्की की सीढ़ी पर अग्रसर है,वहां ऐसी ही शिकायतें पति की भी हो सकती हैं। फर्क हालात का है, लेकिन दोनों ही हालात में असर रिश्ते पर आता है। परिवार पर आता है। आज जब स्त्री प्रार्थना और पूजा भाव से इस रिश्ते की लंबी उम्र और अच्छी सेहत की कामना कर रही है तो आप भी तन-मन-धन से इसमें लग जाएं। निदा फाजली का एक दोहा खास दांपत्य के लिए...
माटी से माटी मिले,
खो के सभी निशान
किसमें कितना कौन है,
कैसे हो पहचान.

Wednesday, September 30, 2009

पाँच हजार रुपये में बेच दी बच्ची


बाज़ार में इन दिनों जहाँ कबाड़ से लेकर महल तक बिक रहे हैं वहीँ जिंदगियां भी दाव पर लगी हैं उसने अपनी नवजात बच्ची को बेच दिया. यह पहली बार नहीं था कि धन के नीचे संवेदना कुचली गयी हो. नवरात्र में कन्या जिमाने का दस्तूर है लेकिन उसने अपना अंश किसी और के सुपुर्द कर दिया था. अगर आप मान रहे कि वह बिटिया थी इसलिए ऐसा हुआ तो आप भूल करेंगे

यह बेटी तेईस साल की भव्या की चौथी संतान है। पति नंदू खास कमाता नहीं। पड़ोसी थे, शादी कर ली। दोनों के माता-पिता की सहमति इस शादी में नहीं थी। अपनी संतान से मुंह मोड़ पाना कब किस के बस में रहा है [लेकिन भव्या -नंदू के बस में तो है]वे धीरे-धीरे जुड़ने लगे।
धन का अभाव अमावस के अंधेरे की तरह इनके साथ लगा हुआ था। कामचोर पति का साथ निभाते हुए भव्या ने कई छोटी-मोटी नौकरियां की, लेकिन कोई भी कायम नहीं रही। पहली संतान एक बेटा हुआ, जो कुपोषण का शिकार था। दो महीने बाद ही वह दुनिया छोड़ गया। दसवीं फेल भव्या कभी किसी पार्लर में, कभी कैटरिंग सर्विस में और कभी सेल्स में काम करती रही। बेटे की मौत के एक साल बाद दूसरी संतान उसकी गोद में थी। पालने के लिए न समय था, न पैसा। भव्या की सास ने उसे पाल लिया। वह बच्ची को दिलोजान से चाहती है और वह दादी को ही मां बुलाती है। उसके माता-पिता उसकी ओर से बेखबर हैं। सवा साल बाद एक और पुत्र भव्या की झोली में था। आम मानसिकता होती है अब तो बेटा भी हो गया है, भव्या-नंदू का परिवार पूरा । अभाव के मारे ये दोनों पति-पत्नी केवल पांच हजार रुपए में बेटा बेच आए। तब भव्या का कहना था कि मन तो रोता था, लेकिन उसकी जिंदगी संवर जाएगी। हम उसे क्या दे सकते थे। भव्या की सास ने बहुत रोका,चीखी-चिल्लाई, लेकिन डील हो चुकी थी।
अब भव्या ने अपनी नवजात बेटी के साथ भी यही किया है। नंदू भी इन सबमें शामिल है। इस बार का सौदा थोड़ा बेहतर है। बच्ची गोद लेने वाले ने पांच हजार नकद दिए हैं और नंदू का आठ हजार रुपए का पुराना कर्ज चुकाने का वादा भी किया है। भव्या के नौ माह के गर्भ और दर्द की कीमत तेरह हजार रुपए लगी है। त्योहार है। खूब खरीद-फरोख्त जारी है, लेकिन ऐसा व्यापार? दिल दहल जाता है। खून सूखने लगता है। लगातार दो बार यह स्त्री अपनी संतान किसी और के हवाले कर चुकी है। कोई उम्मीद नहीं कि वह कभी उसे देख पाएगी, छू सकेगी। यह संवेदनाओं का खात्मा है या गरीबी का अभिशाप। शायद संवेदनाओं को पलने के लिए भी रोजी-रोटी का सहारा चाहिए। अभाव में जब संतान पेट में आ सकती है तो फिर उसे पालने-पोसने का संकल्प क्यों नहीं? क्या अपना कलेजा किसी को सौंप देना आसान है। वे बच्चे जो मां के दूध से लगे हैं, यकायक दूर हो जाते हैं। कितना कठिन फैसला होगा यह मां के लिए और संतान, उसका तो यह फैसला भी नहीं।
लगातार दो बार अपने बच्चों को बेचने की घटना हैरान करती है, वह मामूली राशि के लिए। भव्या कहती है, मैं बच्चे बेच नहीं रही हूं। बस उनकी परवरिश बेहतर हो जाए। ओह... यह कैसी परवरिश होगी, जो मां के बगैर हो और कैसी दुनियादारी कि जहां धन है, वहां बच्चे नहीं और जहां बच्चे हैं वहां धन नहीं। धन के गणित ने बच्चों से उनके माता-पिता छीन लिए। यहां यह भूमिका यमराज ने नहीं, माया ने अदा की है। जयपुर में ऐसी कई भव्याएं हैं। त्योहार के इस शुभ मुहूर्त में जीवन भी बिक रहे हैं।?
painting by husain baba.

Thursday, September 17, 2009

हर चेहरा विदा....


क्या वाकई तिथियों के साथ गम भी विदा हो जाते हैं ? काश यादों का भी तर्पण हो सकता और यदि नहीं तो कागे की जगह एक बार ही वह दिखाई दे जाता जिसके लिए आँखों से नमी का नाता टूट ही नहीं पा रहा है.
सांझ
सां .....झ
हर चेहरा विदा.

अन्तिम तीन पंक्तियाँ कवि अशोक वाजपेयी की हैं जो उन्होंने 1959 में लिखी थीं । क्या वाकई हर चेहरा विदा है? विदा होते ही सब कुछ खत्म हो जाता है कि कुछ रह जाता है तलछट की तरह। सालता, भिगोता, सुखाता और फिर सराबोर करता। कभी किसी प्रेम में डूबे को देखा है आपने? एक ऐसे सम पर होता है जहां चीजें एक लय ताल में नृत्य करती हुई नजर आती हैं। इतना सिंक्रोनाइज्ड कि कोई चूक नहीं। समय से बेखबर बस वह उसी में जड़ हो जाता है। यह जड़ता तब टूटती है जब दोनों में से कोई एक बिखरता है। विदा होता है। अवचेतन टूटता है। चेतना जागती है। तकलीफ, दुख, पीड़ा जो भी नाम दें, सब महसूस होने लगते हैं। एहसास होता है जिंदा होने का। एहसास होता है उस ...ताकत का जो इस निजाम को चला रही है। इससे पहले तक लगता है जैसा हम चाह रहे हैं वही हो रहा है। हमने यह कर दिया, वह कर दिया। हमारे प्रयास से ही सब बेहतर हुआ। फिर पता चलता है कि आपके हाथ से सारे सूत्र निकल गए। आप खाली हाथ रह जाते हैं और वह उड़कर जाने किस जहां में खो जाता है। उस दिन आपको यकीन होने लगता है कि आपकी हस्ती से बड़ी कोई बहुत बड़ी हस्ती है जिसके चलाए सब चल रहे हैं। यह सृष्टि भी और इसमें जी रही चींटी भी। आपकी बिसात कुछ नहीं। यह आपको अपनी हार लग सकती है। आप ठगे से रह जाते हैं कि जिसकी आवाज कानों में मिश्री घोला करती थीं... बांहें भरोसा देती थी... आंखें उम्मीद बंधाया करती थी.... वह आज नहीं है। वह खत्म है। अतीत है। उसके साथ थां जुड़ गया है। नाम के आगे स्वर्गीय लगाना पड़ रहा है और नगर निगम ने उसका मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया है। यह सब एक जिंदा शख्स को मृत्यु की कगार पर लाने से कम नहीं होता है। जीते जी मरने की यह तकलीफ सिर्फ वही पाता है जिसका अपना उससे विदा ले गया हो।
1987 में वाजपेयी जी ने फिर लिखा विदा शीर्षक से-
तुम चले जाओगे
पर थोड़ा-सा यहां भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सोंधी सी गंध
भोर के उजास में
थोड़ा सा चंद्रमा
खंडहर हो रहे मंदिर में
अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार।

तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति
छंद की तरह गूंजता
तुम्हारे पास होने का अहसास।

तुम चले जाओगे
और थोड़ा सा यहीं रह जाओगे!
यही अंत में शुरूआत है? यह कोशिश होती है चीजों को बड़े फलक पर देखने की। एक कमरे से घर, घर से शहर, शहर से देश और देश से दुनिया और दुनिया से ब्रह्मांड को देखने की। इस तुलना में आपको अपना गम छोटा लगने लगता है। सूरज आपको अस्त होता हुआ लगता है लेकिन वह कहीं उदय हो रहा होता है। अंत कहीं नहीं है। एक चक्र है जो चलता है सतत निर्बाध जब हमारे मन का होता है तब हमें भी सब चलता हुआ लगता है और जब नहीं होता तब खंडित होता हुआ। एक और कवि हरिवंश राय बच्चन की बात गौर करने लायक है। मन का हो तो अच्छा है और मन का न हो तो और भी अच्छा। गौर कीजिएगा। शायद जिंदगी आसान हो जाए.

Saturday, September 5, 2009

हाउ अनहैप्पी इज हर टीचर्स डे ?


happy teachers day की ध्वनियों के बीच वह कहीं उदास कोने में बैठी होगी.लड़ रही होगी हालात से.बिखर रही होगी या शायद बिखरकर जुड़ रही होगी वह 14 की और प्रिंसिपल 48
शिक्षक दिवस यानी डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन। हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति और एक समर्पित शिक्षक। हमेशा की तरह इस दिन को भी श्रद्धा भाव से मनाने की कोशिश थी। गुरु को ईश्वर से भी बड़ा दर्जा देने वाले इस देश की परंपरा में कुछ और विचारने का मन भी नहीं करता, लेकिन जब जयपुर के महाराजा पब्लिक स्कूल के संचालक और प्रिंसिपल का कृत्य उजागर हुआ तो लगा जैसे शिक्षक ही इस परंपरा को चुनौती दे रहे हैं। वे इस दर्जे से नाखुश हैं। यह वाकये का सामान्यीकरण करने की कोशिश नहीं है, लेकिन अनेकानेक घटनाएं हैं, जो नैतिक पतन की ओर इशारा करती हैं। हमें यह बिलकुल नहीं भूलना चाहिए कि दुष्कर्म की शिकार इस बच्ची की उम्र चौदह है और अपराधी की 48।
रिपोर्टर की छानबीन बताती है कि दुष्कर्म के बाद स्कूल संचालक ने लड़की को अच्छे नंबरों से पास करने का लालच दिया। लड़की की मां ने ताड़ लिया था, लेकिन डर के मारे उसने कुछ भी नहीं बताया। दूसरे दिन उसने वही हरकत फिर दोहराई। लड़की की पीड़ा अब सब्र तोड़ चुकी थी। उसने सब-कुछ मां को बता दिया। किशोरी की तकलीफ देखिए। अबोध की बात पर विश्वास न करते हुए परिजनों ने पहले उसका परीक्षण कराया और फिर मुकदमा दर्ज कराया। तीन दिन आईसीयू और एक दिन जनरल वार्ड में रहने के बाद सोमवार को पीड़ित बालिका को छुट्टी दे दी गई। वह तीन दिन तक चलने-फिरने की हालत में नहीं थी। जरा संभली ही थी कि सरकार की ओर से पांच लाख की एफडी और पुनर्वास के संकेत मिल गए। पांच लाख रुपए का ही एक ओर प्रस्ताव आरोपी की तरफ से भी आया है कि कोर्ट-कचहरी ना करें, मामाला बाहर ही सुलटा लें। पीड़िता के दादाजी कातर स्वर में किसी से यह बात साझा कर रहे थे। 'हम गरीब इसके आगे कहां टिक पाएंगे', यही शब्द थे उनके। समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति एक गरीब बच्ची और उसके परिवार की प्रतिष्ठा से खेल गया था। फिर सभी पैसों से उसकी भरपाई करने में लगे थे। इस कवायद में हमें ध्यान रखना होगा कि वह लड़की एक सामान्य लड़की ही बनी रहे। अकेले कर दिए जाने का पूरा खतरा है यहां। एक महिला पुलिसकर्मी (जो अस्पताल में उसकी रक्षा के लिए थी) का कहना था कि पांच लाख मिल गए लड़की, तेरा तो बुढ़ापे तक का इंतजाम हो गया...। दरअसल कुकर्म के प्रति क्षतिपूर्ति का यह अंदाज ही अपराध की आग में घी डालता है। किशोरियों पर कहर की बढ़ती घटनाओं से लगता है कि जैसे इस उम्र को समझने का हमारा कोई इरादा नहीं है। इस उम्र में जब लड़की स्वयं ही एक अनजाने अपराधबोध से घिरी होती है, हम भी उसे भरोसा नहीं दे पाते। जो बिटिया दस साल तक खेलते-कूदते बड़ी हो रही होती है, अचानक अपने माता-पिता की आखों में चिंता के भाव देखने लगती है। बड़ी हाने का यह आभास उसे उन्हीं से होता है। यह सब मित्रवत न होकर भयग्रस्त कराते हुए होता है। इसी समय का लाभ शातिर अपराधी लेते हं। ...और शेष समाज? कभी किसी किशोरी से पूछिएगा। खासकर निम्न-मध्य वर्ग की लड़की। स्कूल से घर तक सैकड़ों निगाहें उसे ऐसे देखती हैं जैसे कोई अजूबा जा रहा हो। आंखों से शरीर भेदती ये निगाहें उसे खुद की नजरों में ही हीन साबित कर देती हैं। स्कूल से बाहर लगा जमावड़ा कभी फिकरे कसता है तो कभी स्पर्श करता हुआ रफूचक्कर हो जाता है। कोई रोज प्रणय निवेदन की रट लगाए हुए घर तक पीछा करता है। अलवर शहर की चालीस लड़कियों ने ऐसी ही छेड़ -छाड और प्रताड़ना से तंग आकर स्कूल छोड़ दिया . परिजन यह दृश्य देखकर लड़की पर ही शक करते हुए उसे कोसना शुरू कर देते हैं। जिस समाज में लड़की के आने पर लक्ष्मी आई है... लक्ष्मी आई है...जैसे शब्दों का मरहम देना पड़ता है, वहां उसके सहज सामान्य विकास की कल्पना बेमायने है। उसकी कमजोर उपस्थिति ही अपराधों की लंबी फेहरिस्त बनाती है।
किशोरियों का बुनियादी हक शिक्षा अब भी उनसे दूर है। कई रोड़े हं उसमें। जाहिर है यह विकास आधा-अधूरा है। जब तक इस तबके तक विकास और विश्वास का संचार नहीं होगा देश की तरक्की नामुमकिन है। कुछ चमक जरूर नजर आती है, लेकिन यह सड़े हुए गोबर पर चांदी के वर्क से ज्यादा कुछ नहीं है।

Wednesday, August 26, 2009

रत्ती-जिन्ना छोटे सफर के हमसफ़र





रत्ती [20.02.1900-20.021929] के इंतकाल के दौरान भी मोहम्मद अली जिन्ना शांत और संयत बने रहे लेकिन जब रत्ती सुपुर्दे-खाक की जा रही थी और पहली मिट्टी जिन्ना को देनी थी तब यह पत्थरदिल शख्स किसी अबोध बच्चे की तरह फफक-फफक कर रो पड़े। तर्क और गांभीर्य के प्रतीक जिन्ना के सब्र का बांध टूट चुका था। उनकी रत्ती सदा के लिए धरती की गोद में समा चुकी थीं।

जिन्ना के व्यक्तित्व का जब-जब आकलन हुआ है तब-तब शोर मचा है, जिरह हुई है, बेदखली हुई है। यहाँ मकसद इसमें और इजाफा करने की बजाए उन सुनहरे पलों को याद करना है जो एक खूबसूरत, राष्ट्रवादी, समृद्ध पारसी लड़की रतन बाई के बिना मुकम्मल नहीं होते। जिन्ना ने खुद से 24 बरस छोटी रतनबाई उर्फ रत्ती से जब प्रेम विवाह किया था तो दोनों ही समाज सकते में आ गए थे ...।

दिल्ली में 15 अगस्त 2006 की एक सुबह। स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में मंच पर पूर्व राज्यसभा नजमा हेपतुल्ला, पंजाब के पूर्व डीजीपी केपीएस गिल और वरिष्ठ पत्रकार शाहिद मिर्जा आसीन थे। कार्यक्रम के बाद जारी अनौपचारिक बातचीत में बॉम्बे डाइंग वाले नुस्ली वाडिया भी शामिल हो गए। मोहम्मद अली जिन्ना और रतनबाई के नवासे नुस्ली वाडिया यानी जेह और नेस वाडिया के पिता। रतन-जिन्ना की बेटी दीना के पुत्र। बहरहाल, नुस्ली वाडिया और राज्यसभा की पूर्व उपसभापति नजमा हेपतुल्ला को बातचीत करते हुए देखना बहुत रोचक था। एक ओर कायदे-आजम जिन्ना के नवासे तो दूसरी ओर मौलाना अबुल कलाम आजाद की पोती । एक ने पाकिस्तान बनाया तो दूसरे अखंड भारत के पैरोकार। विभाजन के बावजूद पाकिस्तान न जाकर भारत के निर्माण में जुटे मौलाना। जाने क्यूं यह मंजर स्मृतियों में हमेशा डेरा डाले रहता है। यह कैसा विखंडन है जिसके सूत्र इतने गहरे जुडे़ हैं।
अब बात रतनबाई जिन्ना की। जिन्ना के जीवन का नर्म और नाजुक पहलू। कौन थीं रतनबाई? सब प्यार से उन्हें रत्ती पुकारते थे . बेहद संवेदनशील, मेधावी, सम्मोहक व्यक्तित्व वाली रतन के जीवन पर निगाह डालने पर इन शब्दों में जान पड़ जाती है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में जन्म लेने के बावजूद उनकी छवि बोल्ड एंड ब्यूटीफुल से भी आगे की नजर आती है। स्वर कोकिला सरोजिनी नायडू (वे जिन्ना की काफी करीबी दोस्त थीं) ने रत्ती को मुंबई का पुष्प और जिन्ना की कामना का नील कुसुम कहा था। मुंबई के बेहद समृद्ध और प्रतिष्ठित पेटिट दंपति की पहली संतान रत्ती। 20 फरवरी 1900 को जन्मीं रत्ती बहुत खूबसूरत व कुशाग्र थीं। कला और साहित्य में गहरी रुचि रखने वाली रत्ती को शेक्सपीअर के नाटकों में खासी दिलचस्पी थी। कविता में भी गहरी रूचि थी, लिहाजा भावप्रवणता भी वक्त के साथ जवान होती गई। राष्ट्रवाद भी इसी भावना के साथ जड़ पकड़ रहा था, क्योंकि दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह, गोपालकृष्ण गोखले, मैडम एनीबीसेंट, सरोजिनी नायडू और मोहम्मद अली जिन्ना का परिवार में सतत आना-जाना था। बहस, बातचीत नन्हीं रत्ती के मन पर गहरी छाप छोड़ती। उनकी बुआ और चचेरी बुआ की इन सबमें गहरी रुचि थी। निस्संदेह रत्ती का मानसिक फलक काफी विशाल हो रहा था। यूं रहन-सहन जरूर पश्चिम से प्रेरित था।
चालीस पार कर चुके जिन्ना शरीर से भले ही दुबले-पतले थे, लेकिन पाश्चात्य जीवनशैली, शालीन व्यवहार, प्रखर राष्ट्रवाद (जी यह वह समय था, जब जिन्ना देश के लिए सोचते थे। किसी एक धर्म की पैरवी अभी इस बैरिस्टर ने शुरू नहीं की थी) धार्मिक एकता के समर्थक होने से वे खास और अलग पहचान रखते थे। राजनीतिक चर्चाओं के दौरान अकसर उनका रात का भोजन पेटिट परिवार के साथ ही होता। सोलह पार करती रत्ती भी कभी-कभार इन सबमें मौजूद रहती। शायद वह जिन्ना के प्रति आकर्षण महसूस करने लगी थीं। जिन्ना भी किशोर रत्ती को अनदेखा करने की हालत में नहीं रह गए थे। कुछ इस आकर्षण के चलते और कुछ राष्ट्रवाद की प्रखर हिमायती होने के नाते रत्ती भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होने लगी थीं।
इस सोच को परवाज तब मिली, जब जिन्ना पेटिट परिवार के साथ अप्रेल 1916 में दार्जिलिंग जाकर छुट्टियाँ मना रहे थे। पूना, दार्जिलिंग में इस परिवार के बड़े-बड़े बंगले थे। इस मनमोहक एकांत ने दोनों से वह सब कुबूलवा लिया, जो वे अब तक दबाए हुए थे। सन 1916 में ही कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौते का आगाज हो चुका था। जिन्ना अब हीरो थे । अकबर की नाईं शायद जिन्ना भी दूसरे धर्म की सुंदर और कुशाग्र कन्या से ब्याह कर राजनीतिक दृष्टिकोण को व्यापक आधार देना चाहते थे। जनवरी 1917 में जब धार्मिक सौहार्द पर सर दिनशॉ पेटिट के बंगले पर चर्चा चल रही थी, तब जिन्ना ने उनसे दो अलग धर्मों के बीच वैवाहिक रिश्तों पर विचार जानने चाहे। सर पेटिट ने राष्ट्रीय एकता के लिए ऐसे संबंधों की वकालत की। उन्होंने माना की टकराव और कलह की कई समस्याएं इस कदम से खत्म हो सकती हैं। जिन्ना को इससे बेहतर मौका नहीं मिल सकता था। उन्होंने दिल की बात रख दी। पेटिट का चौंकना स्वाभाविक था। स्वयं से केवल तीन साल छोटे शख्स के साथ अपनी फूल-सी गुणी बेटी के ब्याह की बात वे सोच भी नहीं सकते थे। उन्हें जिन्ना की पहल सर्वथा गलत लगी। उन्होंने इस प्रस्ताव को क्रोधपूर्वक रद्द कर दिया। वकील जिन्ना की हर दलील बेअसर साबित हुई। इसके बाद जिन्ना से कभी उनकी मित्रवत बातचीत नहीं हुई। उधर, रत्ती के जिन्ना से मिलने पर रोक लगा दी गई। पारसी विवाह कानून के तहत यह रोक न्यायालय से भी लागू हो गई। 20 फरवरी 1918 को जब रत्ती का अठारहवां जन्मदिन मनाने की तैयारियां चल रही थी, तब वह पिता का घर छोड़ जिन्ना के पास आ गईं। शिया समुदाय को यह निकाह कबूल नहीं था, क्योंकि ऐसा करने पर पारसियों के उनसे व्यावसायिक रिश्ते खतरे में पड़ सकते थे, लिहाजा जिन्ना को यह जमात छोड़नी पड़ी। मुस्लिम कानून के तहत विवाह की स्वीकृति के लिए रत्ती का धर्म परिवर्तन जरूरी था। जिन्ना ने भी इस्माइली जमात से नाता तोड़ इस्ना अशरी जमात से नाता जोड़ा। जहां उनके निकाह को स्वीकृति मिल गई। तीन पीढ़ी को पहले क्षत्रिय धर्म से इस्लाम स्वीकारने वाले जिन्ना अब इस जमात में थे। विवाह की खबर पर ही स्वर कोकिला ने लिखा था कि इस बच्ची ने उससे कहीं बड़ा बलिदान किया है जितना वह आज समझ रही है। तब नवविवाहित जोड़ा नैनीताल में हनीमून मना रहा था। शायद उस समय वे रत्ती के जीवन का सच लिख रही थीं।
रत्ती से शादी के पहले जिन्ना के मुंबई आवास साउथ कोर्ट पर उनकी बहन फातिमा का कब्जा था। रत्ती के प्रवेश से उनका एकछत्र राज टूटा। यह तिरस्कार भाव जिन्ना की बेटी दीना के लिए भी रहा। बाद के बरसों में दीना अपने ननिहाल चली गईं। इससे पहले जिन्ना रत्ती को भी वक्त नहीं दे पा रहे थे। राजनीतिक गतिविधियों से गहरे जुड़ाव ने उन्हें रत्ती से दूर कर दिया। रत्ती खुद को उपेक्षित महसूस करने लगी। जनवरी 1928 में उन्होंने जिन्ना से अलग रहने का फैसला किया। मुंबई में समंदर किनारे बने ताज होटल में उन्होंने एक सुइट बुक करा लिया था। यकीन करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन यही वह समय रहा जब उदारमना धर्म निरपेक्ष जिन्ना का दूसरा अवतार सामने आया। कहना गलत न होगा कि इसमें उनकी बहन का भी योगदान रहा। वक्त गुजरते जिन्ना एक सांप्रदायिक नेता में तब्दील होते गए। उनके ऐसे भाषणों की पहली श्रोता फातिमा ही होती। उधर रत्ती जिन्ना से अलग भले ही हो गई थीं, लेकिन जिन्ना के प्रति आत्मीय भाव बना हुआ था। वह बदलते जिन्ना को देख चिंतित व व्यथित थीं। धीरे-धीरे पहले से खराब सेहत और गिरने लगी। उनके फेफडे़ क्षयग्रस्त थे। अप्रेल 1928 में वे इलाज के लिए मां के साथ पेरिस रवाना हुईं। राजनीतिक निराशा में डूबे जिन्ना भी रत्ती से मिलने के लिए पेरिस के अस्पताल पहुंचे। जिन्ना ने चिकित्सकों से बात कर रत्ती के लिए बेहतर डॉक्टर और नर्स की व्यवस्था की। वे एक महीना साथ रहे। देखभाल से रत्ती ठीक होने लगी थीं। फिर अचानक दोनों में झगड़ा हुआ और रत्ती मां के साथ मुंबई लौट गई। कुछ समय ठीक रहने के बाद स्वास्थ्य फिर गिरने लगा। 18 फरवरी, 1929 को रत्ती ने जिन्ना के लिए लिखा, मेरे प्रिय मैंने तुम्हें इतना प्यार किया, जितना कभी किसी पुरुष को नहीं किया। यही प्रार्थना है कि जिस ट्रेजेडी का प्रारंभ प्रेम से हुआ था, उसका अवसान भी प्रेम से ही हो। गुडनाइट...गुड बाई...। दो दिन बाद अपने जन्मदिन पर इस शहजादी ने हमेशा के लिए आँखें मूँद ली। तब पहली बार सर पेटिट ने जिन्ना से बात की। केवल इतना कहा कि रत्ती बहुत बीमार है। यहां आ जाओ। परी कथा की इस हसीन नायिका का अंत सुखद नहीं था। 29 साल की की रत्ती भर ज़िन्दगी जीने वाली रतन के जीवन में २० फरवरी का दिन बहुत कुछ लेकर आया था . मौत भी . इसके बाद जिन्ना ने जो निजी स्वप्न साकार किया उसमें उनके परिवार का भी यकीन नहीं था। उनकी बेटी दीना न्यू यॉर्क में हैं और अक्सर भारत आती जाती हैं.


रतन का वह जवाब
शिमला के वाइसरॉय लार्ड चेम्सफोर्ड ने जिन्ना दंपति के सम्मान में रात्रिभोज का आयोजन किया था। जब रत्ती का परिचय कराया गया तो उन्होंने पश्चिमी ढंग से झुककर अभिवादन करने की बजाय दोनों हाथ जोड़कर सम्मान प्रकट किया। वाइसरॉय को यह नागवार गुजरा। भोजन के बाद उन्होंने रत्ती को अपने पास बुलवाया और सख्त आवाज में कहा आपके पति का राजनीतिक भविष्य उज्जवल है। आपको अपने व्यवहार से इसे खराब नहीं करना चाहिए। (इन रोम यू मस्ट डू एज रोमंस डू...यह उनका अंतिम वाक्य था) रत्ती ने विनम्र होकर कहा ठीक वही तो किया है महामहिम। मैं हिंदुस्तान में हूं और हिंदुस्तानी अंदाज में ही मैंने आपका अभिवादन किया है। चेम्सफोर्ड निरुत्तर हो चुके थे। उसके बाद रत्ती उनके किसी आयोजन में शामिल नहीं हुई।

Wednesday, July 29, 2009

जयपुर की महारानी गायत्री देवी नहीं रहीं




जयपुर की महारानी गायत्री देवी का आज जयपुर में निधन हो गया . वे ९० वर्ष की थीं .बुधवार दोपहर संतोकबा दुर्लभजी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. कूंच बिहार में जन्मीं गायत्री देवी का असली नाम आयशा था.उनका विवाह जयपुर के महाराजा मानसिंह के साथ १९४० में हुआ. वे उनकी तीसरी पत्नी थीं. उनका रहन-सहन अन्य महारानियों से अलग था .वे घुड़सवारी करतीं गौल्फ़ खेलती शिकार पर जातीं . इन सब के बावजूद गायत्री देवी से सादगी और गरीमा कभी अलग नहीं हुई .वोग पत्रिका ने उन्होंने दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं में शुमार किया. मकबूल फ़िदा हुसैन और अमिताभ बच्चन उनके प्रशंसकों में रहे हाँ इंदिराजी से ज़रूर उनका बैर रहा. वे जयपुर से तीन बार सांसद का चुनाव जीतीं लेकिन आपातकाल [१९७५] में उन्हें इंदिरा गाँधी ने तिहाड़ जेल में बंद कर दिया .
पिछले कुछ दिनों से वे अस्पताल में दाखिल थीं . सांस लेने और पेट दर्द की शिकायत के बाद वे कुछ बेहतर भी महसूस कर रहीं थी लेकिन आज जब दफ्तर में यह खबर आयी तो सबके स्वर धीमे हो गए अधिक से अधिक सामग्री देने के जूनून के साथ सब जैसे दर्द को भी जी रहे हैं. इस गरिमावान जीवन और mgd [स्कूल की बुनियाद उस समय पड़ी जब राजपूत लड़कियां परदे में रहती थी ] स्कूल के माध्यम से लड़कियों की शिक्षा की राह आसान करने वाली गायत्री देवी को श्रध्दासुमन .

Friday, July 10, 2009

बात कुफ्र की की है मैंने....


पेश है एक वार्तालाप

टॉम-उफ...क्या हो गया है देश को
डिक-क्यों क्या हुआ...
टॉम-अरे... अब ऐसे घृणित काम को भी कानूनी मान्यता मिल गई... महिला का महिला और पुरुष का पुरुष के साथ संबंध पर कोर्ट को कोई एतराज नहीं...
डिक-तो इसमें गलत क्या है
टॉम-गलत ही गलत है। ये कुदरत के खिलाफ है। सोचकर ही घिन आती है। यह फैसला शादी, परिवार जैसी व्यवस्था को खत्म कर देगा।
डिक-यह सब पर लागू नहीं होता, बल्कि जो लोग ऐसे हैं उन्हें प्रताड़ना से बचाएगा। इन्हें समझने की बजाए हम घरों में कैद कर देते हैं। पुलिस उनके साथ खराब सुलूक करती है।
टॉम-इन्हें क्या समझना...ये तो बीमार और पागल हैं।
डिक- यह न तो बीमार हैं और न असामान्य। जैसे आप किसी स्त्री को पसंद करते हैं या कोई स्त्री पुरुष को पसंद करती हैं, वैसे यह प्रवृत्ति भी जन्मजात है।
टॉम-सब बकवास है। इनका तो इलाज होना चाहिए, न कि इन्हें अधिकार दिए जाने चाहिए। इन्हें बढ़ावा क्यों दे रहे हैं?
डिक-नहीं, यह कोई छूत की बीमारी नहीं है, जो दूसरों में फैल जाएगी। इसके लिए एक जीन जिम्मेदार है।
टॉम-ऐसे गन्दे काम के लिए भी जीन जिम्मेदार हैं।
डिक-हां है, तुम उसे सिर्फ सेक्स तक ही देखते हो, वह तो सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा है। मूल बात है भावनात्मक लगाव, जो सामान्य तौर पर किसी भी स्त्री-पुरुष में होता है। उनकी सारी जिंदगी यहीं तक तो सीमित नहीं रहती।
टॉम-इसके लिए सड़कों पर उतरने की क्या जरूरत। जी लो जिंदगी। इमोशनल तरीके से।
डिक-जिस तरह दो प्रेमी एक-दूसरे के बिना नहीं जी पाते, वैसा ही आकर्षण ये महसूस करते हैं। यह बात एक शोध से भी सिद्ध हो चुकी है। ये केवल इतना चाहते हैं कि इन्हें भी दुनिया समझे। ये इस दुनिया में खुद को अल्पसंख्यक और असुरक्षित मानते हैं।
टॉम-मुझे तो कानून ही सही लगता है। इन्हें समाज में नहीं होना चाहिए।
डिक-क्यों... इन्होंने क्या अपराध किया है। उल्टे इन्हें समझने वाला कोई नहीं है। ये मौत से बदतर जिंदगी जीते हैं, जबकि बिलकुल सामान्य जिंदगी जी सकते हैं।
टॉम- ऐसा कोई शास्त्र नहीं कहता। सब धर्मों ने इसे वर्जित माना है।
डिक-वहां तो कई बातें वर्जित हैं। क्या उन सबका पालन हम कर पाए हैं और क्या वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर कई पुरानी धारणाएं बदली नहीं हैं।
टॉम-फिर कुछ लोग सुधर कैसे जाते हैं..
डिक-वे बदलते हैं खुद को। परिवार और समाज के दबाव के आगे। ठीक वैसे ही जैसे कोई लड़का या लड़की परिजनों की मर्जी के आगे घुटने झुका देता है, लेकिन इससे उसका झुकाव कम नहीं होता। क्षणिक आवेश में मौके का फायदा कई लोग उठाते हैं, लेकिन उनमें सड़कों पर उतरने का साहस नहीं होता ।
टॉम- आगे ये शादी का अधिकार मांगेंगे फिर बच्चे गोद लेने का।
डिक-इसमें दिक्कत क्या है, यह उनकी मर्जी पर छोड़ देना चाहिए।
टॉम-कोई मरना चाहता है। उसे भी चलाने दो मर्जी। आत्महत्या को क्यों जुर्म मान रखा है?
डिक-ये तो जिंदगी जीना चाहते हैं और वो खत्म करना। दोनों में फर्क है।
टॉम-लगता है तुम भी पागल हो गए हो, कहीं तुम भी...
डिक-मैं ऐसा तो नहीं हूं, लेकिन होता तो भी मुझे कोई शर्म नहीं आती।
टॉम-तुम सरफिरे हो। तुम्हारी पूरी सोच ही अजीब है..
डिक-या रब न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात,
दे और दिल उनको, जो न दे मुझको जुबां और।


गौरतलब है की सर्वोच्च न्यायालय ने मुद्दे को खारिज करने की बजाय धारा ३७७ के समर्थन में एन जी ओ नाज़ और सरकार को नोटिस जारी कर दिए हैं. बहस के सारें रस्ते अभी खुले हैं कि यह कुफ्र है यां कुछ और...

photo courtesy ;AP an activist in kolkata after delhi highcourt version of decriminalising homosexuality under act 377 of ipc.

Tuesday, July 7, 2009

आय लाइक करिना - वसीम अकरम




आज कुछ पुराने पन्नों से। करीब पौने तीन साल पहले [6th oct 2006] वसीम अकरम जयपुर आए थे। राजस्थान पत्रिका की सिटी मैग 141 के लिए उनसे मुलाकात करनी थी। होटल रामबाग पैलेस में वे बहुत कूल और कांफिडेंट नजर आ रहे थे । साथ ही भारत की तरक्की से प्रभावित भी। पेश है वही प्रकाशित इंटरव्यू जस का तस।

दुनिया के सबसे तेज लेफ्ट आर्म फास्ट बॉलर, गुड कमेंटेटर बट सिवियरली डायबिटिक वसीम अकरम शुक्रवार को जयपुर में थे। खेल के मैदान में जितने आक्रामक, जाती जिंदगी में उतने ही हंसमुख और मिलनसार। हर सवाल के लिए तैयार, कहीं नो कमेन्ट नहीं। क्रिकेट, पॉलिटिक्स, इंडिया, बॉलीवुड, बीमारी सबके बारे में वर्षा भम्भाणी मिर्जा की वसीम अकरम से एक्सक्लूसिव बातचीत-
कहते हैं, जिसने लाहौर नहीं देखा, वो पैदा ही नहीं हुआ। जयपुर के बारे में क्या कहेंगे?>

हां, मैं लाहौर का हूं, लेकिन जयपुर बहुत खूबसूरत है। पूरी दुनिया में रिच हेरिटेज-कल्चर के लिए जाना जाता है। जब मैचेस के लिए आते थे, तब टाइम नहीं होता था। अब देखना चाहूंगा।

आपके सामने (बातचीत रामबाग पैलेस की लॉबी में हो रही थी) एसएमएस स्टेडियम है, जहां चैंपियंस ट्राफी होने जा रही है...

मैंने देखा, बहुत शानदार तैयारी चल रही है। स्टेडियम बहुत बदल गया है। अच्छे मैचेस होंगे।
कौन जीतेगा चैंपियंस ट्राफी?

टॉप थ्री में ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका और हिन्दुस्तान-पाकिस्तान।

इंडो-पाक तीसरे पर क्यों?

होम ग्राउंड पर ज्यादा प्रेशर होता है। इसका फायदा पाकिस्तान को मिलेगा।

और वर्ल्ड कप?

वर्ल्ड कप में साउथ एशियन टीमें अच्छा खेलेंगी। विकटें हमारे हिसाब की ही होंगी।
पाक में मो. युसुफ को कप्तान...

वही सीनियर था। मैं इन दिनों बाहर हूं। ज्यादा कुछ पता नहीं। वही डीज़र्विंग था।

मीडिया कह रहा है कि युसुफ को मजहब बदलने का फायदा मिला।

यह बिलकुल गलत है। तीन दिन पहले मैंने इंटरव्यू किया (वसीम ईएसपीएन के कमेन्टेटर हैं)। उसने कहा, मैं मर्जी से मुसलमान बना। यह मीडिया का सही इंटरप्रिटेशन नहीं है।

इंडियन टीम में फेवरेट कौन है?

इरफान पठान और वीरेंद्र सहवाग।

पाकिस्तान में अब तक का बेस्ट प्लेयर?

इमरान खान इज द बेस्ट।

एज ए पॉलिटिशियन?

अभी नए हैं पॉलिटिक्स में इमरान।

आप सियासत में जाएंगे?

कह नहीं सकता। हां भी, ना भी।

मुशर्रफ कैसे प्रेसिडेंट हैं?

डेमोक्रेसी इज द बेस्ट। लेकिन मुशर्रफ बेहतर साबित हो रहे हैं।

सचिन के बारे में ?

सचिन अब बूढ़ा हो गया है।

और सौरव का जाना?

जाते सभी हैं, लेकिन जिस तरह उन्हें हटाया गया वह बहुत खराब था।

आप हिन्दी फिल्में देखते हैं?

हां, लास्ट ओमकारा´ देखी। कमाल का काम किया सैफ, अजय ने।

और करीना।

आई लाइक करीना वेरी मच। रानी मुखर्जी भी ब्लैक´ में बहुत अच्छी लगीं। एक्टर में अमिताभ बच्चन के अलावा कोई नहीं।

सिंगर्स में?

लता, आशा, सोनू निगम, नुसरत फतह अली खां व गुलाम अली। अंग्रेजी गाने नहीं सुनता।
आप ये सब कहां देख लेते हैं?

इधर आपके यहां फिल्म रिलीज होती है, उससे पहले हमारे यहां सीडी आ जाती है।

पाकिस्तान में मल्टीप्लैक्स का कोई बूम नहीं है?

नहीं, पता नहीं क्यूं। वहां मार्केट डेवलप नहीं हो पा रहा। इंडिया तो तेजी से ग्रो कर रहा है। कोई शक नहीं कि इंडिया सुपर पॉवर होगा। मैं दिल्ली, इंदौर, लखनऊ, चंडीगढ़ कई शहरों में गया हूं। इकॉनामिकली दे आर ऑल बूमिंग।

अब तो पूरे साल क्रिकेट खेली जा रही है।

यह बहुत अच्छा है। ज्यादा क्रिकेट, ज्यादा पैसा होना चाहिए। और खेलों के मुकाबले क्रिकेट में पैसा कम है।

डायबिटीज के साथ जीवन कैसा होता है?

मुझे दस साल से डायबिटीज है। खान-पान और एक्ससाइज में डिसिप्लिन बहुत जरूरी है। दिन में दो बार शुगर चेक कर लेता हूं, कोई परेशानी नहीं आती है।

Monday, June 29, 2009

न्यू यॉर्क के बहाने...


स्लमडॉग मिलिनेअर के बाद, कल संडे को थिएटर का रुख किया। फिल्मों के मामले में खांटी भारतीय हूं, न्यू यॉर्क तक चली गई।[लगा था की फिल्म एवेंइ होगी] अंधेरे में चमकती रुपहली स्क्रीन स्पंदित करती है और न्यू यॉर्क ने तो दिल और दिमाग दोनों को। कबीर नाम से गहरा फेसिनेशन रहा है। चक दे इंडिया का पात्र कबीर खान भी पसंद रहा. संत कबीर के प्रति गहरी आसक्ति है और अब कबीर खान यानी न्यू यॉर्क के डायरेक्टर।
क्या खास है जो न्यूयार्क पर लिखने के लिए बाध्य करता है। कैटरीना, जॉन या नील नितिन मुकेश या फिर हमारे जयपुर के इरफान खान? लेकिन वह घटना जो अमरीकी इतिहास में नासूर की तरह दर्ज हो गई। 9/11 का हादसा कई दिलों में नश्तर चुभो गया। पहले मरने वालों के परिजनों के दिलों में और फिर एक खास मजहब के सीनों में। दर्द में कराहते अमरीका में उन दिनों एफबीआई ने 1200 लोगों को हिरासत में लेकर तफ्तीश की थी जिनका बस नाम ही काफी था। इन कथित कैदियों के दिलों में चुभे नश्तर से फूटता लावा ही न्यू यॉर्क है।
प्रख्यात स्तंभकार आदरणीय जयप्रकाश चौकसे जी सही फरमाते हैं कि पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए´ देखने के बाद न्यू यॉर्क क्लासिक नहीं लग पाती। बाअदब सौ फीसदी सही लेकिन 'सर खुदा के लिए'... आज कितने भारतीय देख पाए हैं। new york ke liye जयपुर का फर्स्ट सिनेमा खचाखच भरा था। जॉन, कैटरीना जैसी पॉपुलर स्टार कास्ट युवाओं को गर्मी भरी दोपहरी में हॉल तक खींच लाई थी। इतनी बड़ी तादाद में कॉलेज गोइंग यूथ को खुदा के लिए...में देख पाना संभव नहीं।
उमर एजाज (नील नितिन मुकेश) को पहले एक मासूम प्रेमी और फिर एफबीआई के लिए इस्तेमाल होते देखना कतई यह आभास नहीं देता कि वे कमजोर कलाकार हैं। ही लुक्स गुड...। उनके दादा और बेहतरीन गायक मुकेश अभिनेता बनने ही मायानगरी आए थे। ख्वाब तीसरी पीढ़ी में साकार हुआ। इरफान खान स्लमडॉग... में भी एक निरपराध अपराधी को डिटेन कर रहे थे और यहां भी . वहां भारतीय खाकी वर्दी का बोझ था यहां एफबीआई का रौब है। इटालियन बीबी का बनाया पास्ता खाकर भले ही उनका पेट गड़बड़ाया हो लेकिन अंत में आतंकी इरादों वाले पिता के बच्चे के आग्रह पर पास्ता खाना टाल नहीं पाते। यही शायद मैसेज भी है कि अन्याय के बावजूद नफरत की पुरानी दुनिया में तड़पने की बजाए उम्मीद की नई दुनिया हमें ही रचनी होगी। हैट्स ऑफ कबीर खान। यहां junoon सा सीने में दिखाई देता है ... मसालों और तड़कों के बीच पौष्टिक आहार देने का। यही शायद सिनेमा का उद्देश्य है। न्यू यॉर्क के बहाने ही सही देश में भी ऐसे हालात रचने से हमें भी बचना होगा।

Tuesday, June 16, 2009

अब कोई अवतार नहीं होनेवाला


विख्यात पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा के व्याख्यान की समापन किस्त
हम पढे़-लिखे देश भी हो रहे हैं। साक्षर देश भी हो रहे हैं। जिम्मेदार निर्वाचन कानून बनाने से मतदाता जिम्मेदार नहीं होगा। और चुनाव आयोग के बूते की भी नहीं है कि वह अपराधियों की पूरी पहचान कर ले। कई बार बडे़ अपराधी भी बडे़ सफेदपोश बन जाते हैं। बडे़ अच्छे रिकॉर्ड्स ले आते हैं। थाने से पंचनामा ही फड़वा देते हैं। तो कई सारा छल-छद्म इसमें होता है। लेकिन मैं शाहिद मिर्जा यदि जयपुर का निवासी हूं तो मैं जानता हूं कि मेरे सांसद महोदय कैसे हैं? किस माजने के हैं? कितने पढे़-लिखे हैं? कितने सक्रिय रहेंगे? जनता से उनको कितना लगाव है? है या नहीं? लेकिन मैं तो पलायनकारी हूं। ना मैं काम करने जाता हूं। मुझे कोई मतलब ही नहीं है कि देश में किस अदा से काम चल रहा है। खासतौर पर शिक्षित मध्यवर्ग है। इसके बारे में पवन वर्मा ने बहुत सुंदर किताब लिखी है, ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास। उन्होंने कहा कहा कि भारत की आजादी लाने वाले यही लोग हैं। लेकिन ये ही अब चोट्टे हो गए हैं। ये ही सबसे अधिक भ्रष्ट हो गए हैं। ये शाम को कहते हैं कि देश में बहुत भ्रष्टाचार है ओर सुबह ही थैली लेकर मंत्री के घर पहुंच जाते हैं। साहब हमारे काम करवा दीजिए। तीन ठेके हैं, सर, अंकल। यह तो बहुत जरूरी है। यह तो करने ही पडे़गे और ये, ये तो रीति नीति है। यह तो भीतर है। इससे mukti नहीं मिलेगी तो समाज को भी mukti नहीं मिलेगी, और लोकतंत्र हमारा दूषित और कलंकित बना रहेगा। इसको छोड़ना बहुत जरूरी है। धनबल से दलाल पंचों को, वार्ड पंचों को खरीद लेते हैं। विधायक को खरीद लेते हैं। भले ही वे अजीम
प्रेम जी न हो लेकिन छुटभैय्ये प्रेमजी का अपराधियों से प्रेम अनवरत चल रहा है। तो उन्हें कौन रोकेगा। मेरा निवेदन है कि अब कोई अवतार नहीं होने वाला है। सब अवतार हो गए। महात्मा बुद्ध हो गए। कृष्णावतार हो गए। दशावतार हो गए। जीसस क्राइस्ट को सलीब ठोक दी। सुकरात को जहर पिला दिया। अब कुछ होने वाला नहीं है। अगर यह दुनिया खराब बन रही है तो यह हमारे कारण बन रही है। और अच्छी सुन्दर और रहने लायक सहनशील और सरस बनेगी, तो भी हमारे कारण ही बनेगी।
अलग-अलग पेशों से राजनीति मे कोई दिक्कत नहीं हैं। गोल्डन मेयर इजराइल के बहुत अच्छे प्रधानमंत्री साबित हुए। इजराइल मंे जो कंसेप्ट है उसमें मीडिया के नुमाइंदों को बुलाकर रखते हैं। फौज के नुमाइंदों को रखते हैं। जब भारत इतने सारे घोषित और अघोषित शत्रुओं से घिरा हुआ है तो फौज के 12 लोग नामांकित क्यों नहीं होते? उन्हें भी आप सहयोग करें। आप यह कल्पना करें कि फील्ड मार्शल मॉनेक शॉ जीत कर आ जाएंगे तो आप उनकी जमानत जब्त करवा देंगे। वो कैपैन नहीं करेंगे। हाथ नहीं जोड़ेंगे, वो झुकेंगे नहीं। वो झूठे वादे नहीं करेंगे तो हार जाएंगे। उनकी तो जमानत जब्त होगी। वो बुढ़ापे में यह अपमान क्यों सहन करें? तो हमारे कानून में कुछ होना चाहिए कि जहां पाकिस्तान की सीमा लगी है, जहां तालिबान खडे़ हो रहे हैं, जहां चीन से सीमा लगी है, जहां यांमार में हमारे खिलाफ ट्रेनिंग कैम्प्स लगते हैं। जहां 2000 आतंकी प्रशिक्षण शिविर पाक अधिकृत कश्मीर में हैं। बांग्लादेश में हैं।
लक्षद्वीप को लेकर श्रीलंका हमें आंख दिखाता है। मालदीव कहता है कि लक्षद्वीप हमारे हैं। तो हम किसी गरीब की जोरू क्यों बनना चाहते हैं? ऐसी क्या हमारी मजबूरी है? हम भारत को एक मजबूत देश क्यों नहीं बनाना चाहते? पिछली शताब्दी कुछ अमेरिकी लोगों से मुझे मिलने का मौका मिला। डेनियल वहां के भारत में राजदूत थे। तो वो बहुत दंभी होकर कहते थे दिस इज अमेरिकन सेन्चुरी। अमेरिका के लोग स्वभाव से ही दंभी हैं। सब यूरोप के जुआरी, चोर, लबारों की संतान हैं। तो ठीक है। आपकी शताब्दी थी, वो गई। अब वो अतीत हो गई। यह हमारी शताब्दी है। भारतीयों की शताब्दी।
pahle do hisse padhne ke liye side bar mein भारत महात्मा गाँधी इंदिरा गाँधी फूलन देवी शाहिद मिर्जा aur तुष्टिकरण लोकतंत्र par click keejiye

Friday, June 5, 2009

जोधाराम ही जोजेफ क्यों बनते हैं?


ख्यात पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा के व्याख्यान का दूसरा हिस्सा
कोई जमील खां, जोजेफ क्यों नहीं बनते? जोधाराम ही जोजेफ क्यों बनते हैं? दंगे से वो भी परेशान हैं। बेरोजगार वो भी हैं। अदक्ष तो वो भी हैं। जैसे जोधाराम हैं वैसे जमील खां हैं। तो इस पर विचार करना चाहिए। मैं हिन्दू नेताओं से कहता हूं। खासतौर पर विश्व हिन्दू परिषद के सभी लोगों से मिलने-जुलने का मौका मिल जाता है। जाति प्रणाली का जिक्र इसलिए किया कि वो अपना उम्मीदवार बनाते हैं। तब यह ध्यान रखते हैं कि अच्छा वो गांव है, यादवों का है। किसी यादव को टिकट दे दो। कोई यादव गाजियाबाद से क्यों नहीं? यादव है तो क्या दिक्कत है। उसे वहां से चुनाव लड़ने दो। मतलब आदमी को भी जाति का टूल बना लिया है और यह बहुत विभाजन करेगा। वोट बैंक पॉलिटिक्स भी इसीलिए हो रही है। तथाकथित तुष्टीकरण की पॉलिटिक्स भी इसी कारण हो रही है। जयपुर विश्वविद्यालय से आई थीं प्रोफेसर। मैंने उनसे कहा कि तुष्टीकरण से मुसलमान का रत्तीभर भी फायदा नहीं होगा। मुसलमान को दो बीघा जमीन नहीं मिली। उनको उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण नहीं मिला। जॉब का वादा नहीं मिला। जीवन जीने की सुरक्षा और दंगे के खिलाफ कभी सुरक्षा का वादा नहीं मिला। तो तुष्टीकरण क्या है? यह फसाद है, एक छल है, छद्म है। आपने रख लिया और आप भूल गए। मैंने कहा जिम्मेदारी से बोलिए। अब मैं मूल विषय पर आता हूं। नई दिल्ली से आई डॉ. सुषमा यादव ने कल सुबह कहा था कि राजनीति में सभी को आने दो। गुलदस्तां बनने दीजिए। हमें आपत्ति होनी चाहिए कि कोई जुआरी, चोर, लबार,लम्पट,गुण्डा, डकैत, हत्यारा संसद में नहीं पहुंचे और प्रायश्चित करे तो फूलनदेवी भी पहुंच जाए। कोई दिक्कत नहीं है। सुधरने का अवसर मिलना चाहिए। अंग्रेजी में तो कहावत है कि एवरी सैंट हैज पास्ट एंड एवरी सिनर हैज अ फ़्यूचर। अपराधी का भविष्य है। संत का अतीत है। अतीत को वो दबाकर रखना चाहता है। पता नहीं क्या था? वो बताना नहीं चाहता। संत बन गए तो उनकी पूजा होती रहती है। लेकिन अपराधी के सामने तो भविष्य है। जब वह अपने पाप से तौबा कर लेगा, तो उसको एक अच्छा आदमी बने की मुख्यधारा में आने की, जनप्रतिनिधि बनने की आजादी होनी चाहिए। लेकिन, जो भूमाफिया है, कातिल है। वो संसद या विधानसभा का सदस्य तो क्या ,पार्षद नहीं बनना चाहिए। ग्राम पंचायत में हम लठैतियों को ही क्यों चुनते हैं? यह किसकी जिम्मेदारी है। कैसे लोग आएं? हमारे सांसद का आचरण कैसा हो? संसद अच्छा गुलदस्ता कैसे बने? यहां कोई पैगंबर नहीं आने वाला है। यह तो हमें ही देखना पडे़गा। हम अपने वोट का इस्तेमाल कैसे करें? 1977 में इंदिरा जी को अपदस्थ करने के लिए जयप्रकाश नारायण जी आए। मैं भी उसमें था, यूथ फोर डेमोक्रेसी के लोग थे। छात्र संघर्ष युवावाहिनी के लोग थे, हमने बूथ पर जाते लोगों को देखा कि लोग रात को ही वोट नहीं छाप लें। हम मतपेटियों की हिफाजत करते थे, तो यदि हम एक चौकन्ना लोकतंत्र है। चौकन्ना मतदाता है तो हमारी राजनीतिक पार्टियाँ भी चौकन्नी बनेंगी। राजनीतिक पार्टियाँ के घोष्णा-पत्र केवल अखबार वालों को दिखाने के लिए नहीं छापे जाएंगे। हमें उन्हें जिम्मेदार बनाना होगा। आखिरकार हमने यह शैली चुनी तो फिर इकबाल की उस पंक्ति की तरह नहीं हो सकते कि जम्हूरियत तर्ज़ ए हुकूमत में बंदों को गिना करते हैं, तौला नहीं करते।´
ठीक है। संख्याबल का महत्व है। बहुमत व्यवस्था का कोई अर्थ होगा कि 100 में से 51 आपके हैं तो आप जीते तो इस पर सवाल हो सकता है। लेकिन जब शैली यह हमने चुन ली, तो इसको दायित्ववान बनाना, इसको जवाबदेह बनाना, ये सभी हमारे काम होने चाहिए। इसे कोई दूसरा थोड़े ही करेगा। तो सभी को आने दीजिए। कलाकार को आने दीजिए। पत्रकार को आने दीजिए। अभिनेता को आने दीजिए। लता मंगेशकर को बुला लिया। और वे संसद में एक दिन नहीं आईं। युसूफ भाई दिलीप कुमार भी शायद एक ही दिन आए हैं। कभी बोले नहीं। विनोद खन्ना आए। शत्रुघ्न सिन्हा आए। ये खूब बोले। राजेश खन्ना चुनकर आए। नरगिस दत्त कुछ बोलती थी, लेकिन एक सुन्दर चेहरा था। 12-13 चेहरों में नामांकन राष्ट्रपति कर सकता है। लेकिन उसमें अलग अलग चेहरे नहीं होते। उसमें स्वास्थ्य के लोग होते ही नहीं, फौज में से लोग नहीं आते। शंकरराय चौधरी राज्यसभा में चले गए। लेकिन निर्वाचन से आए। उन्हें उन 12-13 लोगों में नहीं रखा। 237 की जो हमारी राज्यसभा है उसकी संख्या बढ़ानी चाहिए। अच्छा कोई प्रशासक है। किसी ने कोई बहुत अच्छा काम किया है। तो उसको संसद में लेकर आइये। उसके अनुभवों का लाभ लेने में क्या दिक्कत है?
परगट सिंह अच्छा खिलाड़ी था या सुनील गावस्कर अच्छा क्रिकेटर था तो वे संसद में आकर खेल नीति बनावें और तभी उसका योगदान है। हमारे यहां खेलमंत्री ऐसे आदमी को बनाते हैं, जिसने जीवन में कभी खेल ही नहीं खेला हो। भ्रष्टाचार का खेल किया इसके अलावा उसे दूसरा खेल आता ही नहीं है। और हम उसे खेल मंत्री बना दें। फिर कहते हैं कि हमारा तो मैडल जीतने वालों में नाम ही नहीं हैं। और वह नेता तो टीम के राइट्स को लेकर भी पैसे खा जाता है। तो यह हमें देखना है।

Thursday, May 28, 2009

यह भारत की सदी है


<बेहतरीन पत्रकार मग्नातीसी [magnatic ]शख्सियत शाहिद मिर्जा के व्याख्यान का पहला हिस्सा. शायद आप भी इसे अविकल पढ़ जाएँ...




"Power corrupts and absolute Power corrupts absolutely।"

तो जैसे राज्य एक अनिवार्य बुराई है। वैसे ही लोकतंत्र में भी बहुत सारी बुराइयां अन्तर्निहित हैं। वो एक पर एक फ्री वाला मामला है। आपको वो झेलना होगा। आपने लोकतंत्र को चुना है।लोकतंत्र के बारे में बहुत सटीक शेर allama iqbal ने कहा था की जम्हूरियत वह तर्जे-हुकूमत है कि जिसमे बन्दों को गिना करते हैं तौला nahin । कोई लठैत, कोई हत्यारा, कोई कातिल, कोई आंतककारी। और ये लोग जब जेलों में पहुंचने लग गए तो उन्होंने जेलों को भी जन्नत में तब्दील कर दिया। बेऊर जेल के बारे में बताते हैं कि वह तो बहुत ही सुसज्ज हो गई है। जब आदरणीय चार्ल्स शोभराज जी तिहाड़ जेल में अपना समय काट रहे थे, तो उनके लिए बहुत अच्छे प्रबंध वहां कर दिए गए थे। ये सब बिना राजनीतिक संरक्षण के नहीं हो सकता। ऐसा तो नहीं है कि कोई अकेले में अपराध किया जा रहा हो। कोई अपराधी है, तो कोई उसका आका है और राजनीति में अनिवार्य रूप से आका होते हैं। यह हम सब जानते हैं। लेकिन इसको शुद्ध करने का काम हमारा है। अल्लामियां फरिश्ते तो भेजेगा नहीं। यह महाभारत तो हमको ही लड़नी पडे़गी। कोई भगवान कृष्ण तो अब आएंगे नहीं और कहेंगे कि ये तेरे काका हैं, लेकिन चोर हैं। उन पर तू हथियार चला। तो हमें ही कृष्ण बनना है और हमें ही अर्जुन बनना है।महात्मा गांधी ने साधन शुचिता की बात कही थी कि यदि आपका साध्य पावन है तो उसे अर्जित करने के जो तरीके हैं, वो अपावन नहीं हो सकते। यदि वो गंदगी वाले हैं, मैले कुचैले हैं, तो मैला-कुचैला शासन मिलता रहेगा। मैंने एक नेता से पूछा था कि आप जो घोषणा पत्र जारी करते हो उस पर कभी अमल करते हो? तो वो बोला, आप मीडियावाले मानते नहीं हो इसलिए हम इसे बना लेते हैं। हम इसको छपने के पहले और बाद में कभी नहीं देखते। लेकिन आप लोग बहुत शोर मचाते हैं। क्या नीति है? क्या कार्यक्रम है? यह आपके लिए है। आप इसका विश्लेषण कीजिए। हमको तो वोट छापना है। इसलिए वहां का इंतजाम करना है कि प्राथमिक विद्यालय क्रमांक 56 में बूथ कैसे कब्जाया जाए। सवेरे-सवेरे वोटिंग कैसे कर ली जाए। वो ही तरीका है।लेकिन ऐसा भी नहीं है .1977 का जब चुनाव हुआ था। यदि हमेशा ऐसा ही होता रहता तो इंदिरा माता कभी जाती ही नहीं। वो तो आजीवन सत्ता में बनी रहती और तिरंगे में लिपटकर ही अल्लामियां के पास जाती। तो वो गयी। वो विदा हुई। वो रायबरेली से हार गईं। और ऐसे व्यक्ति से हार गईं जिनको कुछ लोग जोकर वगैरह भी कहते थे। आदरणीय राजनारायणजी को चुनकर लोगों ने उन्हें पछाड़ा। तो ये भारतीय लोकतंत्र की मजबूती भी मैं मानता हूं कि इंदिरा माता जैसी बड़ी बुलंद शख्सियत चुनाव हार गईं। मैं उन्हें अन्य मां-बहनों में बहुत सारे अंक देता हूं। सारी हिन्दुवादी पार्टियाँ पाकिस्तान को गाली बकती रहती हैं, लेकिन पाकिस्तान का बाजू तोड़ने का काम तो इंदिरा माता ने किया। 24 साल में बता दिया कि धर्म जोडे़गा नहीं, तोडे़गा और धर्म के आधार पर किसी देश का निर्माण नहीं हो सकता। द्वि-राष्ट्रवाद का सिद्धान्त सिरे से गलत है और बांग्लादेश भाषा के आधार पर अलग हुआ अर्थात इस्लाम नहीं जोडे़गा। बाद में कई कारण हुए। जब इराक ने कुवैत पर हमला किया। इरान-इराक लड़ पडे़। 1979 की क्रांति के बाद तत्काल 1980 में युद्ध हो गया। तो धर्म तो प्रायः नहीं ही जोडे़गा। वह एक निजी किस्म की चीज हो सकती है, अपने को पवित्र करने का कोई एक जरिया।लेकिन जब आप उसको झंडा बनाकर सड़क पर निकलेंगे तो दुर्गति वही होगी जो श्रद्धेय सद्दाम जी की हुई। लड़ पड़ेंगे , अलग हो जाएंगे। तो द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत को तोड़ा-तो इंदिरा गांधी ने। सिक्किम में अमरिकी षड़यंत्र चल रहा था। जो श्रद्धेय चौटियाल जी थे वो किसी सीआईए की एजेंट महिला से शादी करवाने गए थे। और वह भी आजादी का ऐलान करवाने वाला था तो इंदिरा माता ने सिक्किम को कब्जा लिया। सवेरे होते ही पता चला कि सिक्किम भारत का नया राज्य बन गया है। अगर वो जीती रहती तो पता नहीं क्या होता? पता नहीं मालदीव नाम का देश बचता या नहीं बचता? मैं उनको प्रणाम करता हूं। कई मामलों में आलोचना करता हूं। प्रेस को मसल दिया था। अभिव्यçक्त की आजादी की पक्षधर नहीं थी। लेकिन एक व्यक्ति में काला सफेद सारा है। उनको कहीं पूरे-पूरे अंक देने पड़ेंगे । इंदिरा का सपना भारत को एक सबल राष्ट्र बनाने का सपना इंदिरा गांधी का था। भारत से प्रेम करने वाली स्त्री थी और वे चाहती थीं कि पचास फीसदी स्त्रियाँ संसद में हों। यदि वे पचास फीसदी पहुंच जाती तो बात अलग होती। अब तो ये 33 भी नहीं देना चाहते हैं, और वो समाजवादी पार्टी, राममनोहर जो स्त्रियों के महान पक्षधर थे उनके लोग अब कहते हैं कि ये पर कटी बाईयां हैं। फूलनदेवी तो पहुंची थीं। प्रायश्चित का भी स्थान है और फूलनेदवी की चम्बल के बीहड़ों में भी हत्या नहीं हुई जो कि सांसद बन गई। जो कि वे कायदे की बन गईं। प्रायश्चित कर रहीं थीं। जब कि वो अपने पापों पर परदा डालना चाहती थी, जब वे मुख्यधारा में लौट रही थीं, तब उनकी हत्या हो गई? ये गुण्डई है। जब एक महान गुण्डई और डकैत किस्म की स्त्री मुख्यधारा में आती है। कानून के प्रति जिम्मेदार बनना चाहती है। उसको आप दृश्य से ही साफ कर देते हैं। ये बहुत दुखद है। मैं प्रायः इस तरह द्रवित नहीं होता। लेकिन जिस तरह उनकी मृत्यु हुई, उससे मुझे बहुत अफसोस हुआ था, वो रहती तो शायद कुछ कॉन्ट्रीब्यूट करतीं। बहुत ही नीचे से आईं थीं। कुछ उनके पास राजनीति में करने को होगा। उन्होंने दर्द देखा था। हिन्दुओं में जो बहुत कुरूप सिलसिला है जाति का, जो नाइंसाफी है। बहुत सारे लोग उसमें ईसाई हो जाते हैं। जो थोड़ी सी ना इंसाफी है, उन्हें थोड़ी सी बराबरी दे दो। वो कभी छोड़कर नहीं जाएंगे। कोई जमील खां, जोजेफ क्यों नहीं बनते? जो जोधाराम ही जोजेफ क्यों बनते हैं?






विख्यात पत्रकार शाहिद मिर्जा ने यह वक्तव्य september 2006 में कोटा गवर्नमेंट कॉलेज के एक सेमीनार में भारतीय राजनीति की स्थिति विषय पर दिया था .

Wednesday, April 22, 2009

वंदे मातरम्-यानी मां, तुझे सलाम

आज मेरे अराध्य शाहिद मिर्जा का लेख आपकी नजर। यह 2006 में राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।

यह अफसोसनाक है कि राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लेकर मुल्क में फित्ने और फसाद फैलाने वाले सक्रिय हो गए हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने तय किया कि 7 सितम्बर वंदे मातरम् का शताब्दी वर्ष है। इस मौके पर देशभर के स्कूलों में वंदे मातरम् का सार्वजनिक गान किया जाए। इस फैसले का विरोध दिल्ली की जामा çस्जद के इमाम (वे स्वयं को शाही कहते हैं) अहमद बुखारी ने कर दिया। बुखारी के मन में राजनीतिक सपना है। वे मुसलमानों के नेता बनना चाहते हैं। बुखारी को देश के मुसलमानों से कोई समर्थन नहीं मिला। देश के मुसलमान वंदे मातरम् गाते हैं। उसी तरह जैसे कि `जन-गण-मनं गाते हैं। `जन-गण-मनं कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेज शासक की स्तुति में लिखा था। बहरहाल जब `जण-गण-मनं को आजाद भारत में राष्ट्रगान का दर्जा दे दिया गया तो देश के मुसलमान ने भी इसे कुबूल कर लिया। `सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारां एक सरल और सांगीतिक गान था लेकिन एकाधिक कारणों से उसे राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान का दर्जा नहीं मिल सका। इसके बावजूद कि कोई बाध्यता, अनिवार्यता नहीं है, राष्ट्रीय दिवसों पर `सारे जहां से अच्छा...जरूर गाया जाता है। यह स्वतःस्फूर्त है। भारत का गुणगान करने वाले किसी भी गीत, गान या आव्हान से देश के मुसलमान को कभी कोई एतराज नहीं रहा। आम मुसलमान अपनी गरीबी और फटेहाली के बावजूद भारत का गान करता है। सगर्व करता है। एतराज कभी कहीं से होता है तो वह व्यक्ति नेता मौलाना या इमाम विशेष का होता है। इस विरोध के राजनीतिक कारण हैं। राजनीति की लपलपाती लिप्साएं हैं। कभी इमाम बुखारी और कभी सैयद शहाबुद्दीन जैसे लोग मुसलमानों के स्वयं-भू नेता बनकर अलगाववादी बात करते रहे हैं। ऐसा करके वे अपनी राजनीति चमका पाते हैं या नहीं, यह शोध का विषय है लेकिन देश के आम मुसलमान का बहुत भारी नुकसान जरूर कर देते हैं। आम मुसलमान तो .आर. रहमान की धुन पर आज भी यह गाने में कभी संकोच नहीं करता कि `मां, तुझे सलाम...इसमें एतराज की बात ही कहां है? धर्म या इस्लाम कहां आड़े गया? अपनी मां को सलाम नहीं करें तो और क्या करें? अपने मुल्क को, अपने वतन को, अपनी सरजमीन को मां कहने में किसे दिक्कत है? वंदे मातरम् का शाब्दिक अर्थ है मां, तुझे सलाम। इसमें एतराज लायक एक भी शब्दनहीं है? जिन्हें लगता है वे इस्लाम और उसकी गौरवपूर्ण परंपरा को नहीं समझते। इस्लामी परंपरा तो कहती है कि ` हुब्बुल वतन मिनल ईमानं अर्थात राष्ट्र प्रेम ही मुसलमान का ईमान है। आजादी की पहली १८५७ में मुगल बादशाह बहादुर शाह `जफरं की अगुवाई में ही लड़ी गई। फिर महात्मा गांधी के नेतृत्व में बादशाह खान सरहदी गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, डॉ. जाकिर हुसैन, डॉ. सैयद महमूद, यूसुफ मेहर अली, सैफउद्दीन किचलू, एक लम्बी परंपरा है भारत के लिए त्याग और समर्पण की। काकोरी काण्ड के शहीद अशफाक उल्लाह खान ने वंदे मातरम् गाते हुए ही फांसी के फंदे को चूमा। कर्नल शाहनवाज खान, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के विश्वस्त सहयोगी थे। पाकिस्तान के साथ युद्धों में कुर्बानी का सिलसिला है। ब्रिगेडियर उस्मान, हवलदार अब्दुल हमीद से लेकर अभी करगिल संघर्ष में मोहत काठात एक देशभक्त और कुर्बानी की प्रेरक कथाएं हैं। इन्हें रचने वाला देश का आम मुसलमान भी है।वंदे मातरम् हो या जन-गण-मन, आपत्ति आम मुसलमान को कभी नहीं रही। वह मामूली आदमी है। शिक्षित नहीं है। अच्छी नौकरियों में भी नहीं है लेकिन ये सारी हकीकत देश प्रेम के उसके पावन जज्बे को जर्रा भर भी कम नहीं करती। साधारण मुसलमान अपनी `मात भौमं से बेपनाह मुहब्बत करता है, अत्यनत निष्ठावान है और उसे अपने मुल्क के लिए दुश्मन की जान लेना और अपनी जान देना बखूबी आता है। अपने राष्ट्र प्रेम का प्रमाण-पत्र उसे किसी से नहीं चाहिए।राष्ट्रगीत को लेकर इने-गिने लोगों की मुखालिफत को प्रचार बहुत मिला। बिना बात का बखेड़ा है, क्योंकि बात में दम नहीं है। मुल्क के तराने को गाना अल्लाह की इबादत में कतई कोई खलल नहीं है। अल्लाह तो लाशरीकलहू (उसके साथ कोई शरीक नहीं) ही है और रहेगा। अल्लाह की जात में कोई शरीक नहीं। बहरहाल मुसलमानों का भी अपना समाज और मुल्क होता है। जनाबे सद्र एपीजे अब्दुल कलाम अगर चोटी के साइंटिस्ट हैं तो उनकी तारीफ होगी है, मोहम्मद कैफ अच्छे फील्डर हैं तो तालियां बटोरेंगे ही, सानिया मिर्जा सफे अव्वल में हैं तो हैं, शाहरुख खान ने अदाकारी में झंडे गाड़े हैं तो उनके चाहने वाले उन्हें सलाम भी करेंगे। इसी तरह बंकिम चन्द्र चटर्जी का राष्ट्रगीत है। शायर अपने मुल्क की तारीफ ही तो कर रहा है। ऐसा करना उसका हक है और फर्ज भी। कवि यही तो कह रहा है कि सुजलाम, सुफलाम, मलयज शीतलाम। कवि ने मातृभूमि की स्तुति की। इसमें एतराज लायक क्या है। धर्म के विरोध में क्या है? जिन निहित स्वार्थी तत्वों को वंदे मातरम् काबिले एतराज लगता है वो अपनी नाउम्मीदी , खीझ और गुस्से में दो रोटी ज्यादा खाएं लेकिन इस प्यारे मुल्क के अमन-चैन और खुशगवार माहौल को खुदा के लिए नजर नहीं लगाएं। वंदे मातरम्

Wednesday, April 15, 2009

मैं सोना को जानती हूं



आज बात एक प्यारी सी लड़की की। नाम है सोना। वाकई सोने जैसी ही दमकती है वह। लेकिन भीतर एक तूफान है। अठारह की उम्र में पहाड़ सा तूफान। बमुश्किल आठवीं पास होगी निम्नवर्गीय परिवार की यह लड़की। पिता नहीं है मां के साथ चारों भाई-बहन रहते हैं। सभी छोटे-मोटे काम करते हैं। गुजारे के लिए। सोना से भी मां की यही अपेक्षा है। वह उसे कैटरिंग के काम के लिए भेजती है। कोई बिचौलिया आता है लड़कियों को साथ ले जाता है। वे समारोहों में खाने की मेज पर खड़ी हो जाती हैं। मेजबान की शान बढ़ती है कि हमने भोजन परोसने के लिए लड़कियों को रखा है। कभी पूरी शाम तो-कभी रात के एक बजे तक वे सब यूं ही हंसती-मुस्कराती खड़ी रहती हैं। इस काम के जयपुर में डेढ़ सौ और जयपुर से बाहर यानी कोटा, सीकर, अलवर तक जाने के ढाई सौ रुपए मिलते हैं। ब्याह समारोह का मौसम नहीं होता तो सोना और ये लड़कियां किसी फिल्म या शूटिंग में ले जाई जाती हैं। कभी फूल बरसाती हैं तो कभी नाचती हैं बतौर एक्स्ट्रा। सोना को शादी कैटरिंग से यहां फिर भी थोड़ा ठीक लगता है। एक बार शादी में किसी लड़के ने उससे पूछ लिया था एक रात का कितना लोगी...? उसका जी किया कि उस आदमी के मुंह पर एक जोरदार तमाचा जड़ दे लेकिन साथ वाली लड़की ने रोक दिया। और वह पूरी तरह जड़ हो गई।
सोना को यह काम बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता। उसने मां से कई बार कहा भी लेकिन मां का कहना है कि तेरी शादी में पैसा लगेगा कहां से लाऊंगी। कहने को दो भाई हैं लेकिन वे भी कुछ खास कमा नहीं पाते न ही उनके मन में ऐसा कोई भाव है कि बहनें उनकी ज़िम्मेदारी हैं। बड़ी बहन की शादी मां ने की थी लेकिन उसका ससुराल उससे घृणित अपेक्षाएं रखता था वो सब छोड़कर मां के पास आ गई। सोना की मां सोना को आलसी और मुंहजोर मानती हैं क्योंकि वह उनसे कह चुकी है कि आप मेरे पीछे क्यों पड़ी रहती हैं। भाई को क्यों नहीं काम पर भेजती। अब तो भाई भी सोना से चिढ़ता है। वह उसे अपशब्द भी कहता है और मां से भी लड़ता है। सोना दिन रात यही प्रार्थना करती है कि या तो उसे मौत आ जाए या फिर एक अच्छा लड़का उसे ब्याहकर ले जाए। सोना पूछती है- मैं जब रात को देर से लौटूंगी तो कौन लड़का मुझसे ब्याह करेगा। मां को यह बात क्यों नहीं समझ आती? मुझसे कई लड़के बात करने की कोशिश में रहते हैं पर मुझे यह सब पसंद नहीं । मां ने एक लड़का पसंद भी किया था, मुझे भी ठीक लगा था लेकिन फिर जन्मपत्री नहीं मिली। मां कहती हैं लड़के तो बहुत हैं पर पैसा मांगते हैं इसलिए सोना से कहती हूं मेहनत करने को। कोई काम बुरा नहीं होता। सोना दुखी रहने लगी सुर्ख चेहरा पीला पड़ने लगा है। क्या इतनी मुश्किल है हमारे यहां लड़कियों की शादी? माफ कीजिएगा गरीब लड़की की शादी। सोना को इंतजार है कोई तो आएगा उसका हाथ मांगने। लड़की की शादी को सर्वोपरि मानने वाले हमारे समाज में ही लड़की की शादी इतनी मुश्किल क्यों?

Friday, April 3, 2009

नो मोर फूल


पिछले सप्ताह जयपुर में एक युवती की कथित प्रेमी ने हत्या कर दी। नाम छिपाने में कोई तुक नहीं क्योंकि हमारी पुलिस अपराधी से पहले पीडिता की सात पुश्तों का पता ठिकाना खोज लाती है। उनतीस साल की सुमन के केस में भी यही हुआ। पुलिस ने कहा, वह लड़के की प्रेमिका थी। शराब पीती थी। दावत होटल में कमरा घंटों से बुक था। लड़के ने लड़की के सारे नाज-नखरे उठाए। यहां तक कि स्कूटर भी खरीदकर दिया। और जब लड़का सुमन के ऐशोआराम का खर्च न उठा सका तो लड़की ने मिलना-जुलना बंद कर दिया। लड़के को बुरा लग गया और उसने लड़की का गला दबाकर कत्ल कर दिया।
ताकत जीती अबला हारी। अफसोस, पुलिस की बयां की गई इस कहानी माफ कीजिए, तफ्तीश को अखबार जस का तस छाप देतें हैं . तहकीकात में आरोपी मनोज चावला के लिए हमदर्दी साफ नजर आती है। पुलिस ने तो कथित तहकीकात का ढिंढोरा सब जगह पीट दिया। सुमन कहां मौत की नींद तोड़कर सच्चाई बताने आने वाली है। लड़की का परिवार वह तो बिटिया के होटल में मिलने से ही अधमरा हो जाता है। उस पर लड़का, शराब यह तो किसी कलंक से कम नहीं। ये दोनों वयस्क थे। मिलना-जुलना आपसी सहमति के आधार पर कहीं भी हो सकता है। पार्क में, रेस्त्रां में या होटल में। यही मामला किसी रसूखदार का होता तो हमें आपको हवा भी न लगती। सवाल लड़की का था एक सामान्य लड़की का। जमकर कीचड़ उछाला गया। क्यों पुलिस हत्या को एक हत्या की तरह देखने की बजाए घटिया कहानियां सुनाने लगती है। लड़की है तो पहली पड़ताल उसके चरित्र हनन से ही शुरु होती है। उस मामले में तो उसे लड़के के पैसों से ऐश करने वाली भी बता दिया है। कोई कैसे एक हत्यारे से इतनी हमदर्दी रख सकता है। चावला कुंठित और हारा हुआ लड़का था। उसका कोई काम और व्यवसाय सफल नहीं हुआ। इसी बीच उसने विवाह भी कर लिया था .अब अगर उसके विवाह के बाद लड़की ने मिलना-जुलना बंद कर दिया हो तो पुलिस उसे महंगे तोहफे न मिल पाने की तोहमत लगा रही है।
इस घटना के बाद हरदम प्रेम की वकालत करने वाले भले मानस ने लड़कियों के बीच चिल्लाकर कहा- लड़कियों अगर किसी लड़के से मिल रही हो तो मत मिलना। कभी कोई हादसा भी हो जाएगा तो तुम्हारी चीर-फाड़ इसी तरह होगी। सच ही है लड़कियों को आंख मूंदकर विश्वास करना बंद करना होगा।। यहां आप छली भी जाएंगी और जान से भी हाथ धोना पड़ेगा। मूर्ख बनने के लिए अब और तैयार न रहें।

Thursday, March 26, 2009

ए टु `जेड `


सच कहूं तो ब्रिटिशde जेड गुडी पर लिखने का कोई इरादा नहीं था। आक्रामक अंदाज, बेतरतीब रहन-सहन, आधे-अधूरे कपड़ों ने उन्हें सेलिब्रिटी जरूर बना दिया था लेकिन सम्मान कहीं गायब था। सत्ताईस की जिंदगी और इतनी .सनसनी डेंटल नर्स का पेशा प्रेम , दो बच्चे , चर्चित सेलेब्रिटी ,फिर प्रेम कैंसर शादी और फिर एक महीने बाद सब कुछ ख़त्म लेकिन एक साल में जेड की जिंदगी में जो कुछ भी हुआ उन्होंने जिस तरह उसे लिया वह जेड के बेहद साहसी और समझदार महिला होने की ओर इशारा करता है। पिछले साल भारतीय रिएलिटी शो बिग बॉस में काम करते हुए जेड को पता चला कि उन्हें sarvical कैंसर है और वे ज्यादा दिनों तक नहीं जी पाएंगी। फितरतन इनसान हर काम को तरीके से ही करना चाहता है लेकिन जिंदगी की रफ्तार उसे भटका देती है। अन्यथा क्यों मरने से एक माह पहले जेड गुडी अपने प्रेमी से शादी करती। उस समाज में जहां बिना शादी के संबंध और फिर बच्चे पैदा कर दिए जाते हैं। जेड ने न केवल शादी की बल्कि उसके विडियो राइट्स भी बेचे ताकि उसके बाद बच्चों को कोई तकलीफ नहीं हो। यहां तक कि जेड ने अपनी मृत्यु को दिखाने के अधिकार भी बेच दिए। कैंसर की पीड़ा में गुजारे अंतिम दिनों की अनुभूतियों को किताब की शक्ल में लाने का कारण भी पैसा रहा जो कि एशोआराम के लिए नहीं बल्कि उसके दो बेटों के लिए था। मृत्यु की कगार पर इतना चौकन्ना रह पाना, आम इनसान के बूते की बात नहीं है। हर पल दस्तक देती मौत के बीच जेड एक बेहद बहादुर और जिंदा स्त्री साबित हुई हैं।मृत्यु जिंदगी का सच है लेकिन कैसा लगता होगा जब आपको पता हो कि आप मरने वाले हैं। ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म आनंद का पात्र याद आ जाता है। बाहर जिंदगी की रोशनी तो भीतर गहरा सन्नाटा, दर्द, तकलीफ। आनंद जहां जाता वहां जिंदगी नृत्य करने लगती। जबकि वह हमेशा के लिए शांत होने जा रहा था। ऐसे लोग क्या मरकर भी मरते हैं? उनके आनंद की अनुगूंज क्या बार-बार लौटकर हमारी तरफ नहीं आती? जिंदगी से भरे शब्द सदा प्रेरित नहीं करते? खैर मुद्दे की बात यह है कि क्या किसी मरीज को बता दिया जाना चाहिए कि वह मरने वाला है। इस रहस्य से परदा उठ जाना चाहिए। यदि हमें पता चल जाए कि अगले क्षण और उसके बाद यह-यह होने वाला है तो सब कुछ नीरस, ऊबाऊ और बोçझल नही हो जाएगा? ... और, मृत्यु वही तो सबसे बड़ा रहस्य है। हमारे यहां मरीज को न बताने की परंपरा है। हम मौत को अशुभ मानते हैं और उसे जाहिर नहीं करते। हमें लगता है कि यदि मरीज को बता दिया तो वह वक्त से पहले ही मर जाएगा। जेड गुडी को पता था कि वह मरने वाली है। जो काम उन्होंने किए उससे तो लगता है कि वह जिंदगी को बड़ी कर गई। गंभीर मरीजों की चिकित्सा करने वालों की राय भी यही होती है कि मरीज को हकीकत पता होनी चाहिए ताकि वह अपनी जिममेदारियों को निभा सकें और खुलकर जी सके। जिंदगी को मनमुताबिक आकार दे सके। ऐसा ज्यादातर डॉक्टर्स मानते हैं। बहरहाल, असहमत होने की पूरी गुंजाइश है। जेड को अगर पता नहीं होता तो क्या वह इतना कुछ कर पाती। शायद उसने इस सुकून के साथ दुनिया छोड़ी होगी कि वह जो जो कर सकती थी उसने किया। वह चाहती थी कि दुनिया उसे एक चहचहाती हुई चिड़िया की तरह याद रखे। वाकई जेड की ख्वाहिश पूरी होती हुई लगती है।

Friday, March 6, 2009

सुरा सुन्दरी के बाद


बधाई हो। गांधी जी का सामान भारत आने वाला है। उनकी चमडे़ की चप्पल, चश्मा और घड़ी अब हमारी हुई। विजय माल्या ने इन्हें अठारह लाख डालर की बोली लगाकर खरीदा है। भले ही भारत सरकार से सांठ गांठ कर उन्होंने बोली लगाई हो लेकिन इस खबर ने सुकून दिया है।हवाई यात्राओं , सुरा और सुंदरियों के (किंगफिशर का बहुचर्चित कैलेंडर)अलावा अब कुछ और भी उनमें नजर आएगा। यह और बात है कि ये स्मृति चिन्ह ससम्मान हमें मिलने की बजाए नीलामी के जरिए मिले। यदि नीलामी हमारे हक में ना हुई होती तो.. ? बहरहाल, मेरे जैसे कई भारतीय खुद को मुक्त महसूस कर रहे हैं। भीतर ही भीतर कुछ बेहतर लग रहा है। नीलामी के पहले तक अजीब सी बैचेनी थी।

Wednesday, February 18, 2009

पब...पिंक...और...

इन दिनों स्त्री विमर्श की दिशा में दो अभियानों की चर्चा है। पब भरो और पिंक चड्डी। आज क्रिएटिविटी की दुनिया में नया करने का जो हल्ला मचा हुआ है उसमें ये दोनों ही कैम्पेन बाजी मार ले गए हैं। बेहद चर्चित। ब्लॉग, अखबार और टीवी बहसों के केंद्र में भी यही हैं। दरअसल, मंगलौर के एम्नेशिया पब में श्रीराम सेना का लड़कियों पर हमला और वेलेंटाइन दिवस पर जोड़ों की जबरदस्ती शादी करा देने जैसे फैसलों के फलस्वरूप इनकी पैदाइश हुई है। केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने पब भरने का आह्वान कर दिया तो दिल्ली की एक पत्रकार ने वेलेंटाइन्स डे का विरोध करने वालों को पिंक ..भेंट देने की पेशकश कर दी। इनसे पूछा गया कि पिंक.. ही क्यों तो उनका कहना था कि पिंक इज द कलर ऑव फन, फेमिनिज्म एंड चड्डी इज एन आइडियोलॉजी जो हम पर दबाव डाल रही है बाकी हमने लोगों के इमेजिनेशन पर छोड़ दिया है। इमेजिनेशन वाले इस आंदोलन की दशा और दिशा का अंदाजा लगाया जा सकता है। जैसा कि डिफरेंट आइडियाज वाले विज्ञापन खूब चर्चित होते हैं ठीक वैसा ही यहां भी है। सवाल यह उठता है कि कितने लोगों के हृदय आप इस कैम्पेन से बदल पाए हैं। इसकी तह में कोई नहीं जाना चाहता है और न ही ऐसा किसी का मकसद है। विरोध का यह तरीका फूहड़ और विवेकहीन भी जान पड़ता है। पब में घुसकर लड़कियों पर हमला करने वाले और साथ में बैठे लड़के-लड़कियों की शादी करा देने वालों के मानस से कम ओछी नहीं लग रही है यह सोच। पब भरने और गुलाबी रंग का वस्त्र भेंट कर देने से ही यह सोच बदल सकती है यह कल्पना ही बचकानी लगती है। अलबत्ता एक तबका है जो मान रहा है कि रचनात्मक तरीके से विरोध प्रकट किये जाने में कोई बुराई नहीं। महिलाओं को एक ही नजरिए से देखने वालों को बदलना चाहिए। कल्पना कीजिए यदि राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का अंत करने के लिए जैसे को तैसा वाला ही रास्ता अपनाया होता तो? बात जहां जीने के समान अधिकार देने की है वहां फूहड़पन के लिए क्या जगह है? राजा राममोहन राय ने स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह की वकालत की थी ताकि वह पुरुषों के साथ एक पायदान पर खड़ी हो सके। आज जब स्त्री यह पायदान साझा कर रही है तो नई तकलीफ पैदा हो गई है। इसके चलते स्त्री एक बार फिर असुरक्षित है। इस बार सामाजिक कुरीतियों से नहीं बल्कि उस वर्ग विशेष की निगाहों में जिसे स्त्री के पब जाने, लड़कों के साथ घूमने पर गहरा एतराज है। कहीं यह तेजी से बदलती स्त्री की दुनिया के साथ खुद को न बदल पाने का मलाल या कुंठा तो नहीं? पिछले दस सालों में उदारीकरण और तकनीक के दखल ने दुनिया को तेजी से बदला है। कुछ ख़ुद को बदल पाने में कामयाब रहे हैं और कुछ नहीं। अमीर-गरीब की खाई भी कुंठा का कारण बन रही है। भारतीय संस्कृति की बात करने वालों को समझना होगा कि यह किसी एक वर्ग, जाति, धर्म या समुदाय की बपौती नहीं बल्कि कई जीवंत सभ्यताओ का मिश्रण है। यह भारत की सांस्कृतिक सहनशीलता है जिसने सभी को आत्मसात किया। पब भरना और गुलाबी अंत:वस्त्र देना न तो इस संस्कृति का हिस्सा लगते हैं और न ही किसी नई चेतना को प्रेरित करते हैं। आप चड्डी देंगे वे साड़ी। प्रताडि़त कहीं ठगी सी निरीह बनकर देखती रहेगी। स्त्री प्रताड़ना की लगातार बढ़ती घटनाओं के बीच इतनी सतही सोच और उसका रातोंरात प्रचार में आ जाना एक नई चिंता की वजह बन रहा है। क्रांतिकारी आंदोलन की अपेक्षा में एक फुस्सी बम सा।

Friday, January 23, 2009

जरिवाले आसमान के पैबंद


अरसे बाद आज सुबह-सुबह पहले दिन पहला शो देखा। जयपुर के वैभव मल्टीप्लैक्स में। स्लमडॉग मिलेनियर। दो सौ के हाल में कुल जमा हम सात। मिलेनियर होने का ही एहसास हुआ। खैर देसी कलाकारों और देसी हालात पर जो विदेशी कैमरा घूमा है वह वाकई कमाल है। समंदर किनारे की आलीशान अट्टालिकाओं के पार मुंबई की धारावी नहीं हम सब अनावृत्त हुए हैं। कच्ची बस्ती की शौच व्यवस्था से लेकर उनकी नींद तक का सिनेमा हमारी आंखें खोल देने वाला है। हम भले ही अपनी फिल्मों में एनआरआई भारतीय की लकदक जिंदगी देख सपनों में खोने के आदी रहे हों लेकिन फिल्म माध्यम के पास यथार्थ दिखाने की जबरदस्त ताकत है का अंदाजा पाथेर पांचाली के बाद एक बार फिर होता है। सत्यजीत रे पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने भारत की गरीबी बेची है। पचास साल बाद भी हम यही आरोप लगा रहे हैं। शर्म आती है हमें कि आज तक हम भारतवासी को भरपेट रोटी और छत नहीं दे पाए हैं। रे साहब आज नहीं है। हालात अब भी जिंदा है। अगर किसी ने कुछ बेचा है तो वह हमारी कथित मुख्यधारा के फिल्म मेकर हैं, जिन्होंने झूठे सपने बेचे हैं। इन फिल्मों से ऐशो-आराम खरीदा है ।
फ़िल्म का पहला भाग बेहद घटना प्रधान और यथार्थ के करीब है तो दूसरा थोड़ा नाटकीय हो गया है। बच्चों की भूमिकाएं बड़ों से हैं। रहमान का ऑस्कर पक्का लगता है। नायक का नाम जमाल मलिक की बजाय राम मोहम्मद थॉमस ही होता तो अच्छा था। विकास स्वरूप के उपन्यास में यही है।अब जब किताब का नाम ही क्यू एंडऐ स्लम डॉग... हो गया तो बाज़ारपरस्ती के भाव को समझा जा सकता है ।
बहरहाल शाहरुख खान ने सही कहा कि अनिल कपूर वाला किरदार थोड़ा नेगेटिव था इसलिए उन्होंने मना कर दिया। डेनी बॉयल जब अमिताभ के बारे में कहते हैं कि उनके ग्रेस का लाभ फिल्म को मिला है तो वे वाकई बड़े हो जाते हैं क्योंकि कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ जिस गरिमा के साथ हाजिर हुए थे वह उन्हीं के बूते की बात थी। बहरहाल नीली जरीवाले शामियाने में टके पैबंद की हकीकत में विचरना अच्छा लगता है। और हां इरफान खान की क्षमता के आगे उनका रोल कुछ कम चुनौतीपूर्ण लगा। एज युजूअल उन्हें कोई मशक्कत नहीं लगी होगी

Thursday, January 15, 2009

उफ ये जुनून ए पतंगबाजी


                                                                    tasveer abhishek tiwari

















नजारे जयपुर कि पतंगबाजी के

मै जन्म से जयपुरी नहीं हूँ .होती तो बेहतर था यूँ मेरा शहर इंदौर भी कम उत्सवप्रिय नही लेकिन जयपुर की बात ही निराली है । यूँ तो पिछले बारह वर्षों से इस शहर की जिंदादिली को जी रही हूँ लेकिन मकर संक्रांति बेहद खास है। सारा शहर पतंगबाजी के इस कुम्भ मै डुबकी लगाता है मानो कोई रह  गया तो बड़े पुण्य से वंचित रह जाएगा. क्या छोटा क्या बड़ा, क्या पुरूष क्या स्त्री सब पतंग और डोर के रिश्ते मै बंधने को आतुर. सारा शहर तेज़ संगीत कि धुनों के साथ छत पर होता है वाकई जिसने जयपुर की पतंगबाज़ी नहीं देखी वह जन्मा ही नहीं । इस बार नज़ारा कुछ खास रहा क्योंकि शाम ढलते ढलते आकाश में पतंगों के साथ आतिशी नजारे भी हावी थे । जयपुर पर रश्क़ किया जा सकता है क्योंकि त्यौहार वही है जो हर एक के दिल मै उत्साह जगाये खुशी को एक सूत्र मै बाँध दे। यह यहाँ पर खरा है यकीन नहीं होता तो डेली न्यूज़ के photojournlist दिलीप सिंह कि नज़रों से देखिये.