Thursday, September 25, 2008

हर मुसलमान आतंकवादी नही होता......

आज सुबह एक अख़बार में एक बड़े लेखक के  लेख की शुरुआत में वही बात थी . हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर अतंकवादी मुसलमान होता हे. हालाँकि लेख में सिख ,नाजी , तमिल हिंदू, तमाम आतंकवादियों का ज़िक्र हे लेकिन निजी तौर पर लगता हे कि यह मज़हबी चश्मा कई बार हमें कमज़ोर करता है. आतंक का कोई धर्म नहीं होता यह हर बार साबित हो रहा हे. मुद्दे पर आते हैं भारतीय मुसलमान पर. उन्होंने लिखा हे वह इस्तेमाल हो रहा है . कोई कब इस्तेमाल होता है? गरीबी अशिक्षा के अलावा एकं और खास कारण है नफरत. हम उन्हें अस्प्रश्य समझते हैं . मुझे याद हे जब मै और मेरे पति किराये पर मकान देखने जाते तो लोग हमारा खूब स्वागत करते. अरे आप इस अख़बार में काम करते हैं आप इन्हें जानतें हैं, उन्हें जानते हैं . कबसे रहने के लिए आयेंगे ? आपका नाम क्या हे? मैं शाहिद मिर्जा और ये मेरी पत्नी वर्षा. हमारी हिंदू मुस्लिम शादी है इसको पकाना आता नही इसलिए नॉन वेज कि चिंता न करें ये लीजिये किराया शाहिदजी कहते ... मकान मालिक का चेहरा सफ़ेद पड़ रहा है शब्द गुम हो रहे हैं . अभी मेरी बीवी घर पर नहीं है . आप बाद में फोन कर लेना. ऐसा एक बार नही ७७ बार हमारे साथ हुआ. मेरी समझ काम नहीं करती थी कि ये सब हो क्या रहा है .इससे पहले जब मेरे पति कहते थे कि मुसलमान को कोई मकान नहीं देता मुझे यकीन नहीं होता था लेकिन जब प्रत्यक्ष देखा तो मन घृणा से भर उठा . उनकी नफरत देख मेरी आत्मा छलनी हो आती थी .कभी-कभी तो लगता जैसे खून खोल रहा हे . मेरे पति शांत बने रहते जैसे उन्हें तो इसकी आदत पड़ चुकी थी . इस बीच जो मकान दे देता वे उनके ऋणी हो जाते . खूब मान देते उन्हें वह सामान्य मालिक मकान फ़रिश्ता सा लगता था .वे शांत थे लेकिन मैं भाजपा की  वोटर एक अजीब दुनिया से रूबरू होकर गिल्ट में आ गयी थी. एक और बात जब शाहिदजी ने  अपनी माँ से पूछा माँ ये अफज़ल[terrorist] जैसे लोगों का क्या होना चाहिए माँ ने एक क्षण नही लगाकर कहा बेटा इन्हे तो सरे आम चौराहे पर फांसी लगनी चाहिए ताकि किसी और अफज़ल की  ऐसा करने से पहले रूह काँपे . शाहिद मिर्जा ने इसी शीर्षक के साथ एक लेख लिखा, छपने के दो दिन बाद तक उनके मोबाइल की  घंटी बधाईयों से गूंजती रही . वंदे मातरम पर भी उन्होंने लिखा वंदे मातरम यानी  माँ तुझे सलाम .मुबारकबाद फ़िर गूंजी
स्वयं ये लेखक महोदय  भी शाहिदजी को साधूसिफत इंसान कह चुके हैं लेकिन संदेह जारी है .यूरोप के हवाई अड्डे पर छोटी सी कैंची छीन ली जाती है .उसके हर ख़त की जांच होती हे . हर वक्त अग्नि परीक्षा के लिए खड़ा है क्योंकि उसे भारत से प्यार है .दूसरा हर मुल्क उसके लिए अजनबी है . उसे भी इंतज़ार हे आतंकवादी के सूली पर चढ़ने का .उसकी देशभक्ति पर शक है .वह सीना चीरना चाहता हे लेकिन राम के दर्शन नहीं करा पाता.लम्हों कि खता जाने कितनी सदियाँ भुगतेंगी ?

Wednesday, September 10, 2008

गाली , मसाज का बॉडी बॉस

सबसे पहले एक कन्फैशन कि तथाकथित फैमिली शो बिग बॉस रोज देखती हूं और मौजूद महिलाओं को निर्वस्त्र करने या होने के उतावलेपन को देख वितृष्णा से भर उठती हूं। शो में स्त्री मानसिक नग्नता की भी शिकार है। या तो बेवजह छोटे-छोटे कपड़े पहन रही है या किसी लड़के से लिपट रही है या फिर लगाई-बुझाई करते हुए रसोई में खाना पका रही है। ये लड़कियां फुटेज के लिए किसी भी हद तक गिर रहीं हैं। एक ही लक्ष्य है कि बिग बॉस के घर में रहते हुए ज्यादा से ज्यादा निर्माता, निर्देशक उनकी त्वचा के दर्शन कर लें और यहां से निकलते ही ऑफर्स के अंबार से उनकी झोली भर जाए।
दरअसल बिग बॉस को एक फॅमिली शो बताया जा रहा है। इसमें सेलेब्रिटीज (जिनके खाते में विवाद के अलावा कुछ दर्ज नहीं ) को एक घर में बंद कर दिया जाता है। तीन महीनों के लिए बाहर की दुनिया से कटकर ये अपना खाना-पीना लड़ना-झगड़ना, मोहब्बत-नफरत जारी रखते हैं। घरवाले सदस्यों को एक-एक करके बाहर निकालने की साजिश रचते हैं और बाहर वाली जनता उन्हें एसएमएस कर बचाने की कोशिश करती हैं। कनसेप्ट और कमाई के लेवल पर शो नंबर वन है। शो में शामिल आइटम डांसर संभावना सेठ, अबू सलेम की पूर्व प्रेमिका मोनिका बेदी, अंगों को संवारने में व्यस्त अभिनेत्री पायल रोहतगी , विचित्र व्यवहार वाली राखी विजन, रोतली अलीना वडीवाला और टीवी एक्ट्रेस केतकी दवे शामिल हैं। उम्रदराज केतकी को छोड़ दिया जाए तो बाकी सब की सब विक्षिप्तों की तरह व्यवहार करती हुई नजर आती हैं। एकदम अपरिपक्व और असंयत। शो में मौजूद लड़के उन्हें भूतनी, कम कपड़े पहनने वाली, कपड़े संभाल वरना... हो जाएगी जैसी उपाधियों से नवाजते रहते हैं, लेकिन इन्हें केवल एक ही भूख है यहां से निकलते ही काम मिल जाने की भूख। एक भी संवाद ऐसा नहीं है जो इन महिलाओं के सकारात्मक सरोकारों को दिखाता हो। शो से समझ आता है कि छोटे परदे के छोटे कलाकारों की दुनिया कितनी छोटी है और काम पाने के लिए उन्हें दिमाग को कितने ताक पर रखना पड़ता है। जो भी है बस शरीर है। शो के एक हिस्से में इन लड़कियों को स्कूल यूनिफॉर्म पहननी होती है लेकिन ग्लैमर की मारी ये लड़कियां पचास मिनट के शो में पांच मिनट भी पूरे कपड़ों में नहीं दिखना चाहती। समझ से परे है कि ये लड़कियां खुद ऐसी बनी या पैसों ने बनाया। क्या वाकई दर्शकों को स्त्रियों को इतनी बेवकूफ और कम-तंग कपड़ों में देखने में ही मजा आता है? ये लड़कियां लड़कों के भड़काने पर आपस में ही लड़ पड़ती हैं। पूरे मेकअप के साथ बिकिनी पहन पूल में कूद जाती हैं। वाह रे शो बिजनेस का रिअलिटी शो। काम की लॉलिपॉप क्या- क्या करा रही है। गाली से लेकर मसाज तक।
गौर करने लायक बात है कि लड़के यहां काफी शांत सहज हैं। अपनी बीवी को पीटने के आरोपी राजा चौधरी और राहुल महाजन भी अपना संतुलन नहीं खोते हैं। सारे लड़के आपे में नजर आते हैं और लड़कियां आपा खोती हुई। यह तकलीफदेय है और इशारा करता है कि इनका प्रोफेशन इन्हें किस कदर दबाव में रखता है। सुंदर दिखने का दबाव । यह संकेत भी है स्त्री के प्रति इंडस्ट्री के नजरिए का। अच्छा हुआ कि स्किन बिजनेस के मारे इस शो से ब्रिटिश टीवी एक्ट्रेस जेड गुडी चली गईं। कब तक बेसिरपैर की बातें करते हुए वक्त गुजारतीं। बहरहाल, स्त्रियों की कुटिल और कामुक छवि पेश करने वाले शो को देखने का अपराध हम सब करतें हैं। क्यों एक बार भी खयाल नहीं आता कि हिंदुस्तान के कौनसे परिवार की किस स्त्री की बानगी है यह?

Thursday, September 4, 2008

हत्या के बाद चीरहरण

आखिर क्यों पुलिस हर तहकीकात की शुरूआत ही महिला पीडि़ता के चरित्रहनन से करती है वह भी हत्या की शिकार महिला के । अखबार -चैनल उसे परम सत्य मानकर छापते -दिखाते हैं? गोआ में स्कारलेट हो या नोएडा में आरूषि या जयपुर में मारी गई ये तीन लड़कियां ।
हाल ही में जयपुर की एक युवती की सेन्ट्रल पार्क में एक हत्यारे ने गला रेत कर हत्या कर दी। नाम, परिचय, काम के पचड़े में न पड़ें क्योंकि वह किसी भी शहर की कोई भी लड़की हो सकती है। वह उन हजारों मध्यवगीüय लड़कियों में से एक थी जो पढ़ी-लिखी थी, कुछ बनना चाहती थी और हाल-फिलहाल एक बैंक नौकरी कर रही थी। जिंदगी है कई लोग मिलते हैं। कोई शायद ऐसा भी होगा जिससे थोड़ी नजदीकियां रही होंगी लेकिन पुलिस ने जिस तरह से कहानी पेश करने की कोशिश की है उससे लगता है कि दोनों में अथाह प्रेम था और प्रेम परिणति पर नहीं पहुंचा इसलिए यह हत्या हुई। क्या है यह एक हत्या को `डायल्यूट´ करने की कोशिश नहीं है? बताया गया है लड़के की शादी कहीं ओर हो रही थी, लड़की ने विरोध किया इसलिए लड़के ने उसे मार दिया। एक तरफ पुलिस लड़के को प्रेमी बता रही है और दूसरे ही पल उस प्रेमी के कहीं ओर शादी करने की बात भी कर रही है।क्या प्रेमी चाकू लेकर चलते हैं? यह सुनियोजित हत्या है। गला रेतने के लिए चाकू कहां से आया? लड़का स्वयं लड़की के दफ्तर गया। वहां से उसे लिया और सेंट्रल पार्क ले जाकर मार दिया। उस दिन मौसम भी इस कू्रर कृत्य में उसका साथ दे गया। तेज बारिश में यह उस भरोसे की हत्या थी। यह खून है उस यकीन का जो लड़की ने लड़के पर किया। उस समाज में जहां प्रेम को बहुत ऊंचा दर्जा हासिल है, प्रेम और आस्था की पूजा होती है, प्रेमियों की गाथाओं पर ग्रंथ लिखे जाते हों, फिल्में बनती हो, भजन लिखे जाते हों। लेकिन अब वक्त आ गया है इस भरोसे पर शक करने का। जयपुर को ही लें गत दस महीनों में तीन लड़कियां इसी तरह हत्या की शिकार हुईं। एक विधायक के मकान में रह रही विधवा मां की युवा बिटिया की युवक ने घर में घुसकर हत्या कर दी थी। मेहनत मजदूरी कर बेटी को बड़ा करने वाली वह मां आज तक सदमे में है। बेटी का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाई थी कि उसका सामान घर से निकालकर बाहर फेंक दिया गया। संवेदनशून्यता की मिसाल देखिए तब विधायक ने कहा था कि हमें तो शुरू से ही मां-बेटी के आचरण पर शक था। पुलिस ने कत्ल की गई लड़की को तो प्रमिका मान पड़ताल शुरू कर ही दी थी मां को भी नहीं बख्शा। दो शादियां कर चुकी वह माँ पुलिस की निगाह में चरित्रहीन थी। शशि नामक युवती भी एक युवक का शिकार बनीं। उसे दिल्ली में मार दिया गया था। शशि के बारे में कहा गया कि वह बिंदास थी, देर रात तक पार्टियों में रहना उसकी आदत थी। क्या महज देर रात तक बाहर रहने से कोई लड़की अपनी हत्या के लिए प्रस्तुत हो जानी चाहिए? यह लड़की तो पार्टी गलü नहीं थी और न ही वह .....। एक को पार्क में मारा गया दूसरी को घर में घुसकर। दरअसल, यह वह मानसिकता है जिसके तहत लड़कियों की जुबां बंद करने को ही मर्दानगी समझा जाता है। लड़की जब अपने मन की करना चाहती है हम उसे रोकते हैं, पीटते हैं और अंत में मार डालते हैं। अधिकांश महिलाएं अपने निकटतम परिजन खासकर पति/प्रेमी की पिटाई का शिकार होती हैं। छह दिन से छत्तीस साल तक के दाम्पतय में अलग-अलग शहरों में औरतों को पिटते देखने का कटु अनुभव जब हुआ तो लगा जैसे ये पति इनसान नहीं हैवान हों। ये सब पढ़े-लिखे और आर्थिक तौर पर संतुष्ट नजर आते थे। जोधपुर के चीफ इंजिनियर से जयपुर के मेडिकल से जुड़े व्यवसाई तक सभी की पत्नियों के शरीर पर जख्मों की कहानियां है। पिटाई का यही आचरण आपा खोने पर हत्या में बदलने में कितनी देर लगती है? पीटने की इस प्रवृत्ति पर शुरू से ही परिवार और समाज की नजर तीखी हो तो हत्याओं पर भी अंकुश लग सकता है। कथित प्रेम को सहारा लेकर मरने या मारने पर उतारू ये लड़के मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं। पुलिस कह रही है कि हत्यारा पहले, प्रेम में असफल हो कर आत्महत्या की कोशिश कर चुका है। अव्वल तो आत्महत्या करने की कोशिश में वह गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ? जब वह असफल प्रेमी है तो फिर उसे लड़की का प्रेमी क्यों कहा जा रहा है? जाहिर है वह एक कुंठित प्रेमी है और लड़की को शायद कहीं न कहीं हमददीü रही हो जिसका लाभ इस दिलीप नामक हत्यारे ने उठाया। यूं भी लड़कियां स्वभाव से बेहद इमोशनल होती हैं। कई रिसर्च प्रमाणित कर चुके हैं कि लड़कियां भावुकता के साथ सारे काम करती हैं वहीं लड़के प्रेçक्टकल होकर। लड़का पूरी तैयारी के साथ चाकू लेकर आया था। कमजोर और इरादा भांप न सकी लड़की शिकार बन गई। काश पंजाबी के कवि और शहीद पाश की ये पंक्तियां सच हो जाती-
मरने का एक और भी ढंग भी होता है
मौत के चेहरे से उठा देना नकाब
aur जिंदगी के चार सौ बीस को
सरे आम बेपर्द कर देना
ladkiyon को समझना होगा कि हर ऐरा-गैरा नत्थूखैरा उनके सानिध्य का हकदार नहीं। प्रेम की फिल्मी छवि से उबरें। आपका काम, आपकी जान कीमती है। सोच समझकर भरोसा करें। हम और कितनी जानें गवाएंगे। कई शहरों की असंख्य युवतियां इन कातिलों के हत्थे चढ़ रही हैं। इन्हें रोका जा सकता है। उन पर पूरी तरह यकीन न करके। वक्त बदला है हमें भी बदलना होगा।