Thursday, August 28, 2008

एक मुलाकात शहनाई के उस्ताद से

२८ जून 1995 को शहनाई के उस्ताद बिस्मिल्लाह खां से रूबरू होना किसी जादुई अनुभव से कम नहीं था .तेरह साल पहले इन्दौर के होटल में जब बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो लगा उस्ताद शहनाई के ही नहीं तबीयत के भी शहंशाह है। यकायक एक मोहतरमा ने आकर पूछा -यहां आपको कोई तकलीफ तो नहीं? हमसे कोई गलती तो नहीं हुई? खां साहब कहां चुप रहने वाले थे तुरंत बोल पडे़-गलती तो आप कर चुकी हैं, लेकिन यह खूबसूरत गलती आप फिर दोहरा सकती हैं। इतना कहकर वे खुद भी ठहाका मारकर हंस पड़े। खां साहब के लबों पर जब शहनाई नहीं होती तब जुबां कब एक राग से निकलकर दूसरे में प्रवेश कर जाती, पता ही नहीं लगता था।
बनारस और बिस्मिल्लाह का क्या रिश्ता है?
बनारस को अब वाराणसी कहा जाने लगा है यूं तो बनारस के नाम में ही रस है। वहां की हर बात में रस है। हम पांच या छह साल के थे जब बनारस आ गए थे। एक तरफ बालाजी का मंदिर दूसरी ओर देवी का और बीच में गंगा मां। अपने मामू अली खां के साथ रियाज करते हुए दिन कब शाम में ढल जाता पता ही नहीं चलता था। आज के लड़कों की तरह नहीं कि सबकुछ झटपट पाने की चाह रही हो। पैर दबाए हैं हमने उस्ताद के। जूते पॉलिश किए हैं।
इन दिनों आप कितने घंटे रियाज करते हैं?
45मिनट
किसी निश्चित समय?
नहीं। जब समय मिला बजा लिया। बाकी समय खुदा की इबादत करता हूं। अपने फन के लिए, अपनी सेहत के लिए और देश के लिए दुआएं मांगता हूँ गांगुली द्वारा आप पर लिखी किताब `बिस्मिल्लाह खां एण्ड बनारस- द सीट ऑव शहनाई´ के बारे में आपकी क्या राय है?
यहां-वहां से बातचीत की और लिख दी किताब (क्रोधित होकर)। उस किताब ने हमें मुसलमानों के खिलाफ कर दिया। हमारा घर से निकलना मुश्किल हो गया। दो-एक बार हमसे मिली और पूरी किताब लिख डाली। वे लिखती हैं शहनाई हमारे लिए कुरान के समान है। यह क्या बात हुई? कुरान हमारे लिए खुदा की इबादत का जरिया है और शहनाई कला की।
क्या रीता गांगुली की इस किताब पर आपने आपत्ति जताई?
क्यों नहीं जताई। किताब के अगले संस्करण में वह सब नहीं है। उनकी इस हिमाकत की वजह से हमें अखबारों के जरिए अपनी बात कहनी पड़ी। (खां साहब ने उस किताब की पांच हजार प्रतियां बिक जाने पर अफसोस व्यक्त किया) किताब लिखना नहीं उन्हें तो बस पैसा कमाना था।
`गूंज उठी शहनाई´ के बाद आपने फिल्मों से नाता क्यों तोड़ लिया?
इसके बाद एक और तमिल फिल्म आई थी। उसमें एक गायिका के साथ हमारी जुगलबंदी थी। बड़ी अच्छी गायिका थी। हम नाम भूल रहे हैं। (तभी खां साहब उस फिल्म से एक टोड़ी सुनाने लगते हैं। उनकी यह तन्मयता देखते ही बनती है) हम एक ही राग को चार तरह से गा रहे थे। तो वे तो (गायिका) हैरान रह गई थीं।
उसके बाद कोई फिल्म क्यों नहीं आई?
दरअसल, यह सब हमें रास नहीं आया। जरा सुर लगा नहीं कि कट...
सुना है कि बचपन में रियाज के दौरान आपको किसी साधु बाबा के दर्शन हुए थे?हां, यह बिलकुल सच है। हम कभी झूठ नहीं कहते। उस वक्त मैं कोई दस-ग्यारह बरस का रहा होऊंगा।मैं बालाजी के मंदिर में बैठकर रियाज कर रहा था। एक तरफ मामू रियाज कर रहे थे। तभी मैंने तेज खुशबू महसूस की लेकिन मैं फिर भी बजाता रहा। खुशबू और तेज होती गई। मैंने आंखें खोलीं तो देखा सामने साधु बाबा खड़े हैं। सफेद बढ़ी हुई दाढ़ी। केवल कमर का हिस्सा ढका हुआ। उनकी आंखों में गजब की चमक थी। मेरे हाथ रूक गए। साधु बाबा बोले `बजाओ बजाओ रूक क्यों गए´ मुझसे डर के मारे बजाते न बना। वे बोले- मजा करेगा, मजा करेगा। आज भी जब मैं याद करता हूं तो खुद को बहुत ही मजबूत पाता हूं।
इंदौर इससे पहले कब आए थे?
बीस साल पहले आया था। बड़े अच्छे लोग हुआ करते थे। अभिनव कला समाज ने बुलवाया था। खूब खिदमत करते और खूब चर्चा भी
आने में बीस साल का फासला क्यों बना?
पहले हम आने के तीन-चार हजार रुपए लेते थे और अब तीन लाख रुपए .दीजिए और बुलवाइये। हम आने को तैयार हैं। (मुस्कुराने लगते हैं)भारतीय और पाश्चात्य संगीत को मिलाकर कुछ नया करने का प्रचलन जोरों पर है
वजूद नहीं है इसका (क्रोध में)। तबाह करने की साजिश है ये। भारतीय संगीत कोई आज का नहीं है। सदियों पुराना संगीत है, इसका कोई क्या मुकाबला करेगा।
रहमान के दिए संगीत को नई बयार के रूप में देखा जा रहा
हैकौन है रहमान? कोई खुदा हो गए रहमान। वे कितना जानते हैं पुराने संगीतज्ञों को?
क्या आप तालीम भी दे रहे हैं?
हां, फिलहाल सिर्फ अपने खानदान के सदस्यों को। पहले काफी शागिर्दों ने हमसे तालीम ली है और आज अच्छे मुकाम पर हैं। लंदन, अमेरिका, दिल्ली, बंबई में जब भी जाना होता है ये आकर हमसे मिलते हैं।
क्या किसी में आपको संभावना नजर आती है?संभावना खुदा में है।कोई यादगार विदेशी अनुभव...
कुछ अरसा पहले मैं ईरान गया था। तब भारत और ईरान के संबंध अच्छे नहीं थे। वहां कि जनता ने जो मेरा स्वागत किया उसे देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। इस सफल कार्यक्रम को मौलवियों ने भी सुना और दाद दी। इसके बाद अभी तीन महीने पहले ही मेरा ईरान जाना हुआ। मैंने देखा कि जिस सभागृह में मैंने शहनाई बजाई थी, उसका नाम मेरे नाम पर कर दिया गया है। उस पर हिंदी भाषा में लिखा गया है। मेरे लिए यह कभी न भूलने वाला अनुभव स्पिक मैके में आकर कैसा लगा?
बहुत अच्छा। खुदा इन्हें और कामयाब करे। युवाओं में भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति दिलचस्पी जगाने वाले इस आंदोलन की जितनी तारीफ की जाए कम हे .
बहरहाल पोस्ट पढने में हुई असुविधा के लिए माफी .

Friday, August 22, 2008

सॉरी बिप्स .. हार गए विजेंद्र

विपाशा बासु का छः फुट के विजेंद्र के साथ डेट पर जाने का ख्वाब अधूरा रह गया । उनका सपना तोडा हे खानदानी boxer एमिलियो कोरिया ने । वे क्यूबा के हैं और जबरदस्त मुक्केबाज़ हैं । हमारे विजुभैया को कासे के साथ ही संतोष करना पड़ेगा । वैसे इस बांग्ला ब्यूटी की कोई गलती नहीं उन्होंने प्रोतसाहित करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी ।तमाम सरकारों ने जहाँ धन वर्षा कर दी वहीं बीप्स ने डेट पर जाने का प्रस्ताव कर दिया । देश भिवानी के इस handsom मुक्केबाज़ और बॉलीवुड की हॉट ऐक्टर विपाशा की मुलाकात से तो महरूम रहा ही गोल्ड से भी चूक गया .वरना आज हमारे पास दो गोल्ड होते । सॉरी दोस्तों.. क्रिकेट -बॉलीवुड का मेल तो बहुत देखा लेकिन बोक्सिंग-बॉलीवुड का यह बेमिसाल जोड़ नहीं देख पाये विपाशा का प्रयास ज़रूर सराहा जाना चाहिए । बहरहाल विजेंद्र को बधाई क्योंकि छोटे शहरों से क्या खूब झोला उठाया हे उन्होंने ।

Saturday, August 9, 2008

माँ को मिले मारने का हक़ ?

निकिता और हरेश मेहता ने अदालत से गुजारिश की थी कि उन्हें छह माह के गर्भस्थ शिशु को मारने की इजाजत दी जाए क्योंकि उसके दिल में छेद है और वह दुनिया में आकर सामान्य जिंदगी नहीं बसर कर सकता। एक सीधी सपाट राय हो सकती है कि मां को यह हक होना चाहिए लेकिन उस मां का क्या जिसका बच्चा पैदा होते ही मेनेनजाइटिस (दिमागी बुखार) का शिकार हो मानसिक विकलांग हो जाता है? वह मां जिसका बच्चा अस्पताल की लापरवाही से इन्क्यूबेटर में ही बुरी तरह झुलस जाता है? वह मां जिसका नवजात पोलियो का शिकार होकर हमेशा के लिए अपाहिज हो जाता है? तो क्या ये माताएं अपने प्रेम का मोल-तोल करने लग जाती हैं? कवि प्रयाग शुक्ल की पंक्तियां है-
तुम घटाना मत


अपना प्रेम


तब भी


नहीं जब लोग करने लगें उसका हिसाब


ठगा हुआ पाओअपने को


एक दिन


तब भी नहीं।


मत घटानाअपना प्रेम


बंद कर देगी तुमसे बोलना


धरती यह, चिडि़या यह,घास घास यह


मुंह फेर लेगा आसमा


नहीं , तुम नहीं घटाना


अपना प्रेम ।


प्रेम की यही परंपरा अब तक हमारी आंखों ने देखी है। मां का प्रेम, जहा आकर सारे शक दम तोड़ देते हैं। सर्वाधिक प्रेम तो कमजोर संतान पर ही बरसता है। गर्भ में बीज पड़ते ही मां एक अटूट बंधन में बंध जाती है। कानून भले ही चार माह तक गर्भस्थ को मारने की आज्ञा देता हो लेकिन वह पहले क्षण से ही नवजीवन से जुड़ जाती है। मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन उन नौ महीनों को भी अपनी आयु में शामिल करते हैं। कुदरत की कई चीजें हमें नजर नहीं आती। एक कोशिका वाला अमीबा, वायरस, बैक्टरिया कहां दिखाई देते हैं लेकिन उनका जीवन है। हमारी दृष्टि के पार भी एक दुनिया है। दरअसल यह निकिता बनाम बच्चे का फैसला नहीं बल्कि कुदरत बनाम विज्ञान की लड़ाई हे हे । उसके गर्भ में अनेक रहस्य छिपे हैं जिसे जान लेने को विज्ञान बेताब है।हम एक डिजाइनर बेबी चाहते he . कौन तय करेगा कि यह पैदा होने लायक है और यह नहीं। मुंबई उच्च न्यायालय ने अपना फैसला निकिता के नहीं प्रकृति के हक में दिया है। अन्यथा मर्सी किलिंग भी जायज है। क्यों नहीं अन्य देशों की तरह हम उस कानून को लागू कर देते जहां जी नहीं पा रहे आदमी को मौत दे दी जाती है?
(डेली न्यूज़ की लोकप्रिय मैग खुशबू में ६ अगस्त २००८ प्रकाशित कमेन्ट }
लग ता है, एक बीमार बच्चे के मां-बाप बनने जा रहे निकिता और हरेश मेहता की गलती बस इतनी थी कि उन्होंने अस्पतालों के अवैध पिछले दरवाजों का इस्तेमाल नहीं किया और कानून के रास्ते से अपनी मांग को पूरा करने का प्रयास किया, वे अच्छे लोग थे, तो उन्हें निराशा हाथ लगी। कानून के मुताबिक, 20 हफ्ते बाद केवल मां के जीवन के खतरे में होने की स्थिति में ही गर्भपात करवाया जा सकता है, लेकिन 20 हफ्ते बाद गर्भस्थ शिशु कैसा भी हो, उसे जन्म देना पड़ेगा। यानी निकिता को एक ऐसे शिशु को जन्म देना होगा, जिसके हमेशा अपंग और बीमार रहने की आशंका है। जब वह लाचार शिशु मां को घर में कैद कर देगा, तब उस मां के दर्द में शरीक होने कोई नहीं आएगा। अपंग बच्चों को पालने में जो दर्द होता है और अपंग बच्चों के प्रति समाज का जो रवैया है, उसे देखते हुए अपंग बच्चे के साथ-साथ उसके पालकों की जिंदगी भी किसी नर्क से कम नहीं होती और सर्वाधिक भुगतती है मां। हमारे देश में कई कथित नारी-समर्थक हैं, जिन्हें निकिता के बीमार गर्भस्थ शिशु की बड़ी चिंता है, वे उसके जन्म के पक्ष में हैं। गर्भस्थ शिशु के अधिकार की बात चल रही है, मां का अधिकार गया भाड़ में! वास्तव में जो शिशु अजन्मा है, उसे लेकर भावुक तो हुआ जा सकता है, लेकिन उस शिशु पर पूरी तरह से मां का हक है, क्योंकि वह मां के शरीर का ही विस्तार है। अंतिम सत्य यही है कि मां क्या चाहती है? मां, अगर उस शिशु को नहीं चाहती, तो मां के निर्णय में कोई भी हस्तक्षेप अमानवीय होगा। विज्ञान अगर उस मां की किसी भी तरह से मदद कर सकता है, तो विज्ञान को ऐसा करने देना चाहिए। हमारा दुभाüग्य है, अंबुमणि रामदास जैसे लोग कह रहे हैं, महज एक मां के कारण कानून में बदलाव नहीं किया जा सकता। अंबुमणि को नहीं पता, कितने लोग यही काम अस्पतालों के पिछले दरवाजे से करवा रहे हैं। निकिता जैसे मामले नए नहीं हैं, लेकिन पहली बार ऐसा कोई मामला अदालत के सामने आया है और निराशा हाथ लगी है। आश्चर्य, भ्रमित नारिवादियों के मन में गर्भस्थ कोशिकाओं, शिशुओं के प्रति ममत्व जाग उठा है। अगर हम गर्भ में पल रहे अमीबा, कोशिकाओं या कहें गर्भस्थ अपुष्ट शिशु के प्रति प्रेम निभाने लगेंगे, तो सोचिए, क्या होगा? परिवार नियोजन कार्यक्रम का तो कबाड़ा हो जाएगा। परिवार नियोजन के जिन उपायों के चलते महिलाओं को घरों से कुछ मुक्ति मिली है, वे उपाय अमानवीय ठहरा दिए जाएंगे, अनर्थ हो जाएगा। मंुबई हाईकोर्ट का फैसला जरूर निकिता के पक्ष में होता, लेकिन कानून के अभाव में वह मजबूर थी। दूसरी मेडीकल रिपोर्ट ने भी कुछ खेल किया है, लेकिन जजों ने साफ कहा, कानून बनाने का काम संसद का है। अथाüत नया कानून बनना चाहिए। कुदरत या प्रकृति अच्छी चीजें देती है, तो बुरी भी देती है। वह बुरी चीज देती है, तो निस्संदेह हमें नहीं लेना चाहिए। उदाहरण के लिए, क्या हम कुदरत की देन भूकंप, बाढ़, बीमारी को सहज स्वीकार कर लेते हैं या वैज्ञानिकों से कहते हैं कि कुदरत के गुस्से को नियंत्रित करने का उपाय खोजिए। अपंग बच्चे भी कुदरत की खामियां हैं। कुदरत को गुस्सा आया होगा, तभी तो निकिता के गर्भ में बीमार शिशु पल रहा है। जन्म के बाद की शारीरिक खामियों के साथ जीने के लिए हम बाध्य हैं, लेकिन जन्म के पहले की खामियों के निस्तारण से किसी को रोकना नाइंसाफी है। क्या हम निकिता से यही कहेंगे कि रे अभागन, कुदरत ने तुझे यही दिया है, प्रसाद मानकर स्वीकार कर? अच्छी मां बनकर कष्ट भोगती रह, सबके ताने सुन? कई रातें जागकर अल्ट्रा साउंड मशीन बनाने वालों की आत्मा निश्चित रूप से दुखी होगी कि उन्होंने तो काम की मशीन बना दी, लेकिन मानवों ने उसका पूरा सकारात्मक लाभ नहीं लिया। बेशक, प्रकृति सोलह आना पावन नहीं है। दुनिया में अपंगता के खिलाफ जंग जहां तक संभव हो, होनी चाहिए।

(ज्ञानेश उपाध्याय की डेली न्यूज़ में 9 अगस्त 2008 को प्रकाशित टिप्पणी


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