Thursday, July 31, 2008

शाहिद मिर्जा की एक कविता


फाकलैण्ड रोड

पीला हाउस की असंख्य रंडिये
शाम ढलते ही
सस्ता पावडर और शोख लिपस्टिक पोत कर
खड़ी होने लगी हैं
फाकलैण्ड स्ट्रीट के दोनों तरफ
क्या बसा है उनकी उजाड़ आंखों में
सुकून नहीं
इसरार नहीं
ललक नही
उम्मीद नहीं
खौफ हां
भूख हां
बेचैनी हां
अवमानना हां
बेपनाह बोझे जैसी बेबसी बसी है
पेट और उसके अतराफ
अलाव की शक्ल में
लोग कहते हैं एड्स दे रही हैं ये रंडियें
कोई नहीं कहता
हम उन्हें आखिर क्या देते हैं?

Wednesday, July 23, 2008

जिंदगी में कभी कभी

खुशबू की आवरण कथा में इस बार न कुछ उजागर करने की मंशा है और न किसी ज्वलंत मुद्दे पर किसी की टीका टिप्पणी। जिंदगी में कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है जिसके लिए हम बिलकुल प्रस्तुत नहीं होते हैं और तो और यह सोचते हैं कि यदि हमारे साथ ऐसा होता तो कम से कम हम तो यह गलती कभी नहीं करते। किसी भी भारतीय स्त्री के लिए बच्चे सबसे बड़ी धुरी होते हैं। एक चुंबकीय आकर्षण बच्चों की खातिर वह बहुत कुछ ऐसा करती है जो उसकी सोच और चाहत के बिलकुल उल्टा होता है। उसे यह भी लगता है कि यदि मैंने कुछ किया तो बच्चों की जिंदगी तबाह हो जाएगी। क्या वाकई ऐसा है?

जयपुर की एक महिला है उम्र पचास के आसपास। दो बच्चे भी हैं ।शादी चली नहीं। तलाक लिया। इस बीच कोई दूसरा करीब आया। यकीन नहीं हुआ कि दुनिया इतनी खूबसूरत हो सकती है और किसी से इतनी ट्यूनिंग भी। रिश्ता जारी है। समझ की राह भी परस्पर लंबी होती जा रही है। फिर बच्चे? वो तो तबाह हो गए होंगे। इमोशनली पूरी छिन्न -भिन्न। शरत्चन्द्र के नायक की तरह टूटे, उखड़े और दिशाहीन। नहीं जनाब। वह दौर अब गया। आज के बच्चे एक हद तक ही चीजों को अपने ऊपर हावी होने देते हैं। खुदपरस्त (आत्मकेंदि्रत) होती पीढ़ी का यह फायदा तो है कि वह बहुत ज्यादा रोने-धोने में यकीन नहीं रखती ।नई पीढ़ी अगर अपने लिए स्पेस चाहती है तो वह स्पेस देने के लिए भी तैयार है। बच्चों को मां के फैसले पर कोई शिकायत नहीं। इमरान खान। नई पीढ़ी का नया स्टार। लगता है कि एक आम हिंदुस्तानी की तरह उसके माता-पिता होंगे। सीधा-साधा लड़का जो प्रतिभा के दम पर जगमगा रहा है। लेकिन यह कहानी भी इतनी सीधी-सादी नहीं है। इमरान केवल डेढ़ सल् के थे तब उनके माता पिता का तलक हो गया । पिता अनिल पाल ने इस्लाम कूबूलते हुए शादी की थी लेकिन धर्म कब शादी की गारंटी दे पाया हे ।पेशे से इन्जिनेअर पिता ने फ़िर शादी नहीं की ।वे अपने पिता से मिले हालाँकि उन्हें हिन्दी उर्दू नहीं आती । माँ का दूसरा ब्याह भी दो साल पहले टूट गया .लेकिन इमरान को कोई शिकवा नहीं ।

आज़ादी के आसपास का दौर रहा होगा। शादीशुदा और एक बच्चे की मां जुबैदा पर जोधपुर के तत्कालीन महाराज हनुवंत सिंह का दिल आ गया। रिश्ता इस कदर करीब हुआ कि जुबैदा अपने नन्हें बच्चे से दूर हो गइं . वह हनुवंत सिंह के साथ जोधपुर आ गई जहां उन्होंने नई पहचान के साथ नई जिंदगी शुरू की। कुछ ही सालों में हनुवंत सिंह और जुबैदा की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। जुबैदा के पहले पति से हुई संतान जिन्हें वह छोटी उम्र में ही अकेला छोड़ गई थीं वह कोई और नहीं बल्कि ख्यात पत्रकार खालिद मोहम्मद हैं। श्याम बेनेगल निर्देशित जुबैदा की पटकथा उन्होंने ही लिखी है। यहां तक कि फिल्म मम्मो की कहानी भी खालिद की कलम से ही निकली है। खालिद अगर वीरानी में गुम होने में यकीन रखते तो जिंदगी ने उन्हें भरपूर हालात दिए थे। लेकिन उन्होंने इन हालात को कलम में पिरोया। उनकी शोहरत बुलंदियों पर पहुंच गई। खालिद एक ऐसे नायक हैं जो तूफानी लहरों के साथ नहीं बहे।इस मुद्दे पर एक युवा लेखक का कहना है कि रोना-धोना वहां ज्यादा होता है जहां धन की कमी होती है। पैसा पास है तो बड़े से बड़े जख्म पर भी मरहम लग जाता है। मां की जुदाई से बड़ी तकलीफ कोई नहीं लेकिन जहां साधन सुविधाएं हैं वहां ऐसे नश्तर कुछ कम चुभते हैं। एंग्री यंग मैन वहीं बनते हैं जहां अभाव और गरीबी है। पैसा बहुत बड़ी ताकत है। सत्येंद्र पाठक की राय में आज एक बड़ा फर्क नई पीढ़ी के रवैये में भी आया है। वह रिश्तों को एक निश्चित फ्रेम में नहीं रखती। उसे अपने लिए आसमान की तलाश है तो वह जमीन पर भी बहुत तंग गली में नहीं विचरती। वह मानती है कि जीवन में बिल्कुल काला और झकाझक सफेद कुछ नहीं है। ज्यादातर चीजें धूसर हैं। काले और सफेद के बीच। जिसने इसे समझ लिया वह खुद भी कम कष्ट पाएगा और दूसरों को भी कम कष्ट देगा। प्रोफेसर कविता की राय में `यह जनरेशन हमसे कहीं ज्यादा कांफिडेंट है। मुझे याद है कि जब मेरी पंजाबी मां और ब्राrाण पिता के बारे में कोई सवाल करता था तो मैं डर जाती थी। लगता था इस बारे में किसी को भी पता नहीं चले। क्योंकि ऐसा करना एक अपराध माना जाता था। समाज में ऐसे विवाह करने वाले हेय थे। अब अपने व्यवहार पर हंसी आती है। उन्होंने तो बकायदा शादी की और निभाई, यह हिम्मत का काम था। आज मुझे उन पर गर्व होता है लेकिन उस वक्त ऐसा नहीं था। जहां तक बच्चों को छोड़ दूसरे विवाह में जाने की बात है यह वे ही जान सकते हैं कि उनके लिए क्या सही था। विवाह एक बेहद निजी संबंध है इसमें तीसरे का कोई दखल नहीं हो सकता।´

क्रिएटिवली सक्रिय अभिषेक कहते हैं कि नई पीढ़ी समझती है कि रिश्तों के साथ-साथ जिंदगी भी चलानी होती है। खासकर शो-बिज में हाई लाइफ को कायम रखने के लिए कई तरह के विकल्प मौजूद हैं उनमें से एक शादी भी है। फिल्मी दुनिया में झांकने पर शाहिद कपूर पर ध्यान जाता है। कामयाब सितारों में शामिल हैं लेकिन मां और पिता दोनों ने ही अपनी गृहस्थी फिर बसाई। शाहिद के पिता पंकज कपूर ने सुप्रिया पाठक से दूसरा ब्याह रचाया तो मां नीलिमा अजीम भी तीन शादियां कर चुकी हैं। निस्संदेह शाहिद का बचपन इससे अप्रभावित नहीं रहा होगा लेकिन व्यक्तित्व पर इसकी नकारात्मक छवि नहीं दिखती। नई अभिनेत्री हंसिका मोटवानी ने भी माता-पिता में अनबन देखी है। जाहिर है ये तमाम ब्यौरे उच्च मध्यम वर्ग की पैरवी करते हैं। मध्यम वर्ग इन पर टीका-टिप्पणी से तो बचता ही है विवाह विच्छेद को भी स्वीकारना नहीं चाहता। वहीं पीढ़ी भी प्रभावित होती है। जहां इसे स्वीकार कर लिया गया वहां पीड़ा का अहसास कम नजर आता है। दरअसल तकलीफ को महसूस करने के लिए वक्त चाहिए और ये वक्त बोर्डिंग स्कूल नहीं देते। अनुशासन और दिनचर्या गम को कम करने की बड़ी वजह बनती है। यूं भी धन की ख्वाहिश और लगातार व्यस्त जिंदगी ने इनसान को मशीन बनने पर मजबूर किया है। गमजदा जिंदगियों के लिए यही बेहतर है। मशीन के दिल नहीं होता। वह सिर्फ परिणाम देने में यकीन रखती है। आंसुओं का हिसाब रखने में नहीं। सुदर्शन `फाकिर´ ने क्या खूब कहा है-

आप कहते थे रोने से नहीं बदलेंगे नसीब,

उम्रभर आपकी इस बात ने रोने न दिया।

Wednesday, July 9, 2008

कुंठित कनेक्शन

स्त्री-पुरुष संबंध, सृष्टि की बेहद भरोसेमंद बुनियाद। परस्पर विपरीत होकर भी एक-दूसरे के लिए समर्पित । ऐसा समभाव जहां न कोई छोटा न बड़ा। बावजूद इसके जब हम आधी दुनिया में झांकते हैं तो यह खूबसूरत कनेक्शन एक कुंठित कनेक्शन बतौर सामने आता है। इस कुंठा से घर भी महफूज नहीं। हर चेहरे की अपनी कहानी है। सदियों से होते आए व्या
भिचार में आज बड़ा टि्वस्ट आया है। आज की लड़की तूफान से पहले ही किसी सायरन की तरह गूंज जाना चाहती है..
हर कहानी के पहले चंद पंक्तियां होती हैं-`इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। इनका सच होना महज संयोग हो सकता है, लेकिन हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि खुशबू की कथा के सभी पात्र सच्चे हैं और इनका सच होना महज संयोग नहीं, बल्कि वास्तविक होगा।´
सजला अपने नाम के उलट थी। रोना-धोना उसकी फितरत के विपरीत था, लेकिन आज आंखें बह रही थीं। पन्द्रह साल की काव्या ने जो यथार्थ साझा किया था, उसे सुनकर वह कांपने लगी थी। काव्या ने बताया कि पिछले रविवार जब हम मौसाजी के घर गए थे तो ऊपर के कमरे में काव्या को अकेली देख उन्होंने उसे बाहों में भींचकर किस करने की कोशिश की। काव्या ने अपने पूरे दांत उस हैवान के गालों पर जमा दिए और भाग छूटी। सजला ने बेटी को समझाया। चुप बेटी इस बात का जिक्र भी किसी से नहीं करना, वरना तेरी मौसी की जिंदगी...नहीं मम्मी आपको चुप रहना है तो रहिए, मैं चुप नहीं रहूंगी। मौसी , पापा सबको बताऊंगी। आपको नहीं मालूम उन्होंने मोना (सजला की बहन की बेटी) के साथ भी यही सब किया था। काव्या यह सब कहे जा रही थी, लेकिन सजला का वहां केवल तन था। मन तो अतीत की अंधेरी गलियों में पहुंच चुका था। सजला अपने बड़े जीजाजी के दुष्कर्मों का शिकार हो चुकी थी। तब वह केवल चौदह साल की थी। न जाने किन अघोषित मजबूरियों के चलते उसने घटना का विरोध तो दूर कभी जिक्र भी नहीं किया। वह घृणित शख्स सबकी मौजूदगी में हमेशा सहज और सरल बना रहता। सजला बिसूरती रह जाती। आज जब काव्या का रौद्र और मुकाबलेभरा रुख सजला ने देखा तो अपने लिजलिजे व्यक्तित्व पर बेहद शर्म आई।
न जाने कितनी स्त्रियों के साथ कितनी बार ये हादसे पेश आए होंगे, इसका अंदाजा लगाना उन स्त्री और पुरुषों लिए कतई सहज नहीं है, जो संयोग से बच गईं और जो स्वभाव से संयमी और चरित्रवान हैं। सहनशील बनों, दूसरों के लिए खुद को न्यौछावर कर दो , जोर से नहीं बोलो जैसी जन्म घुटि्टयों ने स्त्री को न जाने किन बंधनों में बांध दिया कि वह हर अन्याय सहने के लिए प्रस्तुत रहीं। यौन उत्पीड़न को भी खुद की इज्जत से जोड़कर देखने लगी। अगर कुछ कहा तो लोग उसे ही बदनाम करेंगे। इस अलिखित बदनामी ने उसे इतना भीरू और कमजोर बना दिया कि वह चुप्पी में ही भलाई देखने लगी। नजमा ऐसी नहीं थी। अब्बू की लाड़ली नजमा को देख जब घर के पीछे रहने वाले चचा ने अश्लील इशारे किए तो वह चुप नहीं रही। मूंछों पर बट देने वाले चचा अब छिपे छिपे फिरते हैं। मीरा नायर की फिल्म `मानसून वेडिंग´ की एक पात्र अपने चाचा की हरकतों की शिकार बचपन में ही हो गई थी। उस उम्र में जब लड़की अच्छे-बुरे, मान-अपमान से परे होती है। शातिर अपराधी इसी उम्र और रिश्ते की निकटता का फायदा उठाते हैं। अपने चाचा का विरोध वह बड़ी होकर तब कर पाती है, जब चाचा एक और मासूम बच्ची को चॉकलेट का लालच दे रहे होते हैं।चौबीस साल की नीता एमबीए है और प्राइवेट कंपनी में एçक्जक्यूटिव। ट्रेन में सूरत से जयपुर आ रही थी। रात का वक्त था। एसी थ्री कोच में एक अधेड़ अपनी सीट छोड़कर उसके पास आकर लेट गया। नीता चीखकर भागी तो वह उसका पीछा करने लगा। बेटी-बेटी क्या हुआ। नीता नहीं पिघली। रेलवे पुलिस को शिकायत कर उसे गिरफ्तार करवाया और हर पेशी पर पूरी ईमानदारी से जाती है। न्यायिक पचड़ों के अलग पेंच हैं, उस पर रोशनी फिर कभी।
पूनम के जीजाजी बड़े रसिया किस्म के थे। जीजी सब जानती थीं या अनजान बनी रहती थीं, पूनम को समझ नहीं आया। जीजाजी बड़े मशगूल होकर स्त्रियों के अंगों-प्रत्यंगों का ब्यौरा देते रहते। जीजी कभी छोटी हंसी तो कभी बड़े ठहाके लगाया करती। एक दिन मौका देखकर जीजा महाशय पूनम के साथ ज्यादती पर उतारू थे। पूनम चूंकि इस अंदेशे को भांप चुकी थी, इसलिए स्कूल में सीखे जूडो-कराते के भरपूर वार जीजा पर किए और उसके पिता के सामने पूरा ब्यौरा रख दिया। सारी बातें इतने वैज्ञानिक तरीके से सामने रखी गई कि जीजाजी को लगा कि जमीन फट जाए और वो गड़ जाएं। पूनम फिर कभी जीजी के घर गई नहीं और न ही इस बात की परवाह की कि जीजी और जीजाजी के संबंधों का क्या हुआ होगा।अंजू के हॉकी कोच निहायत शरीफ और समपिüत नजर आते थे। अंजू उनके अंदाज और खेल पर फिदा थी। कोच साहब जब अपना दर्जा भूल ओछी हरकत पर उतर आए तो फिर अंजू ने भी एसोसिएशन के पदाधिकारियों के सामने कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया।
आज की लड़कियां सजला की तरह इस्तेमाल होने को अपनी नियति नहीं मानती और न ही घृणित हरकतों पर परदा डालने में यकीन करती हैं। स्वाभिमान को ठेस उन्हें बर्दाश्त नहीं। यह आत्मविश्वास उन्हें शिक्षा ने दिया है। आर्थिक आजादी ने दिया है जहां वे किसी के रहमोकरम पर पलने वाली बेचारी लड़की नहीं है। आर्थिक आजादी हासिल कर चुकी कामवाली महिला में भी आप इस आत्मविश्वास को पढ़ सकते हैं। घरेलू हिंसा और यौन आक्रमणों का प्रतिकार वह करने लगी है। कभी भारतीय रेलवे के शौचालयों की दीवारों पर गौर किया है आपने। भारतीय समाज की यौन कुंठाओं का कच्चा चिट्ठा होता है वह। भद्दी गालियां, स्त्री अंगों की संरचना के अश्लील रेखाचित्र किसी भी शालीन शख्स को गुस्से और घृणा से भर देते हैं। मनोवैज्ञानिक भले ही इसे बीमारी की संज्ञा दें, लेकिन हमारा समाज ऐसा नहीं मानता। वह इसी नजरिए से देखने का अभ्यस्त है, लेकिन वह मां क्या करे, जिसके बच्चे अभी-अभी पढ़ना सीखे हैं और हर शब्द को पहचानने की समझदारी दिखाने में कहीं चूकना नहीं चाहते? बसों के हवाले से मनजीत कहती है मैंने दिल्ली की बसों में यात्रा की थी कभी। यात्रा नहीं यातना थी। पुरुष भीड़ की आड़ में सट के खडे़ होते और अश्लील हरकतें करते। मैंने  जब एक थप्पड़ रसीद किया तो वह क्या है . . .क्या है  . . .कह कर मुझ पर हावी होने लगा लेकिन मौजूद लोगों ने मेरा साथ दिया।छेड़खानी का एक मामला पंजाब पुलिस के तत्कालीन डीजीपी के पी एस गिल से भी जुड़ा है। बीस साल पहले उन्होंने एक पार्टी में आईएएस रूपन देओल बजाज को स्पर्श कर अभद्र टिप्पणी की थी। सत्रह साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने गिल को दो लाख रुपए जुर्माना और पचास हजार रुपए मुकदमे की कीमत अदा करने के निर्देश दिए।
इन दिनों एक शब्द अक्सर अकसर इस्तेमाल किया जाता है `ऑनर किलिंग´। आरुषि-हेमराज मामले में नोएडा पुलिस ने भी किया। लड़की से कोई मामला जुड़ा नहीं कि माता-पिता उसे खानदान की इज्जत से तौलने लग जाते हैं। मानो सदियों की इज्जत एक लड़की के सर पर रखा मटका हो, जिसके फूटते ही सब-कुछ खत्म हो जाएगा। हम यह भूल जाते हैं कि सबसे पहले हम इनसान हैं, जहां गलती की गुंजाइश रहती है। कब तक हम लड़की के लड़की होने का दोष देते रहेंगे। यदि वाकई लड़कों को इस सोच के साथ पाला जाए कि लड़की खूबसूरत कोमल काया के अलावा कुछ और भी है तो यकीनन हम स्त्री को देखने की दृष्टि भी बदली हुई पाएंगे। रिश्तों की आड़ में सक्रिय दरिंदे लड़की के कमजोर व्यक्तित्व का लाभ उठाते हैं। तीर निशाने पर न भी लगे तब भी उनका कुछ नहीं बिगड़ता। वे जानते हैं कि अधिकांश बार दोष लड़की में ही देखते हैं। वे मुक्त हैं। जब तक लड़की होना ही अपराध की श्रेणी में आता रहेगा, तब तक अपराधी यूं ही बचते रहेंगे। समय के बदलाव ने काव्या को मुखर बनाया है। वह सजला जैसी दब्बू और अपराधबोध से ग्रस्त नहीं है। उसे गर्व है अपने स्त्रीत्व पर। ख़ुद पर गर्व किए बिना वह अपनी लड़ाई कभी नहीं जीत पाएगी।