Thursday, September 4, 2008

हत्या के बाद चीरहरण

आखिर क्यों पुलिस हर तहकीकात की शुरूआत ही महिला पीडि़ता के चरित्रहनन से करती है वह भी हत्या की शिकार महिला के । अखबार -चैनल उसे परम सत्य मानकर छापते -दिखाते हैं? गोआ में स्कारलेट हो या नोएडा में आरूषि या जयपुर में मारी गई ये तीन लड़कियां ।
हाल ही में जयपुर की एक युवती की सेन्ट्रल पार्क में एक हत्यारे ने गला रेत कर हत्या कर दी। नाम, परिचय, काम के पचड़े में न पड़ें क्योंकि वह किसी भी शहर की कोई भी लड़की हो सकती है। वह उन हजारों मध्यवगीüय लड़कियों में से एक थी जो पढ़ी-लिखी थी, कुछ बनना चाहती थी और हाल-फिलहाल एक बैंक नौकरी कर रही थी। जिंदगी है कई लोग मिलते हैं। कोई शायद ऐसा भी होगा जिससे थोड़ी नजदीकियां रही होंगी लेकिन पुलिस ने जिस तरह से कहानी पेश करने की कोशिश की है उससे लगता है कि दोनों में अथाह प्रेम था और प्रेम परिणति पर नहीं पहुंचा इसलिए यह हत्या हुई। क्या है यह एक हत्या को `डायल्यूट´ करने की कोशिश नहीं है? बताया गया है लड़के की शादी कहीं ओर हो रही थी, लड़की ने विरोध किया इसलिए लड़के ने उसे मार दिया। एक तरफ पुलिस लड़के को प्रेमी बता रही है और दूसरे ही पल उस प्रेमी के कहीं ओर शादी करने की बात भी कर रही है।क्या प्रेमी चाकू लेकर चलते हैं? यह सुनियोजित हत्या है। गला रेतने के लिए चाकू कहां से आया? लड़का स्वयं लड़की के दफ्तर गया। वहां से उसे लिया और सेंट्रल पार्क ले जाकर मार दिया। उस दिन मौसम भी इस कू्रर कृत्य में उसका साथ दे गया। तेज बारिश में यह उस भरोसे की हत्या थी। यह खून है उस यकीन का जो लड़की ने लड़के पर किया। उस समाज में जहां प्रेम को बहुत ऊंचा दर्जा हासिल है, प्रेम और आस्था की पूजा होती है, प्रेमियों की गाथाओं पर ग्रंथ लिखे जाते हों, फिल्में बनती हो, भजन लिखे जाते हों। लेकिन अब वक्त आ गया है इस भरोसे पर शक करने का। जयपुर को ही लें गत दस महीनों में तीन लड़कियां इसी तरह हत्या की शिकार हुईं। एक विधायक के मकान में रह रही विधवा मां की युवा बिटिया की युवक ने घर में घुसकर हत्या कर दी थी। मेहनत मजदूरी कर बेटी को बड़ा करने वाली वह मां आज तक सदमे में है। बेटी का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाई थी कि उसका सामान घर से निकालकर बाहर फेंक दिया गया। संवेदनशून्यता की मिसाल देखिए तब विधायक ने कहा था कि हमें तो शुरू से ही मां-बेटी के आचरण पर शक था। पुलिस ने कत्ल की गई लड़की को तो प्रमिका मान पड़ताल शुरू कर ही दी थी मां को भी नहीं बख्शा। दो शादियां कर चुकी वह माँ पुलिस की निगाह में चरित्रहीन थी। शशि नामक युवती भी एक युवक का शिकार बनीं। उसे दिल्ली में मार दिया गया था। शशि के बारे में कहा गया कि वह बिंदास थी, देर रात तक पार्टियों में रहना उसकी आदत थी। क्या महज देर रात तक बाहर रहने से कोई लड़की अपनी हत्या के लिए प्रस्तुत हो जानी चाहिए? यह लड़की तो पार्टी गलü नहीं थी और न ही वह .....। एक को पार्क में मारा गया दूसरी को घर में घुसकर। दरअसल, यह वह मानसिकता है जिसके तहत लड़कियों की जुबां बंद करने को ही मर्दानगी समझा जाता है। लड़की जब अपने मन की करना चाहती है हम उसे रोकते हैं, पीटते हैं और अंत में मार डालते हैं। अधिकांश महिलाएं अपने निकटतम परिजन खासकर पति/प्रेमी की पिटाई का शिकार होती हैं। छह दिन से छत्तीस साल तक के दाम्पतय में अलग-अलग शहरों में औरतों को पिटते देखने का कटु अनुभव जब हुआ तो लगा जैसे ये पति इनसान नहीं हैवान हों। ये सब पढ़े-लिखे और आर्थिक तौर पर संतुष्ट नजर आते थे। जोधपुर के चीफ इंजिनियर से जयपुर के मेडिकल से जुड़े व्यवसाई तक सभी की पत्नियों के शरीर पर जख्मों की कहानियां है। पिटाई का यही आचरण आपा खोने पर हत्या में बदलने में कितनी देर लगती है? पीटने की इस प्रवृत्ति पर शुरू से ही परिवार और समाज की नजर तीखी हो तो हत्याओं पर भी अंकुश लग सकता है। कथित प्रेम को सहारा लेकर मरने या मारने पर उतारू ये लड़के मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं। पुलिस कह रही है कि हत्यारा पहले, प्रेम में असफल हो कर आत्महत्या की कोशिश कर चुका है। अव्वल तो आत्महत्या करने की कोशिश में वह गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ? जब वह असफल प्रेमी है तो फिर उसे लड़की का प्रेमी क्यों कहा जा रहा है? जाहिर है वह एक कुंठित प्रेमी है और लड़की को शायद कहीं न कहीं हमददीü रही हो जिसका लाभ इस दिलीप नामक हत्यारे ने उठाया। यूं भी लड़कियां स्वभाव से बेहद इमोशनल होती हैं। कई रिसर्च प्रमाणित कर चुके हैं कि लड़कियां भावुकता के साथ सारे काम करती हैं वहीं लड़के प्रेçक्टकल होकर। लड़का पूरी तैयारी के साथ चाकू लेकर आया था। कमजोर और इरादा भांप न सकी लड़की शिकार बन गई। काश पंजाबी के कवि और शहीद पाश की ये पंक्तियां सच हो जाती-
मरने का एक और भी ढंग भी होता है
मौत के चेहरे से उठा देना नकाब
aur जिंदगी के चार सौ बीस को
सरे आम बेपर्द कर देना
ladkiyon को समझना होगा कि हर ऐरा-गैरा नत्थूखैरा उनके सानिध्य का हकदार नहीं। प्रेम की फिल्मी छवि से उबरें। आपका काम, आपकी जान कीमती है। सोच समझकर भरोसा करें। हम और कितनी जानें गवाएंगे। कई शहरों की असंख्य युवतियां इन कातिलों के हत्थे चढ़ रही हैं। इन्हें रोका जा सकता है। उन पर पूरी तरह यकीन न करके। वक्त बदला है हमें भी बदलना होगा।

3 comments:

Tarun said...

वर्षा बात तो बहुत सही उठायी है आपने। एक सलाह ये है कि लंबे पैराग्राफ को छोटे छोटे भागों में तोड़कर लिखें। दो पैराग्राफ के बीच में एक लाईन की जगह दें। इससे पढ़ने वाले के लिये पढ़ने में आसानी रहती है। और लेख भी लेख जैसा दिखता है।

dhirendra pratap singh durgvanshi said...

varsha ji apne jo prashn uthaye hai ve bilkul thik hai-yah sahi hai ki yadi koi ladki chartraheen hai to uska matalab ye nahi ki uska jo chahe balatkar kare-par aaj kal padne likhne wali ladikiya is tarah ka aachran karti hai ki uska parinam sari mahila samaj ko uthana padta hai-dhirendra

bharat bhushan said...

very moving.
complete poetry of Paash in Hindi, English, Punjabi and much more about his life and times is at my blog on Paash at http://paash.wordpress.com