गुरुवार, 31 जुलाई 2008

शाहिद मिर्जा की एक कविता


फाकलैण्ड रोड

पीला हाउस की असंख्य रंडिये
शाम ढलते ही
सस्ता पावडर और शोख लिपस्टिक पोत कर
खड़ी होने लगी हैं
फाकलैण्ड स्ट्रीट के दोनों तरफ
क्या बसा है उनकी उजाड़ आंखों में
सुकून नहीं
इसरार नहीं
ललक नही
उम्मीद नहीं
खौफ हां
भूख हां
बेचैनी हां
अवमानना हां
बेपनाह बोझे जैसी बेबसी बसी है
पेट और उसके अतराफ
अलाव की शक्ल में
लोग कहते हैं एड्स दे रही हैं ये रंडियें
कोई नहीं कहता
हम उन्हें आखिर क्या देते हैं?

10 टिप्‍पणियां:

surjeet ने कहा…

unaki tarah, unki kavita bhi bebak.

varsha ने कहा…

shukriya yah kavita unhone 1991 me europe yatra ke douran likhi thi

Arun Aditya ने कहा…

हम उन्हें क्या देते हैं? सटीक सवाल करती है शाहिद जी की कविता।
कविता ने शाहिद जी की याद दिला दी और दिल भर आया। शाहिद जी के दिनमान में छपे हुए कुछ लेख उपलब्ध हों तो जरुर ब्लॉग पर डालिए। उनके लेख नई पीढी के कला समीक्षकों के लिए मार्गदर्शक का काम करेंगे।

sanjay patel ने कहा…

वर्षाजी.
शाहिद भाई
कभी भी हमारी ज़िन्दगी से नहीं जाते.
लगता है बस इन्दौर से जयपुर ही तो गए हैं.

आप उन्हें बार बार इस ब्लॉग पर लाते रहियेगा,बहुत दिन हो जाते हैं उनसे मिले तो मन भारी हो जाता है.पापा भी शिद्दत से याद करते हैं उन्हें.हम सब की याद दीजियेगा उन्हें...आप तो रोज़ ही मिलतीं होंगीं उनसे ?

varsha ने कहा…

namaskar,
kya kahoon sanjayji, nami to in aankhon me hamesha hi bani rahti he lekin aapki in panktiyon ne aap to unse roz hi milti hongi... barsa diya.yakeen maniye yah shahidji ka hi blog he. mere pas jo kuch bhi he unhi ka he.papa ko pranam.

cartoonist ABHISHEK ने कहा…

shahid ji ko koi kabhi bhool hi nahi sakta..

vipinkizindagi ने कहा…

bahut sahi aur satik......

surjeet ने कहा…

varshaji, ek gujarish hai aapse, mirza saheb ke purane lekhan se nai pidhi ko rubaru karayen, kyonki ve nai pidhi ki sashakt aavaz the.

बेनामी ने कहा…

कोई नहीं कहता
हम उन्हें आखिर क्या देते हैं?

sach me,agar hum unhe kuch de pate to shayad unko ye sab nahi karna padta.

varsha ने कहा…

sabka shukriya
sach he agar ham unhe kuch de pate to yah noubat hi kab aati?