बुधवार, 23 जुलाई 2008

जिंदगी में कभी कभी

खुशबू की आवरण कथा में इस बार न कुछ उजागर करने की मंशा है और न किसी ज्वलंत मुद्दे पर किसी की टीका टिप्पणी। जिंदगी में कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है जिसके लिए हम बिलकुल प्रस्तुत नहीं होते हैं और तो और यह सोचते हैं कि यदि हमारे साथ ऐसा होता तो कम से कम हम तो यह गलती कभी नहीं करते। किसी भी भारतीय स्त्री के लिए बच्चे सबसे बड़ी धुरी होते हैं। एक चुंबकीय आकर्षण बच्चों की खातिर वह बहुत कुछ ऐसा करती है जो उसकी सोच और चाहत के बिलकुल उल्टा होता है। उसे यह भी लगता है कि यदि मैंने कुछ किया तो बच्चों की जिंदगी तबाह हो जाएगी। क्या वाकई ऐसा है?

जयपुर की एक महिला है उम्र पचास के आसपास। दो बच्चे भी हैं ।शादी चली नहीं। तलाक लिया। इस बीच कोई दूसरा करीब आया। यकीन नहीं हुआ कि दुनिया इतनी खूबसूरत हो सकती है और किसी से इतनी ट्यूनिंग भी। रिश्ता जारी है। समझ की राह भी परस्पर लंबी होती जा रही है। फिर बच्चे? वो तो तबाह हो गए होंगे। इमोशनली पूरी छिन्न -भिन्न। शरत्चन्द्र के नायक की तरह टूटे, उखड़े और दिशाहीन। नहीं जनाब। वह दौर अब गया। आज के बच्चे एक हद तक ही चीजों को अपने ऊपर हावी होने देते हैं। खुदपरस्त (आत्मकेंदि्रत) होती पीढ़ी का यह फायदा तो है कि वह बहुत ज्यादा रोने-धोने में यकीन नहीं रखती ।नई पीढ़ी अगर अपने लिए स्पेस चाहती है तो वह स्पेस देने के लिए भी तैयार है। बच्चों को मां के फैसले पर कोई शिकायत नहीं। इमरान खान। नई पीढ़ी का नया स्टार। लगता है कि एक आम हिंदुस्तानी की तरह उसके माता-पिता होंगे। सीधा-साधा लड़का जो प्रतिभा के दम पर जगमगा रहा है। लेकिन यह कहानी भी इतनी सीधी-सादी नहीं है। इमरान केवल डेढ़ सल् के थे तब उनके माता पिता का तलक हो गया । पिता अनिल पाल ने इस्लाम कूबूलते हुए शादी की थी लेकिन धर्म कब शादी की गारंटी दे पाया हे ।पेशे से इन्जिनेअर पिता ने फ़िर शादी नहीं की ।वे अपने पिता से मिले हालाँकि उन्हें हिन्दी उर्दू नहीं आती । माँ का दूसरा ब्याह भी दो साल पहले टूट गया .लेकिन इमरान को कोई शिकवा नहीं ।

आज़ादी के आसपास का दौर रहा होगा। शादीशुदा और एक बच्चे की मां जुबैदा पर जोधपुर के तत्कालीन महाराज हनुवंत सिंह का दिल आ गया। रिश्ता इस कदर करीब हुआ कि जुबैदा अपने नन्हें बच्चे से दूर हो गइं . वह हनुवंत सिंह के साथ जोधपुर आ गई जहां उन्होंने नई पहचान के साथ नई जिंदगी शुरू की। कुछ ही सालों में हनुवंत सिंह और जुबैदा की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। जुबैदा के पहले पति से हुई संतान जिन्हें वह छोटी उम्र में ही अकेला छोड़ गई थीं वह कोई और नहीं बल्कि ख्यात पत्रकार खालिद मोहम्मद हैं। श्याम बेनेगल निर्देशित जुबैदा की पटकथा उन्होंने ही लिखी है। यहां तक कि फिल्म मम्मो की कहानी भी खालिद की कलम से ही निकली है। खालिद अगर वीरानी में गुम होने में यकीन रखते तो जिंदगी ने उन्हें भरपूर हालात दिए थे। लेकिन उन्होंने इन हालात को कलम में पिरोया। उनकी शोहरत बुलंदियों पर पहुंच गई। खालिद एक ऐसे नायक हैं जो तूफानी लहरों के साथ नहीं बहे।इस मुद्दे पर एक युवा लेखक का कहना है कि रोना-धोना वहां ज्यादा होता है जहां धन की कमी होती है। पैसा पास है तो बड़े से बड़े जख्म पर भी मरहम लग जाता है। मां की जुदाई से बड़ी तकलीफ कोई नहीं लेकिन जहां साधन सुविधाएं हैं वहां ऐसे नश्तर कुछ कम चुभते हैं। एंग्री यंग मैन वहीं बनते हैं जहां अभाव और गरीबी है। पैसा बहुत बड़ी ताकत है। सत्येंद्र पाठक की राय में आज एक बड़ा फर्क नई पीढ़ी के रवैये में भी आया है। वह रिश्तों को एक निश्चित फ्रेम में नहीं रखती। उसे अपने लिए आसमान की तलाश है तो वह जमीन पर भी बहुत तंग गली में नहीं विचरती। वह मानती है कि जीवन में बिल्कुल काला और झकाझक सफेद कुछ नहीं है। ज्यादातर चीजें धूसर हैं। काले और सफेद के बीच। जिसने इसे समझ लिया वह खुद भी कम कष्ट पाएगा और दूसरों को भी कम कष्ट देगा। प्रोफेसर कविता की राय में `यह जनरेशन हमसे कहीं ज्यादा कांफिडेंट है। मुझे याद है कि जब मेरी पंजाबी मां और ब्राrाण पिता के बारे में कोई सवाल करता था तो मैं डर जाती थी। लगता था इस बारे में किसी को भी पता नहीं चले। क्योंकि ऐसा करना एक अपराध माना जाता था। समाज में ऐसे विवाह करने वाले हेय थे। अब अपने व्यवहार पर हंसी आती है। उन्होंने तो बकायदा शादी की और निभाई, यह हिम्मत का काम था। आज मुझे उन पर गर्व होता है लेकिन उस वक्त ऐसा नहीं था। जहां तक बच्चों को छोड़ दूसरे विवाह में जाने की बात है यह वे ही जान सकते हैं कि उनके लिए क्या सही था। विवाह एक बेहद निजी संबंध है इसमें तीसरे का कोई दखल नहीं हो सकता।´

क्रिएटिवली सक्रिय अभिषेक कहते हैं कि नई पीढ़ी समझती है कि रिश्तों के साथ-साथ जिंदगी भी चलानी होती है। खासकर शो-बिज में हाई लाइफ को कायम रखने के लिए कई तरह के विकल्प मौजूद हैं उनमें से एक शादी भी है। फिल्मी दुनिया में झांकने पर शाहिद कपूर पर ध्यान जाता है। कामयाब सितारों में शामिल हैं लेकिन मां और पिता दोनों ने ही अपनी गृहस्थी फिर बसाई। शाहिद के पिता पंकज कपूर ने सुप्रिया पाठक से दूसरा ब्याह रचाया तो मां नीलिमा अजीम भी तीन शादियां कर चुकी हैं। निस्संदेह शाहिद का बचपन इससे अप्रभावित नहीं रहा होगा लेकिन व्यक्तित्व पर इसकी नकारात्मक छवि नहीं दिखती। नई अभिनेत्री हंसिका मोटवानी ने भी माता-पिता में अनबन देखी है। जाहिर है ये तमाम ब्यौरे उच्च मध्यम वर्ग की पैरवी करते हैं। मध्यम वर्ग इन पर टीका-टिप्पणी से तो बचता ही है विवाह विच्छेद को भी स्वीकारना नहीं चाहता। वहीं पीढ़ी भी प्रभावित होती है। जहां इसे स्वीकार कर लिया गया वहां पीड़ा का अहसास कम नजर आता है। दरअसल तकलीफ को महसूस करने के लिए वक्त चाहिए और ये वक्त बोर्डिंग स्कूल नहीं देते। अनुशासन और दिनचर्या गम को कम करने की बड़ी वजह बनती है। यूं भी धन की ख्वाहिश और लगातार व्यस्त जिंदगी ने इनसान को मशीन बनने पर मजबूर किया है। गमजदा जिंदगियों के लिए यही बेहतर है। मशीन के दिल नहीं होता। वह सिर्फ परिणाम देने में यकीन रखती है। आंसुओं का हिसाब रखने में नहीं। सुदर्शन `फाकिर´ ने क्या खूब कहा है-

आप कहते थे रोने से नहीं बदलेंगे नसीब,

उम्रभर आपकी इस बात ने रोने न दिया।

6 टिप्‍पणियां:

cartoonist ABHISHEK ने कहा…

बधाई..
जीवन सिर्फ़ सांसे लेने का नाम नही है

varsha ने कहा…

shukriya

varsha ने कहा…

shukriya

manglam ने कहा…

बदलते हुए समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। इस सचाई के बखूबी दशॅन कराए हैं आपने। अच्छा लगा।

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छा लगा आपको पढ़ना..

vipinkizindagi ने कहा…

अच्छा लगा।