Saturday, November 29, 2008

फक्र के फूल

हेमंत करकरे ने सीने पर गोलियां खाई जिस पर नेता तोहमत लगा रहे थे कि वे पूर्वाग्रही हैं करकरे अगर पूर्वाग्रही हैं तो सारा देश ऐसा हो जाए । सबसे पहले ये नेता ...
जिस धज से कोई मकतल में गया वो शान सलामत रहती है
ये जान तो आनी जानी है इस जां की तो कोई बात नहीं
बकौल फैज़ अहमद फैज़ मुंबई मोर्चे पर अपना सर्वस्व त्याग करने वाले जांबाजों की शान निस्संदेह सदियों तक सलामत रहेगी। यह रुखसती फक्र के साथ है। क्रंदन ,विलाप ,जुगुप्सा भी है लेकिन नेताओं के लिए । हेमंत करकरे ,संदीप उन्नीथन और गजेन्द्र सिंह बेहद प्रखर ,पढ़े -लिखे ,फिट , काबिल और अपने काम में निष्णात रहे । ए टी एस प्रमुख चाहते तो नीचे आर्डर पास कर सकते थे लेकिन उन्होंने मोर्चा संभाला । अपेक्षाकृत कमज़ोर बुलेटप्रूफ ,हेलमेट जो उनका नहीं था और रायफल के साथ मैदान में कूद पड़े । सीने पर गोलियां खाई जिस पर नेता तोहमत लगा रहे थे कि वे पूर्वाग्रही हैं । करकरे अगर पूर्वाग्रही हैं तो सारा देश ऐसा हो जाए । सबसे पहले ये नेता जो सिवाय एक सोच रखने के कुछ नहीं कर पाये। कोई उसके पक्ष में कोई इसके । बराबरी की नज़र कभी किसी की नहीं रही अगर हो पाती तो इस कुर्बानी की नौबत ही नहीं आती । politician को देख जहाँ टीवी बंद करने का जी चाहता है वहीं जवान के आगे हाथ ख़ुद ब ख़ुद जुड़ जाते हैं । दरअसल यह नेताओं का रवैया ही है जो संदीप के पिता से कहलवा रहा है किउनका बेटा शहीद नहीं , देश के काम आया है । ऐसा ही कुछ ndtv पर संजना कपूर ने भी बरखा दत्त और प्रोनोय रॉय से -कहा इसे युद्ध न कहे । युद्ध में आपको पता होता है की आपका दुश्मन कौन है ।लक्ष्य सामने होता है लेकिन यह दहशतगर्दी है । जघन्य हरकत हे ये । क्या यह विचारणीय नहीं है कि शहादत के बिना हम कब तक हम अपने बेहतरीन जवानों को मौत के मुहँ में धकेलते रहेंगे? क्या अब भी अन्तिम निर्णय का वक़्त नहीं आया है ?

Thursday, November 20, 2008

पाकीजा काम


बेशक शब्द कवि के दिल से आते हैं .तेरह साल पहले लिखी इस कविता का एक एक शब्द वक़्त के साथ अर्थ ग्रहण करता चला गया .समय के साथ शब्दों को सार्थक होते देखने के अनूठे अनुभव की समय साक्षी मैं शाहिद मिर्जा की इस कविता को पहली बार ब्लॉग पर दे रही हूँ .समय और शब्द की चेतना को समर्पित एक पत्रकार की रचना शायद पसंद आए


प्रेम नहीं है
सौ मीटर फर्राटा दौड़
मैराथन है प्रेम
अछोर मेराथन
प्रेम क्रिकेट में
दोनों पक्ष सगर्व
खेलना चाहतें हैं
फोलोऑन

क्यों
बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं
ग़ालिब की नाई
निकम्मा हो जाना
इश्क फरमाते हुए
गो
ज्यादातर बार
होता यही है
बावजूद
प्रेम से जुड़ी तमाम कथाओं किम्वदंतियों के
और बावजूद इस यथार्थ के

कि अरसे से जर्द पड़ गए हैं
प्रेम नाम की तमाम पातियों के रंग
मुहैया करनी है मुझे ही
प्रेम को अपूर्व गरिमा , गहराई सादगी और अर्थ
देना है प्रेम को
हूबहू प्रेम की शक्ल
रचना है हज़ारराहा भयावह
हददर्जा जहरआलूद हवाओं के मुकाबिल
नाज़ुक और कारगर प्रतिरोध
नहीं जानता
ये काम ठीक ठीक
अंजाम
दे पाउँगा या नहीं
लेकिन इन दिनों
इस नियाहत वाहियात दौर में
यही हे
सबसे ज़रूरी और पाकीजा काम

Thursday, November 13, 2008

काले नहीं हैं ओबामा


ओबामा न तो काले हैं ना ही गोरे, `काले-गोरे´ हैं। काले पिता और गोरी मां की संतान। हाइब्रिड ओबामा। संकरित ओबामा। सारी दुनिया एक जैसी सोच की शिकार है। फिफ्टी-फिफ्टी को सौ फीसदी काला बना दिया। बहरहाल दो संस्कृतियों में पला-बढ़ा शख्स दुनिया को एक आंख से तो नहीं देखेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे ब्लैक एंड वाइट के बीच बिखरे बहुत से रंगों की पहचान रखते होंगे
ओबामा..ओबामा..ओबामा.. हर तरफ यही गूंज। सोचा था ब्लॉग पर नहीं करूंगी ओबामा का जिक्र। कुछ लोगों की तकलीफ भी थी कि ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं हमारे नहीं। वह अमेरिका जो दुनिया पर दादागिरी करने में यकीन रखता है। ओबामा भी अमेरिकी प्रशासन का मोहरा भर होंगे।राष्ट्रपति ओबामा बने या मैक्केन हम क्यों फूल कर कुप्पा हुए जा रहे हैं। माफ कीजिएगा दोस्तो, फूलने की वजह है। वे युवा हैं। इतना बढ़िया बोलते हैं कि अमेरिकी ही नहीं, दुनिया के किसी भी हिस्से में रहने वाला वोटर उन्हें वोट देने का मन बना लेता है। वे पत्नी मिशेल और दो बेटियों के साथ पारिवारिक मूल्यों में भरोसा करते हुए नजर आते हैं और लास्ट बट नॉट लीस्ट, वे काले हैं। हमारे जैसे काले, जिनका गोरों ने हमेशा मजाक उड़ाया है। हेय समझा है। दोयम माना है। ओबामा बेहतर दुनिया की अपेक्षा जगाते हैं क्योंकि वे न तो काले हैं ना ही गोरे, `काले-गोरे´ हैं। काले पिता और गोरी मां की संतान। हाइब्रिड ओबामा। संकरित ओबामा। सारी दुनिया एक जैसी सोच की शिकार है। फिफ्टी-फिफ्टी को सौ फीसदी काला बना दिया। बहरहाल दो संस्कृतियों में पला-बढ़ा शख्स दुनिया को एक आंख से तो नहीं देखेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे ब्लैक एंड वाइट के बीच बिखरे बहुत से रंगों की पहचान रखते होंगे हुसैन ओबामा से प्रीत बेवजह नहीं लगती। वे पहले एफ्रो-अमेरिकन राष्ट्रपति हैं। पिता 1961 में अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने के लिए कीनिया से अमेरिका आए थे। वहीं विश्वविद्यालय में मां एना डुनहेम से मुलाकात हुई। 1963 में ही ओबामा के माता-पिता अलग हो गए। 1967 में मां ने दूसरी शादी की और इंडोनेशिया चली गईं। जाहिर है ओबामा किसी संस्कृति विशेष की नहीं बल्कि संस्कृतियों के मिलन का नतीजा है और समूची दुनिया अगर दीवानी हो रही है तो उसे अब्दुल्लाह नहीं कहा जाना चाहिए। आशा की जानी चाहिए कि यह दुनिया वसुधैव कुटुंबकम यानी एक परिवार की भारतीय सोच में भरोसा कर रही है।युवाओं के देश भारत की खुशी बताती है कि हमारे नौजवान जाति और धर्म की ऊंची दीवारों से बाहर निकलना चाहते हैं। वे किसी दलित, जाट, मीणा, brahmanमें अपना नेता नहीं खोजना चाह रहे बल्कि उत्साह से भरपूर एक ऐसे लीडर की तलाश में हैं जो `संकरित बीज´ की तरह मजबूत और ऊर्जा से लबरेज हो। ओबामा ने पूरे प्रचार में कहीं कलर कार्ड नहीं खेला और न ही जीत के बाद रंगभेद की बात की। बात की तो साथ काम करने और सफलता पाने की। यस वी केन उनका ध्येय वाक्य था। खुश हो सकते हैं कि ओबामा के प्रचार में सुकेतु मेहता, सलमान रश्दी,किरण देसाई,झुंपा लाहिडी़, मीरा नायर जैसी भारतीय मूल की हस्तियां शामिल रहीं। ओबामा पर छाई खुशी तो यही बताती है । क्यों हमें बीज तो संकरित चाहिए लेकिन इनसान एकदम खालिस? क्रॉसब्रीड हमें गाली लगती है। क्या हम अपने प्रजातंत्र में क्रॉस ब्रीड उम्मीदवार का दखल देख सकते हैं? अन्य क्षेत्रों में तो वे जौहर दिखा ही रहे हैं। लगता तो है, यस वी के न ।

Thursday, October 9, 2008

हैप्पी रावण सा...


थोडी देर पहले हुआ एक छोटा सा संवाद पेश है ।
me: हैप्पी रावण सा abhishek3939: रावण कोई इतनी अच्छी चीज नहीं है। ।बुराई का प्रतीक चारों तरफ़ रावणabhishek3939: रावण 2008 पर सद् विचार ....???me: रावण मुझे अच्छा लगने लगा है 100 रूपए पर फीट का रावणबच्चों को भी खुश कर देता है सीता को स्पर्श भी नहीं कियाआज कल रेप मर्डर सब कुछ नॉन रावण कर रहेabhishek3939: आज कल की सीताओं पर आपके सद् विचार
me: त्रेता युग की सीता ने भी लक्ष्मण रेखा तो लांघी थीलेकिन इससे रावण का अपराध कम तो नहीं माना गया यही फर्क है कल युग और त्रेता युग के नज़रिए का abhishek3939: बोलो रावण महाराज की ...जयme: आप क्यों सहमत हो रहे हैंabhishek3939: आपसे सहमत हो रहा हूँ दरअसल आज का आदमी उस रावण से कहीं ज्यादा खतरनाक सिद्ध हो रहा है..... me: शुक्रिया 2:23 जुगल किशोर शर्मा का यह फोटो जयपुर की गुर्जर की थडी का है जहाँ सैकडों की तादाद में रावण बिकने लिए आए हैं

Thursday, September 25, 2008

हर मुसलमान आतंकवादी नही होता......

आज सुबह एक अख़बार में एक बड़े लेखक के  लेख की शुरुआत में वही बात थी . हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर अतंकवादी मुसलमान होता हे. हालाँकि लेख में सिख ,नाजी , तमिल हिंदू, तमाम आतंकवादियों का ज़िक्र हे लेकिन निजी तौर पर लगता हे कि यह मज़हबी चश्मा कई बार हमें कमज़ोर करता है. आतंक का कोई धर्म नहीं होता यह हर बार साबित हो रहा हे. मुद्दे पर आते हैं भारतीय मुसलमान पर. उन्होंने लिखा हे वह इस्तेमाल हो रहा है . कोई कब इस्तेमाल होता है? गरीबी अशिक्षा के अलावा एकं और खास कारण है नफरत. हम उन्हें अस्प्रश्य समझते हैं . मुझे याद हे जब मै और मेरे पति किराये पर मकान देखने जाते तो लोग हमारा खूब स्वागत करते. अरे आप इस अख़बार में काम करते हैं आप इन्हें जानतें हैं, उन्हें जानते हैं . कबसे रहने के लिए आयेंगे ? आपका नाम क्या हे? मैं शाहिद मिर्जा और ये मेरी पत्नी वर्षा. हमारी हिंदू मुस्लिम शादी है इसको पकाना आता नही इसलिए नॉन वेज कि चिंता न करें ये लीजिये किराया शाहिदजी कहते ... मकान मालिक का चेहरा सफ़ेद पड़ रहा है शब्द गुम हो रहे हैं . अभी मेरी बीवी घर पर नहीं है . आप बाद में फोन कर लेना. ऐसा एक बार नही ७७ बार हमारे साथ हुआ. मेरी समझ काम नहीं करती थी कि ये सब हो क्या रहा है .इससे पहले जब मेरे पति कहते थे कि मुसलमान को कोई मकान नहीं देता मुझे यकीन नहीं होता था लेकिन जब प्रत्यक्ष देखा तो मन घृणा से भर उठा . उनकी नफरत देख मेरी आत्मा छलनी हो आती थी .कभी-कभी तो लगता जैसे खून खोल रहा हे . मेरे पति शांत बने रहते जैसे उन्हें तो इसकी आदत पड़ चुकी थी . इस बीच जो मकान दे देता वे उनके ऋणी हो जाते . खूब मान देते उन्हें वह सामान्य मालिक मकान फ़रिश्ता सा लगता था .वे शांत थे लेकिन मैं भाजपा की  वोटर एक अजीब दुनिया से रूबरू होकर गिल्ट में आ गयी थी. एक और बात जब शाहिदजी ने  अपनी माँ से पूछा माँ ये अफज़ल[terrorist] जैसे लोगों का क्या होना चाहिए माँ ने एक क्षण नही लगाकर कहा बेटा इन्हे तो सरे आम चौराहे पर फांसी लगनी चाहिए ताकि किसी और अफज़ल की  ऐसा करने से पहले रूह काँपे . शाहिद मिर्जा ने इसी शीर्षक के साथ एक लेख लिखा, छपने के दो दिन बाद तक उनके मोबाइल की  घंटी बधाईयों से गूंजती रही . वंदे मातरम पर भी उन्होंने लिखा वंदे मातरम यानी  माँ तुझे सलाम .मुबारकबाद फ़िर गूंजी
स्वयं ये लेखक महोदय  भी शाहिदजी को साधूसिफत इंसान कह चुके हैं लेकिन संदेह जारी है .यूरोप के हवाई अड्डे पर छोटी सी कैंची छीन ली जाती है .उसके हर ख़त की जांच होती हे . हर वक्त अग्नि परीक्षा के लिए खड़ा है क्योंकि उसे भारत से प्यार है .दूसरा हर मुल्क उसके लिए अजनबी है . उसे भी इंतज़ार हे आतंकवादी के सूली पर चढ़ने का .उसकी देशभक्ति पर शक है .वह सीना चीरना चाहता हे लेकिन राम के दर्शन नहीं करा पाता.लम्हों कि खता जाने कितनी सदियाँ भुगतेंगी ?

Wednesday, September 10, 2008

गाली , मसाज का बॉडी बॉस

सबसे पहले एक कन्फैशन कि तथाकथित फैमिली शो बिग बॉस रोज देखती हूं और मौजूद महिलाओं को निर्वस्त्र करने या होने के उतावलेपन को देख वितृष्णा से भर उठती हूं। शो में स्त्री मानसिक नग्नता की भी शिकार है। या तो बेवजह छोटे-छोटे कपड़े पहन रही है या किसी लड़के से लिपट रही है या फिर लगाई-बुझाई करते हुए रसोई में खाना पका रही है। ये लड़कियां फुटेज के लिए किसी भी हद तक गिर रहीं हैं। एक ही लक्ष्य है कि बिग बॉस के घर में रहते हुए ज्यादा से ज्यादा निर्माता, निर्देशक उनकी त्वचा के दर्शन कर लें और यहां से निकलते ही ऑफर्स के अंबार से उनकी झोली भर जाए।
दरअसल बिग बॉस को एक फॅमिली शो बताया जा रहा है। इसमें सेलेब्रिटीज (जिनके खाते में विवाद के अलावा कुछ दर्ज नहीं ) को एक घर में बंद कर दिया जाता है। तीन महीनों के लिए बाहर की दुनिया से कटकर ये अपना खाना-पीना लड़ना-झगड़ना, मोहब्बत-नफरत जारी रखते हैं। घरवाले सदस्यों को एक-एक करके बाहर निकालने की साजिश रचते हैं और बाहर वाली जनता उन्हें एसएमएस कर बचाने की कोशिश करती हैं। कनसेप्ट और कमाई के लेवल पर शो नंबर वन है। शो में शामिल आइटम डांसर संभावना सेठ, अबू सलेम की पूर्व प्रेमिका मोनिका बेदी, अंगों को संवारने में व्यस्त अभिनेत्री पायल रोहतगी , विचित्र व्यवहार वाली राखी विजन, रोतली अलीना वडीवाला और टीवी एक्ट्रेस केतकी दवे शामिल हैं। उम्रदराज केतकी को छोड़ दिया जाए तो बाकी सब की सब विक्षिप्तों की तरह व्यवहार करती हुई नजर आती हैं। एकदम अपरिपक्व और असंयत। शो में मौजूद लड़के उन्हें भूतनी, कम कपड़े पहनने वाली, कपड़े संभाल वरना... हो जाएगी जैसी उपाधियों से नवाजते रहते हैं, लेकिन इन्हें केवल एक ही भूख है यहां से निकलते ही काम मिल जाने की भूख। एक भी संवाद ऐसा नहीं है जो इन महिलाओं के सकारात्मक सरोकारों को दिखाता हो। शो से समझ आता है कि छोटे परदे के छोटे कलाकारों की दुनिया कितनी छोटी है और काम पाने के लिए उन्हें दिमाग को कितने ताक पर रखना पड़ता है। जो भी है बस शरीर है। शो के एक हिस्से में इन लड़कियों को स्कूल यूनिफॉर्म पहननी होती है लेकिन ग्लैमर की मारी ये लड़कियां पचास मिनट के शो में पांच मिनट भी पूरे कपड़ों में नहीं दिखना चाहती। समझ से परे है कि ये लड़कियां खुद ऐसी बनी या पैसों ने बनाया। क्या वाकई दर्शकों को स्त्रियों को इतनी बेवकूफ और कम-तंग कपड़ों में देखने में ही मजा आता है? ये लड़कियां लड़कों के भड़काने पर आपस में ही लड़ पड़ती हैं। पूरे मेकअप के साथ बिकिनी पहन पूल में कूद जाती हैं। वाह रे शो बिजनेस का रिअलिटी शो। काम की लॉलिपॉप क्या- क्या करा रही है। गाली से लेकर मसाज तक।
गौर करने लायक बात है कि लड़के यहां काफी शांत सहज हैं। अपनी बीवी को पीटने के आरोपी राजा चौधरी और राहुल महाजन भी अपना संतुलन नहीं खोते हैं। सारे लड़के आपे में नजर आते हैं और लड़कियां आपा खोती हुई। यह तकलीफदेय है और इशारा करता है कि इनका प्रोफेशन इन्हें किस कदर दबाव में रखता है। सुंदर दिखने का दबाव । यह संकेत भी है स्त्री के प्रति इंडस्ट्री के नजरिए का। अच्छा हुआ कि स्किन बिजनेस के मारे इस शो से ब्रिटिश टीवी एक्ट्रेस जेड गुडी चली गईं। कब तक बेसिरपैर की बातें करते हुए वक्त गुजारतीं। बहरहाल, स्त्रियों की कुटिल और कामुक छवि पेश करने वाले शो को देखने का अपराध हम सब करतें हैं। क्यों एक बार भी खयाल नहीं आता कि हिंदुस्तान के कौनसे परिवार की किस स्त्री की बानगी है यह?

Thursday, September 4, 2008

हत्या के बाद चीरहरण

आखिर क्यों पुलिस हर तहकीकात की शुरूआत ही महिला पीडि़ता के चरित्रहनन से करती है वह भी हत्या की शिकार महिला के । अखबार -चैनल उसे परम सत्य मानकर छापते -दिखाते हैं? गोआ में स्कारलेट हो या नोएडा में आरूषि या जयपुर में मारी गई ये तीन लड़कियां ।
हाल ही में जयपुर की एक युवती की सेन्ट्रल पार्क में एक हत्यारे ने गला रेत कर हत्या कर दी। नाम, परिचय, काम के पचड़े में न पड़ें क्योंकि वह किसी भी शहर की कोई भी लड़की हो सकती है। वह उन हजारों मध्यवगीüय लड़कियों में से एक थी जो पढ़ी-लिखी थी, कुछ बनना चाहती थी और हाल-फिलहाल एक बैंक नौकरी कर रही थी। जिंदगी है कई लोग मिलते हैं। कोई शायद ऐसा भी होगा जिससे थोड़ी नजदीकियां रही होंगी लेकिन पुलिस ने जिस तरह से कहानी पेश करने की कोशिश की है उससे लगता है कि दोनों में अथाह प्रेम था और प्रेम परिणति पर नहीं पहुंचा इसलिए यह हत्या हुई। क्या है यह एक हत्या को `डायल्यूट´ करने की कोशिश नहीं है? बताया गया है लड़के की शादी कहीं ओर हो रही थी, लड़की ने विरोध किया इसलिए लड़के ने उसे मार दिया। एक तरफ पुलिस लड़के को प्रेमी बता रही है और दूसरे ही पल उस प्रेमी के कहीं ओर शादी करने की बात भी कर रही है।क्या प्रेमी चाकू लेकर चलते हैं? यह सुनियोजित हत्या है। गला रेतने के लिए चाकू कहां से आया? लड़का स्वयं लड़की के दफ्तर गया। वहां से उसे लिया और सेंट्रल पार्क ले जाकर मार दिया। उस दिन मौसम भी इस कू्रर कृत्य में उसका साथ दे गया। तेज बारिश में यह उस भरोसे की हत्या थी। यह खून है उस यकीन का जो लड़की ने लड़के पर किया। उस समाज में जहां प्रेम को बहुत ऊंचा दर्जा हासिल है, प्रेम और आस्था की पूजा होती है, प्रेमियों की गाथाओं पर ग्रंथ लिखे जाते हों, फिल्में बनती हो, भजन लिखे जाते हों। लेकिन अब वक्त आ गया है इस भरोसे पर शक करने का। जयपुर को ही लें गत दस महीनों में तीन लड़कियां इसी तरह हत्या की शिकार हुईं। एक विधायक के मकान में रह रही विधवा मां की युवा बिटिया की युवक ने घर में घुसकर हत्या कर दी थी। मेहनत मजदूरी कर बेटी को बड़ा करने वाली वह मां आज तक सदमे में है। बेटी का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाई थी कि उसका सामान घर से निकालकर बाहर फेंक दिया गया। संवेदनशून्यता की मिसाल देखिए तब विधायक ने कहा था कि हमें तो शुरू से ही मां-बेटी के आचरण पर शक था। पुलिस ने कत्ल की गई लड़की को तो प्रमिका मान पड़ताल शुरू कर ही दी थी मां को भी नहीं बख्शा। दो शादियां कर चुकी वह माँ पुलिस की निगाह में चरित्रहीन थी। शशि नामक युवती भी एक युवक का शिकार बनीं। उसे दिल्ली में मार दिया गया था। शशि के बारे में कहा गया कि वह बिंदास थी, देर रात तक पार्टियों में रहना उसकी आदत थी। क्या महज देर रात तक बाहर रहने से कोई लड़की अपनी हत्या के लिए प्रस्तुत हो जानी चाहिए? यह लड़की तो पार्टी गलü नहीं थी और न ही वह .....। एक को पार्क में मारा गया दूसरी को घर में घुसकर। दरअसल, यह वह मानसिकता है जिसके तहत लड़कियों की जुबां बंद करने को ही मर्दानगी समझा जाता है। लड़की जब अपने मन की करना चाहती है हम उसे रोकते हैं, पीटते हैं और अंत में मार डालते हैं। अधिकांश महिलाएं अपने निकटतम परिजन खासकर पति/प्रेमी की पिटाई का शिकार होती हैं। छह दिन से छत्तीस साल तक के दाम्पतय में अलग-अलग शहरों में औरतों को पिटते देखने का कटु अनुभव जब हुआ तो लगा जैसे ये पति इनसान नहीं हैवान हों। ये सब पढ़े-लिखे और आर्थिक तौर पर संतुष्ट नजर आते थे। जोधपुर के चीफ इंजिनियर से जयपुर के मेडिकल से जुड़े व्यवसाई तक सभी की पत्नियों के शरीर पर जख्मों की कहानियां है। पिटाई का यही आचरण आपा खोने पर हत्या में बदलने में कितनी देर लगती है? पीटने की इस प्रवृत्ति पर शुरू से ही परिवार और समाज की नजर तीखी हो तो हत्याओं पर भी अंकुश लग सकता है। कथित प्रेम को सहारा लेकर मरने या मारने पर उतारू ये लड़के मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं। पुलिस कह रही है कि हत्यारा पहले, प्रेम में असफल हो कर आत्महत्या की कोशिश कर चुका है। अव्वल तो आत्महत्या करने की कोशिश में वह गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ? जब वह असफल प्रेमी है तो फिर उसे लड़की का प्रेमी क्यों कहा जा रहा है? जाहिर है वह एक कुंठित प्रेमी है और लड़की को शायद कहीं न कहीं हमददीü रही हो जिसका लाभ इस दिलीप नामक हत्यारे ने उठाया। यूं भी लड़कियां स्वभाव से बेहद इमोशनल होती हैं। कई रिसर्च प्रमाणित कर चुके हैं कि लड़कियां भावुकता के साथ सारे काम करती हैं वहीं लड़के प्रेçक्टकल होकर। लड़का पूरी तैयारी के साथ चाकू लेकर आया था। कमजोर और इरादा भांप न सकी लड़की शिकार बन गई। काश पंजाबी के कवि और शहीद पाश की ये पंक्तियां सच हो जाती-
मरने का एक और भी ढंग भी होता है
मौत के चेहरे से उठा देना नकाब
aur जिंदगी के चार सौ बीस को
सरे आम बेपर्द कर देना
ladkiyon को समझना होगा कि हर ऐरा-गैरा नत्थूखैरा उनके सानिध्य का हकदार नहीं। प्रेम की फिल्मी छवि से उबरें। आपका काम, आपकी जान कीमती है। सोच समझकर भरोसा करें। हम और कितनी जानें गवाएंगे। कई शहरों की असंख्य युवतियां इन कातिलों के हत्थे चढ़ रही हैं। इन्हें रोका जा सकता है। उन पर पूरी तरह यकीन न करके। वक्त बदला है हमें भी बदलना होगा।

Thursday, August 28, 2008

एक मुलाकात शहनाई के उस्ताद से

२८ जून 1995 को शहनाई के उस्ताद बिस्मिल्लाह खां से रूबरू होना किसी जादुई अनुभव से कम नहीं था .तेरह साल पहले इन्दौर के होटल में जब बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो लगा उस्ताद शहनाई के ही नहीं तबीयत के भी शहंशाह है। यकायक एक मोहतरमा ने आकर पूछा -यहां आपको कोई तकलीफ तो नहीं? हमसे कोई गलती तो नहीं हुई? खां साहब कहां चुप रहने वाले थे तुरंत बोल पडे़-गलती तो आप कर चुकी हैं, लेकिन यह खूबसूरत गलती आप फिर दोहरा सकती हैं। इतना कहकर वे खुद भी ठहाका मारकर हंस पड़े। खां साहब के लबों पर जब शहनाई नहीं होती तब जुबां कब एक राग से निकलकर दूसरे में प्रवेश कर जाती, पता ही नहीं लगता था।
बनारस और बिस्मिल्लाह का क्या रिश्ता है?
बनारस को अब वाराणसी कहा जाने लगा है यूं तो बनारस के नाम में ही रस है। वहां की हर बात में रस है। हम पांच या छह साल के थे जब बनारस आ गए थे। एक तरफ बालाजी का मंदिर दूसरी ओर देवी का और बीच में गंगा मां। अपने मामू अली खां के साथ रियाज करते हुए दिन कब शाम में ढल जाता पता ही नहीं चलता था। आज के लड़कों की तरह नहीं कि सबकुछ झटपट पाने की चाह रही हो। पैर दबाए हैं हमने उस्ताद के। जूते पॉलिश किए हैं।
इन दिनों आप कितने घंटे रियाज करते हैं?
45मिनट
किसी निश्चित समय?
नहीं। जब समय मिला बजा लिया। बाकी समय खुदा की इबादत करता हूं। अपने फन के लिए, अपनी सेहत के लिए और देश के लिए दुआएं मांगता हूँ गांगुली द्वारा आप पर लिखी किताब `बिस्मिल्लाह खां एण्ड बनारस- द सीट ऑव शहनाई´ के बारे में आपकी क्या राय है?
यहां-वहां से बातचीत की और लिख दी किताब (क्रोधित होकर)। उस किताब ने हमें मुसलमानों के खिलाफ कर दिया। हमारा घर से निकलना मुश्किल हो गया। दो-एक बार हमसे मिली और पूरी किताब लिख डाली। वे लिखती हैं शहनाई हमारे लिए कुरान के समान है। यह क्या बात हुई? कुरान हमारे लिए खुदा की इबादत का जरिया है और शहनाई कला की।
क्या रीता गांगुली की इस किताब पर आपने आपत्ति जताई?
क्यों नहीं जताई। किताब के अगले संस्करण में वह सब नहीं है। उनकी इस हिमाकत की वजह से हमें अखबारों के जरिए अपनी बात कहनी पड़ी। (खां साहब ने उस किताब की पांच हजार प्रतियां बिक जाने पर अफसोस व्यक्त किया) किताब लिखना नहीं उन्हें तो बस पैसा कमाना था।
`गूंज उठी शहनाई´ के बाद आपने फिल्मों से नाता क्यों तोड़ लिया?
इसके बाद एक और तमिल फिल्म आई थी। उसमें एक गायिका के साथ हमारी जुगलबंदी थी। बड़ी अच्छी गायिका थी। हम नाम भूल रहे हैं। (तभी खां साहब उस फिल्म से एक टोड़ी सुनाने लगते हैं। उनकी यह तन्मयता देखते ही बनती है) हम एक ही राग को चार तरह से गा रहे थे। तो वे तो (गायिका) हैरान रह गई थीं।
उसके बाद कोई फिल्म क्यों नहीं आई?
दरअसल, यह सब हमें रास नहीं आया। जरा सुर लगा नहीं कि कट...
सुना है कि बचपन में रियाज के दौरान आपको किसी साधु बाबा के दर्शन हुए थे?हां, यह बिलकुल सच है। हम कभी झूठ नहीं कहते। उस वक्त मैं कोई दस-ग्यारह बरस का रहा होऊंगा।मैं बालाजी के मंदिर में बैठकर रियाज कर रहा था। एक तरफ मामू रियाज कर रहे थे। तभी मैंने तेज खुशबू महसूस की लेकिन मैं फिर भी बजाता रहा। खुशबू और तेज होती गई। मैंने आंखें खोलीं तो देखा सामने साधु बाबा खड़े हैं। सफेद बढ़ी हुई दाढ़ी। केवल कमर का हिस्सा ढका हुआ। उनकी आंखों में गजब की चमक थी। मेरे हाथ रूक गए। साधु बाबा बोले `बजाओ बजाओ रूक क्यों गए´ मुझसे डर के मारे बजाते न बना। वे बोले- मजा करेगा, मजा करेगा। आज भी जब मैं याद करता हूं तो खुद को बहुत ही मजबूत पाता हूं।
इंदौर इससे पहले कब आए थे?
बीस साल पहले आया था। बड़े अच्छे लोग हुआ करते थे। अभिनव कला समाज ने बुलवाया था। खूब खिदमत करते और खूब चर्चा भी
आने में बीस साल का फासला क्यों बना?
पहले हम आने के तीन-चार हजार रुपए लेते थे और अब तीन लाख रुपए .दीजिए और बुलवाइये। हम आने को तैयार हैं। (मुस्कुराने लगते हैं)भारतीय और पाश्चात्य संगीत को मिलाकर कुछ नया करने का प्रचलन जोरों पर है
वजूद नहीं है इसका (क्रोध में)। तबाह करने की साजिश है ये। भारतीय संगीत कोई आज का नहीं है। सदियों पुराना संगीत है, इसका कोई क्या मुकाबला करेगा।
रहमान के दिए संगीत को नई बयार के रूप में देखा जा रहा
हैकौन है रहमान? कोई खुदा हो गए रहमान। वे कितना जानते हैं पुराने संगीतज्ञों को?
क्या आप तालीम भी दे रहे हैं?
हां, फिलहाल सिर्फ अपने खानदान के सदस्यों को। पहले काफी शागिर्दों ने हमसे तालीम ली है और आज अच्छे मुकाम पर हैं। लंदन, अमेरिका, दिल्ली, बंबई में जब भी जाना होता है ये आकर हमसे मिलते हैं।
क्या किसी में आपको संभावना नजर आती है?संभावना खुदा में है।कोई यादगार विदेशी अनुभव...
कुछ अरसा पहले मैं ईरान गया था। तब भारत और ईरान के संबंध अच्छे नहीं थे। वहां कि जनता ने जो मेरा स्वागत किया उसे देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। इस सफल कार्यक्रम को मौलवियों ने भी सुना और दाद दी। इसके बाद अभी तीन महीने पहले ही मेरा ईरान जाना हुआ। मैंने देखा कि जिस सभागृह में मैंने शहनाई बजाई थी, उसका नाम मेरे नाम पर कर दिया गया है। उस पर हिंदी भाषा में लिखा गया है। मेरे लिए यह कभी न भूलने वाला अनुभव स्पिक मैके में आकर कैसा लगा?
बहुत अच्छा। खुदा इन्हें और कामयाब करे। युवाओं में भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति दिलचस्पी जगाने वाले इस आंदोलन की जितनी तारीफ की जाए कम हे .
बहरहाल पोस्ट पढने में हुई असुविधा के लिए माफी .

Friday, August 22, 2008

सॉरी बिप्स .. हार गए विजेंद्र

विपाशा बासु का छः फुट के विजेंद्र के साथ डेट पर जाने का ख्वाब अधूरा रह गया । उनका सपना तोडा हे खानदानी boxer एमिलियो कोरिया ने । वे क्यूबा के हैं और जबरदस्त मुक्केबाज़ हैं । हमारे विजुभैया को कासे के साथ ही संतोष करना पड़ेगा । वैसे इस बांग्ला ब्यूटी की कोई गलती नहीं उन्होंने प्रोतसाहित करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी ।तमाम सरकारों ने जहाँ धन वर्षा कर दी वहीं बीप्स ने डेट पर जाने का प्रस्ताव कर दिया । देश भिवानी के इस handsom मुक्केबाज़ और बॉलीवुड की हॉट ऐक्टर विपाशा की मुलाकात से तो महरूम रहा ही गोल्ड से भी चूक गया .वरना आज हमारे पास दो गोल्ड होते । सॉरी दोस्तों.. क्रिकेट -बॉलीवुड का मेल तो बहुत देखा लेकिन बोक्सिंग-बॉलीवुड का यह बेमिसाल जोड़ नहीं देख पाये विपाशा का प्रयास ज़रूर सराहा जाना चाहिए । बहरहाल विजेंद्र को बधाई क्योंकि छोटे शहरों से क्या खूब झोला उठाया हे उन्होंने ।

Saturday, August 9, 2008

माँ को मिले मारने का हक़ ?

निकिता और हरेश मेहता ने अदालत से गुजारिश की थी कि उन्हें छह माह के गर्भस्थ शिशु को मारने की इजाजत दी जाए क्योंकि उसके दिल में छेद है और वह दुनिया में आकर सामान्य जिंदगी नहीं बसर कर सकता। एक सीधी सपाट राय हो सकती है कि मां को यह हक होना चाहिए लेकिन उस मां का क्या जिसका बच्चा पैदा होते ही मेनेनजाइटिस (दिमागी बुखार) का शिकार हो मानसिक विकलांग हो जाता है? वह मां जिसका बच्चा अस्पताल की लापरवाही से इन्क्यूबेटर में ही बुरी तरह झुलस जाता है? वह मां जिसका नवजात पोलियो का शिकार होकर हमेशा के लिए अपाहिज हो जाता है? तो क्या ये माताएं अपने प्रेम का मोल-तोल करने लग जाती हैं? कवि प्रयाग शुक्ल की पंक्तियां है-
तुम घटाना मत


अपना प्रेम


तब भी


नहीं जब लोग करने लगें उसका हिसाब


ठगा हुआ पाओअपने को


एक दिन


तब भी नहीं।


मत घटानाअपना प्रेम


बंद कर देगी तुमसे बोलना


धरती यह, चिडि़या यह,घास घास यह


मुंह फेर लेगा आसमा


नहीं , तुम नहीं घटाना


अपना प्रेम ।


प्रेम की यही परंपरा अब तक हमारी आंखों ने देखी है। मां का प्रेम, जहा आकर सारे शक दम तोड़ देते हैं। सर्वाधिक प्रेम तो कमजोर संतान पर ही बरसता है। गर्भ में बीज पड़ते ही मां एक अटूट बंधन में बंध जाती है। कानून भले ही चार माह तक गर्भस्थ को मारने की आज्ञा देता हो लेकिन वह पहले क्षण से ही नवजीवन से जुड़ जाती है। मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन उन नौ महीनों को भी अपनी आयु में शामिल करते हैं। कुदरत की कई चीजें हमें नजर नहीं आती। एक कोशिका वाला अमीबा, वायरस, बैक्टरिया कहां दिखाई देते हैं लेकिन उनका जीवन है। हमारी दृष्टि के पार भी एक दुनिया है। दरअसल यह निकिता बनाम बच्चे का फैसला नहीं बल्कि कुदरत बनाम विज्ञान की लड़ाई हे हे । उसके गर्भ में अनेक रहस्य छिपे हैं जिसे जान लेने को विज्ञान बेताब है।हम एक डिजाइनर बेबी चाहते he . कौन तय करेगा कि यह पैदा होने लायक है और यह नहीं। मुंबई उच्च न्यायालय ने अपना फैसला निकिता के नहीं प्रकृति के हक में दिया है। अन्यथा मर्सी किलिंग भी जायज है। क्यों नहीं अन्य देशों की तरह हम उस कानून को लागू कर देते जहां जी नहीं पा रहे आदमी को मौत दे दी जाती है?
(डेली न्यूज़ की लोकप्रिय मैग खुशबू में ६ अगस्त २००८ प्रकाशित कमेन्ट }
लग ता है, एक बीमार बच्चे के मां-बाप बनने जा रहे निकिता और हरेश मेहता की गलती बस इतनी थी कि उन्होंने अस्पतालों के अवैध पिछले दरवाजों का इस्तेमाल नहीं किया और कानून के रास्ते से अपनी मांग को पूरा करने का प्रयास किया, वे अच्छे लोग थे, तो उन्हें निराशा हाथ लगी। कानून के मुताबिक, 20 हफ्ते बाद केवल मां के जीवन के खतरे में होने की स्थिति में ही गर्भपात करवाया जा सकता है, लेकिन 20 हफ्ते बाद गर्भस्थ शिशु कैसा भी हो, उसे जन्म देना पड़ेगा। यानी निकिता को एक ऐसे शिशु को जन्म देना होगा, जिसके हमेशा अपंग और बीमार रहने की आशंका है। जब वह लाचार शिशु मां को घर में कैद कर देगा, तब उस मां के दर्द में शरीक होने कोई नहीं आएगा। अपंग बच्चों को पालने में जो दर्द होता है और अपंग बच्चों के प्रति समाज का जो रवैया है, उसे देखते हुए अपंग बच्चे के साथ-साथ उसके पालकों की जिंदगी भी किसी नर्क से कम नहीं होती और सर्वाधिक भुगतती है मां। हमारे देश में कई कथित नारी-समर्थक हैं, जिन्हें निकिता के बीमार गर्भस्थ शिशु की बड़ी चिंता है, वे उसके जन्म के पक्ष में हैं। गर्भस्थ शिशु के अधिकार की बात चल रही है, मां का अधिकार गया भाड़ में! वास्तव में जो शिशु अजन्मा है, उसे लेकर भावुक तो हुआ जा सकता है, लेकिन उस शिशु पर पूरी तरह से मां का हक है, क्योंकि वह मां के शरीर का ही विस्तार है। अंतिम सत्य यही है कि मां क्या चाहती है? मां, अगर उस शिशु को नहीं चाहती, तो मां के निर्णय में कोई भी हस्तक्षेप अमानवीय होगा। विज्ञान अगर उस मां की किसी भी तरह से मदद कर सकता है, तो विज्ञान को ऐसा करने देना चाहिए। हमारा दुभाüग्य है, अंबुमणि रामदास जैसे लोग कह रहे हैं, महज एक मां के कारण कानून में बदलाव नहीं किया जा सकता। अंबुमणि को नहीं पता, कितने लोग यही काम अस्पतालों के पिछले दरवाजे से करवा रहे हैं। निकिता जैसे मामले नए नहीं हैं, लेकिन पहली बार ऐसा कोई मामला अदालत के सामने आया है और निराशा हाथ लगी है। आश्चर्य, भ्रमित नारिवादियों के मन में गर्भस्थ कोशिकाओं, शिशुओं के प्रति ममत्व जाग उठा है। अगर हम गर्भ में पल रहे अमीबा, कोशिकाओं या कहें गर्भस्थ अपुष्ट शिशु के प्रति प्रेम निभाने लगेंगे, तो सोचिए, क्या होगा? परिवार नियोजन कार्यक्रम का तो कबाड़ा हो जाएगा। परिवार नियोजन के जिन उपायों के चलते महिलाओं को घरों से कुछ मुक्ति मिली है, वे उपाय अमानवीय ठहरा दिए जाएंगे, अनर्थ हो जाएगा। मंुबई हाईकोर्ट का फैसला जरूर निकिता के पक्ष में होता, लेकिन कानून के अभाव में वह मजबूर थी। दूसरी मेडीकल रिपोर्ट ने भी कुछ खेल किया है, लेकिन जजों ने साफ कहा, कानून बनाने का काम संसद का है। अथाüत नया कानून बनना चाहिए। कुदरत या प्रकृति अच्छी चीजें देती है, तो बुरी भी देती है। वह बुरी चीज देती है, तो निस्संदेह हमें नहीं लेना चाहिए। उदाहरण के लिए, क्या हम कुदरत की देन भूकंप, बाढ़, बीमारी को सहज स्वीकार कर लेते हैं या वैज्ञानिकों से कहते हैं कि कुदरत के गुस्से को नियंत्रित करने का उपाय खोजिए। अपंग बच्चे भी कुदरत की खामियां हैं। कुदरत को गुस्सा आया होगा, तभी तो निकिता के गर्भ में बीमार शिशु पल रहा है। जन्म के बाद की शारीरिक खामियों के साथ जीने के लिए हम बाध्य हैं, लेकिन जन्म के पहले की खामियों के निस्तारण से किसी को रोकना नाइंसाफी है। क्या हम निकिता से यही कहेंगे कि रे अभागन, कुदरत ने तुझे यही दिया है, प्रसाद मानकर स्वीकार कर? अच्छी मां बनकर कष्ट भोगती रह, सबके ताने सुन? कई रातें जागकर अल्ट्रा साउंड मशीन बनाने वालों की आत्मा निश्चित रूप से दुखी होगी कि उन्होंने तो काम की मशीन बना दी, लेकिन मानवों ने उसका पूरा सकारात्मक लाभ नहीं लिया। बेशक, प्रकृति सोलह आना पावन नहीं है। दुनिया में अपंगता के खिलाफ जंग जहां तक संभव हो, होनी चाहिए।

(ज्ञानेश उपाध्याय की डेली न्यूज़ में 9 अगस्त 2008 को प्रकाशित टिप्पणी


)

Thursday, July 31, 2008

शाहिद मिर्जा की एक कविता


फाकलैण्ड रोड

पीला हाउस की असंख्य रंडिये
शाम ढलते ही
सस्ता पावडर और शोख लिपस्टिक पोत कर
खड़ी होने लगी हैं
फाकलैण्ड स्ट्रीट के दोनों तरफ
क्या बसा है उनकी उजाड़ आंखों में
सुकून नहीं
इसरार नहीं
ललक नही
उम्मीद नहीं
खौफ हां
भूख हां
बेचैनी हां
अवमानना हां
बेपनाह बोझे जैसी बेबसी बसी है
पेट और उसके अतराफ
अलाव की शक्ल में
लोग कहते हैं एड्स दे रही हैं ये रंडियें
कोई नहीं कहता
हम उन्हें आखिर क्या देते हैं?

Wednesday, July 23, 2008

जिंदगी में कभी कभी

खुशबू की आवरण कथा में इस बार न कुछ उजागर करने की मंशा है और न किसी ज्वलंत मुद्दे पर किसी की टीका टिप्पणी। जिंदगी में कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है जिसके लिए हम बिलकुल प्रस्तुत नहीं होते हैं और तो और यह सोचते हैं कि यदि हमारे साथ ऐसा होता तो कम से कम हम तो यह गलती कभी नहीं करते। किसी भी भारतीय स्त्री के लिए बच्चे सबसे बड़ी धुरी होते हैं। एक चुंबकीय आकर्षण बच्चों की खातिर वह बहुत कुछ ऐसा करती है जो उसकी सोच और चाहत के बिलकुल उल्टा होता है। उसे यह भी लगता है कि यदि मैंने कुछ किया तो बच्चों की जिंदगी तबाह हो जाएगी। क्या वाकई ऐसा है?

जयपुर की एक महिला है उम्र पचास के आसपास। दो बच्चे भी हैं ।शादी चली नहीं। तलाक लिया। इस बीच कोई दूसरा करीब आया। यकीन नहीं हुआ कि दुनिया इतनी खूबसूरत हो सकती है और किसी से इतनी ट्यूनिंग भी। रिश्ता जारी है। समझ की राह भी परस्पर लंबी होती जा रही है। फिर बच्चे? वो तो तबाह हो गए होंगे। इमोशनली पूरी छिन्न -भिन्न। शरत्चन्द्र के नायक की तरह टूटे, उखड़े और दिशाहीन। नहीं जनाब। वह दौर अब गया। आज के बच्चे एक हद तक ही चीजों को अपने ऊपर हावी होने देते हैं। खुदपरस्त (आत्मकेंदि्रत) होती पीढ़ी का यह फायदा तो है कि वह बहुत ज्यादा रोने-धोने में यकीन नहीं रखती ।नई पीढ़ी अगर अपने लिए स्पेस चाहती है तो वह स्पेस देने के लिए भी तैयार है। बच्चों को मां के फैसले पर कोई शिकायत नहीं। इमरान खान। नई पीढ़ी का नया स्टार। लगता है कि एक आम हिंदुस्तानी की तरह उसके माता-पिता होंगे। सीधा-साधा लड़का जो प्रतिभा के दम पर जगमगा रहा है। लेकिन यह कहानी भी इतनी सीधी-सादी नहीं है। इमरान केवल डेढ़ सल् के थे तब उनके माता पिता का तलक हो गया । पिता अनिल पाल ने इस्लाम कूबूलते हुए शादी की थी लेकिन धर्म कब शादी की गारंटी दे पाया हे ।पेशे से इन्जिनेअर पिता ने फ़िर शादी नहीं की ।वे अपने पिता से मिले हालाँकि उन्हें हिन्दी उर्दू नहीं आती । माँ का दूसरा ब्याह भी दो साल पहले टूट गया .लेकिन इमरान को कोई शिकवा नहीं ।

आज़ादी के आसपास का दौर रहा होगा। शादीशुदा और एक बच्चे की मां जुबैदा पर जोधपुर के तत्कालीन महाराज हनुवंत सिंह का दिल आ गया। रिश्ता इस कदर करीब हुआ कि जुबैदा अपने नन्हें बच्चे से दूर हो गइं . वह हनुवंत सिंह के साथ जोधपुर आ गई जहां उन्होंने नई पहचान के साथ नई जिंदगी शुरू की। कुछ ही सालों में हनुवंत सिंह और जुबैदा की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। जुबैदा के पहले पति से हुई संतान जिन्हें वह छोटी उम्र में ही अकेला छोड़ गई थीं वह कोई और नहीं बल्कि ख्यात पत्रकार खालिद मोहम्मद हैं। श्याम बेनेगल निर्देशित जुबैदा की पटकथा उन्होंने ही लिखी है। यहां तक कि फिल्म मम्मो की कहानी भी खालिद की कलम से ही निकली है। खालिद अगर वीरानी में गुम होने में यकीन रखते तो जिंदगी ने उन्हें भरपूर हालात दिए थे। लेकिन उन्होंने इन हालात को कलम में पिरोया। उनकी शोहरत बुलंदियों पर पहुंच गई। खालिद एक ऐसे नायक हैं जो तूफानी लहरों के साथ नहीं बहे।इस मुद्दे पर एक युवा लेखक का कहना है कि रोना-धोना वहां ज्यादा होता है जहां धन की कमी होती है। पैसा पास है तो बड़े से बड़े जख्म पर भी मरहम लग जाता है। मां की जुदाई से बड़ी तकलीफ कोई नहीं लेकिन जहां साधन सुविधाएं हैं वहां ऐसे नश्तर कुछ कम चुभते हैं। एंग्री यंग मैन वहीं बनते हैं जहां अभाव और गरीबी है। पैसा बहुत बड़ी ताकत है। सत्येंद्र पाठक की राय में आज एक बड़ा फर्क नई पीढ़ी के रवैये में भी आया है। वह रिश्तों को एक निश्चित फ्रेम में नहीं रखती। उसे अपने लिए आसमान की तलाश है तो वह जमीन पर भी बहुत तंग गली में नहीं विचरती। वह मानती है कि जीवन में बिल्कुल काला और झकाझक सफेद कुछ नहीं है। ज्यादातर चीजें धूसर हैं। काले और सफेद के बीच। जिसने इसे समझ लिया वह खुद भी कम कष्ट पाएगा और दूसरों को भी कम कष्ट देगा। प्रोफेसर कविता की राय में `यह जनरेशन हमसे कहीं ज्यादा कांफिडेंट है। मुझे याद है कि जब मेरी पंजाबी मां और ब्राrाण पिता के बारे में कोई सवाल करता था तो मैं डर जाती थी। लगता था इस बारे में किसी को भी पता नहीं चले। क्योंकि ऐसा करना एक अपराध माना जाता था। समाज में ऐसे विवाह करने वाले हेय थे। अब अपने व्यवहार पर हंसी आती है। उन्होंने तो बकायदा शादी की और निभाई, यह हिम्मत का काम था। आज मुझे उन पर गर्व होता है लेकिन उस वक्त ऐसा नहीं था। जहां तक बच्चों को छोड़ दूसरे विवाह में जाने की बात है यह वे ही जान सकते हैं कि उनके लिए क्या सही था। विवाह एक बेहद निजी संबंध है इसमें तीसरे का कोई दखल नहीं हो सकता।´

क्रिएटिवली सक्रिय अभिषेक कहते हैं कि नई पीढ़ी समझती है कि रिश्तों के साथ-साथ जिंदगी भी चलानी होती है। खासकर शो-बिज में हाई लाइफ को कायम रखने के लिए कई तरह के विकल्प मौजूद हैं उनमें से एक शादी भी है। फिल्मी दुनिया में झांकने पर शाहिद कपूर पर ध्यान जाता है। कामयाब सितारों में शामिल हैं लेकिन मां और पिता दोनों ने ही अपनी गृहस्थी फिर बसाई। शाहिद के पिता पंकज कपूर ने सुप्रिया पाठक से दूसरा ब्याह रचाया तो मां नीलिमा अजीम भी तीन शादियां कर चुकी हैं। निस्संदेह शाहिद का बचपन इससे अप्रभावित नहीं रहा होगा लेकिन व्यक्तित्व पर इसकी नकारात्मक छवि नहीं दिखती। नई अभिनेत्री हंसिका मोटवानी ने भी माता-पिता में अनबन देखी है। जाहिर है ये तमाम ब्यौरे उच्च मध्यम वर्ग की पैरवी करते हैं। मध्यम वर्ग इन पर टीका-टिप्पणी से तो बचता ही है विवाह विच्छेद को भी स्वीकारना नहीं चाहता। वहीं पीढ़ी भी प्रभावित होती है। जहां इसे स्वीकार कर लिया गया वहां पीड़ा का अहसास कम नजर आता है। दरअसल तकलीफ को महसूस करने के लिए वक्त चाहिए और ये वक्त बोर्डिंग स्कूल नहीं देते। अनुशासन और दिनचर्या गम को कम करने की बड़ी वजह बनती है। यूं भी धन की ख्वाहिश और लगातार व्यस्त जिंदगी ने इनसान को मशीन बनने पर मजबूर किया है। गमजदा जिंदगियों के लिए यही बेहतर है। मशीन के दिल नहीं होता। वह सिर्फ परिणाम देने में यकीन रखती है। आंसुओं का हिसाब रखने में नहीं। सुदर्शन `फाकिर´ ने क्या खूब कहा है-

आप कहते थे रोने से नहीं बदलेंगे नसीब,

उम्रभर आपकी इस बात ने रोने न दिया।

Wednesday, July 9, 2008

कुंठित कनेक्शन

स्त्री-पुरुष संबंध, सृष्टि की बेहद भरोसेमंद बुनियाद। परस्पर विपरीत होकर भी एक-दूसरे के लिए समर्पित । ऐसा समभाव जहां न कोई छोटा न बड़ा। बावजूद इसके जब हम आधी दुनिया में झांकते हैं तो यह खूबसूरत कनेक्शन एक कुंठित कनेक्शन बतौर सामने आता है। इस कुंठा से घर भी महफूज नहीं। हर चेहरे की अपनी कहानी है। सदियों से होते आए व्या
भिचार में आज बड़ा टि्वस्ट आया है। आज की लड़की तूफान से पहले ही किसी सायरन की तरह गूंज जाना चाहती है..
हर कहानी के पहले चंद पंक्तियां होती हैं-`इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। इनका सच होना महज संयोग हो सकता है, लेकिन हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि खुशबू की कथा के सभी पात्र सच्चे हैं और इनका सच होना महज संयोग नहीं, बल्कि वास्तविक होगा।´
सजला अपने नाम के उलट थी। रोना-धोना उसकी फितरत के विपरीत था, लेकिन आज आंखें बह रही थीं। पन्द्रह साल की काव्या ने जो यथार्थ साझा किया था, उसे सुनकर वह कांपने लगी थी। काव्या ने बताया कि पिछले रविवार जब हम मौसाजी के घर गए थे तो ऊपर के कमरे में काव्या को अकेली देख उन्होंने उसे बाहों में भींचकर किस करने की कोशिश की। काव्या ने अपने पूरे दांत उस हैवान के गालों पर जमा दिए और भाग छूटी। सजला ने बेटी को समझाया। चुप बेटी इस बात का जिक्र भी किसी से नहीं करना, वरना तेरी मौसी की जिंदगी...नहीं मम्मी आपको चुप रहना है तो रहिए, मैं चुप नहीं रहूंगी। मौसी , पापा सबको बताऊंगी। आपको नहीं मालूम उन्होंने मोना (सजला की बहन की बेटी) के साथ भी यही सब किया था। काव्या यह सब कहे जा रही थी, लेकिन सजला का वहां केवल तन था। मन तो अतीत की अंधेरी गलियों में पहुंच चुका था। सजला अपने बड़े जीजाजी के दुष्कर्मों का शिकार हो चुकी थी। तब वह केवल चौदह साल की थी। न जाने किन अघोषित मजबूरियों के चलते उसने घटना का विरोध तो दूर कभी जिक्र भी नहीं किया। वह घृणित शख्स सबकी मौजूदगी में हमेशा सहज और सरल बना रहता। सजला बिसूरती रह जाती। आज जब काव्या का रौद्र और मुकाबलेभरा रुख सजला ने देखा तो अपने लिजलिजे व्यक्तित्व पर बेहद शर्म आई।
न जाने कितनी स्त्रियों के साथ कितनी बार ये हादसे पेश आए होंगे, इसका अंदाजा लगाना उन स्त्री और पुरुषों लिए कतई सहज नहीं है, जो संयोग से बच गईं और जो स्वभाव से संयमी और चरित्रवान हैं। सहनशील बनों, दूसरों के लिए खुद को न्यौछावर कर दो , जोर से नहीं बोलो जैसी जन्म घुटि्टयों ने स्त्री को न जाने किन बंधनों में बांध दिया कि वह हर अन्याय सहने के लिए प्रस्तुत रहीं। यौन उत्पीड़न को भी खुद की इज्जत से जोड़कर देखने लगी। अगर कुछ कहा तो लोग उसे ही बदनाम करेंगे। इस अलिखित बदनामी ने उसे इतना भीरू और कमजोर बना दिया कि वह चुप्पी में ही भलाई देखने लगी। नजमा ऐसी नहीं थी। अब्बू की लाड़ली नजमा को देख जब घर के पीछे रहने वाले चचा ने अश्लील इशारे किए तो वह चुप नहीं रही। मूंछों पर बट देने वाले चचा अब छिपे छिपे फिरते हैं। मीरा नायर की फिल्म `मानसून वेडिंग´ की एक पात्र अपने चाचा की हरकतों की शिकार बचपन में ही हो गई थी। उस उम्र में जब लड़की अच्छे-बुरे, मान-अपमान से परे होती है। शातिर अपराधी इसी उम्र और रिश्ते की निकटता का फायदा उठाते हैं। अपने चाचा का विरोध वह बड़ी होकर तब कर पाती है, जब चाचा एक और मासूम बच्ची को चॉकलेट का लालच दे रहे होते हैं।चौबीस साल की नीता एमबीए है और प्राइवेट कंपनी में एçक्जक्यूटिव। ट्रेन में सूरत से जयपुर आ रही थी। रात का वक्त था। एसी थ्री कोच में एक अधेड़ अपनी सीट छोड़कर उसके पास आकर लेट गया। नीता चीखकर भागी तो वह उसका पीछा करने लगा। बेटी-बेटी क्या हुआ। नीता नहीं पिघली। रेलवे पुलिस को शिकायत कर उसे गिरफ्तार करवाया और हर पेशी पर पूरी ईमानदारी से जाती है। न्यायिक पचड़ों के अलग पेंच हैं, उस पर रोशनी फिर कभी।
पूनम के जीजाजी बड़े रसिया किस्म के थे। जीजी सब जानती थीं या अनजान बनी रहती थीं, पूनम को समझ नहीं आया। जीजाजी बड़े मशगूल होकर स्त्रियों के अंगों-प्रत्यंगों का ब्यौरा देते रहते। जीजी कभी छोटी हंसी तो कभी बड़े ठहाके लगाया करती। एक दिन मौका देखकर जीजा महाशय पूनम के साथ ज्यादती पर उतारू थे। पूनम चूंकि इस अंदेशे को भांप चुकी थी, इसलिए स्कूल में सीखे जूडो-कराते के भरपूर वार जीजा पर किए और उसके पिता के सामने पूरा ब्यौरा रख दिया। सारी बातें इतने वैज्ञानिक तरीके से सामने रखी गई कि जीजाजी को लगा कि जमीन फट जाए और वो गड़ जाएं। पूनम फिर कभी जीजी के घर गई नहीं और न ही इस बात की परवाह की कि जीजी और जीजाजी के संबंधों का क्या हुआ होगा।अंजू के हॉकी कोच निहायत शरीफ और समपिüत नजर आते थे। अंजू उनके अंदाज और खेल पर फिदा थी। कोच साहब जब अपना दर्जा भूल ओछी हरकत पर उतर आए तो फिर अंजू ने भी एसोसिएशन के पदाधिकारियों के सामने कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया।
आज की लड़कियां सजला की तरह इस्तेमाल होने को अपनी नियति नहीं मानती और न ही घृणित हरकतों पर परदा डालने में यकीन करती हैं। स्वाभिमान को ठेस उन्हें बर्दाश्त नहीं। यह आत्मविश्वास उन्हें शिक्षा ने दिया है। आर्थिक आजादी ने दिया है जहां वे किसी के रहमोकरम पर पलने वाली बेचारी लड़की नहीं है। आर्थिक आजादी हासिल कर चुकी कामवाली महिला में भी आप इस आत्मविश्वास को पढ़ सकते हैं। घरेलू हिंसा और यौन आक्रमणों का प्रतिकार वह करने लगी है। कभी भारतीय रेलवे के शौचालयों की दीवारों पर गौर किया है आपने। भारतीय समाज की यौन कुंठाओं का कच्चा चिट्ठा होता है वह। भद्दी गालियां, स्त्री अंगों की संरचना के अश्लील रेखाचित्र किसी भी शालीन शख्स को गुस्से और घृणा से भर देते हैं। मनोवैज्ञानिक भले ही इसे बीमारी की संज्ञा दें, लेकिन हमारा समाज ऐसा नहीं मानता। वह इसी नजरिए से देखने का अभ्यस्त है, लेकिन वह मां क्या करे, जिसके बच्चे अभी-अभी पढ़ना सीखे हैं और हर शब्द को पहचानने की समझदारी दिखाने में कहीं चूकना नहीं चाहते? बसों के हवाले से मनजीत कहती है मैंने दिल्ली की बसों में यात्रा की थी कभी। यात्रा नहीं यातना थी। पुरुष भीड़ की आड़ में सट के खडे़ होते और अश्लील हरकतें करते। मैंने  जब एक थप्पड़ रसीद किया तो वह क्या है . . .क्या है  . . .कह कर मुझ पर हावी होने लगा लेकिन मौजूद लोगों ने मेरा साथ दिया।छेड़खानी का एक मामला पंजाब पुलिस के तत्कालीन डीजीपी के पी एस गिल से भी जुड़ा है। बीस साल पहले उन्होंने एक पार्टी में आईएएस रूपन देओल बजाज को स्पर्श कर अभद्र टिप्पणी की थी। सत्रह साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने गिल को दो लाख रुपए जुर्माना और पचास हजार रुपए मुकदमे की कीमत अदा करने के निर्देश दिए।
इन दिनों एक शब्द अक्सर अकसर इस्तेमाल किया जाता है `ऑनर किलिंग´। आरुषि-हेमराज मामले में नोएडा पुलिस ने भी किया। लड़की से कोई मामला जुड़ा नहीं कि माता-पिता उसे खानदान की इज्जत से तौलने लग जाते हैं। मानो सदियों की इज्जत एक लड़की के सर पर रखा मटका हो, जिसके फूटते ही सब-कुछ खत्म हो जाएगा। हम यह भूल जाते हैं कि सबसे पहले हम इनसान हैं, जहां गलती की गुंजाइश रहती है। कब तक हम लड़की के लड़की होने का दोष देते रहेंगे। यदि वाकई लड़कों को इस सोच के साथ पाला जाए कि लड़की खूबसूरत कोमल काया के अलावा कुछ और भी है तो यकीनन हम स्त्री को देखने की दृष्टि भी बदली हुई पाएंगे। रिश्तों की आड़ में सक्रिय दरिंदे लड़की के कमजोर व्यक्तित्व का लाभ उठाते हैं। तीर निशाने पर न भी लगे तब भी उनका कुछ नहीं बिगड़ता। वे जानते हैं कि अधिकांश बार दोष लड़की में ही देखते हैं। वे मुक्त हैं। जब तक लड़की होना ही अपराध की श्रेणी में आता रहेगा, तब तक अपराधी यूं ही बचते रहेंगे। समय के बदलाव ने काव्या को मुखर बनाया है। वह सजला जैसी दब्बू और अपराधबोध से ग्रस्त नहीं है। उसे गर्व है अपने स्त्रीत्व पर। ख़ुद पर गर्व किए बिना वह अपनी लड़ाई कभी नहीं जीत पाएगी।