Wednesday, August 17, 2016

नकली विलाप बंद करो रक्षा सूत्र बांधो


कल रक्षाबंधन है। ऐसा लगता है जैसे हमारे पुरखों ने इस त्योहार के साथ ही बंधुत्व भाव की ऐसी नींव रख दी थी कि दुनिया में हर कहीं संतुलन-सा कायम रहे। रक्षा-सूत्र बांधकर आप हर उस जीवन की रक्षा कर सकते हैं जिसे अधिक तवज्जो या महत्व की जरूरत है। कभी-कभार विचार आता है कि तुलसी का जो मान हम करते हैं या केला, नारियल, पंचामृत जो हमारे प्रसाद का हिस्सा हैं, या जो सोमवार या गुरुवार को एक या दो दिन ईश्वर के नाम पर व्रत करने की जो परिपाटी है, ये सब हमारे शरीर और जीवन को बेहतर बनाने की ही कोशिश है। एक दिन के उपवास में हम इतना पानी  पी जाते हैं कि वह डी-टॉक्सिफिकेशन का काम कर देता है। व्रत में फलों का सेवन कहीं ऊर्जा को कम नहीं होने देता
और खनिज और विटामिन की कमी को पूरा कर देता है।
गाय भी इसी परंपरा के लिहाज से देश में पूजी जाती है। हमारे तो ईश्वर ही गौ-पालक हैं। कृ ष्ण की वंशी पर नंदन-वन की गाय इकट्ठी होकर जिस गौधुली-बेला को रचती है, वह इस चौपाए को नई आभा देता है । ऐसा क्यों है भला? क्योंकि गाय ने उस युग में मानव को जिंदा रहने का साहस दिया है जब उसके पास कुछ नहीं था। गाय का दूध मानव शिशु के  लिए तो उसके  कंडे ईंधन के लिए और उससे लिपे घर आज के पक्के फर्श का विकल्प थे। गोबर से ही बनी खाद उस जमीन को फिर ऊपजाउ बना देती जो एक-दो फसल के बाद किसी काम की नहीं रह जाती। जब जमीन और जिंदगी दोनों ही गाय पर इस कदर आश्रित हो तो फिर घर का पहला निवाला, पहला तिलक किसके लिए होगा?
आज वही गाय सड़कों पर प्लास्टिक की थैलियां खाने  को मजबूर है, तिलक और चारा उसे दिन विशेष को ही नसीब होता है। गांवों में निर्धारित गौचर की भूमि हम चर गए, गौशालाओं में हमने उन्हें पलने के लिए नहीं मरने के लिए छोड़ा। इन सबके साथ हमने मगरमच्छ के आंसू बहाने और सीख लिए। सब इन नकली आंसुओं के साथ विलाप कर रहे हैं। गाय की यह दशा इन्सानियत के पतन का  पता देती है। उसके नाम पर देश को बांटने में हमें रत्ती भर शर्म नहीं आती। गाय से प्रेम करने वाला किसी इन्सान का कत्ल कैसे कर सकता है? यह शक क्यों कि किसी के ट्रक, किसी के फ्रिज किसी की टौकरी में वही है।  ...और जो इन शक करने वालों के खिलाफ कोई बयान आता है तो सब फिर उसी पर  हावी होने लगतें हैं।
दरअसल हमारी अपनी नफरत और भय ने  इन अकारणों पर जोर देने के लिए मजबूर किया है जबकि हदीस में ही लिखा है कि गाय के दूध में शफा है, मक्खन में दवा और गोश्त में बीमारी है। हजरत मोहम्मद के हवाले से भी यही बात कही गई है कि ऊपरवाले ने हर बीमारी की दवा नाजिल फरमाई है बस गाय का दूध पीया करो क्योंकि ये हर किस्म के दरख्तों से चरती है। 
जाहिर है गाय के गुणों ने इसे वंदनीय बनाया है और हमारे अवगुण इस बेबस प्राणी को  नहीं बचा पा रहे हैं। क्यों ना इस रक्षाबंधन पर गौरक्षा का वचन लें। हर भाई-बहन यह वचन ले कि पॉलीथीन का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करेंगे। उन्हें सड़कों पर खुला नहीं छोड़ेंगे। हिंगोनिया गौशाला के पशु चिकित्सक बताते हैं कि कई गाय ऐसी आती हैं जिनका पूरा पेट इन थैलियों से भरा रहता है और फिर इन्हें बचा पाना नामुमकिन होता है। लोगों से मार-पीट कर नहीं प्लास्टिक थैलियों को ना कह कर गाय की हिफाजत की जा सकती है। बछ बारस एक दिन नहीं बारह महीने मनानी होगी

Friday, August 5, 2016

go girls go medals are waiting for u


 दुनिया का सबसे बड़ा खेल उत्सव कल  तड़के  सुबह ब्राजील की राजधानी रियो डी जेनेरियो में शुरू होने जा रहा है  । यह सचमुच अच्छा वक्त है क्योंकि पुराने वक्त में तो दमखम दिखाने का एकाधिकार केवल पुरुषों के पास था। शरीर को साधने का कोई मौका स्त्री के पास नहीं था। खुद को सजाने और खूबसूरत दिखने का प्रशिक्षण तो जाने -अनजाने हर लड़की  को उसकी पुरानी पीढ़ी दे देती थी लेकिन शरीर से पसीना बहाना, इस तपस्या में खुद को ढालना और फिर खरा सोना बन जाने का हुनर केवल इक्कीसवीं सदी की स्त्री में दिखता है। उजले चेहरे और तपी हुई त्वचा को देखने की आदत हमारी पीढ़ी को 1982 के दिल्ली, एशियाड से मिली। संयोग से उन्हीं दिनों शहरों को टीवी का तोहफा भी मिला था और एशियाई खेल इस पर सीधे प्रसारित हुए थे। उडऩपरी पी टी उषा का सौ मीटर और दो सौ मीटर में चांदी का पदक जीतना। वो चांद राम का पैदल दौड़ में पहले आना । ये मंजर देख हम बच्चों की आंखें सपनों से भर जाती। भारत-पाकिस्तान के हॉकी फाइनल मैच को देखने घर के बरामदे तक  में तिल धरने की जगह ना थी। यह जोश जुनून खेल देता है।     
2012 के लंदन ओलंपिक्स में जब मेरी कोम और साइना नेहवाल ने कांस्य पदक जीते तो वह देश के लिए कभी ना भूलने वाला पल बन गया। अभिनव बिंद्रा ने जब बीजिंग में सोने पर निशाना लगाया तो रोम-रोम रोमांचित हुआ था। भारत के ऊपर उठते ध्वज के साथ जब जन गण मन बजा तो लगा जैसे यही तो वे क्षण हैं जो राष्ट्र को गौरवान्वित करते हैं। राष्ट्र की अवधारणा ही ऐसे मंचों पर सार्थक होती है। खून-खराबों और एक राष्ट्र का दूसरे पर वर्चस्व किसी राष्ट्र के होने का पता नहीं देते लेकिन ओलंपिक खेल देते हैं। हमारी पहले की पीढ़ी ने ध्यानचंद की हॉकी का जादू देखा है तो मिल्खा सिंह और पीटी उषा जैसे एथलीटों को सेकेंड के सौवें हिस्से से पदक चूकते भी। अस्सी पार धावक मिल्खा सिंह का तो एकमात्र सपना ही देश को एथलेटिक्स में मैडल लेते देखना है। 
सच है कि आबादी के हिसाब से इन खेलों में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। सवा अरब से ज्यादा की आबादी एक स्वर्ण पदक के लिए तरसती है। बीच-बीच में सुशील कुमार और नरसिंह यादव जैसे विवाद सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हमारे देश में खेल नीति नाम की कोई सोच है या नहीं। इतने बड़े खेलों में जाने से पहले हम कोर्ट कचहरी में उलझते हैं कि कौन जाएगा और कौन नहीं। यह शर्मनाक है कि ब्रॉन्ज जीतने वाले योगेश्वर दत्त ये कहें कि मैं साई (स्पोर्टस अथॉरिटी ऑव इंडिया) की मैस में खाना नहीं खाता क्योंकि वहां उसमें कुछ मिला दिए जाने की आशंका होती है। देशवासी केवल भौचक्के होकर इन बातों को पढ़ते-सुनते रहते हैं। उन्हें कुछ समझ नहीं आता कि कौन सही है और कौन गलत। आखिर इस तरह के हालात के लिए कोई तो जिम्मेदार होगा। क्यों उन्हें चिन्हित नहीं किया जाता? भाग लेने से पहले इतना तनाव क्या खिलाड़ी की एकाग्रता को तबाह नहीं करेगा?
       वैसे 2016 के हमारे दल पर नजर डालें तो हमने पाया ही है। महिला खिलाडिय़ों की संख्या आधी-आधी न सही लेकिन आधी से थोड़ी ही कम है। ऐसा कहीं नहीं है ना प्रशासनिक सेवाओं में ना संसद में लेकिन यहां है। मेहनतकश महिला खिलाडिय़ों ने अपने दम पर यह मुकाम हासिल किया है। तीरंदाज दीपिका एक ऑटो रिक्शॉ चालक की बेटी हैं  और दूती चंद को तो स्त्री मानने से ही इंकार कर दिया गया था। जिमनास्ट दीपा करमाकर के तो पैर ही सपाट बता दिए गए थे फिर भी वे भारतीय दल में हैं। अपनी योग्यता के दम पर। यहां तक पहुंचना वाकई बड़ी बात है। लंदन ओलंपिक्स में हम 23 थे, रियो के लिए 54 का दल जा रहा है। बिना किसी आरक्षण के  यह अपने बूते पर हासिल की गई उपलब्धि है। साइना नेहवाल , मेरी कोम ने तो पदक भी दिलाए हैं। हम जीत रहे हैं और जीतेंगे यदि स्कूल और स्टेडियम में माहौल सकारात्मक हो। हर लड़की को कोई ना कोई खेल जरूर खेलना चाहिए। खिलाड़ी खुद में अतिरिक्त ऊर्जा का अनुभव करती है। वह नकारात्मक में भी सकारात्मक सोच का परचम लहराती है। खेल भावना उसे जीवन में भी कभी हारने नहीं देती। वे जीत रही हैं और जीतेंगी बशर्ते मम्मी-पापा उनके बचपन से ही खेलों को मेकअप की तरह प्रवेश करा दें। कॉस्मेटिक्स की परत रोमछिद्रों को बंद करती है, खेलों में बहाया पसीना इन रोम छिद्रों को खोलता है। चयन आपका है कि आप किसे तरजीह देती हैं। 


Tuesday, August 2, 2016

मंच पर ये रंग दृष्टिहीन बच्चों ने खिलाए थे

बीते रविवार की शाम जो देखा वह ना देख पानेवालों का ऐसा प्रयास था जो आने वाले कई-कई रविवारों में रवि (सूर्य) जैसी ऊर्जा भरता रहेगा। यह एक नाटक था और मंच पर मौजूद बच्चे दृष्टिहीन थे। मंच पर ऐसे रंग खिले  कि लगा हम आंखवालों ने कभी मन की आंखें तो खोली ही नहीं बस केवल स्थूल आंखों से सबकुछ देखते रहे हैं। इनके पास तो अनंत की आंखें हैं और वो सब महसूस कर लेती हैं आंख वाले नहीं कर पाते। ये अनंत की आंखें रंग आकार से परे इतना गहरे झांक लेती हैं कि वे बेहतर मालूम होती हैं। शायद लेखक-निर्देशक भारत रत्न भार्गव  उनकी इसी शक्ति से दर्शक को रू-ब-रू कराना चाहते थे।
एक ज्योतिहीन बच्चे का मन चित्रकारी करने का हो और वह कुछ चित्रित करना चाहे तो आप कैसे उसका परिचय आकार, रंग और दुनिया में बिखरे सौंदर्य से कराएंगे। एक बालक की यही चाह है और इस चाह को पूरा करते हैं उसके गुरु जिन्हें वह हर दृष्य में चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करता है। वे उसका  आकार और रंग से तो परिचय कराते ही साथ ही यह भी बताते हैं कि चित्रकार स्थूल से परे देखता है। वे बताते हैं कि जिस पोदीने की खुशबू को तुम जानते हो उसकी पत्तियों का रंग हरा है, हल्दी की गंध है पीली सौंधी-सी माटी की रंगत है भूरी,  नील का रंग है नीला, जामुन है जामूनी रंगत का। इन तमाम रंगों को जानने के बाद बालक जो चित्र रचता है वह एक उल्टा पेड़ है जिसकी जड़ें अनंत में फली हैं और जो सूरज से ऊर्जा लेकर फल-पत्तों को रचती है और फिर जमीन को ही लौटा देती है। कमाल है एक बालक ने कैसे कुछ न देखकर भी जीवन चक्र को समझा दिया।
अचरज होता है कि कैसे ये बच्चे मंच पर एक बार भी ना टकराए, न घबराए और न ही गलत जगह तूलिका चलाई। इन्हें ध्वनि का पूरा आभास था। वे जरा फ्रे म से बाहर होते कि एक सुरीला संकेत उन्हें मिल जाता। संगीत इस पूरे नाट्य में कमाल का सेतु बंध बना। आवाज की मधुरता और गीतों के दार्शनिक बोल इस प्ले को नई ऊंचाई देते हैं। इस काम को डॉ. प्रेम भंडारी और गुरमिंदर सिंह पुरी अनंत तक ले जाते हैं। जानकर खुशी होती है कि जयपुर शहर में ऐसे इन्सान हैं जो अपनी जमीन अंधे बच्चों को उपलब्ध कराते हैं और वहां नाट्यकुलम जैसी संस्था का जन्म होता है।
बाल कलाकारों के बारे में बात करते हुए वरिष्ठ स्तंभकार जयप्रकाश चौकसे का कहना था कि अंग्रेजी के कवि जॉन मिल्टन की जब आंखें रही तब उन्होंने पेराडाइज लॉस्ट लिखा, लेकिन जब उनकी आंखों की रोशनी चली गई तब उन्होंने पेराडाइज रीगेन लिखा। यकीन करना मुश्किल है कि स्वर्ग तब खोया जब आंखें थीं और वापस तब मिला जब आंखें जा चुकी थीं। शायद यही वे अनंत की आंखें हैं जिनके नाम पर लेखक ने नाटक का नाम लिखा है। चौकसे ने बच्चों की मेहनत को झुक कर प्रणाम किया।
एक बात जो थोड़ी खलती है वह बच्चों की ओर से नहीं बल्कि बड़ों की और से है।  बड़ों की समस्याएं जैसे भ्रष्टाचार और आतंकवाद को बच्चों से बुलवाने की कोशिश में नाटक की स्वाभाविक बालसुलभता में थोड़ी कमी आती है। खलती एक और बात है कि जो शहर में यो यो हनी सिंह आते हैं तो टिकटों की मारा-मारी होती है और इतने खूबसूरत नाटक में टिकट खिड़कियां सूनी-सूनी रहती हैं

। अखबार छापते हैं, माता-पिता पढ़ते हैं, लेकिन उनके पास अपने बच्चों को रंगमंच तक लाने का समय नहीं होता। सुल्तान और हनी सिंह के बीच नाटक भी हमारे देखने-सुनने की फेहरिस्त में शामिल होने चाहिए। अगर हम इंतजार करेंगे कि कोई हीरो इसकी तारीफ करे फिर हम इसे देखेंगे तो यह  बच्चों के प्रति हमारी क्रूरता ही होगी।