Thursday, February 16, 2012

porn, horn please !!!




अश्लीलता को शब्द  देने वाले
भारतीय कानून के मूल में एक ही
भाव है कि किसी महिला की
गरिमा को ठेस न पहुंचे। यह भाव
सर्वोपरि है कि किसी परिवार के
सामाजिक रुतबे और साख पर
कोई आंच नहीं आए।
हमारे यहां ऐसा है और यूं ये
परिकल्पना पूरी दुनिया के देशों में
वहां की सांस्कृतिक अवधारणा के
हिसाब से बदलती रहती है। ऐसे
में सवाल यह उठता है कि जब
स्त्री की अपनी ही भूमिका परिवार
और समाज में बहुत बदली है वहां
 1860 के अंग्रजों के जमाने के ये
कानून किस तरह साथ देते हैं।
दूसरा सवाल यह उठता है कि जब
सब कुछ एक क्लिक  की दूरी पर
हो, शहर के थिएटर में 'जंगली
जवानी' 
जैसी कोई फिल्म चल
रही हो, प्ले बॉय जैसी पत्रिकाओं
में स्त्री की उत्तेजक तस्वीरें हो,
पारिवारिक पत्रिकाओं में ही
सर्वे के नाम पर कई बातें हो, वहां
इस कानून की रक्षा किस कदर
की जा सकती है?
नर्स भंवरी देवी के एक
विधायक मंत्री 
महिपाल मदेरणा  के साथ संबंधों की
सीडी को कुछ टीवी चैनल्स ने
खूब दिखाया। अखबार के दफ्तरों
ने भी इसे देखा। जाहिर है
प्रकाशन और प्रसारण के निर्णय
से पहले इसे देखना जरूरी था।
कुछ मनचलों ने इसे अपने मित्रों
को भी फॉरवर्ड कर दिया।क्या यह अपराध नहीं था?
इस
पूरे प्रकरण में भंवरी देवी जो कि
एक स्त्री थीं , उनकी गरिमा तारतार
हो चुकी थी। कानूनन यह
सरासर उल्लंघन था। हमने अपने
ही नैतिक मानदंड बना लिए और
कहा कि जब उन्हें अपने चरित्र की
फिक्र नहीं तो हमें क्यों हो। हैरानी
तो तब हुई है जब कई ब्लोग्स ,
बहस और चर्चाओं ने भंवरी के
हश्र (अपहरण के बाद हत्या) को
इसलिए जायज करार दिया
 
क्योंकि वे अति महत्वाकांक्षी थीं
और सत्ता  के गलियारों में
मुंहजोरी करती थीं। क्या तब वह
कानून ताक पर नहीं था।


मरहूम मकबूल फिदा हुसैन
ने जब सरस्वती
 का चित्र

बनाया तो लोगों ने इसे धार्मिक
हमला बताया। उनके खिलाफ कई
अदालतों में मामले दर्ज हो गए।
हमने मां शारदा को इतना ही मान
दिया कि कोई उन्हें पेंट करे और
हम उत्तेजित हो जाएं। हमारी
आस्था ने यही देखा कि वह गैर
हिंदू हैं और उनकी नीयत देवीदेवताओं
 को निर्वस्त्र करने की ही
रही होगी। आस्था ने यह देखने
से इनकार कर दिया कि रामायण
की समूची सीरिज इस कलाकार
ने पेंट की है। इंदिरा गांधी को
दुर्गा के रूप में भी पेंट किया है।
उनकी फिल्म 'गजगामिनी' सौ
फीसदी भारतीय संस्कृति का ही
एहतराम है। भारतीय मिट्टी में जीने
वाले पेंटर की एक पेंटिंग
ने उन्हें अपने ही देश में
अपराधी बना दिया और उन्हें
एक पराए देश की मिट्टी
ओढ़कर सोना पड़ा।

हमारे कायदे कानून न
कलाकार को समझ पा रहे हैं, ना
स्त्री की अस्मिता का मजाक बन
पाने से रोक पा रहे हैं। विज्ञापन,
सिनेमा, रिअलिटी शोज,
मैगजीन्स, कहां पर स्त्री गरिमा के
साथ मौजदू है? पोर्नोग्राफी का
पुरजोर विरोध करने वाले देश का
एक टीवी चैनल पोर्न स्टार को
लाकर लोगों से वोट पड़वाता रहा।
दोहरे और अश्लील संवाद
बोलनेवाले सर्कस की टीआरपी
बरसों-बरस बढ़ती जा रही है।
शीला की जवानी और मुन्नी की
बदनामी इतनी लोकप्रिय होती है
कि अच्छे गीतकार को अपने
वजूद का एहसास होना ही बंद हो
जाता है। आइटम सॉन्ग जो
सम्मान हासिल करता जा रहा है
वह अभूतपूर्व है।
दरअसल, हम दोहरी
मानसिकता में जीने वाला समाज
हैं। देखने की मानसिकता चरम
पर न होती तो ये तमाम संचार
माध्यम स्त्री की मादक अदाकारी
से ना रंगे होते। उसकी सेंशुअस
छवि का बाजार बहुत बड़ा है
योंकि उसकी मांग बहुत है।
सीधे-सपाट चरित्र की कोई पूछ
नहीं है। कोई ट्रेड रेंकिंग नहीं।
श्लीलता की हर रोज मृत्यु हो
रही है। अश्लीलता उस पर
सामाजिक दल बल के साथ हावी
है। समाज बदल रहा है, नैतिकता
के मानदंड बदल रहे हैं। कानून
भी पुरानी हिरासत में कैद नहीं
रहना चाहिए। स्त्रियां भी तय कर
लें कि वह बाजार के मुताबिक
खुद को और अपनी देह को नहीं
ढालेंगी तब ही यह कायदा अपनी
धार बनाकर रख सकता है। नो
मोर डर्टी पिक्चर्स।

Tuesday, January 31, 2012

कुछ असर रसोई के मुताल्लिक




प्याज 
जाने क्या है 
 तुम और नमीं 
कदम-ताल मिला कर ही आते हो
और आज तो दस्तक भी शामिल हो गयी थी
अधकटे  प्याज के साथ खोल दिया दरवाज़ा
एक बार फिर मैंने
छिपा लिया था तुम्हें
और तुम्हारे लिए अपने जज़्बात .

***

 
मटर  
मैं मान के चलती थी
गर  मटर छीलने  में 
 
 तुम्हारी मदद ली
तो बन चुकी सब्जी
मटर, कटोरदान
से कम
तुम्हारे होठों से ज्यादा
टकराते थे ,

अब कटोरदान मटर से लबरेज़ है
तुम नहीं आओगे मेरी मदद को ?


***
 
मैथी
वही मैथी 
पकने पर खुशबू भी वही
फिर उसके सब्ज़ में
ये कौन से रंग
 घुल आये हैं 
एक तो जाना-पहचाना
तुम्हारी पसंद का है
दूसरा मेरी वीरानी का है
शायद
रिश्ता बन रहा है उससे भी
लेकिन अब मैथी
नहीं
बनती उस घर में कभी ||


***

Wednesday, January 4, 2012

समंदर के निशां

impression of coconut tree
the only resort at shrivardhan beach


sand crab art at shrivardhan
मैं हैरान थी. मैंने समंदर के कई किनारे देखे थे लेकिन ऊंचे हरे नारियल के पेड़ों का ऐसा शानदार स्नेप कभी रेत पर नहीं देखा था.  कुदरत ने मानों अपनी ही तस्वीर खींच कर रेत पर उतार दी  थी. चित्रकार का नाम नहीं जानना  चाहेंगे आप ? ये मास्टर  केकड़ा थे जो क्षणों में उस नन्हें छेद में घुस जाते थे जो  कभी हमें किसी फूल का केंन्द्र लगता तो कभी वह  बिंदु जहाँ से नारियल का झुण्ड निकलता है .

नया साल आप सबको बहुत-बहुत मुबारक हो। ग्यारह के आधार पर खड़ा बारह आपके लिए खूब सारी खुशियां लेकर आए। ग्यारह और बारह के मिलन पर जो कुछ भी मानस पर दर्ज हुआ वही साझा करने का मन है। मुंबई के बोरिवली स्टेशन के बाहर लगा बाजार। इस स्ट्रीट मार्केट का स्ट्रीट फूड बहुत ही जायकेदार होता है। दाबेली, पाव के भीतर चटनियां और उबली मूंगफली की फिलिंग यानी भरावन वाली यह डिश बहुत ही मजेदार होती है। वड़ा पाव और पानीपूरी तो खाने से पहले ही मुंह में पानी भर देते हैं। मसाला डोसा में जब
चुकंदर,गाजर और पत्ता गोभी के लच्छे पड़ते हैं तो वह स्वाद के साथ पौष्टिक
भी हो जाता है। खैर, छोटी-सी दुकान पर बड़े ही आदर से डोसा परोसा
गया। अभी बच्चे ने एक कौर ही लिया था कि थाली सरक कर जमीन चाटने
लगी। माता-पिता ने हल्की-सी फटकार बच्चे को लगाते हुए दूसरा डोसा ऑर्डर कर दिया। ज्यों ही इस दूसरे डोसे के भुगतान के लिए हाथ बढ़ाया दुकानदार ने पैसे लेने से इंकार कर दिया। 'नहीं साहब हम गिरे हुए
डोसे के पैसे नहीं लेते।' आप आराम से बच्चे को खाने दीजिए।आपका तो
नुकसान हुआ है आप पैसे लीजिए। 'नहीं-नहीं मैं किसी से भी पैसे नहीं
लेता,'  उसने बड़ी विनयशीलता से हाथ जोड़ दिए। माता-पिता नाकाम रहे और डोसे वाला कामयाब। हैरानी हुई कि पैसे की बीन पर नाच रहे इस दौर में कोई उसूलों का झंडा लिए भी चलता है। ना मतलब ना। आगे चले ही थे कि एक स्ट्रीट शॉप पर चश्मे का लेंस गिर गया। चश्मा उतारकर भीतर रखा ही था कि...'अरे भाई बैठा है न आपका अभी ढूंढ देता हूं । दुकान को उलटपलट कर लैंस ढूंढ दिया गया। 'लाओ मैं इसे लगा कर देता हूं।' जाने यह मुंबई की हल्की सर्दी का असर था या भारत की आर्थिक राजधानी में विकसित होता हुआ सद्भाव, भीतर तक अभिभूत कर गया। 

मुंबई की माचिसनुमा इमारतों कोचीरते हुए नवी मुंबई के भव्य और खूबसूरत स्टेशनों को परास्त करतेहुए समंदर का एक किनारा हमारा लक्ष्य था। गोआ रोड पर रायगढ़ जिले के श्रीवर्धन कस्बे का बीच। पहाड़ों के घुमावों को नापतेहुए एक बार तो यूं लगा कि कोई झील सामने आएगी, लेकिन वह था रेत को चूमता समंदर । शांत समंदर में जब सूर्य पतली रेखा में तब्दील होकर विदा होता है तो लगता है कि कुदरत कितनी खूबसूरत है और इनसान कितना खुशनसीब, जो इस नजारे को निहार सकता है। सांझ, रात, सुबह यह समंदर नयी ही कथा सुनाता है. नए नज़ारे गढ़ता हैये केकड़े महाशय इसी किनारे के हमसफ़र थे शाम जब समंदर की  लहरें किनारों का साथ छोड़ने लगती  तब  ये ही इसका साथ देते , दूर-दूर तक यही नज़ारा. अद्वितीय, अनुपम, सुन्दर
बहरहाल, मुंबई से १८० किलोमीटर दूर  श्रीवर्धन एक छोटा-सा कस्बा है।  किनारे के बेहद करीब इस  बस्ती की ताकत ही समंदर है । उभरता हुए पर्यटन स्थल है। वहां के बाशिंदों ने अपने घरों को ही मुसाफिरखानों में तब्दील  कर दिया है। स्त्रियां नौ गज़ की धोतीनुमा साड़ी पहनती हैं और बालों में वैणी यानी गजरा लगाती हैं। इन दिनों शेवंती यानी गुलदाऊदी  की  और आम दिनों में मोगरे की .
अपने घर के  छोटे से  हिस्से के दो कमरों को सैलानियों को देनेवाली आजी (दादी) ने उसका नाम हेल्प सेंटर रखा है।  आजी  बताती हैं , अब तो साल भर टूरिस्ट आते हैं। आजी हिंदी में एक शब्द  भी नहीं बोल सकती। मराठी और कोंकणी में ही बात करती हैं। सुबह पांच बजे से उनका दिन शुरू हो जाता है। दोनों कमरों की सफाई वे ही करती हैं। नहाने के लिए पानी चूल्हे पर गरम कर देती हैं। बेटा चाय बना देता है। बाजू में स्कूल है। ढाई सौ बच्चों का खाना अकेले आजी ही बनाती हैं। बहत्तर  बरस की उम्र में इतना काम करने वाली आजी को जब आप कुछ अतिरिक्त  पैसे देना चाहते हैं तो वे इंकार कर देती है। आजी के घर का पिछला हिस्सा नारियल के पेड़ों से भरा है तो अगले हिस्से में सड़क के पार सुपारी संशोधन केंद्र है। दिसंबर के अंत में सभी ऊंचे पेड़ हरी सुपारी से लदे हैं। आजी के घर से समंदर पांच मिनट के पैदल फासले पर है। वेज नॉनवेज में फर्क करने वालों को वहां खाना मुश्किल हो सकता है क्योंकि , दोनों एक साथ पकते हैं। मछली झींगे तो लगभग हर जगह। नाश्ते के लिए घरों के बाहर ही छोटे-छोटे बोर्ड लगे हैं। पोहा, साबूदाना, उपमा और फिश के। समंदर के बेहद करीब श्रीवर्धन अभी व्यवसायिक हथकंडों से दूर है। शायद आम भारतीय बहुत लालची है भी नहीं। वह संतोषी है।उसे किसी kbc में जाकर करोड़पति बनने का लालच भी नहीं एक खास समूह जरूर बदल गया है, जिसकी टोपी और धोती उतर गई है। महाराष्ट्र के नेता अब जींस, टी-शर्ट में नजर आने लगे हैं। कुरतापायजामा भी आउटडेटेड हो गया है।
श्रीवर्धन के पास जो भी है अपनी कुव्वत है। सरकारी प्रयास सिफर हैं। बीच पर एक रिसोर्ट भी निजी प्रयास का ही नतीजा है, जो आने वाले सैलानियों को खुश रखते हुए इस समंदर की खासियत में डुबो देना चाहता है। दो सालों के इस मिलन की अवधि में यही पाया कि भारत और भारतवासी बहुत
सुंदर हैं, भीतर से भी। सकारात्मक  ऊर्जा से भरपूर।