Friday, May 4, 2018

lights camera fraction

लाइट्स कैमरा फ्रैक्शन। ये  एक्शन, फ्रैक्शन यानी दो  फाड़ में उस वक़्त बदला जब कल गुरुवार को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह  में यह तय हुआ कि कुछ ख़ास  पुरस्कार राष्ट्रपति रामनाथ  कोविंद देंगे और  कुछ सूचना और प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी। सम्मान हासिल करने वालों को इस बात से एतराज़ था कि वे देश  के राष्ट्रपति से अवॉर्ड लेने आए  हैं  जो दलगत राजनीति से ऊपर और देश के प्रथम नागरिक हैं। हालत यह हुई कि सवा सौ  में से 50  सम्मानित अतिथि आये थे लेकिन समारोह में नहीं शामिल  हुए। जिन ख़ास 11 को राष्ट्रपति ने सम्मानित किया उनमें से एक ने भी  कहा कि मैं इनके साथ हूँ लेकिन अवार्ड इसलिए ले रहा हूँ क्योंकि यह राष्ट्रपति की अवमानना होती।
       
                  बहरहाल 65 सालों  की परंपरा को यह बड़ा सदमा है जब राष्ट्रिय सम्मान का यूं बहिष्कार हो। बेशक इन हालात से बचा जा सकता था क्योंकि अवार्ड लेने वालों को जो चिट्ठी  मिली थी उसमें उन्हें राष्ट्रपति ही सम्मानित  करनेवाले थे, फिर ऐनवक़्त पर यह निर्णय क्यों कर हुआ? इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक समर्थ महाजन अपने माता - पिता के साथ होशियारपुर पंजाब से बेस्ट ऑन  लोकेशन साउंड रिकार्डिस्ट का अवार्ड  लेने आये थे  लेकिन वे समोराह में नहीं गए और माता-पिता के साथ होटल की लॉबी में ही रहे।  समर्थ कहते हैं अगर यह पहले से पता होता तो हम अपना निर्णय भी पहले ही ले लेते। अब हर कोई अपने हिसाब से तय कर रहा है। हमने नहीं जाने का फैसला किया है ताकि भविष्य में फिर ऐसा ना  हो। वॉकिंग  विद द  विंड  के लिए बेस्ट फिल्म का अवार्ड लेने आये मोरछले का कहना था कि राष्ट्रपति  तटस्थ नागरिक होता है ,वह देश के प्रमुख हैं अगर हम उनसे सम्म्मानित होते हैं तो हमें लगता है कि देश हमारा सम्मान कर रहा है। मंत्री से सम्मान लेने में वह एहसास गायब है। 
विज्ञान भवन में आयोजित समारोह  में अनुपस्थित रहे सम्मानित फिल्म मेकर्स की नेम प्लेट्स को भी बाद में हटा दिया गया। 


रांची के वरिष्ठ फिल्म मेकर मेघनाथ की राय में हमारे सारे संस्थान एक-एक कर चपेट में आ रहे हैं  चाहे फिर वह शिक्षा हो या कानून। अब फिल्म विधा के साथ भी यही हो रहा है। क्यों केवल मुख्य धारा के सिनेमा को ही अलग सम्मान दिया जाए। हम वैकल्पिक सिनेमा से जुड़े हैं और देश उसे सम्मानित करता है, महत्व देता है हम करोड़ों के पीछे नहीं हैं। हमें यह पहले क्यों नहीं बताया गया कि राष्ट्रपति हमें सम्मानित नहीं करेंगे। ज़ाहिर है तमाम फ़िल्ममेकर्स को धक्का पहुंचा है और सवाल अहम् है कि दो फाड़ करने के क्या मायने हैं। विभाजन क्यों ? अगर परेड की आधी सलामी राष्ट्रपति लें और आधी कोई और तो  हम पर क्या बीतेगी ? पद्म पुरस्कार आधे राष्ट्रपति दें और आधे कोई और तब ? बेशक यह सही फैसला नहीं है वजह चाहे समय की कमी बताई गई हो लेकिन यह गले नहीं उतरती। इस समोराह की गरिमा को इस बार नुक़सान  ही पहुंचा है। 

Monday, April 23, 2018

स्वरा आप अमेज़न की तरह नहीं डरेंगी

स्वरा भास्कर जी आप कैसे भूल गईं अपनी इंडस्ट्री की रवायत को। यहाँ दिलो-दिमाग साथ रखने की छूट नहीं है। सज-धज कर आओ, काम ख़त्म करो। खूब धन मिलेगा। नए-नए एंडोर्समेंट मिलेंगे। आपको अमेज़न ने ब्रांड कैंपेनर  बनाया था। आपने ट्वीट किया। आप ट्रोल हुईं। कोई बड़ी बात नहीं, बड़ी बात यह है कि कंपनी ने भी उस ट्वीट से खुद को अलग कर लिया।डिलीट कर दिया।  आपका दिमाग़ आपका नुक़सान करा रहा हैस्वरा । बोल के लब सिले हैं तेरे ,बोल के ज़ुबां अब तक तेरी नहीं है। फैज़ साहब से मुआफ़ी के साथ कि अभी कुछ भी तेरा, तेरा नहीं है। आज़ादी ख़ामख़याली है।
अभी कुछ दिन पहले की बात है हैदराबाद में एक एंकर ने यह लिखकर ख़ुदकुशी कर ली थी कि उसका दिमाग उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। तेलुगु चैनल की एंकर राधिका रेड्डी  ने यह कदम उस रात नौ बजे का बुलेटिन ख़त्म करने के बाद उठाया। वह ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चे  की माँ भी थीं। my brain is my enemy यही लिखा था उन्होंने अपने ख़ुदकुशी नोट में। इससे पहले ज़रूर क्लीवेज के जवाब में दीपिका पादुकोण एक  ताकतवर अख़बार को अपने दिमाग से रूबरू करवा चुकी हैं। 

स्वरा भास्कर  को हम अच्छी एक्ट्रेस बतौर तो जानते ही हैं लेकिन समय -समय पर सामाजिक सरोकारों और मुद्दों पर मुखर होकर बात करने की पहल उन्हें अन्य बॉलीवुड कलाकारों से अलग करती  है और  शायद यही उनके काम को भी अलग धार  देती है। रांझणा ,तनु वेड्स मनु ,निल बटे सन्नाटा और अनारकली ऑफ़ आरा में उनके काम को कौन सराहे बिना रह सकता है। फिल्म्स के अलावा जब स्वरा संजय लीला भंसाली की फिल्म  पद्मावत के बारे में लिखती हैं कि उन्होंने फिल्म देखते हुए ख़ुद को एक वेजाइना में तब्दील होते हुए महसूस किया तो कई लोगों के कानों में यह व्याख्या पिघले सीसे -सी पड़ती है। और अब जब कठुआ में आठ साल की बच्ची के दुष्कर्म और हत्या के ख़िलाफ़ वे तख्ती लेकर खड़ी होती हैं तो भी कई लोगों को खटकती हैं। इसलिए जब वे अमेज़न के कैम्पेन को लेकर ट्वीट करती हैं तो कई लोग उन्हें तो ट्रोल  करते ही हैं ,अमेज़न को भी नहीं बख्शते। उस साइट से सामान नहीं मंगवाने और एप डिलीट करने की धमकी देते हैं। नतीजतन अमेज़न खुद को ट्वीट से अलग कर लेती है।  

ये कहाँ  तक ला दिए गए हैं हम? एक बच्ची के लिए न्याय की मांग को भी धर्म और ध्रुवीकरण के नज़रिये से देखेंगे ? अमेज़न का बहिष्कार और स्वरा  की आवाज़ दबाने की कोशिश किस तरफ धकेल रही है। अमेज़न डरा है क्योंकि वह ऑनलाइन दुकान है लेकिन स्वरा इंसान है वे नहीं डरेंगी।  उनकी ज़ुबां आज़ाद रहेगी। 

ps : और लोगों की तो फितरत ही यही है कि अगर आपने अपना रास्ता चुना है तो वे पहली फुर्सत में यही कहेंगे कि आप ग़लत रास्ते पर हो। 



























  

Monday, April 9, 2018

ब्लैकमेल को A सर्टिफ़िकेट मिलना था

कल हिंदी फ़िल्म ब्लैकमेल देखी। इरफ़ान ख़ान वह नाम है जिनके अभिनय प्रतिभा के लिए टिकट लेने के लिए बट , परन्तु, लेकिन, किन्तु कभी सर नहीं उठाते । फिर इरफ़ान निराश भी नहीं करते हैं । वे वह सब सहजता से फिल्म के लिए कर जाते हैं जिसे करने का साहस हिंदी फिल्मों की  स्टार ब्रिगेड में नहीं होता। दफ्तर के सहकर्मियों की मेज़ से लड़कियों की तस्वीरें चुराकर वॉशरूम ले जाने का साहस भला किस स्टार में हो सकता है। सहकर्मी जब यह कहे कि प्रभा वर्जिन  है, मैं दावे के साथ कह सकता हूँ क्योंकि उसके होंठ बहुत पतले हैं। .. और मैं लड़की को देखकर बता सकता हूँ कि उसका स्टेटस क्या है ,यह सुनने का साहस भी इरफ़ान के निभाए किरदार के पास ही हो सकता है।ऐसा लिखने की ज़रुरत केवल इसलिए महसूस हुई क्योंकि फिल्म को बच्चों के लिए भी जारी किया गया है। यह कोई पारिवारिक कॉमेडी ड्रामा नहीं है।  
      दरअसल फ़िल्म उस पति पत्नी की कहानी है जिनकी शादी में एकतरफ़ा प्रेम  है। लड़की शादी इसलिए करती है क्योंकि उसके प्रेमी रंजीत ने उसे धोखा  दिया है। वह प्रेमी जिससे शादी करता है वह अमीर है। उसकी  नज़र में पति की इज़्ज़त टॉमी यानी एक पालतू से ज़्यादा  नहीं वह जानती है कि रिश्ते  में  उसे फ़रेब मिल रहा है। ऐसे ही एक  फ़रेब को देव (इरफ़ान) देख लेते हैं और इस शख़्स को ब्लैकमेल करने लगते हैं।  रंजीत फिर इरफ़ान की बीवी को ही ब्लैकमेल करने लगता है। बात दफ्तर की उस लड़की प्रभा को भी  पता चलती है  और वह भी बदले में पैसे मांगती है। रंजीत  डिटेक्टिव की  सेवा लेता है फिर वह भी इरफ़ान को ब्लैकमेल करने लगता  है । एक दिन दुर्घटनावश इरफ़ान के सामने ही प्रभा की  मौत हो जाती है जो हत्या नज़र आती है। अब पुलिस भी इस खेल में है। रंजीत की बीवी भी उसे रंगे हाथों पकड़ लेती है। इस झगड़े में रंजीत अपनी बीवी का खून कर  देता है। 
उफ़ इतने सारे किरदार एक-एक कर जुड़ते जाते हैं लेकिन कसावट भरे संपादन से सभी कहानी में बंध जाते हैं। निर्देशक अभिनय देव ने एक मसाला  कॉमेडी परोसी है जो हमारे समाज का नंगा सच इस मायने में दिखाती है कि हर कोई एक-दूसरे को धोखा  दे रहा है। पैसा हर रिश्ते से ऊपर है। नैतिक मूल्य सूखे हुए गुलाब से किताबों में बंद हो  चुके हैं। अपना उल्लू साधने के अलावा किसी का कोई और मकसद शेष नहीं है। बेशक करारा व्यंग्य है यह हमारे समाज पर लेकिन संवाद का खुलापन इसके  एक एडल्ट फिल्म होने की मांग करता है। दिक्कत यही है कि हमारे यहाँ  सर्टिफिकेट्स भी स्थूल आँखों से दिए जाते हैं। बच्चों के लिए ब्लैकमेल नहीं है। 

अभिनय के मामले में सभी बेहतर हैं। कीर्ति कुलहरि ,अरुणोदय सिंह, दिव्या दत्ता और थ्री इडियट्स के चतुर यानी ओमी भी हैं। वे उस कंपनी के मैनेजर हैं जहाँ इरफ़ान काम करते हैं। कंपनी टॉयलेट पेपर बनाती है और बाज़ारवाद की मजबूरियों और मूर्खताओं की  मिसाल पेश करती है। जैसे एक संवाद में मैनेजर  कहता है हम कर्मचारियों को कोई वृद्धि नहीं देंगे क्योंकि इस बार कंपनी एक बड़े प्रोजेक्ट  को अंजाम  देने जा रही है। वॉशरूम में तस्वीर भले ही देव (इरफ़ान ख़ान ) ले जाते हैं लेकिन शक बेचारे ग़रीब वॉचमैन  पर ही इस मैनेजर को होता है। बहरहाल संगीत अच्छा है। बैकड्रॉप में बजते गीत कहानी में सुर मिलाते हैं।  





ps : इरफ़ान ख़ान विलक्षण और  विरले कलाकार हैं  इन दिनों गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। वे जल्द सेहतयाब हों।