Saturday, November 26, 2016

पति को माता-पिता से अलग करना पत्नी की क्रूरता और पति के सम्बन्ध क्रूरता नहीं


लगभग एक महीने पहले सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया था कि पति को माता-पिता से अलग करना पत्नी की क्रूरता है और  हाल ही एक निर्णय आया है कि पति का विवाहेत्तर संबंध हमेशा क्रूरता नहीं होता, लेकिन यह तलाक का आधार हो सकता है। क्या ये दोनों ही फैसले स्त्रियों के सन्दर्भ में जड़वत बने रहने की पैरवी नहीं है?

लगभग एक महीने पहले सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया था कि पति को उसके माता-पिता से अलग करना पत्नी की क्रूरता है। दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अपने फैसेले में जो कहा वह इस प्रकार है-सामान्य परिस्थितियों में उम्मीद की जाती है कि पत्नी शादी के बाद पति का घर-परिवार संभालेगी। कोई नहीं सोचता कि वह पति को अपने माता-पिता से अलग करने की कोशिश करेगी। यदि वह पति को उनसे दूर करने की कोशिश करती है तो जरूर इसकी कोई गंभीर वजह होनी चाहिए लेकिन इस मामले में ऐसी कोई खास वजह नहीं है कि पत्नी पति को उसके माता-पिता से अलग करे सिवाय इसके कि पत्नी  को खर्च की चिंता है। आमतौर पर कोई पति इस तरह की बातों को बर्दाश्त नहीं करेगा। जिस माता-पिता ने उसे पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया है उनके प्रति भी उसके कर्त्तव्य  हैं।
सामाजिक रीति-रिवाजों के हिसाब से यह फैसला ठीक मालूम होता है लेकिन नजीर के हिसाब से इसकी समीक्षा जरूरी है।एक पल के लिए यह खयाल भी आता है कि जब लड़के की तरह पढ़ी-लिखी लड़की अपने माता-पिता का घर छोड़ती है, वह किस किस्म  क्रूरता होती है। संतान तो दोनों ही अपने माता-पिता की ही होती हैं फिर क्यों लड़की का सबकुछ छोडऩा इतना सामान्य है। रवायत के नाम पर कितनी बड़ी क्रूरता हमारा समाज लड़कियों से कराता आया है और वे इसे खुशी-खुशी करती भी आई हैं। नरेंद्र बनाम के.मीना के इस मामले में ऐसा मालूम होता है जैसे घर के  बड़े-बुजुर्गों  ने कोई फरमान सुनाया हो।
एक और फैसला हाल ही का है जब पति महोदय इस आधार पर तलाक चाहते थे कि गर्भावस्था में संबंध से इन्कार करना पत्नी की कू्र रता है। दरअसल, एक अन्य मामले में पति ने पत्नी के  ना कहने को क्रूरता बताते हुए तलाक मांगा था और उसे तलाक मिल भी गया था। इनसे अलग दिल्ली हाईकोर्ट ने एक  फैसले में पति की तलाक संबंधी याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि यदि पत्नी सुबह देर से सोकर उठती है और बिस्तर पर चाय की फरमाइश करती है तो वह आलसी के दायरे में भले ही आती हो, लेकिन आलसी होना निर्दई या क्रूर होना नहीं है।
विवाहेत्तर संबंध के आधार पर एक व्यक्ति को उसकी पत्नी के प्रति क्रूरता का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला एक मामले में सुनाया और आरोपी पति को बरी कर दिया। एक व्यक्ति की पत्नी ने उसके कथित विवाहेत्तर संबंधों के कारण आत्महत्या कर ली थी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, विवाहेत्तर संबंध अवैध या अनैतिक तो हो सकता है लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता के लिए पति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। क्योंकि इसे आपराधिक मामला करार देने के लिए कुछ और परिस्थितियां भी जरूरी होती हैं।क्या हम आप सब ऐसे मामलों के गवाह नहीं हैं जब दूसरी महिला की मौजूदगी पत्नी को ऐसे अवसाद में ले जाती है जहाँ वह आत्महत्या भी कर गुज़रती है।  यह क्रूरता कैसे नहीं हो सकती?
 
जाहिर है हमारी मानसिकता ही कभी अदालत में तो कभी अदालत के बाहर सर टकराती रहती है। समाज परिवार यही मान के चलते हैं कि हर हाल में पति की आज्ञा का पालन करना पत्नी का फर्ज है। शादी के सात फेरों में या किसी भी अन्य  विवाह तौर तरीकों में दोनों की बराबर भूमिका पर जोर है लेकिन प्रचलित तौर-तरीके इस कदर हमारे दिलों में बसे हैं कि हम मानवीय बराबरी को ही भुला बैठते हैं। ऐसी सहमतियां जब उच्च सदनों से आती हैं तो आधी आबादी खुद को यू-टर्न लेता हुआ पाती है।
शैली बताती हैं कि मेरी सास मुझे हर बार गर्भावस्था में कम खाने को देती थीं। हम बड़ों की बातों पर यकीन भी करते हैं क्योंकि इन मामलों में उन्हीं का अनुभव काम आता है लेकिन मेरे तीन बार अबॉर्शन हुए क्योंकि मैं ऐनिमिक थी। दरअसल ऐसी अनेक छोटी-बड़ी अनबन परिवार के  बीच वैमनस्य को बढ़ाती हैं और तलाक ऐसी ही वजहों की तलाश में रहता है। वह तो फै सलों को चाहिए कि वे ऐसी परंपराएं न  स्थापित कर दें जो एकतरफा मालूम होती हों।
लीगल स्कॉलर फ्लाविया एग्नस अपने एक स्तंभ में लिखती हैं कि ऐसे फैसले इसलिए भी आते हैं क्योंकि हिंदू विवाह अधिनियम में कन्यादान की अवधारणा है, लड़की को पराया धन माना जाता है। यही बात न्याय व्यवस्था को भी परिचालित करती है। ऐसा फैसला ईसाई या पारसी शादियों में कभी नहीं दिया जा सकता कि बहू के अलग रहने की मांग को क्रूरता की संज्ञा दी जाए। लड़कियों को शादी के बाद परेशानी होने पर भी परिवार वापस ससुराल भेजने में ही भलाई समझते हैं।
यूं तो यह पति-पत्नी की ही सहमती होती है कि वे माता पिता के पास रहना चाहते हैं या नहीं। ऐसे में दबाव काम नहीं कर सकता। कई भारतीय परिवार  बरसों-बरस इस चक्रव्यूह में उलझे तो रहते हैं लेकिन कोई हल नहीं निकाल पाते।  पति-पत्नी के बीच यह तनाव किसी बरछी की तरह साथ चलता है। वे जब-तब इसे एक दूसरे को चुभाते रहते हैं।  शादी दो आत्माओं का संबंध है तलाक इसमें जाने कौन-कौन सी प्रेतात्माओं को शामिल करा
देता है।

Wednesday, November 23, 2016

धूप पर कोई टैेक्स नहीं लगा है

इमेज क्रेडिट -उपेंद्र शर्मा, अजमेर 

भूल जाइये तमाम रंज ओ गम
मजा लीजिए मौसम का
कि सर्दी की दस्तक पर कोई बंदिश नहीं है
धूप पर कोई टैेक्स नहीं लगा है
धरा ने नहीं उपजी है कोई काली फसल
रेत के धोरे भी बवंडर में नहीं बदले  हैं
पेड़ों ने छाया देने से इंकार नहीं किया है
परिंदों की परवाज में कोई कमी नहीं है
आसमान का चांद अब भी शीतल  है
दुनिया चलाने वाले ने निजाम नहीं बदला है
फिर हम क्यों कागज के पुर्जों में खुद को खाक कर रहे हैं

शुक्र मनाइये कि सब कुछ सलामत है
नदी की रवानी भी बरकरार है
कच्ची फुलवारी भी खिलने को बेकरार है
करारे नोटों का नहीं यह हरेपन का करार है
भूल जा तमाम रंज ओ गम
कि कुदरत अब भी तेरी है
ये बहार अब भी तेरी है
हुक्मरां कोई हो
हुकूमत केवल उसकी है
और बदलते रहना उसकी ताकत
भूल जाइये तमाम रंज ओ गम
मजा लीजिए मौसम का
किसी के काला कह देने से कुछ भी काला नहीं होता
 ... और सफ़ेद कह देने से भी नहीं ।

Wednesday, October 26, 2016

परम्पराओं की पगथलियों पर

दुनिया में शायद ही कोई देश हो जहाँ हज़ारों साल बाद भी जनमानस परम्पराओं की पगथलियों पर यूं चल रहा हो। जाने क्यों कुछ लोग  परम्पराओं को बिसरा देने का ढोल ही पीटा करते हैं  

इन दिनों हरेक जुनून में जीता हुआ दिखाई देता है। लगातार अथक प्रयास करता हुआ। जैसे उसने प्रयास नहीं किए तो उसके हिस्से की रोशनी और उत्साह  मद्धम पड़ जाएंगे। त्योहार ऐसी ही प्रेरणा के जनक हैं। वर्षा और शरद ऋतु के संधिकाल में मनाया जानेवाला दीपावली बेहिसाब खुशियों को समेटने वाला पर्व है। अपने ही बहाव में ले जाने की असीमित ताकत है इस त्योहार में। आप साचते रहिए कि इस बार साफ-सफाई को वैसा पिटारा नहीं खोलेंगे जैसा पिछली बार खोला था या फिर क्या जरूरत है नई शॉपिंग की, सबकुछ तो रखा है घर में, मिठाइयां भी कम ही बनाएंगे कौन खाता है इतना मीठा अब? आप एक के बाद एक संकल्प दोहराते जाइये दीपावली आते-आते सब ध्वस्त होते जाएंगे। यह त्योहार आपसे आपके सौ फीसदी प्रयास करवाकर ही विदा लेता है। कौनसा शिक्षक ऐसा है जो आपसे आपका 100 फीसदी ले पाता है। यह दीपावली है जो पूरा योगदान लेती है और बदले में आपको इतना ताजादम कर देती है कि आप पूरे साल प्रफुल्लित महसूस करते हैं।
भगवान राम का लंका से आगमन तो हर भारतवासी के दिलो-दिमाग पर अंकित है। यह विजयगाथा त्रेता-युग से इसी तरह गाई जा रही है। उनके आने से जो जन-मन उत्साहित होता है उसका असर आज हजारों साल बाद भी जस का तस  है। यह बताता है कि हम बहुत परंपरावादी तो हैं ही दिल के एक कौने में आदर्श के लिए भी जीते हैं। सीता केवल कथा  नहीं है। भारतीय स्त्रियों में उनकी मौजूदगी को आज भी महसूस किया जा सकता है। उस दौर में राम-सा आदर्श कि वे आजीवन एकनिष्ठ रहेंगे कितने महान मूल्यों की स्थापना है जबकि उनके पिता दशरथ की तीन पटरानियां थीं । उनके बाद द्वापर  के कृ ष्ण भी ऐसा कोई प्रण लेते नहीं दिखे। राम का प्रजा से प्रेम किसी राजा की तरह ना होकर ऐसा था जैसे एक व्यक्ति शाही खजाने का संरक्षक हो और उसे केवल इतना अधिकार है कि वह इस खजाने का इस्तेमाल केवल जनता के हित में करे। राम जब अयोध्या लौटे तो अमावस की काली रात, रोशन रात में बदल चुकी थी।
कुछ लोगों की यह पारंपरिक शिकायत है कि यह त्योहार भी अपने असली स्वरूप को खो चुका है। क्या खोया है हमने। मिट्टी के दीयों के बगैर दीवाली नहीं मनती है। पूजा में गन्ने हैं, रंगोली-मांडने हैं। पारंपरिक पकवान हैं, खील-पताशे हैं। धूप-दीप, अगरबत्ती, कपूर, दीया-बाती सब है फिर काहे की फिक्र है उन्हें। बस बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद और दान-पुण्य को बढ़ा दीजिए। रामा-श्यामा में कुछ जोश और भर दीजिए। त्योहार भी पूरेपन से भर जाएगा। याद नहीं आता कि दुनिया का कोई और त्योहार इतने सालों बाद भी इतने मूल रूप में मौजूद हो।
चीनी सामान के लिए तो यूं  भी आक्रोश अब फूट ही पड़ा है। सोच का यह पटाखा सबसे ज्यादा चमकदार और प्रकाशवाला हो, फुस्स ना हो यही सबसे अच्छा होगा। काश यह सोच पहले ही बदली होती तो हमारे घरेलू उद्योग यूं तबाह नहीं होते। स्वदेशी थोड़ा महंगा है लेकिन बेहतर है। आज की यह राष्ट्रवादी सोच छोटे-छोटे उद्योगों के लिए पहले पनपी होती तो इतना नुकसान नहीं होता।
शुभ-दीपावली।