Monday, December 11, 2017

हार


इस चुनाव में कोई जीते 
पद की गरिमा हारी है 
ज़ुबां से सादगी हारी है
शक से यकीन हारा है
शोर से शाइस्तगी हारी है
नासहों से इबादत हारी है
बहस से रिश्ते हारे हैं 
दग़ाबाज़ी से यकीन हारा है
नफ़रत से मोहब्बत हारी है
बेहयाई से तहज़ीब  हारी है

फिर भी मैंने नहीं टांगा है 
अपने भरोसे को खूंटी पर  
मैं अपने इस लिखे से हारना  
चाहती हूँ ....

वर्षा-शाहिद

नासहों - उपदेशकों

Monday, November 13, 2017

क़रीब-क़रीब सिंगल या ऑलमोस्ट मुकम्मल


क़रीब-क़रीब सिंगल पूरी तरह मुकम्मल मालूम फिल्म मालूम होती है। स्त्री-पुरुष के रिश्तों को इतने रोचक अंदाज़ में पिरोना कि देखनेवाला पूरे समय बस ठुमकती हुई हंसी हँसता रहे आसान नहीं है। इस गुदगुदाने के हुनर में इरफ़ान तो माहिर हैं ही पहली बार हिंदी फिल्म में नज़र आईं पार्वती भी कहीं उन्नीस नहीं  हैं। निर्देशक तनूजा चंद्रा हैं जिन्हें बरसों पहले से हम दुश्मन (फिल्म) के नाम से अपने ज़ेहन में बसाए हुए हैं पूरे 20 साल बाद फॉर्म में नज़र आई  हैं । इन बीस सालों में उनकी संघर्ष, सुर, ज़िन्दगी रॉक्स जैसी फ़िल्में आई लेकिन यह मनोरंजन की नई परिभाषा गढ़ती हैं। प्यारे से रिश्ते के अंकुर फूटने से पहले का मनोरंजन। इरफ़ान के अभिनय जितनी ही सरल सहज है क़रीब क़रीब सिंगल लेकिन जिस किरदार पर मेहनत हुई है वह जया का है। स्त्री होने के नाते तनूजा ने इस किरदार को बहुत ही बेहतरीन रंग दिया है। एक विधवा जो पति के नाम को पासवर्ड बनाकर अब भी उसी की यादों में जी रही है। योगी (इरफ़ान) यहीं तंज़ कसता है कि तुम लड़कियों का अजीब मामला है पति साथ रहे तो सरनेम वर्ना पासवर्ड।
शौक से कवि और पेशे से फक्कड़ योगी और पेशे से बीमा अधिकारी और स्वाभाव से गंभीर जया एक डेटिंग साइट पर मिलते हैं और जब दूसरी मुलाकात में ही कवि महोदय शेखी बघारते हैं कि उनकी तीन गर्लफ्रेंड्स रही हैं और आज तक वे सभी उनकी याद में आंसूं बहा रही हैं  तो जया को बिलकुल यकीन नहीं आता। योगी वहीँ उन्हें सच्चाई को परखने की चुनौती देता है। गर्लफ्रेंड्स से मुलाकातों का यह सफर ऋषिकेश ,जयपुर  और गैंगटोक होता हुआ बहुत ही दिलचस्प बन जाता है। और ये दो एक दूसरे से उलट किरदार कई मज़ेदार मंज़र पैदा करते हैं। योगी दुनिया और इसके लोगों से प्यार करनेवाला बंदा है और जया बंद ख़याल जिसे डेटिंग साइट पर जाने से भी घबराहट होती है।
क़रीब-क़रीब सिंगल को तनुजा चंद्रा की मां कामना चंद्रा ने लिखा है। वही कामना चंद्रा  जिन्होंने चांदनी , 1942 अ लव स्टोरी और प्रेम रोग लिखी है। गीत संगीत अच्छा है लेकिन जो मुझे याद रहा वह बड़े अच्छे लगते हैं जैसे मशहूर गीत का दोहराना जो योगी अपनी पहली गर्लफ्रेंड के घर पर उसके पति और बच्चों की मौजूदगी में गाते हैं। अपनी पानी की बोतल भी योगी से ना शेयर करनेवाली जया क्या अंत में ऐसा कर पाती हैं या दोनों को अपने पुराने साथी और ज़िन्दगी में लौट जाने की प्रेरणा यह सफर दे जाता है,जानने के लिए फिल्म देखने का आईडिया बुरा नहीं है। ऑलमोस्ट मुकम्मल वाली फीलिंग भी आ सकती है। 


Friday, November 10, 2017

पद्मावती, जोधा-अकबर आखिर तकलीफ क्या है?

रानी पद्मावती और तोता हिरामन : तस्वीर गूगल से ही मिली 

स्त्री अस्मिता से जुड़ी विरासत हम सबकी साझी है किसी एक समुदाय की नहीं। पद्मावती  केवल एक फिल्म है कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं। विरोध का ऐसा शोर बरपा है कि जैसे संजय लीला भंसाली कोई फिल्म  नहीं ला रहे  बल्कि इतिहास बदलने जा रहे हों। फिल्म जोधा-अक़बर के साथ भी यही हुआ। फिल्म को राजस्थान में रिलीज़ ही नहीं होने नहीं दिया गया। आज घर- घर में टीवी पर ,इंटरनेट पर देखी जाती है। पहले देखो और फिर जो गलत नज़र आए उस पर गोवारिकर या भंसाली को दृश्यवार फटकार लगाओ।  ये विरोध कम  फिल्म को प्रचार देना ज़्यादा मालूम होता है। राजस्थान में पद्मावती को लेकर राजपूत और राजसी समुदाय तल्ख़ नज़र आ रहा है। तोड़-फोड़ की आशंका को देखते हुए यहाँ के वितरक भी फिल्म को  रिलीज़ नहीं करना चाह  रहे। शूटिंग के दौरान ही भंसाली करनी सेना के थप्पड़ खा चुके हैं। अहम् सवाल यही है कि हमें इन विषयों पर ही एतराज़ है या वाकई हमारा इतिहास से कोई लेना-देना है। 
फिल्म को अनावशयक तूल देने की इस कवायद में आइये जानते हैं  सूफी संत कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने क्या कुछ बयां किया है। उनसे  जो किसी ने कहा होता कि आप पद्मावत लिखने से पहले यहाँ-वहां पढ़ाइये तो क्या हम पद्मावत का सुदंर काव्य पढ़ पाते? इसी महाकाव्य में रानी पद्मावती के सौंदर्य और राजा रत्नसेन के प्रेम की दिव्यता का भी उल्लेख है। जायसी ने पद्मावत (1540  ) में इतिहास और कल्पना, लौकिक और अलौकिक का ऐसा सुंदर सम्मिश्रण किया है कि कोई दूसरी कथा इस ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकी है। जायसी के काव्य में रानी पद्मावती सिंहल देश यानी श्रीलंका की राजकुमारी है जिसकी तलाश में रावल रतन सिंह अपनी पत्नी नागमती को छोड़ चल देते हैं। उन्हें पद्मावती का बखान एक तोते हीरामन से सुना था। जायसी ने नागमती विरह को भी काव्य के जरिए जो उपमाएं दी हैं वैसा दुनिया के किसी साहित्य में आसानी से देखने को नहीं मिलता। विरह प्रेम का ही दूसरा नाम है। “कुहुकि कुहुकि जस कोइल रोई। रक्त आँसु घुंघुची बन बोई।।” नागमती की आँखों से आँसू नहीं, खून के बूँदें टपक रही हैं। नागमती दुख के उस पूरे साल का दर्द रचती हैं जब रतनसिंह पद्मावती को पाने के लिए श्रीलंका की यात्रा पर जाते हैं। 
जायसी के मुताबिक पद्मावती जब उनसे मिलने के लिये एक देवालय में आई, उन्हें देखकर वह बेहोश हो गए और पद्मावती उन्हे अचेत छोड़कर चली गर्इं। चेत में आने पर रतनसिंह बहुत दुखी हुए। जाते समय पद्मावती ने उसके हृदय पर चंदन से यह लिख दिया था कि उसे वह तब पा सकेंगे, जब वह सात आकाशों जैसे ऊंचे सिंहलगढ़ पर चढ़कर आएंगे। राजा को जब यह सूचना मिली तो उन्होंने रतनसिंह को फांसी देने का आदेश दिया लेकिन जब उन्हें रतनसिंह की हकीकत मालूम हुई तब पदमावती का विवाह उनके साथ कर दिया।
अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में रत्नसेन के विरोधि पंडित पद्मावती के सौंदर्य का बखान करते हैं और खिलजी उसे पाने के लिए लालायित हो जाता है। चित्तौड़ पर चढ़ाई के तमाम प्रयास विफल रहते हैं तब वह रतनसेन से संधि का धोखा रचता है। खिलजी उन्हें बंदी बना दिल्ली लौटता है। चित्तौड़ में पद्मावती अत्यंत दुखी होकर पति को मुक्त कराने के लिये अपने सामंतों गोरा और बादल के घर जाती हैं। वेे रतन सिंह को आजाद कराने का बीड़ा लेते हैं। सोलह सौ डोलियों में सैनिकों को रख वे दिल्ली की ओर चल पड़ते हैं। वहां पहुंचकर संदेश भेजते हैं कि पद्मावती दासियोंं के साथ सुल्तान की सेवा में आईं है और आखिरी बार अपने पति रतनसेन से मिलने की आज्ञा चाहती हैं। सुल्तान की आज्ञा के बाद डोलियों में बैठे सैनिक रतनसिंह को बेड़ियों  से मुक्त करा भाग निकलते हैं। पद्मावती के साहस से रतन सिंह सुरक्षित चित्तौड़ पहुंच जाते हैं। पद्मावती बताती हैं कि उनकी गैरमौजूदगी में कुंभलनेर के राजा देवपाल ने उन्हें प्रेम-प्रस्ताव भेजा था। राजा इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और लड़ाई में देवपाल को मार खुद भी जिंदा नहीं रह पाते। नागमती और पद्मावती जौहर कर लेती हैं। अगर जो यह कथा सच है तो तकलीफ जौहर से होती है। क्यों कोई प्रेम में यूं खुद को जलाए? विरह में जलने और यूं जलने में ज़मीन-आसमान का फर्क है। 
बरहाल एक फिल्म को फिल्म  जितनी ही इज़्ज़त बख़्शी जानी चाहिए । स्त्री अस्मिता और इतिहास इससे कहीं बड़े हैं। निजी तौर पर मुझे लगता है कि ऐतिहासिक नायक-नायिकाओं के नाम का सहारा लिया गया है तो उसका इतिहास से मेल खाना ज़रूरी है वर्ना कोई और नाम सोचिये और जो तकलीफ़ गंगा जमुनी धाराओं से है तो फिर इसका कोई इलाज नहीं है। फिल्म  तो झांसी की महान रानी लक्ष्मी बाई  पर भी बन रही है।