मंगलवार, 18 जनवरी 2022

इसका मतलब न जबरदस्ती टीका लगे न प्रमाण मांगा जाए



यह खबर किसी के लिए भी अचरज  भरी हो सकती है कि जबरदस्ती किसी को भी  वैक्सीन लगाई जाए और न ही हरेक के लिए वैक्सीन सर्टिफिकेट अनिवार्य किया जाए। वाकई यह बात एक नागरिक की आज़ादी का पूरा समर्थन करती हुई लगती है खासकर तब और भी ज्यादा जब सरकार यह जवाब सर्वोच्च न्यायालय को देती है। सच यही है कि एक याचिका की सुनवाई पर सरकार ने अपने जवाब में इसी नागरिक स्वतंत्रता पर मुहर लगाई  है। यह बात इस परिदृश्य में और भी जरूरी हो जाती  है जब टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच को ऑस्ट्रेलिया छोड़ना पड़ता है क्योंकि उनहोंने कोविड का टीका नहीं लगवाया है और दुनिया वैक्सीन पासपोर्ट पर फिर से बहस कर रही है 


भारत सरकर का यह रुख उस वक्त सामने आया जब वह एलुरु फाउंडेशन की  याचिका के संदर्भ में  दिव्यांगों से जुड़े उस सवाल का जवाब दे रही थी कि उनके सम्प्पूर्ण टीकाकरण के लिए सरकार की क्या तैयारी है। बेशक अनिवार्य टीकाकरण की सूरत में यह बहुत ही मुश्किल होगा कि हर दिव्यांग और बिस्तर पर रहनेवाले गंभीर रोगी तक भी टीका पहुंचे। इस बारे में सरकार का यह भी कहना था कि राज्य सरकारों को निर्देश दे दिए गए थे कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की टीम बनाकर उन तक भी पहुंचा जाए। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी कोई गाइडलाइन जारी नहीं की गई है कि व्यक्ति की मर्जी के खिलाफ उसे वैक्सीन लगाई जाए या फिर वह टीकाकरण का प्रमाणपत्र साथ लेकर चले। सरकार का सर्वोच्च न्यायालय को यह जवाब बहुत मायने रखता है और उस वक्त तो और भी जब पूरी दुनिया इस बारे में गहन विचार विमर्श में जुटी हो और दुविधा में  हो कि वैक्सीन पासपोर्ट जरूरी किया जाए या नहीं  ?

तो क्या इसके मायने ये हुए कि सरकार टीकाकरण को लेकर गंभीर नहीं है ? यह जो वैक्सीन टेरर जो कुछ राज्यों में जारी है वह निराधार है? मामले की सुनवाई में इसका भी जवाब मिलता है कि टीका बेहद जरूरी है और सरकार सभी सूचना माध्यमों से आम जनता तक यह बात पहुंचा चुकी है। निजी अनुभव यह कहता है कि पिछले महीनों में हुई तमाम यात्राओं और विवाह समारोहों में कहीं कोई अड़चन नहीं डाली गई और ना ही सर्टिफिकेट देखने को लेकर कोई सरकारी नुमाइंदा अड़ा। पिछले महीने  आणंद से सूरत जाते  हुए एक निजी बस की सवारियों को उतारकर उनकी कोरोना जांच की गई फिर  रिपोर्ट नेगेटिव आते ही बस को रवाना कर दिया गया। यह और बात है कि लम्बे जाम ने यात्रा को दुगुने समय में पूरा करवाया। ट्रेन में भी जयपुर से सूरत या कोलकाता जाते हुए  कोई वैक्सीन प्रमाण पत्र नहीं मांगा गया। कोलकाता में जरूर ठाकुर बाड़ी, रवीन्द्रनाथ टैगोर की  जन्मस्थली पर बने संग्रहालय में प्रवेश से पहले टीके के प्रमाण मांगे गए लेकिन  फिर भीतर भी जाने दिया गया। सिनेमाघरों में भी कोई दबाव नहीं देखा गया। फिर भी अगर किसी नागरिक के साथ ऐसा हुआ हो तो वह नियम के खिलाफ ही होगा। बहरहाल यदि  टेनिस की बड़ी प्रतियोगिता भारत में हो रही होती और नोवाक जोकोविच भारत में होते तो उन्हें टीका न लगवाने के कारण देश नहीं छोड़ना पड़ता। 


सर्बियाई टेनिस स्टार नोवाक जोकोविच ने यह कहकर टीका नहीं लगवाया कि दिसंबर में उन्हें  कोविड हो चुका है। विशेष वीजा छूट  के चलते वे ऑस्ट्रेलिया में उतर तो गए लेकिन मेलबोर्न पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। इस गिरफ्तारी को जोकोविच ने अदालत में चुनौती दी। अदालत ने उनके हक में फैसला देते हुए वीज़ा को वैध माना। इससे पहले कि जोकोविच एक और ग्रैंड स्लैम अपने नाम करते ऑस्ट्रेलिया के इमीग्रैशन मंत्री ने अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन्हें ऑस्ट्रेलिया से बाहर का रास्ता दिखा दिया। नियमानुसार वे तीन साल तक ऑस्ट्रेलिया नहीं आ सकेंगे। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री  ने  ज़रूर  कहा है कि सही परिस्थितियां होते ही वे ऑस्ट्रेलिया आ सकते हैं।  सर्बियाई  खिलाड़ी जोकोविच के देश सर्बिया में ऑस्ट्रेलिया के इस व्यवहार  के विरोध में गुस्सा है। सर्बिया के राष्ट्रपति ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया ने खुद को ही शर्मिंदा किया है। उन्होंने यह भी कहा कि  खिलाड़ी  का एयरपोर्ट पर भारी संख्या में जुटकर स्वागत किया जाए। स्पष्ट है कि ऑस्ट्रेलियाई अदालत ने  जोकोविच के हक में फैसला दिया था जिसे  ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने बदला। सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार का जवाब भी ऐसी किसी दुविधा से बचने का स्पष्ट इरादा है।  क्या  वैक्सीन पासपोर्ट में भी ऐसी ही छूट दी जाएगी । 

असल में वैक्सीन पासपोर्ट तभी किसी इंसान को एक देश से दूसरे देश की यात्रा करने देंगे जब उन्हें वैक्सीन लगी हुई हो। सवाल यह उठता है कि दुनिया या उसके संगठन ही अभी तय नहीं कर पाए हैं कि कितने बूस्टर डोज़ लगेंगे ऐसे में कोई नियम कैसे लागू किया जा सकता है ? यात्रा पर रोक नागरिक के अधिकारों का हनन ही होगा। ऐसे में बेहतर यही होगा की महामारी को देखते हुए अधिकाधिक टीके लगें लेकिन इसके अभाव में उनके मौलिक अधिकार न छीने जाएं। कम अज कम भारत सरकार ने तो सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने शपथ पत्र में यही कहा है कि न तो किसी को जबरन टीका लगाया जाए और ना ही इसका सर्टिफिकेट मांगा जाए। भारत टीकाकरण लक्ष्य के बहुत करीब होते हुए भी दबाव की रणनीति नहीं अपनाएगा तो वह अलग मिसाल होगी। ऐसे में राज्य सरकारों को भी यही करना चाहिए। होना तो यह भी चाहिए कि अब जब टीके की प्रक्रिया को शुरू हुए एक साल बीत चुका है इसके प्रभाव का डेटा भी जनता के सामने आए। 










 यह खबर किसी के लिए भी राहत भरी हो सकती है कि जबरदस्ती किसी को भी वैक्सीन न लगाई जाए और न ही  अनिवार्य किया जाए कि  हरेक के पास वैक्सीन सर्टिफिकेट हो।वाकई यह बात एक नागरिक की आज़ादी का पूरा समर्थन करती है हुई लगती है खासकर तब और भी जब सरकार यह जवाब सर्वोच्च न्यायालय को देती है। एक याचिका की सुनवाई पर सरकार ने अपने जवाब में इसी नागरिक स्वतंत्रता पर मुहर लगाई  है। यह बात इस परिदृश्य में और भी जरूरी हो जाती  है जब टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच को ऑस्ट्रेलिया छोड़ना पड़ता है क्योंकि उनहोंने कोविड का टीका नहीं लगवाया है। 


भारत सरकर का यह रुख उस वक्त सामने आया जब वह एलुरु फाउंडेशन की  याचिका के संदर्भ में  दिव्यांगों से जुड़े उस सवाल का जवाब दे रही थी कि उनके सम्प्पूर्ण टीकाकरण के लिए  सरकार की क्या तैयारी है। बेशक अनिवार्य टीकाकरण की सूरत में यह बहुत ही  मुश्किल होगा कि हर दिव्यांग और बिस्तर पर रहनेवाले गंभीर रोगी तक भी टीका पहुंचे। इस बारे में सरकार का यह भी कहना था कि राज्य सरकारों को निर्देश दे दिए गए थे कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की टीम बनाकर उन तक भी पहुंचा जाए। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी कोई गाइडलाइन जारी नहीं की गई है कि व्यक्ति की मर्जी के खिलाफ उसे वैक्सीन लगाई जाए या फिर वह टीकाकरण का प्रमाणपत्र साथ लेकर चले। सरकार का सर्वोच्च न्यायालय को यह जवाब बहुत मायने रखता है जब पूरी दुनिया इस बारे में गहन विचार विमर्श में जुटी हो और दुविधा में भी हो कि वैक्सीन पासपोर्ट जरूरी किया जाए या नहीं  ?

तो क्या इसके मायने ये हुए सरकार टीकाकरण को लेकर गंभीर नहीं है ? मामले की सुनवाई में इसका भी जवाब मिलता है कि टीका बेहद जरूरी है और सरकार इस दिशा में सभी सूचना माध्यमों से आम जनता तक यह बात पहुंचा चुकी है। निजी अनुभव यह कहता है कि पिछले महीनों में हुई तमाम यात्राओं और विवाह समारोहों में कहीं कोई अड़चन नहीं डाली गई और ना ही सर्टिफिकेट देखने को लेकर कोई सरकारी नुमाइंदा अड़ा। पिछले महीने  आणंद से सूरत जाते  हुए एक निजी बस की सवारियों की भी कोरोना जांच की गई। रिपोर्ट नेगेटिव आते ही बस को रवाना कर दिया गया। ट्रेन में भी जयपुर से सूरत या कोलकाता जाते हुए  कोई वैक्सीन प्रमाण पत्र नहीं मांगा गया। कोलकाता में जरूर ठाकुर बाड़ी, रवीन्द्रनाथ टैगोर की  जन्मस्थली पर बने संग्रहालय में प्रवेश से पहले टीके के प्रमाण मांगे गए लेकिन  फिर भीतर भी जाने दिया गया। सिनेमाघरों में भी कोई दबाव नहीं देखा गया। फिर भी अगर किसी नागरिक के साथ ऐसा हुआ हो तो वह नियम के खिलाफ ही होगा। बहरहाल यदि  टेनिस की बड़ी प्रतियोगिता भारत में हो रही होती और नोवाक जोकोविच भारत में होते तो उन्हें टीका न लगवाने के कारण देश नहीं छोड़ना पड़ता। 

सर्बियाई टेनिस स्टार नोवाक जोकोविच ने यह कहकर टीका नहीं लगवाया कि दिसंबर में उन्हें  कोविड हो चुका है। विशेष वीसा छूट  के चलते वे ऑस्ट्रेलिया में उतर तो गए लेकिन मेलबोर्न पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। इस गिरफ्तारी को जोकोविच ने अदालत में चुनौती दी। अदालत ने उनके हक में फैसला देते हुए वीज़ा को वैध माना। इससे पहले कि जोकोविच एक और ग्रैंड स्लैम अपने नाम करते ऑस्ट्रेलिया के इमीग्रैशन मंत्री ने अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन्हें ऑस्ट्रेलिया से बाहर का रास्ता दिखा दिया। नियमानुसार वे तीन साल तक ऑस्ट्रेलिया नहीं  सकेंगे। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री  ने  ज़रूर  कहा है कि सही परिस्थितियां होते ही वे ऑस्ट्रेलिया आ सकते हैं।  सर्बियाई  खिलाड़ी जोकोविच के देश सर्बिया में ऑस्ट्रेलिया के इस व्यवहार  के विरोध में गुस्सा है। सर्बिया के राष्ट्रपति ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया ने खुद को ही शर्मिंदा किया है। उन्होंने यह भी कहा कि  खिलाड़ी  का एयरपोर्ट पर भारी संख्या में जुटकर स्वागत किया जाए। स्पष्ट है कि ऑस्ट्रेलियाई अदालत ने  जोकोविच के हक में फैसला दिया था जिसे  ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने बदला। सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार का जवाब ऐसी किसी भी दुविधा से बचने का स्पष्ट इरादा है। शेष दुनिया अभी वैक्सीन पासपोर्ट में भी उलझी हुई है। 

असल में वैक्सीन पासपोर्ट तभी किसी इंसान को एक देश से दूसरे देश की यात्रा करने देंगे जब उन्हें वैक्सीन लगी हुई हो। सवाल यह उठता है कि दुनिया या उसके संगठन ही अभी तय नहीं कर पाए हैं कि कितने बूस्टर डोज़ लगेंगे ऐसे में कोई नियम कैसे लागू किया जा सकता है ? यात्रा पर रोक नागरिक के अधिकारों का हनन ही होगा। ऐसे में बेहतर यही होगा की महामारी को देखते हुए अधिकाधिक टीके लगें लेकिन इसके आभाव में उनके मौलिक अधिकार ना छीने जाएं। कम अज कम भारत सरकार ने तो सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने शपथ पत्र में यही कहा है कि न तो किसी को जबरन टीका लगाया जाए और ना ही इसका सर्टिफिकेट मांगा जाए। भारत टीकाकरण लक्ष्य के बहुत करीब होते हुए भी दबाव की रणनीति नहीं अपनाएगा तो वह अलग मिसाल होगी। ऐसे में राज्य सरकारों को भी यही करना चाहिए। होना तो यह भी चाहिए कि अब जब टीके की प्रक्रिया को शुरू हुए एक साल बीत चुका है इसके प्रभाव का डेटा भी जनता के सामने आना चाहिए। 









शनिवार, 1 जनवरी 2022

बाइस को इक्कीस से शांत और स्वस्थ क्यों नहीं होना चाहिए

इक्कीस से विदा ले हम बाईस में दाखिल हो चुके हैं। दिल बेशक उम्मीद से भरा होना चाहिए कि देश और दुनिया अब और सेहतमंद और शांत होंगे लेकिन  वाकई ऐसा है ? क्या इक्कीस ने हमारी सर पर मंडराती हुई इन बालाओं से हमें मुक्त किया है ? क्या ऐसे प्रयास हुए हैं जो इंसान पर आई इस आपदा से हमें आजाद करे। शायद नहीं क्योंकि कोरोना वायरस रूप बदलकर और मजहबीं ताकतें सर उठाकर नगाड़े कूटती हुई बाईस में भी घुसपैठ कर गईं हैं। कोरोना के डर को फैलाया जा रहा है और इन ताकतों पर शीर्ष  की चुप्पी चुपचाप इस नए साल में भी चली आई है। गौर करे तो हमारे गांव कोरोना से खौफजदा नहीं है। वहां शायद  है।बाईस को इक्कीस से शांत और स्वस्थ क्यों नहीं होना चाहिए रोज़ी रोटी के संघर्ष में कोरोना सर नहीं उठा पा रहा है। वहां तो अब तक मास्क भी मुंह का हिस्सा नहीं बने  हैं।  शहर के विशेषज्ञ चीखें जा रहे हैं कि डरो ओमिक्रोन आ गया है यह डेल्टा वेरिएंट जैसा खतरनाक नहीं लेकिन कुछ भी हो सकता है। जर्मन कवि  बर्तोल ब्रेख्त ने लिखा भी है 

मैं खूब जानता था 

कि शहर 

बनाए जा रहे हैं 

मैं नहीं गया 

उन्हें देखने 

इसका सांख्यिकी वालों से ताल्लुक है 

न की इतिहास से 

मैंने सोचा 

क्या होगा शहरों के बनाने से  

यदि उन्हें  बगैर 

लोगों की बुद्धिमानी के बनाया। 

अब ये शहर सच ही मैं एक सांख्यिकी में उलझ गए हैं। कोरोना का संख्याबल शहर में ही सर उठा रहा है। बर्तोल ब्रेख्त की कविता से उस लेख की शुरुआत भी हुई है जिसे वाशिंगटन पोस्ट ने प्रकाशित किया है। आलेख उस चुप्पी पर है जो इस समय भारत सरकार की ओर से बरती गई है। आलेख का शीर्षक है भारत में मुसलमानों के नरसंहार की आवाज तेज, मोदी का मौन इसे स्वीकृति देता हुआ। शुरूआत में बर्तोल ब्रेख्त की जिन पंक्तियों का उल्लेख है उनका आशय है जब पहली बार हमारे मित्र मारे गए तब स्याह डर सब तरफ फ़ैल गया फिर सौ और मारे गए और जब यह तादाद हजार हुई तब इस अंत का कोई अंत नहीं था  बल्कि चुप्पी का कंबल ताने सब पड़े रहे और उसके बाद   कोई इन शैतानी ताकतों को रोक नहीं पाता । दरअसल ब्रेख्त की यह कविता उस रहस्य से परदा उठा देती है कि फिर चीजों को बेकाबू मान लिया जाता है और जलते हुए मकान उस  गरीब के ही होते हैं जो न उकसाने वालों का जानता है और न किसी बचाने वालों  को। 

हरिद्वार और रायपुर में आयोजित धर्म संसद किस किस्म की धर्म संसद थी जिसमें कत्ले आम का आव्हान किया जा रहा है। साधु फ़कीर के भेष में ये किसे अपमानित कर रहे हैं? इन्हें कोई कैसे स्वामी ,बाबा या महाराज कह सकते हैं जबकि इन उपाधियों  के साथ भारत वर्ष की  महान  संतानों के नाम जुड़े हैं ? किस धर्म संसद में अध्यात्म की जगह मरने-मारने के लिए उकसाया जाता है। बात बात पर देशद्रोह और U A P A का सहारा लेने वाली सरकार यहां चुप है और जब गांधी को अपमानित करनेवाले कालीचरण को छत्तीसढ़ पुलिस गिरफ्तार करती है तो सरकार के मंत्री गिरिराजसिंह उल्टे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को ही कटघरे में खड़ा करते हैं। यहां राज की मंशा  भी जाहिर हो जाती है और सत्ता का संरक्षण किसे मिला हुआ है यह भी। 

धर्म संसद की अवधारणा में एक को दूसरे के खिलाफ भड़काने की शैली भला क्यों और कैसे जुड़ जाती है ? अक्सर यह  चुनाव के नजदीक होने को  ही पुष्ट करता है । अब तो सीमा पर नहीं घर में तनाव पैदा किया जाता है। द वाशिंगटन पोस्ट के आलेख पर लोटते हैं। लेख कहता है यह देश में हो क्या  रहा है जातीय संहार और महात्मा गांधी की हत्या करनेवालों का महिमामंडन राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हो जाता है। यह देश में हो क्या  रहा  कि भीड़ के पीट पीट  कर किसी मुसलमान को मार देने का बहुसंख्यक विरोध तक नहीं कर पाते और जहां पर सरकार मदर टेरेसा जो विश्व में मानव सेवा की मिसाल हैं उनकी  संस्था के अंतर्राष्ट्रीय दान पर रोक लगा देती है। यह देश में हो क्या  रहा है जहां एक टीवी चैनल का मालिक देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए लड़ो, मारो और मर जाओ की बात कहता है। यह देश में हो क्या  रहा जब क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली को हटा दिया जाता है क्योंकि वह अपने मुस्लिम साथी के साथ खड़े रहते हैं फिर  कट्टरवादी जिन्हें निशाना बनाते हैं। 

उत्तर साफ और  सीधा है कि सत्ता उस पक्ष  के बचाव में खड़ा  है जो अल्पसंख्यक पर वार करता है। राणा अयूब के इस लेख के बाद यकीनन देश की साख नहीं बढ़नेवाली क्योंकि सरकार की और से अब तक कोई सख्त आवाज़ नहीं आई है जो इन देशरोधी ताकतों के कान उमेठे । हां बस इतनी ही चेष्टा एक बड़ा कदम हो सकती है। कान धरने पर यही समझ आता है कि चुनावी दिनों में यह सब बहुत बढ़ जाता है और ऐसा सिर्फ इसलिए होता है कि उन्हें लगता है इससे चुनाव में फायदा होता है। क्या पार्टी विशेष की यह चुप्पी जनता को पसंद है क्या जनता इस तरह की भाषाशैली को वोट में तब्दील करती है। महात्मा गांधी का अपमान करते हुए रायपुर की धर्म संसद में कालीचरण महाराज कह जाते हैं कि कट्टर हिंदूवादी को चुनने के लिए भर भर के वोट करो। क्या वाकई जनता इस नफरती भाषा के आधार पर वोट देने का मन बनाती है? तब तो खामी हमारी ही हुई। एक दल को यह आभास क्योंकर हुआ कि अभद्र और  उकसानेवाली भाषा पर उसकी चुप्पी उसे वोट दिला सकती है। जवाब जनता को ही देना होगा क्योंकि लोकतंत्र में उसी की आवाज के मायने हैं, वही दलों की गलतफहमी भी दूर कर सकती है। दल विशेष को तात्कालिक लाभ ज़रूर हो भी सकता है लेकिन देश के लिए यह अच्छा समय नहीं है यह इसके महीन ताने बाने के साथ छेड़छाड़ है।बाईस को इक्कीस से शांत और स्वस्थ क्यों नहीं होना  चाहिए?




शनिवार, 25 दिसंबर 2021

है कोई 'आधार' मतदाता सूची को जोड़ने का

 पिछले चार माह से बेटे को  कह रही थी तुम अठारह के हो चुके हो अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लो लेकिन वह टाल रहा था। हाल ही जब नए मतदाताओं  को जोड़ने का संदेश फ़ोन पर आया तो मैंने उसे फिर याद दिलाया वह तपाक से बोला -"मां आधार है न अब क्या " जरूरत है वोटर आईडी की उसी से हो जाएगा मतदान।" मैं उसका चेहरा देखती रह गई कि ये दोनों अलग-अलग पहचान हैं कि एक से तुम्हारी नागरिकता, तुम्हारी उम्र, तुम्हारा अधिकार प्रमाणित होता है जो संवैधानिक इकाई प्रदान करती है  तो दूसरी ओर आधार सरकारी योजनाओं का अधिकाधिक लाभ आमजन तक कैसे पहुंचे उसके लिए दी गई पहचान है। बेशक यह उस दोहराव से बचाव करती है कि कोई एकाधिक बार इन योजनाओं का लाभ न ले ले लेकिन चुनाव में इसका इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट के उस टिप्पणी का भी उल्लंघन है जिसमें आधार को निजता का हनन मानते हुए अनिवार्य नहीं किया जाना था । उसका स्वाभाविक सवाल था कि फिर यहां इसकी ज़रुरत क्या है और जो ज़रुरत है तो फिर इसी से पूरा मतदान क्यों नहीं ?

बहरहाल बीते सोमवार को लोकसभा और मंगलवार को राज्यसभा में चुनाव कानून संशोधन विधेयक 2021 भारी शोरगुल और विरोध के बीच पास हो गया जिसके तहत अब मतदाता सूची को आधार डेटाबेस से लिंक कर दिया जाएगा। ऐसे ही शोरगुल के बीच कृषि कानून भी पारित कर दिया गया था जिसका हश्र हम सबने देखा। क्या यह कानून भी ऐसे विरोध का आधार बनेगा इसकी संभावना कम लगती है क्योंकि बिना किसी बारीकियों को साझा किये और बहस के यह संशोधन पारित हो गया है। यह सच है कि देश में चुनाव सुधार की ज़रुरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है, खासकर फर्जी मतदान की दिशा में । आगे पूरे देश में समान मतदाता  सूची के  सुधार का कार्यक्रम भी  प्रस्तावित है। अभी कुछ राज्य पंचायत और नगर निकाय चुनाव के लिए अलग और राष्ट्रिय और विधानसभा चुनावों के लिए अलग-अलग मतदाता सूची का उपयोग करते हैं। 

मैंने अपना पहला मतदान इंदौर में किया लेकिन पिछले कई बरसों से राजस्थान में हूं। अब मुझे नहीं मालूम कि उस नाम का क्या हुआ ?कोई उस पर वोट तो नहीं कर आता या कोई राजनीतिक दल अंतिम समय में इन बचे हुए नामों पर ठप्पा तो नहीं लगा देता ? यह शक बेबुनियाद नहीं है क्योंकि  हम सबने देखा है तमाम राजनीतिक दलों को खर्च की सीमा रेखा पार करते हुए ,मतदाताओं को प्रलोभन देते हुए ,समय सीमा समाप्त हो जाने के बावजूद अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह को लहराते हुए। ऐसे में क्या आधार कार्ड  डुप्लीकेट वोटिंग से बचा सकता है। जवाब होगा हां। मतदाता का डेटा जब आधार से जुड़ेगा तो वह नए रजिस्ट्रेशन के साथ ही  सभी पुराने रजिस्ट्रेशन को सामने ला कर सचेत कर देगा । ऐसे में सभी पुराने पते ठिकाने खारिज होकर एक नया रजिस्ट्रेशन किया जा  सकेगा लेकिन चूंकि  सरकार ने साफ तौर पर इसे अनिवार्य की बजाय इच्छा पर आधारित बताया है तो इस  सुधार की उम्मीद यहीं ख़त्म हो जाती है। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट आधार को निजता में दखल का आधार मानता है इसलिए इसकी अनिवार्यता में भी संदेह तो है ही। 

दूसरा आधार कोई नागरिकता प्रमाण पत्र नहीं बल्कि एक अंकवाली पहचान मात्र है जबकि मतदाता पहचान पत्र है।केवल 182  दिन का रहना किसी को भी आधार की पहचान दिला सकता है, मतदाता पहचान पत्र नहीं। समय समय पर सरकारी इकाइयों के बयान बताते हैं कि आधार को पता प्रमाणित करने वाला नहीं माना  जा सकता जबकि मतदाता पहचान पत्र मतदाता के पते की पुष्टि करता है। सच तो यह है कि आधार अन्य पहचान पत्रों के आधार पर दी गई पहचान है जबकि मतदाता चुनाव आयोग के अधिकारी के जरिये तस्दीक हुई आईडी है।मतदाता पहचान पत्र गरीब, पिछड़े और बेघर को भी दिया जा सकता है बशर्ते बीएलओ इसे प्रमाणित करता हो । आधार ऐसी कोई सहूलियत नहीं देता और न ही यह कहा जा सकता है कि आधार के  डेटा में सेंध नहीं लगी या यह पूरी तरह से डुप्लिकेटरोधी है। 

इस डिजिटल दौर में जहां डेटा सबकुछ है और इलेक्ट्रॉनिक मशीनों की थोड़ी-सी  छेड़छाड़ भी बड़े फेरबदल कर सकती हैं वहां सतर्क होना बहुत जरूरी है। मतदाता सूची का मामूली विश्लेषण भी नतीजे बदलने की ताकत रखता है खासकर तब जब नतीजे बूथ स्तर पर उपलब्ध हों। किसी क्षेत्र विशेष में अगर यह पता चल जाए कि  हार केवल एक फीसदी के मतान्तर से होने वाली है, वहां हल्का  हेरफेरभी बड़े परिवर्तन में बदल सकता है। क्यों नहीं कोई उस मतदाता को निशाना बनाएगा जो कमज़ोर है। यह लकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक कदम  हो सकता है। जाहिर है निजता और ईमानदारी मतदान प्रक्रिया  के लिए इस डिजिटल दौर में और भी जरूरी हो जाते हैं। खासकर तब जब हर सरकार जीतने के लिए परिसीमन से लेकर जातिगत पहचान को पहचान लेने के लिए आतुर हो , हर पैंतरें अपना रही हो। आरईआर 1960 यानी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम चुनाव में पारदर्शिता की वकालत करता है। इसमें मतदाता के नाम जोड़ने हटाने की पारदर्शिता पर भी जोर है जो 1922 में तकनीक की मदद से और बेहतर हो सकती है लेकिन एक दूसरे पक्ष की आवाज़ को सुने बिना उठाया गया कदम लोकतंत्र को मजबूत करनेवाला तो नहीं लगता। जोड़ना हटाना निर्वाचित सरकार का हक है लेकिन यहां सुनना भी जरूरी है क्योंकि कदम निर्वाचन के लिए  ही उठाया जा रहा है बल्कि उठा लिया गया है बस संशोधन पर राष्ट्रपति के मुहर लाने की देर है।