Wednesday, August 31, 2016

मिनी स्कर्ट से भी मिनी सोच

'विदेशी पर्यटकों को एयरपोर्ट पर एक वेलकम किट दी जाती है। इसमें एक कार्ड पर €या करें और €या न करें की जानकारी होती है। हमने बताया है कि छोटी जगहों पर रातवात में अकेले न निकलें, स्कर्ट न
पहनें।'
केंद्रीय पर्यटन मंत्री ने अपने इस बयान के साथ आगरा में विदेशी पर्यटकों की सहायता के लिए एक हेल्पलाइन नंबर भी 1363 भी जारी किया था लेकिन बात केवल स्कर्ट पर सिमट कर रह गई। रहना गलत भी नहीं €क्योंकि फर्ज कीजिए एक भारतीय सैलानी जो इटली के किसी ऐतिहासिक चर्च का दौरा कर रही हो और उसने साड़ी या शलवार (सलवार नहीं) कमीज पहन रखी हो और उन्हें कोई नसीहत दे कि, अपने कपड़े बदलो और स्कर्ट या कुछ और पहन कर आओ। क्या यह फरमान तकलीफ देने वाला नहीं होगा? आप कहेंगे ऐसा €क्यों किसी को कहना चाहिए? पूरे कपड़े पहनना तो शालीनता है। ऐसा नहीं है। यह हमारी सोच है। हमने यह मानक तय कर लिया है और इसे ही परम सत्य मान लिया है और तो और इसे ही अपनी संस्कृति तक करार दे दिया है। भारत जैसे विशाल देश की संस्कृति में €क्या  गोवा, सिक्किम  या मणिपुर शामिल नहीं है €क्या  वहां का पहनावा हमारा पहनावा नहीं है? €क्या हम यहां के सैलानियों से भी ऐसी ही अपेक्षा करेंगे। 
   भारत जैसा अद्वितीय देश इसलिए भी धरती पर अनूठा है क्योंकि पृथ्वी पर किसी देश में इतनी संस्कृतियों का मिलन नहीं। यह सांस्कृतिक समावेश और उदारता ही इसकी ताकत है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एक जर्मन लेखिका आई थीं कोर्नेलिया फूंके जो अपने देश की लोककथाओं पर बात कर रही थीं। जब उनसे भारत के बारे में सवाल किया गया तो बोलीं यह तो कई देशों का एक देश है और इसे किसी एक शैली में बांध पाना नामुमकिन है। जाहिर है भारत कभी किसी को यह आसानी नहीं देता। इसके पग-पग पर विलक्षणता है। हम इस विलक्षणता को किसी एक फरमान में बांधेंगे तो भूल करेंगे। अनेकता में एकता महज निबंध में पढ़ी जानेवाली पंक्ति नहीं है, इसके गहरे मायने हैं। वैसे भी पहनावा या पारंपरिक पहनावा उस क्षेत्र विशेष की जलवायु पर निर्भर करता है। अरब के लोग खुले-खुले और पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनते हैं ताकि लू के गर्म थपेड़े उन्हें अपनी चपेट में ना ले लें। यूरोपीय देशों को सर से पांव तक पूरी तरह कसकर ढकना होता है ताकि बर्फीली हवाएं उन्हें भेद ना सकें। शर्ट के मोटे कॉलर पर टाय हवाओं को चीरने नहीं देती। वे चर्च में भी जूते पहनकर दाखिल होते हैं। हममें से कुछ मजाक उड़ा सकते हैं कि अजीब लोग हैं जूते पहनकर ही पूजा घरों में दाखिल हो जाते हैं।
यह सोच बचपने से ज्यादा कुछ नहीं। एक बचपना हम भारतवासी जरूर करते हैं  पूरे साल अपने स्कूली बच्चों को जबरदस्ती टाय पहनाते हैं। गर्मी में कई बार यह टाय बच्चों के गले की आफत बनकर सामने आती है। किसी को सचमुच कुछ करना ही है तो इस टाय के फरमान से मुक्त करना चाहिए। हमारे दक्षिण भारत में किसान, मछुआरे सबके लिए लुंगी ही मौसम से राहत देने का काम करती है, वहां की उमस भरी हवाएं कसे हुए कपड़ों की बिल्कुल इजाजत नहीं देती। जब भी कोई टूरिस्ट अपने देश से सैर को निकलता है तो उसका
देश भी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के लिए उसे अलग-अलग जानकारियां देता है। मेजबान से पहले मेहमान भी तैयारी करता है। जब किसी सैलानी को उस देश के सरकारी पर्चों से यह पता चले कि आप अगर स्कर्ट या मिनी स्कर्ट पहनने से आपको खतरा है तो वह किस पर यकीन करके यहां बेफिक्र होकर घूमेगा? हम किसी भी देश में क्योंकर जाएंगे जहां कि सरकार सुरक्षा देने की बजाय बचके रहने के उपायों पर जोर दे रही हो? आपके देश में दुनिया का सातवा आश्चर्य ही क्यों  ना हो पर्यटक वहां जाने की हिम्मत नहीं करेगा। अतिथि देवो भव वाले हमारे संस्कार कब आतिथि को ही निर्देश देने लगे। €क्या  ऐसे अतुल्य भारत के दर्शन हम विदेशी मेहमानों को  कराना चाहते हैं कि जहां कपड़ों की लंबाई-चौड़ाई घटने भर से अपराध घट जाते हैं। बेहतर होता जो हमने ऐसे पर्चे और दिशा-निर्देश सैलानियों के लिए नहीं छेड़-छाड़ करने वालों के लिए जारी किए होते। स्कर्ट पर बोलकर तो इतने बड़े पद से मिनी स्कर्ट से भी मिनी सोच सामने आई  है। 

Wednesday, August 17, 2016

नकली विलाप बंद करो रक्षा सूत्र बांधो


कल रक्षाबंधन है। ऐसा लगता है जैसे हमारे पुरखों ने इस त्योहार के साथ ही बंधुत्व भाव की ऐसी नींव रख दी थी कि दुनिया में हर कहीं संतुलन-सा कायम रहे। रक्षा-सूत्र बांधकर आप हर उस जीवन की रक्षा कर सकते हैं जिसे अधिक तवज्जो या महत्व की जरूरत है। कभी-कभार विचार आता है कि तुलसी का जो मान हम करते हैं या केला, नारियल, पंचामृत जो हमारे प्रसाद का हिस्सा हैं, या जो सोमवार या गुरुवार को एक या दो दिन ईश्वर के नाम पर व्रत करने की जो परिपाटी है, ये सब हमारे शरीर और जीवन को बेहतर बनाने की ही कोशिश है। एक दिन के उपवास में हम इतना पानी  पी जाते हैं कि वह डी-टॉक्सिफिकेशन का काम कर देता है। व्रत में फलों का सेवन कहीं ऊर्जा को कम नहीं होने देता
और खनिज और विटामिन की कमी को पूरा कर देता है।
गाय भी इसी परंपरा के लिहाज से देश में पूजी जाती है। हमारे तो ईश्वर ही गौ-पालक हैं। कृ ष्ण की वंशी पर नंदन-वन की गाय इकट्ठी होकर जिस गौधुली-बेला को रचती है, वह इस चौपाए को नई आभा देता है । ऐसा क्यों है भला? क्योंकि गाय ने उस युग में मानव को जिंदा रहने का साहस दिया है जब उसके पास कुछ नहीं था। गाय का दूध मानव शिशु के  लिए तो उसके  कंडे ईंधन के लिए और उससे लिपे घर आज के पक्के फर्श का विकल्प थे। गोबर से ही बनी खाद उस जमीन को फिर ऊपजाउ बना देती जो एक-दो फसल के बाद किसी काम की नहीं रह जाती। जब जमीन और जिंदगी दोनों ही गाय पर इस कदर आश्रित हो तो फिर घर का पहला निवाला, पहला तिलक किसके लिए होगा?
आज वही गाय सड़कों पर प्लास्टिक की थैलियां खाने  को मजबूर है, तिलक और चारा उसे दिन विशेष को ही नसीब होता है। गांवों में निर्धारित गौचर की भूमि हम चर गए, गौशालाओं में हमने उन्हें पलने के लिए नहीं मरने के लिए छोड़ा। इन सबके साथ हमने मगरमच्छ के आंसू बहाने और सीख लिए। सब इन नकली आंसुओं के साथ विलाप कर रहे हैं। गाय की यह दशा इन्सानियत के पतन का  पता देती है। उसके नाम पर देश को बांटने में हमें रत्ती भर शर्म नहीं आती। गाय से प्रेम करने वाला किसी इन्सान का कत्ल कैसे कर सकता है? यह शक क्यों कि किसी के ट्रक, किसी के फ्रिज किसी की टौकरी में वही है।  ...और जो इन शक करने वालों के खिलाफ कोई बयान आता है तो सब फिर उसी पर  हावी होने लगतें हैं।
दरअसल हमारी अपनी नफरत और भय ने  इन अकारणों पर जोर देने के लिए मजबूर किया है जबकि हदीस में ही लिखा है कि गाय के दूध में शफा है, मक्खन में दवा और गोश्त में बीमारी है। हजरत मोहम्मद के हवाले से भी यही बात कही गई है कि ऊपरवाले ने हर बीमारी की दवा नाजिल फरमाई है बस गाय का दूध पीया करो क्योंकि ये हर किस्म के दरख्तों से चरती है। 
जाहिर है गाय के गुणों ने इसे वंदनीय बनाया है और हमारे अवगुण इस बेबस प्राणी को  नहीं बचा पा रहे हैं। क्यों ना इस रक्षाबंधन पर गौरक्षा का वचन लें। हर भाई-बहन यह वचन ले कि पॉलीथीन का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करेंगे। उन्हें सड़कों पर खुला नहीं छोड़ेंगे। हिंगोनिया गौशाला के पशु चिकित्सक बताते हैं कि कई गाय ऐसी आती हैं जिनका पूरा पेट इन थैलियों से भरा रहता है और फिर इन्हें बचा पाना नामुमकिन होता है। लोगों से मार-पीट कर नहीं प्लास्टिक थैलियों को ना कह कर गाय की हिफाजत की जा सकती है। बछ बारस एक दिन नहीं बारह महीने मनानी होगी

Friday, August 5, 2016

go girls go medals are waiting for u


 दुनिया का सबसे बड़ा खेल उत्सव कल  तड़के  सुबह ब्राजील की राजधानी रियो डी जेनेरियो में शुरू होने जा रहा है  । यह सचमुच अच्छा वक्त है क्योंकि पुराने वक्त में तो दमखम दिखाने का एकाधिकार केवल पुरुषों के पास था। शरीर को साधने का कोई मौका स्त्री के पास नहीं था। खुद को सजाने और खूबसूरत दिखने का प्रशिक्षण तो जाने -अनजाने हर लड़की  को उसकी पुरानी पीढ़ी दे देती थी लेकिन शरीर से पसीना बहाना, इस तपस्या में खुद को ढालना और फिर खरा सोना बन जाने का हुनर केवल इक्कीसवीं सदी की स्त्री में दिखता है। उजले चेहरे और तपी हुई त्वचा को देखने की आदत हमारी पीढ़ी को 1982 के दिल्ली, एशियाड से मिली। संयोग से उन्हीं दिनों शहरों को टीवी का तोहफा भी मिला था और एशियाई खेल इस पर सीधे प्रसारित हुए थे। उडऩपरी पी टी उषा का सौ मीटर और दो सौ मीटर में चांदी का पदक जीतना। वो चांद राम का पैदल दौड़ में पहले आना । ये मंजर देख हम बच्चों की आंखें सपनों से भर जाती। भारत-पाकिस्तान के हॉकी फाइनल मैच को देखने घर के बरामदे तक  में तिल धरने की जगह ना थी। यह जोश जुनून खेल देता है।     
2012 के लंदन ओलंपिक्स में जब मेरी कोम और साइना नेहवाल ने कांस्य पदक जीते तो वह देश के लिए कभी ना भूलने वाला पल बन गया। अभिनव बिंद्रा ने जब बीजिंग में सोने पर निशाना लगाया तो रोम-रोम रोमांचित हुआ था। भारत के ऊपर उठते ध्वज के साथ जब जन गण मन बजा तो लगा जैसे यही तो वे क्षण हैं जो राष्ट्र को गौरवान्वित करते हैं। राष्ट्र की अवधारणा ही ऐसे मंचों पर सार्थक होती है। खून-खराबों और एक राष्ट्र का दूसरे पर वर्चस्व किसी राष्ट्र के होने का पता नहीं देते लेकिन ओलंपिक खेल देते हैं। हमारी पहले की पीढ़ी ने ध्यानचंद की हॉकी का जादू देखा है तो मिल्खा सिंह और पीटी उषा जैसे एथलीटों को सेकेंड के सौवें हिस्से से पदक चूकते भी। अस्सी पार धावक मिल्खा सिंह का तो एकमात्र सपना ही देश को एथलेटिक्स में मैडल लेते देखना है। 
सच है कि आबादी के हिसाब से इन खेलों में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। सवा अरब से ज्यादा की आबादी एक स्वर्ण पदक के लिए तरसती है। बीच-बीच में सुशील कुमार और नरसिंह यादव जैसे विवाद सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हमारे देश में खेल नीति नाम की कोई सोच है या नहीं। इतने बड़े खेलों में जाने से पहले हम कोर्ट कचहरी में उलझते हैं कि कौन जाएगा और कौन नहीं। यह शर्मनाक है कि ब्रॉन्ज जीतने वाले योगेश्वर दत्त ये कहें कि मैं साई (स्पोर्टस अथॉरिटी ऑव इंडिया) की मैस में खाना नहीं खाता क्योंकि वहां उसमें कुछ मिला दिए जाने की आशंका होती है। देशवासी केवल भौचक्के होकर इन बातों को पढ़ते-सुनते रहते हैं। उन्हें कुछ समझ नहीं आता कि कौन सही है और कौन गलत। आखिर इस तरह के हालात के लिए कोई तो जिम्मेदार होगा। क्यों उन्हें चिन्हित नहीं किया जाता? भाग लेने से पहले इतना तनाव क्या खिलाड़ी की एकाग्रता को तबाह नहीं करेगा?
       वैसे 2016 के हमारे दल पर नजर डालें तो हमने पाया ही है। महिला खिलाडिय़ों की संख्या आधी-आधी न सही लेकिन आधी से थोड़ी ही कम है। ऐसा कहीं नहीं है ना प्रशासनिक सेवाओं में ना संसद में लेकिन यहां है। मेहनतकश महिला खिलाडिय़ों ने अपने दम पर यह मुकाम हासिल किया है। तीरंदाज दीपिका एक ऑटो रिक्शॉ चालक की बेटी हैं  और दूती चंद को तो स्त्री मानने से ही इंकार कर दिया गया था। जिमनास्ट दीपा करमाकर के तो पैर ही सपाट बता दिए गए थे फिर भी वे भारतीय दल में हैं। अपनी योग्यता के दम पर। यहां तक पहुंचना वाकई बड़ी बात है। लंदन ओलंपिक्स में हम 23 थे, रियो के लिए 54 का दल जा रहा है। बिना किसी आरक्षण के  यह अपने बूते पर हासिल की गई उपलब्धि है। साइना नेहवाल , मेरी कोम ने तो पदक भी दिलाए हैं। हम जीत रहे हैं और जीतेंगे यदि स्कूल और स्टेडियम में माहौल सकारात्मक हो। हर लड़की को कोई ना कोई खेल जरूर खेलना चाहिए। खिलाड़ी खुद में अतिरिक्त ऊर्जा का अनुभव करती है। वह नकारात्मक में भी सकारात्मक सोच का परचम लहराती है। खेल भावना उसे जीवन में भी कभी हारने नहीं देती। वे जीत रही हैं और जीतेंगी बशर्ते मम्मी-पापा उनके बचपन से ही खेलों को मेकअप की तरह प्रवेश करा दें। कॉस्मेटिक्स की परत रोमछिद्रों को बंद करती है, खेलों में बहाया पसीना इन रोम छिद्रों को खोलता है। चयन आपका है कि आप किसे तरजीह देती हैं।