Wednesday, December 21, 2016

पम -पम दादा का यूं चले जाना

अनुपम मिश्र चले गए एक बेहद निजि यात्रा पर। जिसका रोम-रोम सबके लिए धडक़ता हो, जो अपने होने को हवा, मिट्टी, पानी से जोडक़र देखता हो ऐसे अनुपम मिश्र का जाना समूचे चेतनाशील समाज के लिए बड़े शून्य में चले जाना है। कर्म और भाषा दोनों  से सादगी का ऐसा दूत  यही यकीन दिलाता रहा कि गांधी ऐसे ही रहे होंगे। उनसे मिलकर यही लगता कि हम कितने बनावटी हैं और वे कितने असल। वे पैदा जरूर वर्धा महाराष्ट्र में हुए , मध्यप्रदेश से जुड़े रहे, दिल्ली में गाँधी शांति प्रतिष्ठान के  हमसाया बने रहे लेकिन उनकी कर्मभूमि रहा राजस्थान। आज भी खरे हैं तालाब और राजस्थान की रजत बूंदों  में उन्होंने पानी बचाने वाले समाज का इतना गहराई से ब्योरा दिया कि खुद राजस्थानी भी इठलाने पर मजबूर हो गया। अलवर, बाड़मेर, लापोड़िया उनकी  प्रेरणा के बूते हरिया रहे हैं।
   अनुपम दा से कई मुलाकातें हैं। जितनी बार भी मिले उनका सरोकार होता पर्यावरण, गांधी मार्ग जिसके वे संपादक थे और मेरे बच्चे। वे बच्चों से इस कदर जुड़े रहते कि उन्हें खत भी लिखते। खतो-किताबत में उनका कोई सानी नहीं हो सकता। संवाद इस कदर सजीव कि बात करते हुए खुद के ही जिंदा होने का आभास मिलने लगता। कलम के करीब और माबाइल से दूर थे इसलिये शायद इतने सच्चे थे। वे कहते जिस तरह हम बोलते है उस तरह तू लिख और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख। एक पाठक के तौर पर आप भी क्रोधित हो सकते हैं कि मैंने उनके कहने के बावजूद गांधी मार्ग के लिए कोई पत्र नहीं लिखा जबकि उस पत्रिका का हर लेख मन को छू जाता। वे खुद तो इतना सरल-सहज लिखते कि लगता पास खड़े होकर बोल रहे हों। उन्होंने खुद अपने कैंसर की खबर फोन पर दी और मैं दिल्ली जाकर उनसे मिल भी न पाई। ऐसे कई अफसोस मुझे झिंझोड़ रहे हैं और आंख बस बह जाने को आतुर। क्या पता अब कब, कहां ऐसी सरल आत्मा के दर्शन नसीब हों?
    पत्रकार प्रभाष जोशी ने अनुपम मिश्र के लिए कहा था सच्चे, सरल, सादे विनम्र, हंसमुख पोर-पोर से मानवीय। इस जमाने में भी बगैर मोबाइल, बगैर टीवी और बगैर वाहन वाले नागरिक। दो जोड़ी कुरते पायजामे और झोले वाले इंसान। गांधी मार्ग के पथिक। गांधी मार्ग के संपादक। पर्यावरण के चिंतक। कितना सटीक लेखन एक दूसरे लेखक के बारे में। अनुपम मिश्र ने खुशबू के लिए भी लिखा। कभी पारिश्रमिक को लेकर बात होती तो कहते इसकी कोई जरूरत नहीं बस बात दूर तक पहुंचनी चाहिए। उन्होंने सप्रमाण लिखा कि हजारों हजार साल पहले जैसलमेर के मरुस्थल में समंदर हिलौरे मारता था। उन्होंने मध्यप्रदेश के ऐसे गांव के बारे में बताया जहां रस्सियों के सहारे गहरे नीचे उतरना होता था। वहां के आदिवासियों को औषधियों का गहरा ज्ञान था।
तस्वीर -साभार इंडियन एक्सप्रेस 

दिल गहरे तक उदास है की उन्हें रुकना चाहिए था। कुछ और सिपाही पानी को बचाने के लिए तैयार हो जाते फिर भी वे जो कर गए हैं, जो लिख गए हैं , वह पीढ़ियों तक हमारे मार्ग को रोशन रखेगा , काश सरकारें भी ऐसी शांत और शालीन शख्सियतों से प्रेरणा ले सकतीं । 

ps :एक बार वे मेरे पति शाहिद मिर्ज़ा साहब के इंदौर स्थित  निवास पर आये।  शाहिद जी की छोटी सी भांजी मिंटू को देखकर उन्होंने कहा की हमारा नाम पम-पम है तुम कौन हो।  सब हंस पड़े और हमारे घर में फिर उन्हें पम -पम दादा ही कहा जाने लगा। 


Saturday, November 26, 2016

पति को माता-पिता से अलग करना पत्नी की क्रूरता और पति के सम्बन्ध क्रूरता नहीं


लगभग एक महीने पहले सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया था कि पति को माता-पिता से अलग करना पत्नी की क्रूरता है और  हाल ही एक निर्णय आया है कि पति का विवाहेत्तर संबंध हमेशा क्रूरता नहीं होता, लेकिन यह तलाक का आधार हो सकता है। क्या ये दोनों ही फैसले स्त्रियों के सन्दर्भ में जड़वत बने रहने की पैरवी नहीं है?

लगभग एक महीने पहले सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया था कि पति को उसके माता-पिता से अलग करना पत्नी की क्रूरता है। दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अपने फैसेले में जो कहा वह इस प्रकार है-सामान्य परिस्थितियों में उम्मीद की जाती है कि पत्नी शादी के बाद पति का घर-परिवार संभालेगी। कोई नहीं सोचता कि वह पति को अपने माता-पिता से अलग करने की कोशिश करेगी। यदि वह पति को उनसे दूर करने की कोशिश करती है तो जरूर इसकी कोई गंभीर वजह होनी चाहिए लेकिन इस मामले में ऐसी कोई खास वजह नहीं है कि पत्नी पति को उसके माता-पिता से अलग करे सिवाय इसके कि पत्नी  को खर्च की चिंता है। आमतौर पर कोई पति इस तरह की बातों को बर्दाश्त नहीं करेगा। जिस माता-पिता ने उसे पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया है उनके प्रति भी उसके कर्त्तव्य  हैं।
सामाजिक रीति-रिवाजों के हिसाब से यह फैसला ठीक मालूम होता है लेकिन नजीर के हिसाब से इसकी समीक्षा जरूरी है।एक पल के लिए यह खयाल भी आता है कि जब लड़के की तरह पढ़ी-लिखी लड़की अपने माता-पिता का घर छोड़ती है, वह किस किस्म  क्रूरता होती है। संतान तो दोनों ही अपने माता-पिता की ही होती हैं फिर क्यों लड़की का सबकुछ छोडऩा इतना सामान्य है। रवायत के नाम पर कितनी बड़ी क्रूरता हमारा समाज लड़कियों से कराता आया है और वे इसे खुशी-खुशी करती भी आई हैं। नरेंद्र बनाम के.मीना के इस मामले में ऐसा मालूम होता है जैसे घर के  बड़े-बुजुर्गों  ने कोई फरमान सुनाया हो।
एक और फैसला हाल ही का है जब पति महोदय इस आधार पर तलाक चाहते थे कि गर्भावस्था में संबंध से इन्कार करना पत्नी की कू्र रता है। दरअसल, एक अन्य मामले में पति ने पत्नी के  ना कहने को क्रूरता बताते हुए तलाक मांगा था और उसे तलाक मिल भी गया था। इनसे अलग दिल्ली हाईकोर्ट ने एक  फैसले में पति की तलाक संबंधी याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि यदि पत्नी सुबह देर से सोकर उठती है और बिस्तर पर चाय की फरमाइश करती है तो वह आलसी के दायरे में भले ही आती हो, लेकिन आलसी होना निर्दई या क्रूर होना नहीं है।
विवाहेत्तर संबंध के आधार पर एक व्यक्ति को उसकी पत्नी के प्रति क्रूरता का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला एक मामले में सुनाया और आरोपी पति को बरी कर दिया। एक व्यक्ति की पत्नी ने उसके कथित विवाहेत्तर संबंधों के कारण आत्महत्या कर ली थी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, विवाहेत्तर संबंध अवैध या अनैतिक तो हो सकता है लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता के लिए पति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। क्योंकि इसे आपराधिक मामला करार देने के लिए कुछ और परिस्थितियां भी जरूरी होती हैं।क्या हम आप सब ऐसे मामलों के गवाह नहीं हैं जब दूसरी महिला की मौजूदगी पत्नी को ऐसे अवसाद में ले जाती है जहाँ वह आत्महत्या भी कर गुज़रती है।  यह क्रूरता कैसे नहीं हो सकती?
 
जाहिर है हमारी मानसिकता ही कभी अदालत में तो कभी अदालत के बाहर सर टकराती रहती है। समाज परिवार यही मान के चलते हैं कि हर हाल में पति की आज्ञा का पालन करना पत्नी का फर्ज है। शादी के सात फेरों में या किसी भी अन्य  विवाह तौर तरीकों में दोनों की बराबर भूमिका पर जोर है लेकिन प्रचलित तौर-तरीके इस कदर हमारे दिलों में बसे हैं कि हम मानवीय बराबरी को ही भुला बैठते हैं। ऐसी सहमतियां जब उच्च सदनों से आती हैं तो आधी आबादी खुद को यू-टर्न लेता हुआ पाती है।
शैली बताती हैं कि मेरी सास मुझे हर बार गर्भावस्था में कम खाने को देती थीं। हम बड़ों की बातों पर यकीन भी करते हैं क्योंकि इन मामलों में उन्हीं का अनुभव काम आता है लेकिन मेरे तीन बार अबॉर्शन हुए क्योंकि मैं ऐनिमिक थी। दरअसल ऐसी अनेक छोटी-बड़ी अनबन परिवार के  बीच वैमनस्य को बढ़ाती हैं और तलाक ऐसी ही वजहों की तलाश में रहता है। वह तो फै सलों को चाहिए कि वे ऐसी परंपराएं न  स्थापित कर दें जो एकतरफा मालूम होती हों।
लीगल स्कॉलर फ्लाविया एग्नस अपने एक स्तंभ में लिखती हैं कि ऐसे फैसले इसलिए भी आते हैं क्योंकि हिंदू विवाह अधिनियम में कन्यादान की अवधारणा है, लड़की को पराया धन माना जाता है। यही बात न्याय व्यवस्था को भी परिचालित करती है। ऐसा फैसला ईसाई या पारसी शादियों में कभी नहीं दिया जा सकता कि बहू के अलग रहने की मांग को क्रूरता की संज्ञा दी जाए। लड़कियों को शादी के बाद परेशानी होने पर भी परिवार वापस ससुराल भेजने में ही भलाई समझते हैं।
यूं तो यह पति-पत्नी की ही सहमती होती है कि वे माता पिता के पास रहना चाहते हैं या नहीं। ऐसे में दबाव काम नहीं कर सकता। कई भारतीय परिवार  बरसों-बरस इस चक्रव्यूह में उलझे तो रहते हैं लेकिन कोई हल नहीं निकाल पाते।  पति-पत्नी के बीच यह तनाव किसी बरछी की तरह साथ चलता है। वे जब-तब इसे एक दूसरे को चुभाते रहते हैं।  शादी दो आत्माओं का संबंध है तलाक इसमें जाने कौन-कौन सी प्रेतात्माओं को शामिल करा
देता है।

Wednesday, November 23, 2016

धूप पर कोई टैेक्स नहीं लगा है

इमेज क्रेडिट -उपेंद्र शर्मा, अजमेर 

भूल जाइये तमाम रंज ओ गम
मजा लीजिए मौसम का
कि सर्दी की दस्तक पर कोई बंदिश नहीं है
धूप पर कोई टैेक्स नहीं लगा है
धरा ने नहीं उपजी है कोई काली फसल
रेत के धोरे भी बवंडर में नहीं बदले  हैं
पेड़ों ने छाया देने से इंकार नहीं किया है
परिंदों की परवाज में कोई कमी नहीं है
आसमान का चांद अब भी शीतल  है
दुनिया चलाने वाले ने निजाम नहीं बदला है
फिर हम क्यों कागज के पुर्जों में खुद को खाक कर रहे हैं

शुक्र मनाइये कि सब कुछ सलामत है
नदी की रवानी भी बरकरार है
कच्ची फुलवारी भी खिलने को बेकरार है
करारे नोटों का नहीं यह हरेपन का करार है
भूल जा तमाम रंज ओ गम
कि कुदरत अब भी तेरी है
ये बहार अब भी तेरी है
हुक्मरां कोई हो
हुकूमत केवल उसकी है
और बदलते रहना उसकी ताकत
भूल जाइये तमाम रंज ओ गम
मजा लीजिए मौसम का
किसी के काला कह देने से कुछ भी काला नहीं होता
 ... और सफ़ेद कह देने से भी नहीं ।