Thursday, March 2, 2017

गुरमेहर जिस पर गुरु की कृपा हो


गुरमेहर यानी वह जिस पर गुरु की कृपा हो। लेडी श्री राम कॉलेज की छात्रा गुरमेहर से बातचीत के लिए जब तर्क खत्म हुुुुए तो उन्हें सबक सिखाने के लिए दुष्कर्म की धमकी दी गई।  तर्क से बात नहीं बनीं तो दुष्कर्म की धमकी देने को किसी भी नजरिए से कैसे सही ठहराया जा सकता है। वे यह भी कहती हैं कि पाकिस्तान ने नहीं युद्ध ने मारा  है मेरे पिता को। जवाब में उन्हें कहा गया कि यदि उनके पिता जिन्दा होते तो  शर्मसार होते।  फिर कौर कहती हैं मेरे पिता को मुझ पर फख्र होता कि मैं अपने साथियों के साथ आवाज बुलंद कर रही हूं।
क्या वाकई किसी देश के लिए नर्म रवैया रखना देशद्रोह है और क्यों जब बात तर्क से नहीं बनती तो दुष्कर्म का हवाला देकर सबक सीखाने का पैंतरा अपनाया जाता है? दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब पूर्व जर्मनी और पश्चिम जर्मनी के बीच की दीवार टूट सकती है, अमरिका जापान नए समीकरण बना सकते हैं, फ्रांस जर्मनी भी मिलकर नई इबारत लिख सकते हैं  तो ये दो देश क्यों नहीं? कहीं सियासत ही इसकी जड़ में तो नहीं?
   
कल्पना कीजिए कि ऐसे ही जैसे गुरमेहर को ट्रोल किया गया कोई भारत माता की जय के नारे बोलते हुए उनका कुर्ता  फाड़ दे, पत्थर फेंके, कार के शीशे तोड़ दे क्योंकी उन्हीं की पार्टी ने कश्मीर में उस पार्टी के साथ मिलकर सरकार बना रखी है जिसने पत्थर बाजों को रिहा कर दिया। यह भी कहा कि बुरहान को किसी दूसरी तरह से टेकल किया जा सकता था, आतंकवादियों के जनाजे में शामिल हुए हैं , घर पर शोक प्रकट करने गए हैं तब? क्या यह सही होगा ? जाहिर है प्रजातंत्र में इन सबकी कोई जगह नहीं । यहां बात होनी चाहिए। विचार पर विचार आने चाहिए। तर्क से विवेक से होश ओ हवास के साथ।
शहीद की बेटी तो और भी सम्मानित हो जाती हैं । केवल इसलिए कि उनके विचार आपसे अलग हैं उनकी देशभक्ति की परिभाषा आपसे अलग है वे दुष्कर्म की हकदार हो जाती हैं? मंत्री महोदय बजाय दुष्कर्म का विरोध करने के यह कहते हैं कि किसने इनके दिमाग में जहर भरा है। परेशान गुरमेहर ने फिलहाल दिल्ली छोड़ दिया है। वे अपने घर जालंधर लौट गईं हैं। एक लड़की को हम इतना ही साहस दे पाते हैं कि अगर वह कुछ बोले तो हम उसके वजूद को ही छिन्न-भिन्न कर दें? क्यों एक पल को भी हम यह नहीं सोच पाते कि जिस बेटी ने अपना पिता खोया है, इसके बावजूद वह शांति का संदेश देना चाह रही है तो कोई कारण रहा होगा? हम सिर्फ अपनी नफरत को  हवा देते रहना चाहते हैं? क्या यह बात हमें जरा भी बेचैन नहीं करती?
       गुरमेहर कौर की मां राजविंदर कौर की बात सुनिये  ''मैं कभी नहीं चाहती थी कि मेरी बेटी को कोई बेचारी बच्ची कहे. मैं इस बात को लेकर निश्चिंत थी कि मेरे बच्चे ख़ुद को असहाय महसूस नहीं करेंगे. इनके पिता नहीं रहे लेकिन ये पीड़ित नहीं हैं. मेरे पति कश्मीर के कुपवाड़ा में नियुक्त थे. वह गुल से फोन पर बात करते थे. तब मेरी बेटी ने बोलना शुरू ही किया था.'' राजविंदर ने कहा, ''हमलोगों ने उसे हेलो की जगह वंदे मातरम कहना सिखाया था. तब उसे पता रहता था कि फ़ोन पर उसके पिता हैं. वह हिन्दी फ़िल्म सोल्जर का सोल्जर-सोल्जर गाना गाती थी. उसकी आवाज़ में वह गाना सुनना काफी अच्छा लगता था. जब मेरे पति मुझे चिट्ठी लिखते थे तो वह गुल के लिए एक अलग पन्ने पर चित्र बनाकर भेजते थे.''''जब वह छह साल की थी तो मैंने महसूस किया कि उसके मन में काफी ग़ुस्सा है।  मेरठ में उसने एक बुर्के वाली महिला पर हमला कर दिया था जो माहौल था उसमें उसके मन में यह बात पैठ गई थी कि मुसलमान और पाकिस्तान ने उसके पिता को मारा है।  फिर मैंने उसे समझाना शुरू किया। मैंने उसे बताया कि उसके पिता को युद्ध ने मारा है।  वह उन्हीं बच्चों में से एक है जो अपने माता-पिता को युद्ध में खो देते हैं।  मैं नहीं चाहती थी कि मेरी बेटी प्यार के बजाय नफरत को दिल रख बड़ी हो। ''
उधर क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने भी ट्वीट कर दिया कि तिहरा शतक मैंने नहीं मारा था मेरे बल्ले ने मारा था। एक्टर रणदीप हुड्डा ने ट्वीट में स्माइलीज बिखेर दिए। अब हुड्डा कह रहे हैं मैं तो सेहवाग के जोक पर हंसा था।  उधर रामजस कॉलेज के प्राचार्य का कहना है कि उनका दिल रो रहा है। दरअसल घटनाक्रम इसी कॉलेज से ही प्रारंभ होता है जब एबीवीपी को यह लगा कि यहां छात्र उमर खालिद भी बोलने वाले हैं और पत्थरबाजी हुई।
 गुरमेहर के दादा कंवलजीत सिंह ने कहा है कि गुरमेहर एक बच्ची है और अब ये सब ड्रामा बंद होना चाहिए। सिंह ने कहा कि राजनेताओं को इस बारे में अब बयान देने से बचना चाहिए। सही कह रहे हैं दादाजी। पोती के लिए उनकी चिंता को सर्वाेपरी मानना चाहिए। वे सजा के हकदार हैं जो यूं बेटियों को अपमानित करते हैं। इस हरकत को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय बेहद शर्मनाक हरकत की तरह देखना चाहिए। अगर हम वाकई बेटियों की चिंता करते हैं तो गुनाहगारों को माफी नहीं मिलनी चाहिए। तभी बेटियों का आत्मसम्मान भी बचा रहेगा।

Tuesday, January 31, 2017

विरह में जलने और यूं जलने में ज़मीन आसमान का फर्क है

पूर्व से पश्चिम तक हवाएं कुछ गर्म हैं। सर्द मौसम में ये गर्म हवाएं क्योंकर चल रही हैं? क्यों सब निषेध या ना कहकर ही अपनी मुश्किलों को आसान करना चाहते हैं? क्यों हम अभिव्यक्ति  को थप्पड़ मार रोकना चाहते हैं? मान लिया कि आपको घणा एतराज है कि कोई फिल्मकार रानी पद्मावती को क्रूर अलाउद्दीन खिलजी के सपने में दिखाकर  गलती कर रहा है तो आप थप्पड़ जडऩे के अधिकारी हो जाते हैं? फिर जब थप्पड़ खाने के बाद फिल्मकार यह कहता है कि मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा जिससे आपको तकलीफ पहुंचे तो क्या वाकई बहुत खुश हो जाने वाली बात होगी? जिस मरुधरा के  रंग पूरी दुनिया को आकर्षित करते हैं वहां  क्यों इकरंगी और ऊब से भरी दुनिया की पैरवी हो रही है?
अगर किसी ने ऐसी ही रोक सूफी संत कवि मलिक मोहम्मद जायसी पर लगाई होती तो क्या हम पद्मावत का सुदंर काव्य पढ़ पाते? इसी महाकाव्य में रानी पद्मावती के सौंदर्य और राजा रत्नसेन के प्रेम की दिव्यता का भी उल्लेख है। जायसी ने पद्मावत में इतिहास और कल्पना, लौकिक और अलौकिक का ऐसा सुंदर सम्मिश्रण किया है कि कोई दूसरी कथा इस  ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकी है। जायसी के काव्य में रानी पद्मावती सिंहल देश यानी श्रीलंका की राजकुमारी है जिसकी तलाश में  रावल रतन सिंह  अपनी पत्नी नागमती  को छोड़ चल देते हैं। उन्हें पद्मावती का बखान एक तोते हीरामन  से सुना था। जायसी ने नागमती विरह को भी काव्य के जरिए जो उपमाएं दी हैं वैसा दुनिया के किसी साहित्य में आसानी से देखने को नहीं मिलता। विरह प्रेम का ही दूसरा नाम है।  कुहुकि कुहुकि जस कोइल रोई। रक्त आँसु घुंघुची बन बोई।।” नागमती की आँखों से आँसू नहींखून के बूँदें टपक रही हैं। नागमती दुख के उस पूरे साल का दर्द रचती हैं जब रतनसिंह पद्मावती को पाने के लिए श्रीलंका की यात्रा पर जाते हैं।
   जायसी के मुताबिक पद्मावती जब उनसे मिलने के लिये एक देवालय में आई, उन्हें देखकर वह बेहोश हो गए और पद्मावती उन्हे अचेत छोड़कर चली गर्इं। चेत में आने पर रतनसिंह  बहुत दुखी हुए। जाते समय पद्मावती ने उसके हृदय पर चंदन से यह लिख दिया था कि उसे वह तब पा सकेंगे, जब वह सात आकाशों (जैसे ऊंचे) सिंहलगढ़ पर चढ़कर आएंगे। राजा को जब यह सूचना मिली तो उन्होंने रतनसिंह को फांसी देने का आदेश दिया लेकिन जब उन्हें रतनसिंह की  हकीकत मालूम हुई तब पदमावती का विवाह उनके साथ कर दिया।
अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में रत्नसेन  के विरोधि पंडित पद्मावती के सौंदर्य का बखान करते हैं और खिलजी उसे पाने के लिए लालायित हो जाता है। चित्तौड़ पर चढ़ाई के तमाम प्रयास विफल रहते हैं तब वह रतनसेन से संधि का धोखा रचता है। खिलजी उन्हें बंदी बना दिल्ली लौटता है। चित्तौड़ में पद्मावती अत्यंत दुखी होकर पति को मुक्त कराने के लिये अपने सामंतों गोरा और बादल के घर जाती हैं। वेे रतन सिंह को आजाद कराने का बीड़ा लेते हैं। सोलह सौ डोलियों में सैनिकों को रख वे दिल्ली की ओर चल पड़ते हैं। वहां पहुंचकर संदेश भेजते हैं कि पद्मावती  दासियोंं के साथ सुल्तान की सेवा में आईं है और आखिरी बार अपने पति रतनसेन से मिलने की आज्ञा चाहती हैं। सुल्तान की आज्ञा के बाद डोलियों में बैठे सैनिक रतनसिंह  को बेडयि़ों से मुक्त करा भाग निकलते हैं। रतन सिंह राजपूत सुरक्षित चित्तौड़ पहुंच जाते हैं। पद्मावती बताजी है कि उनकी गैरमौजूदगी में कुंभलनेर के राजा देवपाल ने उन्हें प्रेम-प्रस्ताव भेजा था। राजा इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और लड़ाई में देवपाल को मार खुद भी जिंदा नहीं रह पाते। नागमती और पद्मावती जौहर कर लेती हैं। अगर जो यह कथा सच है तो तकलीफ जौहर से होती है। क्यों कोई प्रेम में यूं खुद को जलाए? विरह में जलने और यूं जलने में ज़मीन आसमान का फर्क है ये दौर वाकई बेहतर है क्योंकि संविधान इसे गुनाह कहता है।
कविता- कहानी कहने वाले का अपमान क्यों होना चाहिए ?  सिर्फ इसलिए की इससे हमारी आस्था डिगती है। एक फिल्मकार  की क्या बिसात कि वह जनमानस में मौजूद रानी पद्मिनी के सम्मान को डिगा सके।  जो रानी पद्मिनी के नाम पर हमें अपना हितस्वार्थ देखना है तो बात और है। हमारे ध्येय वाक्य ही जब पधारो म्हारे देस से जाने कब क्या दिख जाए हो जाएगा   तो व्यवहार में शामिल भी होगा ही। 

Wednesday, December 21, 2016

पम -पम दादा का यूं चले जाना

अनुपम मिश्र चले गए एक बेहद निजि यात्रा पर। जिसका रोम-रोम सबके लिए धडक़ता हो, जो अपने होने को हवा, मिट्टी, पानी से जोडक़र देखता हो ऐसे अनुपम मिश्र का जाना समूचे चेतनाशील समाज के लिए बड़े शून्य में चले जाना है। कर्म और भाषा दोनों  से सादगी का ऐसा दूत  यही यकीन दिलाता रहा कि गांधी ऐसे ही रहे होंगे। उनसे मिलकर यही लगता कि हम कितने बनावटी हैं और वे कितने असल। वे पैदा जरूर वर्धा महाराष्ट्र में हुए , मध्यप्रदेश से जुड़े रहे, दिल्ली में गाँधी शांति प्रतिष्ठान के  हमसाया बने रहे लेकिन उनकी कर्मभूमि रहा राजस्थान। आज भी खरे हैं तालाब और राजस्थान की रजत बूंदों  में उन्होंने पानी बचाने वाले समाज का इतना गहराई से ब्योरा दिया कि खुद राजस्थानी भी इठलाने पर मजबूर हो गया। अलवर, बाड़मेर, लापोड़िया उनकी  प्रेरणा के बूते हरिया रहे हैं।
   अनुपम दा से कई मुलाकातें हैं। जितनी बार भी मिले उनका सरोकार होता पर्यावरण, गांधी मार्ग जिसके वे संपादक थे और मेरे बच्चे। वे बच्चों से इस कदर जुड़े रहते कि उन्हें खत भी लिखते। खतो-किताबत में उनका कोई सानी नहीं हो सकता। संवाद इस कदर सजीव कि बात करते हुए खुद के ही जिंदा होने का आभास मिलने लगता। कलम के करीब और माबाइल से दूर थे इसलिये शायद इतने सच्चे थे। वे कहते जिस तरह हम बोलते है उस तरह तू लिख और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख। एक पाठक के तौर पर आप भी क्रोधित हो सकते हैं कि मैंने उनके कहने के बावजूद गांधी मार्ग के लिए कोई पत्र नहीं लिखा जबकि उस पत्रिका का हर लेख मन को छू जाता। वे खुद तो इतना सरल-सहज लिखते कि लगता पास खड़े होकर बोल रहे हों। उन्होंने खुद अपने कैंसर की खबर फोन पर दी और मैं दिल्ली जाकर उनसे मिल भी न पाई। ऐसे कई अफसोस मुझे झिंझोड़ रहे हैं और आंख बस बह जाने को आतुर। क्या पता अब कब, कहां ऐसी सरल आत्मा के दर्शन नसीब हों?
    पत्रकार प्रभाष जोशी ने अनुपम मिश्र के लिए कहा था सच्चे, सरल, सादे विनम्र, हंसमुख पोर-पोर से मानवीय। इस जमाने में भी बगैर मोबाइल, बगैर टीवी और बगैर वाहन वाले नागरिक। दो जोड़ी कुरते पायजामे और झोले वाले इंसान। गांधी मार्ग के पथिक। गांधी मार्ग के संपादक। पर्यावरण के चिंतक। कितना सटीक लेखन एक दूसरे लेखक के बारे में। अनुपम मिश्र ने खुशबू के लिए भी लिखा। कभी पारिश्रमिक को लेकर बात होती तो कहते इसकी कोई जरूरत नहीं बस बात दूर तक पहुंचनी चाहिए। उन्होंने सप्रमाण लिखा कि हजारों हजार साल पहले जैसलमेर के मरुस्थल में समंदर हिलौरे मारता था। उन्होंने मध्यप्रदेश के ऐसे गांव के बारे में बताया जहां रस्सियों के सहारे गहरे नीचे उतरना होता था। वहां के आदिवासियों को औषधियों का गहरा ज्ञान था।
तस्वीर -साभार इंडियन एक्सप्रेस 

दिल गहरे तक उदास है की उन्हें रुकना चाहिए था। कुछ और सिपाही पानी को बचाने के लिए तैयार हो जाते फिर भी वे जो कर गए हैं, जो लिख गए हैं , वह पीढ़ियों तक हमारे मार्ग को रोशन रखेगा , काश सरकारें भी ऐसी शांत और शालीन शख्सियतों से प्रेरणा ले सकतीं । 

ps :एक बार वे मेरे पति शाहिद मिर्ज़ा साहब के इंदौर स्थित  निवास पर आये।  शाहिद जी की छोटी सी भांजी मिंटू को देखकर उन्होंने कहा की हमारा नाम पम-पम है तुम कौन हो।  सब हंस पड़े और हमारे घर में फिर उन्हें पम -पम दादा ही कहा जाने लगा।