Thursday, May 23, 2013

जॉली वुमन


बात  ऐसी स्त्री की जिसने अपनी माँ को स्तन कैंसर से मरते हुए देखा और जब जाना कि उनके अन्दर भी वही जीन है तो उन्होंने स्तन ही हटवा लिए . यह फैसला मशहूर हॉलीवुड अदाकरा एंजलीना जॉली का है . क्या वाकई यह एक जॉली वुमन का सहस से भरा  निर्णय है जिससे दुनिया की तमाम स्त्रियों को एक दिशा मिलेग। किसी अंग को महज आशंका में यूं कटवा देना बीमारी का बर्बर इलाज नहीं ?.
 हॉलीवुड अभिनेत्री एंजलीना जोली के
इस निर्णय का  विरोध ·रते हुए एक
अमेरिकी  शिक्षिका  ने ·हा है कि  वे
अमीर हैं, उनके  पास सारी सुखसुविधाएं
हैं, उनकी  देखभाल के  लिए लंबा-चौड़ा स्टाफ मौजूद है इसलिए वे
महंगी सर्जरी करा सकती हैं। एंजलीना
के  इसे उजागर करने से मेरी जैसी
कई  मध्यमवर्गीय परिवारों को  बेहद
तकलीफ हुई है क्योंकि हम इस खर्च
का  भार नहीं उठा सकते। मेरी मां को
भी कैंसर था और मेरे अंदर भी
बीआरएसी 1 जीन हो सकता है  लेकि न

मैं परीक्षण को करा पाने में सक्षम नहीं।
ऐसा कहने  वाली डे.बी जेंटाइल न्यू
जर्सी में नन्हें बच्चों को  पढ़ाती हैं।
एंजलीना ने जिस न्यू यॉर्क टाइम्स
अखबार में लिख कर अपने स्तन
हटवाने की  घोषणा की  है बाद में उसी
अखबार के  संपादक ने भी लिखकर
इस बात स्वीकारा है कि एंजलीना
का सच पूरे अमेरिका का  सच नहीं हो
सकता।
सवाल यह उठता है कि  सिर्फ
आशंका  में आप इतना बड़ा निर्णय कैसे
ले सकते हैं? एंजलीना के  मुताबिक
जिस ब्रेस्ट कैंसर का  खतरा पहले 83
फीसदी था वह अब घटकर  पांच फीसदी रह गया है। यह पांच फीसदी
.क्या है जो बच गया है? अगर सिर्फ
आशंका  के  चलते इतना कुछ हुआ है तो
यह हमारे साथ क ब नहीं होती। घर से
चलते वक्त से रात को  सोने तक  हर
पल हम आशंकित हैं। फिर भी मानव अपने हौसलों से जीता है।  मनुष्य को शुरुआत में हर फल चखने से
पहले आशंका  ही हुई होगी लेकिन फिर
भी उसने चखा होगा। उसी का  नतीजा
है की  आज हमारे पास खाद्य और
अखाद्य की  लंबी फेहरिस्त है। रहस्यों  से
angelina jolly
आवरण हटाते हुए इंसान ने जो
खूबसूरत दुनिया अपनी अगली पीढ़ी
  को दी वह बेहतर से बेहतर होने की
ओर थी। आज भी वही सब हो रहा है
लेकिन आज सब तकनीक  और
आधुनिक  विज्ञान के हवाले कर दिया
गया है जो की  सिर्फ चंद समर्थ लोगों
की  पहुंच में है। वह एक ऐसा निजाम रचती
हैं कि  जो समर्थ नहीं है वह भी उसी
दिशा में प्रवृत्त  हो। सिलेब्रिटी को कुछ
होना और फिर उसका सुनियोजित
प्रचार क हीं ज्यादा आशंकाओं को  जन्म
देता है।
एंजलीना ने अपने लेख को  काफी
भावनात्मक  रंग में रंगा है। यह लेख
एक  सामान्य स्तंभ की  तरह अखबार में
जगह पा गया ऐसा  नहीं है। अखबार के लिए भले ही यह रहस्योद्घाटन
ब्रेकिंग  न्यूज हो लेकिन एंजलीना के  हर
शब्द पर कई बार विचार हुआ होगा।
वैसे एंजलीना ने कहाँ कैसे और कब
 इसे कराया। यह सब लेख में है। वे लिखती हैं उनकी  मां
दस साल तक कैसर से लड़ते हुए 56
साल में चल बसीं और नवासे-नवासियो
को  अपने वात्सल्य की  छाया
नहीं दे पाईं। एंजलीना ने लिखा है कि
कम अज कम उनके बच्चों को  यह डर
नहीं है कि  उनकी मां भी एक  दिन ब्रेस्ट
कैसर से मर जाएगी।
यहां यह ·कहना बिलकुल भी ठीक
नहीं होगा कि  एंजलीना जैसी
परिस्थितियों से घिरने पर हरेक को
मैस्टैकटॉमी यानी स्तन हटवा लेने
चाहिए। यह जीन वाकई जिन्न होता है
यह निजी हालत पर ज्यादा निर्भर
 रता है। सैंतीस वर्षीय एंजलीना के
हालात से अमेरिकी स्त्रियों की  तुलना
नहीं हो सकती और भारतीयों की  तो
बिलकुल भी नहीं। आशंकाओं का
बिजनेस बहुत बड़ा है। इसके मायाजाल
को  समझना जरूरी है। दुनिया के
ज्यादातर शोध आशंकाओं  पर ही होते
है। मनुष्य इतने बरसों से दीर्घायु जीवन
कैसे जीता रहा इस पर नहीं होता। कम
जांच, कम दवाएं   कैसे काया को  निरोगी
रख सकती हैं इस बारे में बताने वाला
कोई नहीं। यह धंधा बड़ा विचित्र है।
पहले परीक्षण, फिर स्तन हटवाना और
अंत में उन्हें नए सिरे से इम्प्लाट कराना
बड़ा निवेश मांगता है और अब तो
एंजलीना उससे जुड़ गई हैं। दुनिया
हॉलीवुड की  इस मूवी स्टार को  पसंद
करती है। उनके नेक कामों के चर्चे पूरी 
दुनिया में पहले ही हैं। उन्होंने
अफगानिस्तान में स्कूल  खोले हैं। यूएन
की  वे गुडविल एंबेसेडर रही हैं। कहा
जा स·ता है कि  बीआरएसी1 जीन ने
भी एंजलीना को  अपना ब्रांड एंबेसेडर
चुनने में कोई देरी देरी नहीं की है । वे 37 की  हैं
और इसी उम्र के  आसपास ब्रेस्ट कैंसर
का खतरा भी सर्वाधिक  होता है। आम
महिला को  कतई एंजलीना के पदचिन्हों
पर चलने की  जरूरत नहीं है।  अन्य कैंसर  की  तुलना में
ब्रेस्ट कैंसर  का सर्वाइवल रेट 93
प्रतिशत है। जोली का  यह कहना ठीक
नहीं  कि  मेरे केस से अन्य महिलाओं
को  प्रेरणा मिलेगी। जीवन को
चिकीत्स्कीय  झंझटों में डालकर आगे
बढ़ाने की  बजाय बेहतर है कि  उसे
कुदरती बनाया जाए क्योंकि  हम हैं तो
आखिर माटी के  ही पुतले।

Wednesday, April 24, 2013

गुड़िया भीतर गुड़ियाएं

हम सब गुस्से में हैं। हमारी
संवेदनाओं को एक  बार फिर
बिजली के नंगे तारों ने छू दिया है।
हम खूब बोल रहे हैं, लिख रहे हैं
लेकिन  कोई नहीं बोल रहा है तो
वो सरका र और
कानून व्यवस्था
  के लिए  ज़िम्मेदार लोग। खूब
बोल-लिख कर  भी लग रहा है कि
क्या यह काफी है ? कोई हल है हमारे पास कि  बच्चों
का  यौन शोषण न हो और बेटियों
के  साथ बलात्कार का  सिलसिला
रुक जाए। ऐसी जादू की  छड़ी किसी कानून के पास नहीं लेकिन
कानून लागू करने वालों के  पास
एक शक्ति है वह है इच्छा शक्ति।
ईमानदारी से लागू करने की  इच्छा
शक्ति। हमने किसी  भी सरकारी
मुखिया को  सख्ती से यह कहते
नहीं सुना कि  बहुत हुआ, अब और
नहीं। मेरे देश, मेरे प्रदेश में इस
तरह का कोई  भी अपराध बर्दाश्त
नहीं किया जाएगा। हर मुखिया
बचता नजर आता है। बयान आते
हैं पुलिस क्या करे वह हर दीवार,
हर कौने की  चौकसी नहीं कर
सकती; दुष्कर्म एक सामाजिक
अपराध है; कोई भी सरकार हो,
इलजाम तो सरकार पर ही लगते
हैं; ऐसे उबा देनेवाले बयानों की
लंबी फेहरिस्त है। कोई सख्त
आवाज नहीं गूंजती कि ऐसे
वहशियाना कृत्य को  अंजाम देने
वाले दरिंदों को  बख्शा नहीं
जाएगा। ऐसा  कोई संदेश जब
ऊपर से नहीं आता तो नीचे वाले
अपने आप ही मुक्त हो जाते हैं ।
दरअसल, हमारा समाज अब भी
की  मानसिकता में नहीं है। क्या
हुआ लड़के  ने जोर जबरदस्ती की
चलो शादी कर दो इन दोनों की ।
आज भी यही हल दिखाई देता है
बलात्कारियों का । इसकी  पुष्टि
पकडे़ गए आरोपी मनोज के घर
से भी होती है। दिल्ली में पांच
साल की  बच्ची से दुराचार करने
वाले मनोज ने अपनी पत्नी के
साथ भी यही हरकत की  थी।
पंचायत ने फिर उनका  ब्याह करा
दिया। अपनी साली के  साथ भी
यही व्यवहार दोहराया था और पांच
साल की  मासूम से पहले भी वह
न जाने कितने बच्चों को  अपना
शिकार बना चुका  हो। जरूरी नहीं
कि  इसमें बेटियां ही हों। बेटे भी तो
हो सकते हैं। लड़कों के  माता-पिता
को कतई बेखौफ होने की
जरूरत नहीं।
हम इस अपराध को  अपराध
ही नहीं मानते शायद तभी हर
लड़की  का  अपने जीवन में ऐसे कई अपराधियों से सामना होता
है। घर, छत, गली, थिएटर,
बाथरूम, यहां तक कि  पूजा स्थलों
पर भी ऐसे शिकारी घात लगाए
बैठे होते हैं। लड़की खुद को बचने में  ऊर्जा खर्च
करती हैं वहीं ये दुराचारी अपनी
कुचेष्टाओं को  धारदार बनाने में
लगे रहते हैं। यह जितना प्रचलित
है उतनी ही प्रचलित है घरवालों
की लापरवाही। हर लड़की को  यह
घुट्टी पिला दी जाती है कि  चुप रह,
ज्यादा शोर न मचाना। दुष्कर्मी
पहला शिकार परिवार से ही ढूंढता
है और जब परिवारों की चुप्पी  उसे
शह देती है तो वह निरंकुश हो
जाता है।
इन घटनाओं को  लड़कियों
की  इज्जत से जोड़कर देखा जाता
है। अपराध सहते रहो तो इज्जत
बरकरार है और ज्यों ही आवाज
उठाई वह तार-तार हुई। यह कैसी
इज्जत है जो चुप्पी  से चलती है।
हरकत करने वाला बाइज्जत बरी
और लड़की  बेइज्जत। अभी भी
कई जगह लिखा जा रहा है कि
गुडि़या की  अस्मत की कीमत
पुलिस ने दो हजार रुपए लगाई।
पुलिस की  यह भूमिका  बड़ी रोचक
है। जो पेशकश   अपराधी की  ओर
से होनी चाहिए थी वह पुलिस की
ओर से हो रही थी यानी
अपराधी-पुलिस भाई-भाई।
पांच साल की  गुडिय़ा अकेली
नहीं है। गुडिय़ा भीतर कई
गुडिय़ाएं हैं असंख्य अपराधियों से
घिरीं। एक  समय था डायन, सती,
विधवा प्रताडऩा, नाता जैसी कई
कुप्रथाओं से घिरा था समाज।
राजा राममोहन राय, दयानंद
सरस्वती जैसे समाज सुधारकों  ने
लंबी लड़ाई लड़ी। यह लड़ाई
मुसलसल यानी लगातार जारी
रहनी चाहिए थी। आज उस
भूमिका  में कोई नहीं रह गया है।
दुष्कर्म, अपचार जैसी सामाजि·
बुराईयां बढ़ी हैं। यह दो
राजनैतिक  दलों के  लचर बयानों
से नहीं जानेवाली। इन दलों का
लक्ष्य समाज को  स्वस्थ और
मजबूत बनाने का  नहीं बल्कि सत्ता
प्राप्ति का  है। इनसे और इनके
सिस्टम से न्याय मिलेगा इसमें
संदेह है हर भारतवासी को .

Sunday, April 21, 2013

जान मेरी

जान मेरी
जाने किस पड़ाव पर हूँ ज़िन्दगी के
कोई वाक़या नहीं
कोई मसला नहीं
कोई सिलसिला नहीं
कोई इल्तजा नहीं
कोई मशवरा नहीं
कोई एतराज़ नहीं 
कोई ख़लिश नहीं
कोई रंजिश भी नहीं
है तो बस मोहब्बत की वह  पाक सुराही
छलक  रहा है जहाँ से
 रंग  सुकूं अब भी मेरे लिए .